पुनीता जैन की कविताएँ

पुनीता जैन
गठरियाँ 
जीवन के एक पड़ाव पर
 व्याख्या की जगह
 सारांश से
 लिया जाने लगता है काम

फैली हुई बात
समेटते हुए
तैयार निष्कर्षों से
ढोया जाने लगता है जीवन
अलग-अलग समूह
अलग अलग तेवर
अलग-अलग नामकरण

जब कहीं कोई
ऐसे निष्कर्षों को ताड़ते हुए
गहरी घाटी में उतर
स्याह तहखाने तलाश लेता उसके
और लौट आता
साहस कर लेता
नयी व्याख्याओं को समझाने का
तब इसे कहा जाने लगता है
उल्लंघन

क्रियाओं से डरी संज्ञाएं
गढ़ती हैं फिर
कानून
संहिताएं
विधान
परम्परा या फिर/ पद्धतियाँ

इसी तरह / बनती रही
हमेशा से
समय की गठरियाँ

संस्थाएँ  जिसे
खुद ढोती नहीं....
लादती रहीं
सबसे कमजोर कंधों पर
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मनुष्य- होने से 
यह नैतिक तकाजा है
भाषा में से
लिंग हटा दिए जाएं

ये संज्ञा संग मिल
क्रिया के रूप रंग बदल देते है
और यहीं से
क्रियाएं भटकती है राह
जन्म देती हैं भेदभाव

- स्त्री कर्म
- पुरूष कर्म

यह समय है
जब पहचाना जाना चाहिए
कर्म
मनुष्य होने से
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 प्राध्यापक – हिन्दी विभाग, शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भेल, भोपाल (मध्य प्रदेश)