माँ शारदे वर दे - सम्पादकीय

अनुराग शर्मा
भारतभू में वसंत का आगमन हो चुका है। कुसुमाकर के नाम से जाना जाने वाला यह समय प्रकृति के शीतनिशा से उठकर जागने का समय है। भारतीय समाज में सौंदर्यबोध, उत्सव-उल्लास, के साथ-साथ ज्ञान का महत्व अनंतकाल से चला आ रहा है। ऋतुराज वसंत के आगमन पर वसंत-पंचमी का पर्व सरस्वती जयंती के रूप में मनाकर भारतीय परम्परा 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' के सिद्धांत का पालन करती है मानो प्रकृति की समृद्धि के साथ ही मानवमात्र की समृद्धि, ज्ञान, साहित्य, संगीत, कला के साथ होने के प्रयास बने रहें।

हँसकर मृत्युवरण को तैयार हुतात्मा भगत सिंह द्वारा पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के गीत 'मेरा रंग दे बसंती चोला' का गायन न केवल प्राचीन भारतीय परम्परा में निहित आशावाद का प्रतीक है वरन उस संस्कृति की उल्लासप्रिय आत्मा और अमृत्व की विचारधारा का उद्घोष भी है। सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' भी अपने गीत में 'प्रिय स्वतंत्र-रव, अमृत-मंत्र नव, भारत में भर दे' कहते समय भारतमाता के बहुमुखी उत्थान की ही कामना व्यक्त कर रहे हैं। सेतु की ओर से आपको वसंत की शुभकामनाएँ देते हुए हमारी भावना भी भारतीय संस्कृति, भारत-हिंद और हिंदी के उत्थान और बहुमुखी विकास की है।

सेतु के इस अंक में धरोहर स्तम्भ के माध्यम से हमने संतकवि कबीरदास और राष्ट्रकवि दिनकर को याद किया है वहीं सेतुबंध की परम्परा में डॉ श्रीश पाठक द्वारा 'अपने ही घर में' की समीक्षा देवी नागरानी द्वारा सिंधी कथाओं के हिंदी अनुवाद से अवगत करा रही है। नये लेखकों के लिये सेतु के इस अंक में, उपेंद्रनाथ अश्क की एक महत्वपूर्ण सलाह है। जहाँ एक ओर इंद्रनील भट्टाचार्य के कैमरे से हम ग्रामीण भारत के दर्शन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर डॉ. कन्हैया त्रिपाठी की अहिंसा शृंखला की नयी कड़ी हमें भारत की एक महान परम्परा की जानकारी दे रही है।

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शुभकामनाओं सहित,
अनुराग शर्मा


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