‘कगार की आग’ में जलती स्त्री अस्मिता

- मनीष कुमार गुप्ता

शोधार्थी (हिन्दी विभाग), अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
चलभाष: +91 838 201 8200; ईमेल: manishg808@gmail.com


अरण्य (1965), महासागर (1971), छाया मत छूना मन (1974), कगार की आग (1975), समय साक्षी है (1976), तुम्हारे लिए (1978), सु-राज (1980) जैसे बहुचर्चित उपन्यास लिखने वाले प्रसिद्ध कथाकार एवं पत्रकार हिमांशु जोशी ने अपने कथा साहित्य के माध्यम से अकसर उपेक्षित, अछूती जनजातियों और सुदूर पहाड़ी प्रदेश के कठिनाई से जीने वाले मनुष्यों की अन्दरूनी एवं बाह्य तकलीफों को वाणी देने का सराहनीय प्रयास किया है। उन्होंने आदिवासी जीवन को लेकर अनेक कहानियों एवं उपन्यासों की रचना की। उनका जुड़ाव हमेशा उपेक्षित लोगों से रहा और इसी जुड़ाव के पाथेय तथा अपनी संवेदना के माध्यम से ये अपनी रचना संसार को विस्तार देते रहे। उनकी रचनाओं में कल्पना और यथार्थ, फैण्टेसी और वास्तविकता की उलझी हुई परिस्थितियों में स्त्री, गरीब, दलित, आदिवासियों का जीवन जिस प्रपंच, संशय और आतंक में बीतता रहा, उनके विस्मयकारी रहस्य इनके उपन्यासों में पूरी तरह विश्लेषित करने का सार्थक प्रयास किया गया है। इसमें बालपन की जिज्ञासा, स्मृतियों की तार, पारिवारिक जीवन का उतार-चढ़ाव और वंचितों का दर्द को यर्थाथ रूप देखा एवं महसूस किया जा सकता है। इस प्रकार कहानी कहीं जिंदगी लगती है तो कहीं जिंदगी कहानी।

हिमांशु जोशी कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, आलोचना, यात्रा-वृत्तांत आदि विधाओं में महत्वपूर्ण रचना करके हिंदी साहित्य को समृद्धि किया और उनकी रचनाएँ समाज के प्रत्येक तबका खास तौर पर निचला तबका को को ध्यान में रखकर की गयी है। इनकी रचनाओं में ग्रामीण, पर्वतों एवं जंगलों में सुदूर बसे आदिवासी, दलित, स्त्री आदि का यथार्थ रूप प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। उनकी रचनात्मकता से प्रभावित होकर सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर ने इनके बारे में लिखा है- ”यह सही है कि हिमालय की हर चट्टान से गंगा नहीं निकलती, लेकिन हिमांशु जोशी के अनुभवजन्य हिमालय की प्रत्येक चट्टान से एक गंगा या एक उर्वरा नदी निश्चय ही निकलती है।”1 इनकी प्रकार इनके बारे में सुप्रसिद्ध आलोचक गोपाल राय अनुभव और संवेदना का सर्जनात्मक को रेखांकित करके लिखते है- “गरीबी, अशिक्षा, अन्धविश्वास, नैतिक मूल्यों के ह्रास, प्रधानों-पटवारियों-पेशकारों के शोषण आदि से नरक बनी इस जिन्दगी के चित्रण में लेखक ने अपने अनुभव और संवेदना का सर्जनात्मक उपयोग किया है।”2

‘कगार की आग’ एक बहुचर्चित उपन्यास है, जिसका प्रकाशन सन् 1975 में हुआ था। यह उपन्यास केवल गोमती, गोमा, गोमू की ही कहानी नहीं है वरन् पूरे ग़रीब, दलित, आदिवासी स्त्रियों की कहानी है, जो अपनों द्वारा, समाज द्वारा शोषित होती हैं। इस उपन्यास में गोमती के अलावा उसका बीमार पति पिरमा, नादान पुत्र कन्नू, देवर देवराम, ककिया ससुर कलिय’का, ककिया देवर तेजूवा उर्फ तेजाराम, दूसरा पति खुशालराम, खिमू’का, लाला तिरपनलाल आदि पात्रों को लेकर ऐसी कहानी गढ़ी गई है जो अपने घर, आस-पास की कहानी लगती है। यह उपन्यास पढ़ने पर गरीब, सतायी गयी, शोषित स्त्रियों का चेहरा गोमती में दिखायी देने लगता है। गोमती के साथ-साथ उसके पति पिरमा, अबोध पुत्र कुन्नू का चित्र उभरकर सामने आने लगता है। “गोमती, पिरमा, कुन्नू के माध्यम से मर-मरकर जीने वालों की यह व्यथा-कथा आज का युग सत्य भी है, कहीं। यह रंगहीन/रंगीन चित्र किसी के रक्त से खींची यन्त्रणा की रेखाएँ हैं। नाखूनों से कुरेदा हुआ अभिशप्त मानव का इतिहास।... गोमती, कुन्नू, पिरमा के माध्यम से संत्रस्त मानव-समाज के कई चित्र उजागर हुए हैं। इसलिए यह कुछ लोगों की कहानी, कहीं ‘सबकी कहानी’ बन गई है- देश काल की परिधि से परे।”3 यही कारण है कि यह उपन्यास सबको बहुत पसंद आया और यह उस समय का चर्चित उपन्यास रहा। इस उपन्यास को जो भी सुना पढ़ना चाहा इसलिए इसे अंग्रेजी, पंजाबी, मराठी, बांग्ला, उड़िया, डोंगरी जैसी देशी भाषाओं के साथ चीनी, बर्मी, नेपाली, नार्वेजियन जैसी विदेशी भाषाओं में इसका अनुवाद किया गया। इस उपन्यास को आस्ट्रेलिया, इटली जैसे देशों के विश्वविद्यालयों के पाठ्य-पुस्तक के रूप में पढ़ाया जाता रहा है। इस उपन्यास पर प्रसार भारती द्वारा फिल्म भी बनायी गयी है तथा आज भी रंगमंचों पर इसका अभिनय किया जाता है।

हिमांशु जोशी उपेक्षित, अछूती, असहाय और सुदूर पहाड़ी प्रदेश में कठिनाई से जीवन यापन करने वाले लोगों खासतौर जनजातियों के जीवन को उनकी जीवन संघर्ष को केंद्र में रखकर अपनी साहित्य की रचना करते हैं तथा उनके आन्तरिक एवं बाह्य दुख-दर्द को अपनी रचना में प्रमुखता से स्थान देकर सोचने-समझने पर मजबूर करते हैं। कहीं ना कहीं उनके प्रति सहानुभूति रखते हुए उनकी आवाज बनने की कोशिश की गयी है तथा उनके आक्रोश को सबके सामने लाने की सार्थक प्रयास किया गया है। उन्होंने अपने पात्रों को केवल समस्याओं से लड़ते हुए ही नहीं दिखाया है वरन् प्रतिशोध की भावना को जागृत करके उसे समाप्त करने का प्रयास भी किया है। वे अपनी रचना धर्मियता के बारे में कहते है- “साहित्य को मैंने मात्र मनोरंजन के लिए नहीं, मिशन के रूप में लिया है। मेरा प्रयास रहा है कि असंख्य यन्त्रणाओं से घिरे गूँगे आदमी को स्वर मिले।”4

उपन्यास की शुरुआत गोमती के ससुराल से भागने से हुई है। वह अपने ककिया ससुर और उसके बेटे के जुल्म और प्रकोप से बचने के लिए कई बार अपने मायके भागकर आयी थी। उसका पति पिरमा सब कुछ देखता रहता था पर डर के मारे कुछ भी नहीं बोलता था। अगर वह कुछ प्रतिरोध करता तो गोमती के साथ उसकी भी बहुत पिटाई होती थी, यह सब देखकर उसका अबोध बालक कुन्नू कहीं दुपक जाता था और थर-थर कापता था। अकसर वह मायके पहुँचकर अपने पर हुए जुल्म को माँ से बताती परंतु बूढ़ी माँ भी क्या कर सकती, वह भी लाचार है क्योंकि गोमती के जन्म के कुछ दिन बाद ही उसके पिता की मृत्यु हो गई थी और उसका कोई भाई भी ना था कि जाकर उन्हें समझाएँ। यहीं नहीं उसके मायके में अब खेती भी नहीं रही कि वह यहाँ आकर रह सके। जो भी जमीन थी उसे वहाँ के प्रधान पंडित ले लिए थे। गोमती की बेचारी बूढ़ी माँ कर भी क्या सकती थी इसलिए वह दिलासा दिलाते हुए कहती है- “औरत के लिए केवल वही घर है इजु! जैसे भी हो अपनी घड़ी तुझे वही काटनी है। सब दिन एक-से तो नहीं रहते। कभी कुछ सह भी लिया कर।”5 परन्तु उसकी माँ को क्या मालूम उस पर क्या-क्या जुल्म होता रहता है। रात को उसके पति को फसल की रखवाली के लिए भेज दिया जाता है फिर चुपके से उसके ककिया ससुर उसके बिस्तर तक पहुँचकर उसे हवस का शिकार बनाने को आतुर रहता है। उसका ककिया देवर उसे अपनी रखैल बनाने के लिए दबाव बनाता रहता है। हमेशा दोनों इस पर गिद्ध की तरह नज़र जमाए रहते हैं। मना करने पर लाठी-डंडे से मारते पीटते हैं और गंदी-गंदी गालियाँ देते हैं। इतना ही नहीं गंदा आरोप लगाकर उसे प्रताड़ित भी करते रहते हैं। पति भी बेचारा क्या कर सकता था, अपनी जान बचाने के लिए वह इसको ही दोष देता था। कभी-कभी इंसान अपने को इतना कमजोर समझने लगता है कि वह अन्याय को देखते हुए भी बुजदिल बनकर सहन करता है परंतु प्रतिरोध स्वरूप कदम उठाने से कतराता और डरता है। अगर कोई उसकी इस बुददिली का उपहास उड़ाता है तो इसे छुपाने के लिए आदर्श का सहारा लेना चाहता है। उससे भी बात नहीं बनती है तो वह धर्म की बात करके इसे छुपाने का प्रयास करता है। इसी तरह जब गोमती अपने पति से अपने अपने ककिया ससुर की हरकतों के बारे में बताती है तो वह उनकी हरकतों को जानते हुए भी यही कहता है कि “तू तो निरा बावली है! इतने बूढ़े पर शक करती है? तुझे पाप लगेगा। परलोक बिगड़ेगा तेरा। लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे? बिना बात थू-थू।”6

जब कोई स्त्री या कोई दमित व्यक्ति कुछ नहीं कर पाता और उसको दुख से छुटकारा पाने का कोई रास्ता नहीं दिखायी देता एवं उसे कुछ नहीं सूझता तो वह इस दुख-दर्द से मुक्ति पाने के लिए अपनी इहलीला को ही समाप्त करना चाहता है। यही कारण है कि गोमती के मन में भी कई बार आत्महत्या का विचार आया पर बेचारे कुन्नू और पिरमा के बारे में सोचकर वह रूक जाती थी और आत्महत्या की विचार को कुछ समय के लिए टाल देती थी तथा भगवान भरोसे सब कुछ छोड़कर उसी नरक भरी जिंदगी में आ जाती थी। एक बार उसे तथा उसके पति को कलिया एवं तेजुवा मार रहे थे। वह बचाने के लिए पुकार रही थी परंतु गाँववालों में से कोई भी उसे बचाने के लिए आगे नहीं आया क्योंकि वे उनसे उलझना नहीं चाहते थे। लेकिन उसी समय गोमती का देवर फौज से आ गया। यह सब देखकर अपना आपा खो दिया और मिलिट्री के सधे हाथ मारकर तेजुवा को लुढ़का दिया एवं काका को हिदायत देकर छोड़ दिया कि आज के बाद मार-पीट तो दूर, आँख उठाकर भी इनके तरफ ना देखना। “कका, बाप की उमर के हो। बाप की तरह ही माना है तुझको। नहीं तो आज टुकड़े-टुकड़े कर खेत में बिखेर देता...।”7

देवराम कुछ दिन घर पर रहा तब दुख में भी खुशियाँ झलक उठी। वह अपने परिवार के लिए बहुत कुछ करना चाहता था और इसके लिए इस बार पूरी योजना बना कर आया था परन्तु नियत को कुछ और ही मंजूर था। कुछ दिनों बाद ही उसे सेना से युद्ध में जाने के लिए पत्र मिल गया जिससे वह चाहकर भी घर पर नहीं रूक सका। कुछ दिन बाद सेना से अत्यन्त दुखद समाचार आया कि देवराम युद्ध में शहीद हो गया। यह खबर सुनते ही गोमती के परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। गोमती सोचती है कि जो कमानेवाला था, जिसके बल पर वह थोड़ा संघर्ष कर पाती थी और जिसके डर से अब उसके परिवार को अब नहीं सताया जाता था; अब वह भी नहीं रहा, अब हम किसके सहारे रहेंगे? यह खबर सुनकर तेजुवा और कलिया खुशी मनाते हैं तथा गोमती पर फिर से अत्याचार शुरू कर देते हैं। तेजुवा गोमती को अपना रखैल बनाने के लिए घसीटते हुए अपने घर ले जाता है तथा उसका बलात्कार करने का प्रयास करता है। परन्तु गोमती उसका गला दबा देती है जिससे वह बेहोश हो जाता है। इस प्रकार गोमती उस रात बच जाती है और घर से भागकर आत्महत्या करने के लिए नदी के किनारे पहुँच जाती है। परंतु उसे इस बार भी कुन्नू और पिरमा की याद आ जाती है। वह उनके भविष्य के बारे में सोचने लगती है और उनके लिए अपने भविष्य को फिर से उसी नरक में ढकेलने का फैसला करती है। वहीं उसकी मुलाकात खुशालराम से हो जाती है जो इसकी ही जाति का है। उसकी दो बीवियाँ हैं, परन्तु उसे संतान सुख प्राप्त नहीं है। वह गोमती को अपने घर ले जाता है और उसे बड़ी इज्जत के साथ रखता है। यह सब बात कलिया और तेजुवा को मालूम पड़ जाती है। वे दोनों पाँच-छः युवकों के साथ खुशालराम के घर आ जाते हैं और गोमती को ले जाने के लिए मारपीट करते हैं। फिर गोमती के लिए पंचायत बैठती है। इसमें यह तय होता है कि गोमती के बदले खुशालराम को बीस बीसी यानी 400 रुपये देना होगा। गोमती की कीमत पंचायत वालों ने लगा दिया परन्तु उससे यह भी नहीं पूछा गया कि वह घर से भागकर क्यों आई और वह घर क्यों नहीं जाना चाहती है? यह भी नहीं पूछा गया कि उस पर किस-किस तरह से अत्याचार होता था और किस कारण होता था? खुशालराम अब गोमती को खोना नहीं चाहता था जिसके कारण उसने 400 रुपये कलिया के मुँह पर दे मारा। गोमती यह सब देखकर बहुत दुखी हुई और खुशहाल की इस महानता के प्रति पूरी तरह समर्पित हो गयी। खुशालराम भी उसे अब अपनी जान से बढ़कर मानने लगा था। खुशाल उसके लिए गहने खरीदकर लाया और घर की पूरी चाबी दे दी। गोमती के प्रति वह इतना आसक्त हो गया कि वह उसके लिए तरह-तरह के पकवान लाता, मेला आदि घुमाने ले जाता।

एक बार गोमती मेला से बहाना बनाकर पिरमा से मिलने जेल चली जाती है। यह घटना गाँव में चर्चा की विषय बन जाती है। जब यह घटना खुशाल को पता चलता है तो वह गोमती पर भड़क जाता है। धीरे-धीरे गोमती से उसका मोहभंग होने लगता है। उधर गोमती अपने पुत्र के विरह में जल उठती है। उससे मिलने के लिए जाना चाहती है पर वह खुशाल के बीस बीसी के नीचे दबी पड़ी है। वह उस रकम को चुका कर फिर अपने बेटे के पास जाना चाहती है। खुशाल के धन वैभव के आगे भी वह अपने पुत्र के साथ फिर उसी नरक भरी जिंदगी जीना चाहती है इसलिए वह वहाँ से भागकर अपने गाँव के लोगों के साथ ऊँचे जंगलों में मजदूरी करने चली जाती है।
लाला तिरपनलाल के वहाँ वह नौकरी करती है। लाला उसके रूप का दीवाना था, वह उसके लिए कुछ भी करने को तैयार था। वह उसे वही रहने को कहता है लेकिन गोमती मना कर देती है। वह भी अन्य मजदूरों के साथ घर के लिए चल देती है परन्तु खुशालराम के बीस-बीसी को याद करके फिर लाला के पास वापस आ जाती है तथा एक साल नौकरी के बदले बीस-बीसी की शर्त रखती है जिसे लाला स्वीकार कर लेता है। लाला उसका शारीरिक शोषण भी करता है, यही नहीं; जब मन हो अपने आप आ जाता तथा अपने दोस्तों को भी बुलाकर उसके पास लाता रहता। जब एक साल पूरा हो गया तो गोमती अपना पैसों को माँगती है तो लाला उसे और रहने को कहता है। गोमती को यह बात नागवार लगी इसलिए वह लाला पर चिला उठती है- “साल-भर तूने जो कहा, मैंने किया। बता, कभी तेरे किसी काम को मना किया? तू आया, अपने यार-दोस्तों को भी लाया, पर हमने कभी कुछ कहा? अब मेरी तनखा दे दे लाला, नहीं तो मैं तेरे दरवाजे पर फाँसी लगा लूँगी, फिर मत कहना।”8

वह लाला से 400 रुपए लेकर सीधे खुशालराम के पास जाती है तथा उसके मुँह पर पैसा फेंककर अपने गाँव लधौन चली जाती है। वहाँ पहुँचते ही पता चलता है कि उसके पति को तेजवा ने मार डाला है तथा झोंपड़ी में आग लगाकर उसे जला दिया है। गाँववाले पुलिस के डर से सत्य घटना को छुपा लेते हैं। गोमती यह सब देखने-सुनने के बाद कून्नू को लेकर भाग जाती है। और जाते हुए चेतावनी दे जाती है कि जिस तरह कलिया और तेतुवा ने उसके पति को मारकर झोंपड़ी में जला दिया, उसी प्रकार मैं भी उन्हें एक दिन जलाऊँगी। कुछ दिनों बाद एक घास का घरौंदा धू-धू कर जलता हुआ दिखायी दिया और बस्ती से दूर कालभैरवी बने गोमती अपने बच्चे के साथ सब कुछ देखने के बाद अधियारे में लापता हो गयी।

संविधान के अनुच्छेद 46 में यह निर्देश है कि “राज्य जनता के दुर्बल वर्गों के, विशिष्टतया अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के, शिक्षा और अर्थ संबंधी हितो की विशेष से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उनकी संरक्षण करेगा।”9 परन्तु यहाँ राज्य के अधिकारियों, कर्मचारियों का कर्तव्य इस संवैधानिक निर्देश के विपरीत दिखाई देता है। इस उपन्यास में पुलिस की निर्दयता, बलात्कार, अत्याचार का बहुत ही मार्मिक एवं दारुण वर्णन किया गया है। उस क्षेत्र में कोई भी डकैती चोरी होती थी तो पुलिसवाले पहले चोर डाकू को ढूँढते थे फिर कुछ न हाथ लगने पर गोमती के पति पिरमा को पकड़कर जेल में बंद कर देते थे। उसे मार-पीटकर उसे चोर-डाकू बना देते थे। वह डर के मारे सारे अपराध कबूल कर लेता था। फिर शुरू होता था गोमती के साथ अत्याचार। वह गोमती को थाने में अकेले बुलाकर उसके साथ गलत काम करते थे। इसके बाद ही पिरमा को छोड़ते थे। वह भली-भाँति जानती थी कि जब पिरमा जेल में बंद होता था तो पटवारी उसे वहाँ क्यों बुलाता था। जब उसकी माँ थाने जाकर पटवारी से मिलने को कहती है, तब वह मना कर देती है परन्तु वह अपने पति के लिए वहाँ अपनी इज्जत की कुर्बानी देने चली जाती है। जब वह पटवारी से मिलकर आती है तो उसकी माँ उसकी हालत देखकर सिहर उठती है। उसकी देह पर जगह-जगह नाखूनों तथा दाँत के लाल-लाल निशान हैं, जिससे अब भी लहू टपक रहा था। ऐसी घटनाएँ कवल गोमती के साथ ही नहीं होती है, वरन अधिकतर गरीब, असहाय, दलित, आदिवासियों के साथ इस तरह का अत्याचार होता रहता है। यहाँ तक कि जब गोमती की बुआ ने आत्महत्या की थी तो पटवारी ने उसकी माँ के साथ कई बार ऐसा ही कुकर्म किया था।
भाषा की अगर बात की जाये तो इन्होंने जगह-जगह पहाड़ी शब्द और वहाँ के लोकोक्तियों एवं मुहावरों को इस प्रकार गूँथ दिया है कि वह पात्रों के करीब और अनुकूल बन गयी है। प्राकृतिक दृश्य, सामाजिक दृश्य का भी उचित सामंजस्य एवं सार्थक प्रयोग किया गया है जिससे उनकी रोचकता और बढ़ जाती है। अगर हम इनके उपन्यासों की बात करें तो प्रायः उनके सभी उपन्यास लघुउपन्यास की श्रेणी में आते हैं। उन्होंने अपने उपन्यासों में आंचलिकता को सम्माहित किया है और भाषा पात्रों के अनुरूप ही प्रयोग किया है। “हिमांशु जोशी के सभी उपन्यास लघुउपन्यास और उपन्यायिका की श्रेणी में आते हैं।... हिमांशु जोशी की कथा-भाषा सामान्य है, पर पहाड़ी जीवन से सम्बद्ध उपन्यासों के कथाकार ने परिनिष्ठित हिन्दी में पहाड़ी भाषा के शब्दों और लहजों का मिश्रण करके उसे सर्जनात्मकता प्रदान करने की कोशिश की है।”10

इस प्रकार कहा जा सकता है कि यह उपन्यास उस स्त्री की कहानी है जो अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कगार की आग में हमेशा जलती रहती है। यह उपन्यास उस बदनसीब माँ की कहानी है जो अपने नादान बेटे के लिए हमेशा तड़पती रहती है। यह उपन्यास उस पत्नी की कहानी है जो अपने बीमार पति के लिए और अपने रिश्ते के लिए दूसरे के पैसे, वैभव को छोड़कर दिन रात मेहनत करके उसके पास आने को तरसती रहती है। यह उपन्यास उस बदनसीब भाभी की कहानी है जिसकी शहादत पर फूट-फूटकर रोते हुए अपनी जिंदगी को अंधकारमय मानती है। यह उपन्यास उस गरीब स्त्री की कहानी है जिसे पुलिस, सेठ, प्रधान, लाला आदि के शोषण से बचने के लिए हमेशा संघर्ष करना पड़ता है। यह उपन्यास केवल एक क्षेत्र का कथा न कहकर पूरे विश्व की कथा कहता है। इसे पढ़कर अपने आसपास की घटना याद आने लगती है, यही कारण है कि इस उपन्यास को कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है तथा विश्व की कई भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ है। इसकी कथा को कहीं-कहीं अत्यधिक विस्तार दे दिया गया है तो कहीं अत्यंत संक्षिप्त रूप में समाहित कर दिया गया है। अगर एक समान रूप से घटना चलती तो और अधिक रोचकता पैदा हो सकती थी। सब कुछ होते हुए यह उपन्यास समाज के यथार्थ को लेकर लिखा गया एक सार्थक, सामाजिक एवं रोचक उपन्यास है।

संदर्भ सूची
1- इकहत्तर कहानियाँ, हिमांशु जोशी, साहित्य भारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006 फ्लैप पेज से उधृत
2- हिन्दी उपन्यास का इतिहास, गोपाल राय, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, छठा संस्करण, 2016, पृ. 350
3- कगार की आग, हिमांशु जोशी, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, सातवाँ संस्करण, 2006, फ्लैप पेज
4- वही, पृ. 8
5- वही, पृ. 13
6- वही, पृ. 14
7- वही, पृ. 41
8- वही, पृ. 94
9- आदिवासी समाज और हिन्दी उपन्यास, मनीष कुमार गुप्ता, अनुसंधान पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, कानपुर, पृ. 86
10- हिन्दी उपन्यास का इतिहास, गोपाल राय, पृ. 351

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