डेरा उखड़ने से पहले… (कहानी)


वन्दना अवस्थी दुबे
लगातार बजती फोन की घंटी से झुंझला गयी थीं आभा जी। अभी पूजा करने बैठी ही थीं, कि फोन बजने लगा। एक बार टाल गयीं, दो बार टाल गयीं लेकिन तीसरी बार उठना ही पड़ा। अब उठने-बैठने में दिक़्क़त भी तो होती है न!! एक बार बैठ जायें, तो काम पूरा करके ही उठने का मन बनाती हैं आभा जी।  बार-बार उठक-बैठक की न तो उमर रही उनकी, न इच्छा। घुटनों पर हाथ रख के किसी प्रकार उठीं, और फोन तक आयीं। दूसरी तरफ़ से वही चिरपरिचित आवाज़ आई, “कैसी हैं आभा जी? आज दीवाली है न, तो मैने सोचा शुभकामनायें दे दूं। व्हाट्सएप आप इस्तेमाल नहीं करतीं, वरना वहीं मैसेज कर देता।”

“जी शुक्रिया। आपको भी दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।”  प्रत्युत्तर दे, झट से फोन पटक दिया आभा जी ने, जैसे किसी अपवित्र करने वाली चीज़  को छू लिया हो। कुछ भुनभुनाती हुई वापस पूजाघर में सप्रयास बैठ गयी हैं वे।

“नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते। शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्षि्म नमोस्तुते।”

पूजाघर से लक्ष्मी स्तोत्र के स्वर सुनाई देने लगे हैं। बहुत मन लगा के पूजा करती हैं आभा जी। अभी से नहीं, बचपन से ही पूजा के प्रति बहुत झुकाव था उनमें। मैं साक्षी हूं, उनके इस झुकाव की। आभा जी ने बड़ी लगन से आभा जी ने लक्ष्मी-पूजन की तैयारी की है। मूर्तियां, कलश, रंगोली, एपन, दिये, मिठाइयां, खील-बताशे, फल, फुलझड़ियां क्या नहीं सजाया? गेंदे के फूल की बड़ी-बड़ी मालाएं। पूजाघर फूल मालाओं से सजा है। घर के दरवाज़े पर आम के पत्तों और गेंदे के फूलों की बंदनवार लगी है। बाहर भी एक रंगोली बनाई है उन्होंने।

फोन पटक के आईं आभा जी ज़रा विचलित लग रही हैं। उनके हाथ, गौर का पूजन यंत्रवत कर रहे हैं, होंठों से लक्ष्मी स्तोत्र स्वत: निकल रहा, लेकिन आंखें बता रहीं कि उनका मन उद्विग्न सा हो गया है। अब वे उतनी निश्चिन्त, शांत मन नहीं हैं, जितनी फोन सुनने के पहले थीं। उनकी आवाज़ का कम्पन बता रहा, उनके मन की दशा। मैं बहुत अच्छे से महसूस कर पा रही हूं उनकी इस हालत को। बचपन की सहेली हूं आखिर…

आप ये न सोचें, कि आभा जी कोई बहुत बुज़ुर्ग महिला हैं। उम्रदराज़ हैं, लेकिन इतनी भी नहीं कि आप उन्हें बूढा कह दें। दिखने में तो उनकी उम्र और भी कम लगती है। मुझसे यही कोई तीन साल बड़ी हैं। लगभग पचपन साल की हैं वे। सरकारी महकमें में अधिकारी हैं। बहुत बड़ी अधिकारी नहीं हैं, लेकिन उनकी पोस्ट में “ऑफ़िसर” शब्द आता है, सो अधिकारी ही कहलाईं। ऑफ़िस में बहुत इज़्ज़त है उनकी। पिछले तीस सालों से यहीं पदस्थ हैं। यहीं नौकरी शुरु की और अब यहीं से रिटायर हो जायेंगी, ऐसा लगता है। पिछले दो साल से घुटनों में थोड़ी तक़लीफ़ रहने लगी है। वज़न बढ गया है न, बस इसीलिये। वैसे वज़न इतना भी नहीं बढा कि शरीर बेढब लगे। घुटनों की तक़लीफ़ का क्या है, किसी को भी हो जाती है। जबसे वज़न बढ़ने की शुरुआत हुई, तभी से आभा जी ने मॉर्निंग वॉक शुरु कर दिया है। रोज़ लगभग चार किलोमीटर चलती हैं। शायद इसीलिये वज़न उतना ही बढ़ के रह गया, स्थिर हो गया। घुटनों में भी चलते समय दिक़्क़्त नहीं होती, बस उठने-बैठने में परेशानी होती है, वो भी यदि ज़मीन में बैठ जायें तो।

आप सोच रहे होंगे, कि मैं आभा जी के परिवार का ज़िक्र क्यों नहीं कर रही? तो क्या ज़िक्र करूं? कहने को तो तीन भाई, तीन भाभियां, आठ भतीजे, भतीजियां, दो बहनें, दो बहनोई, दो भांजियां हैं, लेकिन किस काम के?? बहनें ही हैं जो सम्पर्क बनाये रखती हैं, वरना भाई तो केवल तब याद करते हैं जब उन्हें पैसों की ज़रूरत होती है। बड़ी बहन अपनी ससुराल में व्यस्त रहते हुए बुढ़ापे को प्राप्त हो गयी हैं, जबकि मंझली बहन इसलिये लगातार आना-जाना बनाये रखती है, क्योंकि उसकी ससुराल में एकदम पटरी नहीं बैठती।  इन दोनों बुज़ुर्ग बहनों के लिये मायके के नाम पर केवल आभा जी का ये सरकारी क्वार्टर ही तो है। पुश्तैनी घर तो पिता के बिस्तर पकड़ते ही  भाइयों ने बेच दिया था, ये चिन्ता किये बिना कि अब उनकी ये बहन और बीमार पिता कहां जायेंगे? वो तो भला हो आभा जी की नौकरी का, जिसमें सरकारी मकान का प्रावधान था।

आभा जी के बचपन में ही उनकी मां का देहान्त हो गया था। तब वे शायद पांच साल की थीं। पिता ने  छह बच्चों, तीन बेटे और तीन बेटियों को सम्भाला, पाला-पोसा, पढाया-लिखाया। बड़े भाईसाब जल्दी ही नौकरी में आ गये सो उनके लिये रिश्ते भी फटाफट आने लगे। इधर शादी हुई, उधर बड़े भैया अपनी पत्नी को साथ ले गये अपनी पोस्टिंग पर। ले ही जाना था। शादी कौन सा भाई-बहनों को संभालने के लिये की थी!!  तीन साल बाद मंझले भैया की शादी हो गयी, और वे भी भाभी को ले गये। तीसरे भैया एकदम नाकारा थे। न पढने में, न लिखने में सो नौकरी भी क्या मिलती, और शादी भी क्यों होती! इन दो शादियों के बाद कई साल बीत गये। पिता फ़क्कड़ टाइप के थे। न लड़कों के लिये घर ढूंढे थे, न लड़कियों के लिये ढूंढने की जुगत की। दोनों भाई भी बाहर निकले सो निकले। दीवाली पर ज़रूर सब इकट्ठे होते। लेकिन न पिता बेटियों के ब्याह का ज़िक्र करते, न भाई ऐसी कोई बात उठाते।

इस बीच पिता ने अपने रिटायरमेंट के पहले, शहर के बीचोंबीच पड़े अपने पुराने प्लॉट पर घर बनवा लिया था। बेटियां अपने घर में सुरक्षित थीं। घर की गाय दुह रही थीं, गोबर से कंडे पाथ रही थीं , आंगन लीप रही थीं। शादी के इंतज़ार में बड़ी बहन ने डबल एम। ए। कर लिया था। मंझली बहन ने भी एम।ए। कर लिया था। आभा जी बी।ए। कर रही थीं। ये वो समय था, जब पढ़ाई के लिये गिने चुने रास्ते ही उपलब्ध होते थे। नौकरियों के लिये और भी कम रास्ते। लड़कियां आमतौर पर शादी की योग्यता हासिल करने के लिये पढ़ाई करती थीं। बी।ए। होते-होते शादी हो गयी तो पूरे मोहल्ले में वाहवाही होती थी। न हो पाई तो लड़कियां , समाज शास्त्र में एम।ए। करती थीं। तब भी समय बच गया तो राजनीति विज्ञान में एम।ए। कर लेती थीं। , प्रायवेट ही। मगर बड़ी बहनों क इंतज़ार ज़्यादा लम्बा हो गया। डबल एम।ए। के बाद बी।एड। की नौबत भी आ गयी, लेकिन न भाई लोग कोई रिश्ता लाये, न पिता ने पहल की। पिता बहुत बूढ़े भी थे। हो सकता है नौकरी के दस्तावेज़ों में उनकी उमर कुछ ज़्यादा ही कम लिख गयी हो। वैसे भी उस ज़माने में जन्म प्रमाण पत्र तो बनते नहीं थे। दस साल का बच्चा भी मां-बाप को पांच साल का लगता था। यही वजह रही होगी क्योंकि रिटायरमेंट के समय ही आभा जी के पिता जी पैंसठ के ऊपर दिखाई देते थे तो अब तो उनके रिटायरमेंट को भी दस साल हो गये थे।

कंडे पाथते, गोबर उठाते, दही मथते, उपलों पर रोटी सेंकते बड़ी बहन की उमर अब पैंतीस पार हो गयी थी। मंझली बत्तीस के आस-पास और आभा जी तीस को छूने वाली थीं। अचानक ही एक रिश्ता किसी ने सुझाया। किसने ? नहीं जानती। लडके वाले अच्छे खाते-पीते परिवार के थे। लड़का खुद ठेकेदारी करता था, इकलौता था। दुहेजू था। पहली बीवी बच्चे के जन्म के समय दुनिया छोड़ गयी। कुछ दिन बाद बच्चा भी चल बसा था। शादी का इंतज़ार कर-कर के निराश हो चुकी बड़ी बहन के लिये ये रिश्ता सौगात सरीखा था। मंझली भी बैरियर खुलने की उम्मीद से खुश थी। बहनों के दुख में दुखी होने वाली आभा जी, अब बहनों की खुशी से खुश थीं। एक बात आपको बता दूं, कि इस वक़्त तक आभा जी , अपने इसी ऑफ़िस में क्लर्क का अस्थायी पद प्राप्त कर चुकी थीं। बड़ी बहनों ने इतनी पढाई करने के बाद भी कहीं नौकरी करने की कोशिश नहीं की थी।

बड़ी बहन के जाते ही, अचानक आभा जी घर में सबसे बड़ी हो गयीं। मझली बहन को काम बहुत रुचता नहीं था। उनकी स्पीड भी इतनी धीमी थी, कि वे आभा जी के दफ़्तर निकलने के पहले उन्हें दो पराँठे  तक नहीं दे पाती थीं। सो आभा जी ने उन्हें सफ़ाई का काम सौंप दिया और खुद रसोई संभाल ली। एक बात बताना भूल ही गयी। बड़ी बहन के ब्याह के दो साल पहले ही सबसे छोटे भैया ने भी इसी शहर की एक लड़की से प्रेम विवाह कर लिया था और अब घर जमाई बन के पत्नी के मायके में रह रहे थे, ससुर के धंधे में हाथ भी बंटा रहे थे, ऐसा सुना गया।

बूढे पिता और बूढ़े हो गये थे। बड़ी बहन की शादी से निश्चिन्त भी। इतने निश्चिन्त, जैसे तीनों बेटियां ब्याह दी हों। कोई टोकता तो बड़ी बेफ़िक्री से कहते, “जैसे बड़की का ब्याह हो गया, वैसे ही ये दोनों भी अपने घर चली जायेंगीं।”  ऐसा कहते हुए वे इस बात पर ध्यान ही नहीं देते, कि  बची हुई दोनों बेटियां अब बड़की के ब्याह वाली उमर को भी पार गयी हैं। खैर बड़े बहनोई अच्छे निकले और उन्होंने मंझली की शादी का जुगाड़ जमाया। मंझली इस वक्त चालीस की हो रही थीं। बात जम गयी और शादी भी हो गयी। आभा जी अब तक परमानेंट हो गयी थीं, और तरक्की भी पा चुकी थीं। वे भी तो चालीस को छूने वाली थीं आखिर। आभा जी ने भी अब उम्मीद जगाई। उन्हें तो वैसे भी शादी का बहुत शौक़ था। सजने-धजने का, ज़रीदार कपड़े पहनने की शौकीन हैं आभा जी।  लेकिन तभी एक हादसा हो गया। पिताजी एक रात बाथरूम में गिर पड़े। अस्पताल में भर्ती किया गया। ब्रेन स्ट्रोक था, जिसके चलते आधा शरीर लकवाग्रस्त हो गया उनका।

बीमार पिता को देखने भाई आये। आभा जी ने सोचा शायद बड़े शहर में ले जा के उपचार की बात करें। लेकिन उन्होंने जो कहा उसके बाद आभा जी ने कभी भाइयों से कोई उम्मीद नहीं की। बड़े भाई बोले, “अब क्या बाहर ले जाना, क्या फ़ालतू खर्चा करना। उमर देख रही हो इनकी? अस्सी  के ऊपर चले गये हैं। तुम्हारी भाभी वैसे भी अधिकतर समय बेटे के पास रहती है। सो इनकी देखरेख कौन करेगा? यहां तो तुम हो, सारी व्यवस्था जमी हुई है, कोई दिक्कत हो तो खबर करना। भगवान तो अब इनकी सुन ले तो बढिया।”

पिता के लिये ऐसे प्रेमपूर्ण उद्गार सुन के आभा जी कट के रह गयीं। बड़े भाई खुद साठ साल के हो रहे थे सो उनसे कुछ कह न पाईं। लेकिन अब ये तय हो गया था कि आभा जी का ब्याह नहीं होगा। पिता की सेवा का दायित्व उन्हीं पर है। कमाऊ हैं, सो भाइयों को रुपया भेजने की चिन्ता भी नहीं करनी है। एक फ़ैसला और सुना गये बड़े भाई। ये जो घर है, उसका समय रहते तीनों भाइयों में बंटवारा हो जाये, वरना पिता यदि अचानक चले गये तो बाद में फ़िजूल झगड़ा होगा, जो वे करना नहीं चाहते। आभा जी दंग रह गयीं…।! तीनों भाइयों के बीच बंटवारा!! जिन बहनों ने इस घर को सहेजा, एक एक ईंट लगवाई, आंगन को सालोंसाल लीपा-पोता उनका कोई हक़ नहीं! खैर! उन्होंने कोई उज्र नहीं किया। भाइयों ने आपसी परामर्श से मकान बेच दिया और पैसा तीनों भाइयों में बांट लिया।  बहन को परामर्श दे दिया कि मकान एक महीने में खाली कर देना है, सो तुम सरकारी क्वार्टर के लिये आवेदन कर दो , पिताजी और जरूरी सामान के साथ वहां शिफ़्ट हो जाओ। वैसे भाईसाब ये सलाह न भी देते तब भी आभा जी को करना तो यही पड़ता।

मकान का पैसा हाथ में आने के बाद भाई लोग बहन की तरफ़ से निश्चिंत हो गये। न कोई आना, न जाना। कभी कभार फोन कर लेते, वो भी भाभी ही बात करतीं। आभा जी ने भी रिश्तों से हाथ जोड़ लिये थे। अपने घर से बेदखल होते ही बीमार पिता और बीमार हो गये। न बोल पाने की तक़लीफ़ और बढ़ गयी। इशारे से पूछते, “तुम्हें कुछ दिया?” आभा जी हां में सिर हिला के पिता को तसल्ली दे देतीं। लेकिन पिता घुलते गये और बमुश्क़िल एक महीने ही ज़िन्दा रह पाये सरकारी क्वार्टर में।

पिता के जाने के बाद आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ। भाई लोग अब अक्सर फोन करने लगे। भाभियां छुट्टी में घर आने का न्यौता देने लगीं।  नाती-नातिन कहीं जा रहे होते तो भाई साधिकार कहते, “आभा, मिंटू लखनऊ जा रहा है, ज़रा फ़लां तारीख का रिज़र्वेशन तो करवा दो। सेकंड एसी में करवाना।”

आभा जी का मन तो नहीं करता, लेकिन फिर भी रिज़र्वेशन करवा देतीं। बड़की जिज्जी साधिकार कहतीं, “आभा, बिन्नी को फलां टेस्ट देने भोपाल जाना है। तुम चली जाओ उसके साथ। टेस्ट रविवार को है, सो तुम्हारा ऑफ़िस भी न छूटेगा। शनिवार की रात निकलो। बड़े सबेरे गाड़ी भोपाल पहुंच जाती है। होटल में रूम बुक कर लो सो वहां नहा-धो के फ़्रेश हो जायेगी बिन्नी। फिर रात को यही गाड़ी चलेगी सो सुबह तुम अपने ठिकाने पर। है कि नईं?”

जब भाइयों का काम आभा जी कर रहीं, तो जिज्जी का काम टालने का सवाल ही नहीं। आभा जी टिकट करवातीं, होटल, खाना, ऑटो, पॉटो सबका खर्चा करतीं। बदले में जिज्जी हंसते हुए कहतीं, “आभा तुमने बड़ी मदद कर दी।”  आभा जी दिल से खुश होतीं। भाई तो इतना भी नहीं कहते। बल्कि कभी-कभी तो मज़ाक में भतीजे कह भी देते, “बुआ, इत्ता पैसा कमा रही हो, का करोगी? हमारे नाम कर जाना सब।”  आभा जी जानती हैं, सारे रिश्ते अब पैसे की वजह से ज़िन्दा हो गये थे। बहनों की बात अलग है। उनके साथ लम्बा जीवन बिताया है आभा जी ने सो उनके लिये अलग प्रीति है मन में। सब अपनी ज़रूरतों का ज़िक्र करते हैं , लेकिन आभा जी की ज़रूरत का किसी को ख़याल नहीं। भूले से भी कोई नहीं पूछता-आभा तुम कैसी हो? अकेले बुरा लगता होगा न?   न कभी कोई  शादी का ज़िक्र करता है। पैंतालीस की उमर तक तो आभा जी ने इंतज़ार भी किया था कि शायद बड़ी जिज्जी कोई रिश्ता खोजें। उनका रिश्ते का देवर आभा जी को अच्छा भी लगता था, ऐसा ज़िक्र उन्होंने मुझसे किया था। लेकिन  जिज्जी ने इस सम्बंध में कोई बात आगे नहीं बढ़ाई। मैने कहा भी तो -“अरे नहीं रे। एक घर में दो बहनें ठीक नहीं।”  कह के मामला ही खत्म कर दिया।

पिछली दफ़ा मैने आभा जी से पूछा था कि इतनी लम्बी नौकरी कर डाली, तुम्हें कोई पसन्द नहीं आया? कोई हो तो खुद कर डालो शादी। काहे किसी के कहने की बाट जोहना? तो ज़ोरदार ठहाका लगा के बोली थीं आभा जी-
“अरे यार पूरा शहर तो दीदी कहता है, प्रेम कौन करेगा?”

मैं ये नहीं कह रही कि शादी जीवन का अनिवार्य अंग है, लेकिन ज़िन्दगी का एक मकाम ऐसा आता है, जब एक साथी की ज़रूरत पड़ती है। जीवन संध्या में जब न नौकरी होती है, न परिवार तो अकेला व्यक्ति और अकेला हो जाता है। रात-बिरात कुछ हो जाये तो किसी को पता ही न चले। ये अलग बात है, कि स्वेच्छा से जिये जाने वाले जीवन का अपना अलग महत्व और आनन्द है। न कोई बक-बक, न झिक-झिक। न बच्चों की चिन्ता, न ससुराल के दुख। लेकिन हमारी सामाजिक व्यवस्था ऐसी है न कि यदि किसी लड़की की शादी नहीं हुई, तो लोग  उसका जीना हराम कर देंगे। ऐसी सहानुभूति से बात करेंगे जैसे पता नहीं कौन सा दुखों का पहाड़ टूट पड़ा हो। या फिर पीठ पीछे उसका भरपूर चरित्र चित्रण कर डालेंगे, वो भी बदचलनी के टैग के साथ।

पिछले दिनों आभा जी को ट्रेनिंग देने कई बार झांसी जाना पड़ा है। वहीं मुलाक़ात हुई थी उन सज्जन से। आभा जी से दो-तीन साल बड़े होंगे।  दो बेटे हैं, दोनों अपनी नौकरियों और परिवारों में व्यस्त हैं। दोनों ही दो साल हुए, देश से बाहर हैं , सो साल में एक बार ही आ पाते हैं। पत्नी का तीन साल पहले देहान्त हो गया। तब से अकेले हैं। आभा जी को पसन्द करने लगे हैं, ये अहसास आभा जी को भी है, लेकिन इस उमर में प्रेम की अनुभूति और उसका प्रदर्शन आभा जी के रूढ़िवादी मन को पसन्द नहीं आ रहा। पिछले एक साल में तीन बार गयीं हैं आभा जी वहां और हर बार उनसे मुलाक़ात हुई है।  उनकी आंखें बताती हैं कि वे आभा जी के प्रति कौन सा भाव रखते हैं। ये अलग बात है कि वे बहुत सभ्य, पढ़े लिखे, ऊंचे ओहदे पर पदस्थ हैं। उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा जो अभद्र लगे। प्रेम प्रदर्शन भी उन्होंने नहीं किया है। उनके अंडर में ही आभा जी को ट्रेनिंग सम्पन्न करवानी होती है।

पिछले महीने उनके बेटे ने बहुत संकोच के साथ आभा जी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखते हुए कहा, “आंटी, मैं जानता हूं आपको अटपटा लगेगा, लेकिन मैं अपने पिता के विवाह का प्रस्ताव आपके सम्मुख रख रहा हूं। आप दोनों अकेले हैं, और दोनों को ही साथ की ज़रूरत है, ऐसा मुझे लगता है। बाक़ी आप का फ़ैसला ही अन्तिम होगा।”  सुन के आभा जी का पूरा शरीर झनझनाहट से भर गया। जिस बात का उन्हें डर था, वो हो गयी, वो भी उनके बेटे के द्वारा।   दो दिन बाद उनका फोन आया, और आभा जी ने ज़रा डपटते हुए ही उनसे बात की-“कैसे उनकी ऐसा सोचने की हिम्मत हुई? ऐसा अटपटा प्रस्ताव रखने के पहले उन्होंने क्या सोचा था कि आभा तो शादी को तैयार बैठी है? सुनते ही हां कर देगी? पूरी ज़िन्दगी अकेले जी ली है मैने, सो मुझे कोई अकेलापन नहीं सालता अब श्रीमान।”

कुछ दिन उनका फोन नहीं आया। फिर एक दिन माफ़ी मांगते हुए उन्होंने बात करते रहने का आग्रह किया। तब से बीच-बीच में फोन कर लेते हैं। और आभा जी हर बार उनकी आवाज़ सुनते ही झुंझला जाती हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने मोबाइल नम्बर मांगा था और आभा जी ने ये सोच के दे दिया कि लैंड लाइन में नाम नहीं दिखता, सो हर बार उनका फोन उठा लेती हैं। मोबाइल में कॉल आयेगा तो उनका नाम दिखेगा और वे उसे नहीं उठायेंगीं। लेकिन हमेशा एक ही नम्बर इस्तेमाल करने वाली आभा जी भूल गयीं, कि उनका व्हाट्स एप भी तो इसी नम्बर पर चलता है!! आज रात अचानक ही व्हाट्स एप पर गुड नाइट पढ़ के चौंकी आभा जी। जवाब नहीं दिया। अगले दिन सुबह फिर फूलों के गुच्छे सहित  सुप्रभात हाज़िर था । आभा जी फिर चुप्पी साध गयीं। लेकिन ये सिलसिला चल निकला। आभा जी भले ही जवाब नहीं दे रहीं, लेकिन वे तो जान ही रहे कि उनके मैसेज पढे जा रहे हैं। अब दिन में एकाध बेहद सलीके का  फ़ॉर्वर्डेड मैसेज भी आ जाता। बीच-बीच में किसी किताब का ज़िक्र भी करते। कभी किसी लेखक का नाम पूछते। आभा जी तब भी जवाब नहीं देतीं। दो महीने से ज़्यादा हो गये, सिलसिला बदस्तूर जारी है। सुबह की गुड मॉर्निनंग और रात का गुड नाइट तो हर हाल में आता ही है।

इधर तीन दिन हो गये थे, उनका कोई मैसेज आये हुए। रोज़ की तरह उस दिन भी नेट ऑन करते ही आभा जी ने व्हाट्स एप चैक किया। वहां उनका गुड मॉर्निंग नहीं था। आभा जी ने सोचा बला टली। रात में गुड नाइट भी नदारद। आभा जी मुस्कुराईं। सोचा-आखिर कब तक एकतरफ़ा मैसेज करते महोदय? दूसरे दिन फिर सुप्रभात ग़ायब!! शुभरात्रि भी नहीं! आभा जी ने चैन की सांस लेनी चाही, लेकिन ले नहीं पाईं। उन्हें तो आदत हो गयी थी इन सुप्रभात और शुभरात्रियों की…  जिन संदेशों का जवाब न दे के वे बड़ी प्रफुल्लित रहा करती थीं सारा दिन, आज उन्हीं संदेशों की अनुपस्थिति अखर रही थी उन्हें। मन को झिड़का, “क्या इस उमर में ऊटपटांग सोच! न आये मैसेज। अच्छा ही हुआ। “लेकिन थोड़ी देर बाद ही उन्होंने खुद को संदेश न आने के बारे में सोचते पाया।

“कहीं बीमार तो नहीं?”

“होने दो, मुझे क्या?”

“इंसानियत के नाते ख़ैरियत तो पूछी जानी चाहिये आभा।”

झिझकते हुए मोबाइल  के  कॉन्टेक्ट्स में से उनका नम्बर निकाला। देखती रहीं। लगायें, न लगायें? कहीं कुछ ग़लत न सोच लें। लेकिन भला हो इस टच स्क्रीन का!! इसी ऊहापोह में कॉल के बटन पर कब हाथ पड़ गया आभा जी जान ही नहीं पाईं। जानी तो तब, जब मोबाइल के अन्दर से “हैलो” जैसी कुछ आवाज़ उन्हें सुनाई दी। अब क्या करतीं? पूछ लिया, “सब ख़ैरियत?”

“जी हां सब बढिया। बेटा आया है सो उसके साथ व्यस्त था तीन दिन से। अच्छा लगा आपने फोन किया।”

“जी, आपके मैसेज नहीं मिले तो चिन्ता हुई कि कहीं बीमार न हों।”  सकुचाती आवाज़ में आभा जी ने कह ही दिया। कोई इस वक़्त उनके चेहरे को देखता, तो गुलाबी चेहरा कितना लाल हो गया है, समझ पाता।

“अच्छा जी! तो आपको मेरे मैसेज का इंतज़ार रहता है…” बेहद खुशगवार आवाज़ आई वहां से। “जानती हैं आभा जी, हम दोनों उम्र के जिस दौर में हैं, उस दौर में किसी भी दिन दुनिया से कूच कर जायेंगे निहायत अकेले ही, और किसी को पता भी नहीं चलेगा। बेटे-बहू आज ही निकलने वाले हैं, इंडिया में ही उन्हें और भी दो-तीन जगह जाना है, फिर वापसी। सूने घर में बहू करे भी क्या? ये घर अब घर तो लगता नहीं। कुछ भी व्यवस्थित नहीं। कांता जब तक थी, घर में रौनक थी, अब तो उसकी गृहस्थी मैने तितर-बितर कर दी, सो कांता की यादें भी उसकी तस्वीर में ही सिमट के रह गयी हैं। चाहता था, हम दोनों एक दूसरे का साथ दे पाते। कांता भी खुश होती, अपनी गृहस्थी को फिर से संवरा हुआ देख के!”

पता नहीं क्यों आज आभा जी का झिड़कने का मन नहीं हुआ। उन्होंने मोबाइल रखते-रखते एक नज़र अपनी व्यवस्थित गृहस्थी पर डाली। उनका मन हो रहा था कि झांसी पहुंच के वे उनका घर व्यवस्थित कर दें। ये तो सरकारी फ़्लैट है, रिटायरमेंट के बाद छोड़ना ही होगा। यहां कितना भी व्यवस्थित कर लें, डेरा तो उखड़ेगा ही। फिर आज तक किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया। वे क्या चाहती हैं, कैसे रहती हैं, किस मुश्क़िल में हैं, कोई पूछने वाला नहीं। एक हमदर्द मिला है, जिसे केवल मेरी चिन्ता है, ये परवाह किये बिना कि मैं उसके साथ रिश्ते में बंधूंगी या नहीं, लगातार मेरी चिन्ता करता है। पैसे की उसे कमी नहीं, कोई और स्वार्थ भी नहीं।
रात बारह बजे आभा जी के मोबाइल पर चमका, “शुभरात्रि”

आभा जी मुस्कुराईं। लगा एक स्माइली भेज दें। फिर नहीं भेजी। कुछ और लिखना चाहा, नहीं लिख पाईं। मन ही मन फ़ैसला सा करतीं, उनकी उंगलियों ने  टाइप किया, “शुभरात्रि।” 

मुख्त्यार गंज. सतना- म.प्र.