राइट टू प्ले - बाल कथा

- पंकज रामेन्दु

सुबह के छह बज रहे थे। पावनी के स्कूल जाने का समय हो गया था। मम्मी ने उसे उठाया तो पावनी ने मुंह को चादर से और कसकर ढंक लिया। मम्मी ने उसे उठाकर बैठा दिया लेकिन पावनी की आंखो में अब तक नींद भरी थी। आंखे बंद किये हुए ही उसने ब्रश किया फिर तैयार हुई और आंखे बंद में ही उसके मुंह में नाश्ता जाता रहा। थोड़ी देर बाद वो बस स्टॉप पर खड़ी हुई थी। उसकी बस ठीक 7 बजे उसे लेने आ जाती है। फिर तमाम बच्चों को ले जाते हुए ठीक 8 बजे उसका स्कूल लग जाता है। ये 7 से 8 बजे का वक्त पावनी के सोने का होता है। उसके साथ उसका दोस्त लावण्य, लक्ष्य, गौरीशा और स्तुति भी आने वाले स्टॉप से बस में चढ़ते हैं लेकिन बस में बैठते ही वो भी सो जाते हैं। स्तुति को इस बात की शिकायत रहती है कि उसके यहां बस साढ़े सात बजे क्यों आती है. इस वजह से वो केवल आधे घंटे ही बस में सो पाती है। दिन भर स्कूल में पढ़ कर, बीच के टाइम में खेल कर बच्चों को घर पहुंचने में 3 बज जाते हैं।

पावनी और उसके दोस्त इस साल पांचवी क्लास में पहुंच गये थे। ये वो उम्र होती है जब बच्चे अगर कुछ शैतानी करता है तो उसे कहा जाता है कि वो अब बड़ा हो गया है और अगर वो अपने मन से कुछ करने को कहता है तो ये कह कर चुप करा दिया जाता है कि अभी तुम छोटे हो।

घर आने पर थोड़ी देर सोती उसके बाद ट्यूशन फिर होम वर्क बीच में थोड़ा सा वक्त मिलता तो वो कभी अपने दोस्तों के साथ पार्क में खेल लेती या घर पर कार्टून देख लेती। वैसे खेलने या कार्टून देखने पर भी मम्मी या पापा मना ही करते थे। कार्टून देखने से आंखे खराब हो जाती है और पार्क में ख़राब लोग आते हैं। कभी –कभी पावनी को मम्मी पापा पर बहुत गुस्सा आता था। वो जो भी काम करने को कहती उसे मना कर दिया जाता। उस दिन शाम को वो होम वर्क कर रही थी तभी उसकी मम्मी खुश होते हुए घर में घुसी और पावनी को गले लगाया. पावनी को लगा कि कुछ गड़बड़ है।

उसका दाखिला किसी डांस क्लास में करवा दिया गया था। जहां उसे ट्यूशन के बाद जाना था। उसकी मम्मी ने उसे बताया था कि वहां दाखिला होना आसान नहीं है लेकिन वो भाग्यशाली है कि उसे दाखिला मिल गया था।।
अगले दिन स्कूल में लंच के दौरान लावण्य, गौरीशा, लक्ष्य, पावनी और स्तुति सब बैठे हुए थे। पावनी ने लावण्य से बोला कि कल से वो पार्क में खेलने नहीं आ पाएगी। लावण्य कुछ बोलता इससे पहले पावनी ने उन लोगों को बताया कि कल से वो ट्यूशन के बाद डांस क्लास जाएगी। गौरीशा ने उससे पूछा तो फिर वह खेलेगी कब ? पावनी के पास इस बात को कोई जवाब नहीं था। उसे लगा कि ये जीना भी कोई जीना है अपनी मर्जी का खा नहीं सकते , खेल नहीं सकते। इतने में लावण्य बोला कि इसलिए वो चाहता है कि वो एक बार बड़ा हो जाए बस फिर छुट्टी ही छुट्टी , फिर वो जी भर खेलेगा और कार्टून देखेगा।

दो तीन दिन गुज़र गए थे. पावनी पार्क नहीं जा रही थी। लावण्य, लक्ष्य और स्तुति वहीं पार्क में बैठे हुए पावनी के बारे में बात कर रहे थे. तभी गौरीशा वहां आई और उसने उन्हें बताया कि कल से वो भी पार्क नहीं आ पाएगी क्योंकि उसके पापा ने उसका एडमिशन ड्राइंग क्लास में करवा दिया है।

अगले दिन से गौरीशा का भी पार्क में आना बंद हो गया। उस दिन स्तुति भी नहीं आई तो लावण्य को लगा कि लगता है स्तुति का भी कहीं एडमिशन हो गया है। उस दिन लावण्य और लक्ष्य का खेलने में मन नहीं लगा. उस दिन वे लोग ना फिसल पट्टी पर फिसले ना ही उन्होंने कोई झूला झूला। बस पार्क में बैठे घास तोड़ते रहे। थोड़ी देर में दोनों की मम्मी उन्हें लेने आ गई थी। दोनों की मम्मी यही बात करने में लगी हुई थी कि पावनी कितनी लकी है कि उसे डांस क्लास में एडमिशन मिल गया है। कहते कहते दोनों ने अपने बच्चों के भविष्य की चिंता भी ज़ाहिर की और लावण्य और लक्ष्य अपनी अपनी मम्मी के साथ चल दिये। दोनों जाते जाते भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि भगवान हमें इतना भाग्यशाली मत बनाना।

दूसरे दिन बस में उन्हें स्तुति मिली तो दोनों ने उससे पूछा कि क्या वो भी कल से खेलने नहीं आएगी। स्तुति ने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसने गौरीशा और पावनी को आवाज़ लगाई. दोनों अपनी अपनी सीट पर सो रही थी। जब दोनों नहीं उठी तो स्तुति उनके पास गई और उन्हें हिला दिया। पावनी चिढ़ गई लेकिन स्तुति ने उसे कहा कि वो जल्दी से वहां आए उसे कुछ बात करनी है। पावनी और गौरीशा आंख मलते हुए स्तुति की सीट के पास पहुंची. अब सब लोग साथ में बैठे हुए थे। और स्तुति की तरफ देख रहे थे. उन्हें लग रहा था पता नहीं स्तुति क्यो बोलने वाली है।

स्तुति ने उनकी तरफ देखा औऱ बताया कि कल वो पार्क इसलिए नहीं आयी थी क्योंकि उसकी मम्मी जो कि एक अख़बार में काम करती हैं, उन्हें एक ख़बर के सिलसिले में कहीं जाना था. उन्हें आने में देर हो जाएगी ऐसा सोचकर वो स्तुति को भी अपने साथ ले गई थी। लावण्य को लगा कि इसमें कौन सी बड़ी बात है, स्तुति जबरन ही स्टोरी बना रही थी। वो ऐसा स्तुति से बोलता इससे पहले ही लक्ष्य ने ये बात बोल दी, लावण्य़ उसे देखने लग गया, तभी स्तुति ने बोला - मेरे पास एक आइडिया है। अब सबके कान खड़े हो गये थे।
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सब लोग अपना अपना लंचबॉक्स लिए बैठे थे। लावण्य ने गौरीशा कि टिफिन से सेंडविच उठाया औऱ उसे मुंह में लेते हुए बोला - लेकिन हम तो पांच लोग हैं ये काम करेंगे कैसे ? स्तुति ने बोला कि हम पांचों के अलग अलग सेक्शन है हमें हमारे सेक्शन में बात करनी होगी। लक्ष्य ने बोला - और अगर किसी को मालूम चल गया तो। पावनी बोली तो डांट पड़ेगी।

गौरीशा ने कहा - एक बार हमें सबसे बात करके देखना चाहिए।

लंच की घंटी बजी औऱ सब लोग अपनी अपनी क्लास में चले गए। सब क्लास में बैठे हुए थे। सबस पहले लक्ष्य ने एक पर्ची पर कुछ लिखा और अपने बगल वाले बच्चे को थमा दिया। उसने उसे पढ़ा औऱ अपने बाजू वाले बच्चे को दे दिया। ऐसा ही पावनी, गौरीशा, लावण्य और स्तुति ने भी किया। थोडी देर बाद घूम कर पर्ची उनके पास पहुंच गई थी। सब बच्चों ने पढ़ लिया था लेकिन किसी को कुछ समझ आया कि नहीं ये पता नहीं चल पाया। सब सस्पेंस लिए हुए छुट्टी के बाद बस में बैठ गये। जाते वक्त किसी ने किसी से कुछ बात नहीं की. कल क्या होगा ये सोच कर सब डरे हुए थे।

अगले दिन पांचो लंचटाइम में खेल के मैदान में बैठे हुए थे, सबके टिफिन खुले हुए थे लेकिन किसी ने कुछ खाया नहीं था। कोई नहीं आया इसलिए सब उदास थे। सबको लग रहा था कि उनका प्लान चौपट हो गया है। तभी एक लड़के ने गौरीशा को उसके नाम से पुकारा गौरीशा ने पलट कर देखा तो उसके सेक्शन का लड़का सामने खड़ा हुआ था. सबको एक उम्मीद नज़र आने लगी थी। धीरे-धीरे करके सभी की क्लास के बच्चे वहां आ गए थे। एक

लड़के ने ज़ोर से बोला - क्या करना है ? स्तुति ने कहा - आंदोलन

सब लोग चुप थे। तभी लंच टाइम की घंटी बजी सब अपनी क्लास में जाने के लिए हुए।

स्तुति ने जोर से कहा - कल सब टाइम पर आ जाएंगे तो हम मिल कुछ तैयारी कर सकेंगे। सब लोग अपना क्लास की ओर जा रहे थे। तभी एक बच्चे ने पूछा वो सब तो ठीक है लेकिन ये आंदोलन होता क्या है ? स्तुति कुछ जवाब देती इससे पहले लावण्य बोला - आंदोलन वो होता जब सब लोग मिलकर किसी जगह पर जाते है। वहीं रुकते हैं और खाते पीते हैं। तो एक बच्चा बोला ऐसा तो हम पिकनिक में भी करते हैं। लावण्य बोला - पिकनिक अलग होती है, उसमें हमें कोई लेकर जाता है। आंदोलन में खुद जाना पड़ता है। तभी एक बच्चा बोला लेकिन हमें जाना कहां है ? तभी स्कूल के चपरासी ने सभी बच्चों को क्लास में आने के लिए बोला।
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शाम को पार्क में स्तुति, लावण्य और लक्ष्य बैठे हुए थे। लक्ष्य बोला - हमें दूसरे स्कूल के बच्चों को भी जोड़ना चाहिए। इस पर लाव्णय ने कहा - पहले अपने स्कूल के तो आ जाएं। इतनी देर में स्तुति खड़ी हुई और वहां खेल रहे बच्चों को आवाज़ दी, पहले तो किसी ने उसके बुलाने पर ध्यान नहीं दिया लेकिन फिर उसे देखकर जब लावण्य और लक्ष्य दौड़ कर उन बच्चों के पास उन्हें बुलाने गये तो धीरे धीरे करके सब बच्चे वहां आ गए। स्तुति ने बोला दो दिन पहले वो अपनी मम्मी के साथ दिल्ली के रामलीला मैदान में गई थी वहां खूब सारे लोग इकट्ठा थे। वो सब लोग एक जगह पर चुपचाप बैठे हुए थे। मेरे पूछने पर मम्मी ने बताया की ये लोग धरने पर बैठे है। मम्मी ने बताया कि अगर किसी के साथ कुछ ग़लत हो रहा है और वो अपने देश के प्रधानमंत्री को ये बताना चाहते हों तो इसके लिए उसे आंदोलन करना होता है। एक लड़की बोली लेकिन वो प्रधानमंत्री के पास सीधे जाकर भी तो बोल सकते हैं। अब जैसे मुझे दूध पीना अच्छा नहीं लगता तो मैं मम्मी से सीधे ही बोल देती हूं। तभी लक्ष्य बोला - अरे दूध पीना तो मुझे भी पसंद नहीं है लेकिन मैं मम्मी से बोलता हूं तो वो मुझे डांट देती है। इस पर लावण्य ने तपाक से बोला - मुझे दूध पीना अच्छा लगता है इसलिए मैं तो मजे से पी लेता हूं। स्तुति ने कहा - दूध पीना अलग बात है। लेकिन अगर आप को खेलने से मना कर दिया जाए तो...अगर आपको सिर्फ ट्यूशन या कुछ सीखने ही भेजा जाए, अगर आपको खेलने का वक्त ही नहीं दिया जाए तो क्या करोगे।
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स्कूल में सब बच्चे थोड़ी देर चुप खड़े हुए थे. तभी एक बच्चा बोला लेकिन ये आंदोलन करेंगे कैसे। उसके लिए हमें एक साथ मिलकर अपनी बात बोलनी होगी। एक बच्चा बोला - मैने देखा है कि लोग बैनर पर भी कुछ कुछ लिखते हैं। स्तुति बोली - हां वो भी सही रहेगा। तभी एक लड़की ने पूछा कि ये हमें करना कब होगा।
पावनी ने कहा - 14 नवंबर आने वाला है उस दिन किया जाए तो।

गौरीशा ने हामी भरते हुये कहा कि उस दिन हमारे पास टाइम भी होगा। साथ ही उसने ये भी कहा कि उसके भैया पैंटर है, वो उनसे बैनर बनवा लेगी। कोई कुछ कहता इससे पहले लंच की घंटी बज गई और सब क्लास में चले गए।
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स्तुति अपनी मम्मी के साथ बैठी हुई थी। उसने अपनी मम्मी से पूछा कि मम्मी अगर खूब सारे लोग को कोई बात बुरी लगे तो इसका मतलब क्या होगा। उसकी मम्मी ने कहा बेटा हो सकता है सभी के साथ कुछ गलत हो रहा हो। जैसे अंग्रेज यहां आए तो तुम्हारे दादा, नाना और उनके दोस्तों को सभी लोगों को हर बात पर टोकते थे, उनका कहना था कि जैसा वो कहें, वैसा ही करो, उन्हें गुलाम बना लिया गया था। फिर एक दिन गांधी जी किसी ट्रेन में जा रहे थे तो उन्हें ट्रेन से धक्का दे दिया गया क्योंकि उस समय अंग्रेज किसी भी भारतीय को फर्स्ट क्लास के डब्बे में बैठने नहीं देते थे, लेकिन गांधी जी के पास तो टिकट था तो उन्होंने कहा मैं तो जाउंगा, उनका ऐसा कहना था और अंग्रेज ने उन्हे ट्रेन से बाहर धकेल दिया। गांधी जी को ये बात बुरी लगी, उन्होंने देखा कि ऐसा व्यवहार तो सभी भारतीयों के साथ हो रहा है उन्होंने इसके खिलाफ आंदोलन किया।

स्तुति ने पूछा तो क्या उनका आंदोलन करने से अंग्रेजों ने उनकी बात मान ली? मम्मी का जवाब था - नहीं बेटा, नहीं मानी बल्कि गांधी जी और उनके साथियों को अंग्रेजों ने खूब मारा भी लेकिन गांधी जी ने सबसे बोल रखा था कि कोई तुम्हे कितना भी मारे तुम पलट कर मत मारना, यही नहीं गांधी जी ने अपनी बात मनवाने के लिए उपवास भी रखा। उपवास क्या होता है - स्तुति ने पूछा, तो उसकी मम्मी ने बताया फास्टिंग, भूखा रहना। स्तुति ने उत्साह में कहा जैसे दादी या आप दुर्गा जी के समय रहते हो। हां वैसे ही उसकी मम्मी बोली।
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भूखा क्यों? एकदम से लक्ष्य चीख कर बोला। और भी सारे बच्चे वहां इक्ट्ठे हो चुके थे। आजकल उन्हें जब भी मौका मिलता वो आगे के बारे में प्लानिंग करने लग जाते। एक लड़की ने लक्ष्य से पूछा क्या हुआ ? लक्ष्य ने बताया कि हमें अपनी बात मनवाने के लिए भूखा भी रहना पड़ सकता है। सब बच्चे एक साथ बोले क्या ये ज़रूरी है ?? स्तुति बोली कि उसकी मम्मी ने बताया कि गांधी जी भूखे रहते थे इससे अंग्रेजों ने उनकी बात जल्दी मान ली थी। एक लड़का बोला - गांधी जी की बात तो सही है क्योंकि मैं भी खाने खाने के बदले में मम्मी से हर बार कोई खिलौना मांग लेता हूं। उस टाइम मम्मी मान भी जाती है।

धीरे धीरे ये बात सब बच्चों में फैलने लगी थी, सब अपना समय निकाल कर दूसरों को बताने लगे थे। गौरीशा ने अपने भाई को बताया तो पहले उसने उसे समझाने की कोशिश की लेकिन फिर उसे लगा कि गौरीशा की बात सही है तो वो उसकी मदद करने के लिए तैयार हो गया. उसने अपने कुछ दोस्तों को भी साथ लाने के लिए बोल दिया। यही नहीं उसने अपनी पॉकेट मनी से उसके बैनर पोस्टर तैयार करने का वादा भी कर दिया।
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दूसरे दिन सब लोग लंच टाइम में मिले, पावनी ने स्तुति से कहा कि ये तो ठीक है कि हम आंदोलन करेंगे लेकिन हम करेंगे कहां, स्तुति ने कहा जंतर मंतर, गौरीशा ने पूछा लेकिन वहां क्यों वो तो बहुत दूर है, स्तुति बोली कि सब लोग जंतर मंतर पर ही आंदोलन करने जाते है। एक लड़का बोला - हां एक बार मैं भी गया था वहां खूब सारे लोग थे औऱ सब ज़ोर से चिल्ला रहे थे। लावण्य बोला मतलब जंतर मंतर आंदोलन वाला पार्क है। स्तुति ने हामी भर दी।

फिर बच्चों के बीच में कुछ और सवाल भी खड़े हुए . जैसे - हम लोग वहां जाएंगे कैसे? मम्मी पापा तो जाने नहीं देंगे और उन्हे छोड़ने के लिए बोला तो बताना पड़ेगा कि क्यों जाना है, कारण बताया तो पिटाई भी पड़ सकती है?
 
स्तुति के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। तभी किसी ने कहा कि अगर टीचर डायरी में नोट लिख दे कि 14 नवंबर को जंतर मंतर पर पहुंचना है तो काम बन सकता है। लेकिन टीचर क्यों लिखेंगे वो तो उलटा हमें ही डांटेगे?

“मैं नहीं डांटूगा और लिख भी दूंगा.” सब लोगों ने पलट कर देखा तो भटनागर सर वहां खड़े हुए थे। उन्हें देख कर सब बच्चे सहम गये।

भटनागर सर स्कूल के पीटी टीचर हैं। उन्होंने बच्चों से कहा कि घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है तुम लोगों को रोज़ रोज़ यहां आता देखकर मुझे खटका हुआ था कि कुछ गड़बड़ है। स्तुति ने कहा लेकिन सर आपका झूठ लिखना तो गलत होगा। भटनागर सर ने बोला कि कभी कभी सही काम करने के लिए थोड़ा बहुत गलत भी करना होता है। पावनी बोली - लेकिन सर आप तो लिख दोगे लेकिन और भी स्कूल हैं। भटनागर सर ने जवाब दिया - कुछ स्कूल में मेरे दोस्त है, मैं उन्हे बोल दूंगा। जिस टाइम पर तुम जंतर मंतर में भूख हड़ताल पर बैठोगे, उस वक्त बाकी स्कूल के बच्चे अपने स्कूल के ग्राउंड में बैठ जाएंगे। सब लोग एक साथ बैठेगे तो काम हो जाएगा। सब लोग एक साथ उत्साह में चिल्लाए।
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14 नवंबर आ गया था। स्तुति ने अपने मम्मी पापा को सच बात बता दी थी उन्होंने उसे ऐसा करने से मना नहीं किया बल्कि उन्होंने कहा कि वो खुद उसे जंतर मंतर तक छोड़ कर आएंगे।

जंतर मंतर पर धीरे धीरे बच्चे इकट्ठा हो रहे थे, दूसरे बच्चों को देखकर सब के मम्मी पापा ने अपने बच्चों को छोड़ दिया था, भटनागर सर भी वहां मौजूद थे तो मम्मी पापा को चिंता भी नहीं थी। थोड़ी देर में गौरीशा अपने भाई के साथ वहां पहुंची। उसके भाई के कुछ दोस्त भी साथ में थे, सब लोगों के पास कुछ बैनर थे जिनमें कुछ लिखा हुआ था। सब लोगों ने घड़ी देखी और ज़ोर से चिल्लाए - भूख हड़ताल।

सब बच्चे एक जगह बैठ गये थे, उनके हाथ में बैनर थे। एक टीवी जर्नलिस्ट ने उन्हें देखा तो तुरंत वहां से लाइव रिपोर्टिंग देना शुरु कर दिया।

धीरे धीरे वहां टीवी पत्रकारों की भीड़ लगने लग गई। खबर फैलती जा रही थी और लोगों को मालूम चल रहा था कि कुछ स्कूलों में भी बच्चे भूख हड़ताल पर बैठ गये हैं, सब चुपचाप बैठे हुए थे , कुछ बच्चे बैनर पकड़े हुए थे जिसमें लिखा हुआ है।

“राइट टू प्ले - बच्चों को खेलने का अधिकार दो, प्रधानमंत्री अंकल मम्मी से बोलो की हमें खेलने दो... दिन के कुछ घंटे हमारे हैं उन पर हमारा अधिकार है!”

टीवी पर सभी बच्चों के मम्मी पापा अपने बच्चों के इस आंदोलन को चुपचाप देख रहे थे, उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे बच्चे उन्हें ही देख रहे हो। जो बच्चे एक वक्त पूरी की जगह आधी रोटी खा लेते हैं तो माता पिता की भूख मर जाती है आज जब अपने बच्चों को भूख हड़ताल करते देख रहे थे तो समझ में आ रहा था कि बच्चों को खेलने का भी अधिकार है।
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