समीक्षा 'कस्बाई सिमोन'

'कस्बाई सिमोन' (उपन्यास)
उपन्यासकार: सुश्री शरद सिंह
प्रकाशक: सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य: 300 रुपये
समीक्षक: डॉ. लता अग्रवाल
प्रत्येक युग में तीन विचार धाराओं पर आधारित लेखन होते रहे हैं एक सुखांत जो संभवतः कल्पनाओं पर आधारित होता है, वास्तव में जो होता नहीं है। दूसरा आस -पास के जीवन से जुडी घटनाओं पर आधारित जिन पर लेखक अपने शब्दों का आवरण चढ़ाता है, कुछ यथार्थ कुछ कल्पना का मिला जुला रूप। तीसरा जीवन में हुए हादसों का कटु यथार्थ, जिसे ज्यों का त्यों लिखना, सच इसके लिए हिम्मत की आवश्यकता है। क्योंकि आवश्यक नहीं कि पाठक इस सच को स्वीकारे।

आज समाज की मान्यताओं को रुढ़ि का नाम देकर नकारने का चलन तेजी से बढ़ा है। विवाह भी उनके लिए ऐसा ही बंधन है जिसमें बंधते हुए युगल का प्रेम कहीं गुम हो जाता है।युवा पीढ़ी इसमें अपने निजत्व का तर्क खोजती है, सिर्फ खामियां देखते हुए बिना विवाह के संग रहने का चलन बनाये हुए हैं जिसे ‘सह जीवन’ या ‘लिव इन रिलेशन’ का नाम दिया जा रहा है। कम से कम महानगरों में लिव इन रिलेशन’ का चलन तेजी से बढ़ता जा रहा है। सुश्री शरद सिंह जी का उपन्यास ‘कस्बाई सिमोन’ इसी जीवन शैली को अपनाने वाली एक नायिका के अनुभव को वक्त करता है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो यह उपन्यास नायिका की पीड़ा है जो इस रिश्ते में जीते हुए उसने महसूस की, अतिश्योक्ति नहीं अगर कहूँ कि यह उपन्यास एक वर्कशॉप है जो आने वाली उस पीढ़ी को इस सम्बन्धों का फीचर उनके सामने रखती है, इसके तर्क–वितर्क सचेत करते है। इससे सीख ले सकते हैं यदि वे लिव इन में रहना चाहते हैं तो कैसे सहेजे रखें रिश्तों को, कौन से हालात हैं जो उन्हें तोड़ सकते हैं आदि।

नामकरण - लेखिका ने इस उपन्यास को नाम दिया ‘कस्बाई सिमोन’, शहरी सभ्यता में यह ‘लिव इन रिलेशन की संस्कृति का बीज न केवल रोपित हुआ वरन पुष्पित और पल्लवित भी हो चुका है किन्तु कस्बों में जहाँ आज भी लोग एक दूसरे से जुड़े हैं उनके सुख-दुःख साझा है, एक दूसरे के जीवन में हस्तक्षेप रखते हैं, वहां इस तरह की जीवन शैली अपनाने वालों के लिए मुश्किलें उत्पन्न होती है। इस उपन्यास की नायिका चूँकि कस्बे से ताल्लुक रखती है अत: उसे इन सारी समस्याओं से गुजरना पड़ा है। उसके लिए यह इतना आसन नहीं क्यों? यह हम सुगंधा के दफ्तर के ही एकाउंटेंट सिकरवार के शब्दों में, “तुम नीना गुप्ता, सुष्मिता सेन या करीना कपूर नहीं हो तुम एक कसबे की और मध्यमवर्ग की लड़की हो ये सब पैसेवालों और महानगरों के जीने के तरीके हैं तुम जैसी लड़कियां दुःख ही पाती हैं, चैन, सुकून, अधिकार और सम्मान नहीं, आगे तुम समझदार हो।” (पृ 98) सम्भवतः सुगंधा ने अपने जीवन का आदर्श फ़्रांसिसी लेखिका सिमोन द बोउवार को चुना जो बिन ब्याह के अपने प्रेमी के साथ रही, साथ रहते हुए भी अन्य पुरुष से देह सम्बन्ध बनाये। किन्तु यह परिवेश की भिन्नता थी, ‘यहाँ बंद दरवाजे के पीछे बनने वाले रिश्ते प्रतिकूल मानी होते हैं, खुली सड़क पर बनने वाले अनुकूल रिश्ते नहीं।’ (पृ 117) इस दृष्टि से उपन्यास का शीर्षक सार्थक है।

चतुर्वेदी और लता पण्डे का प्रसंग भी इस सम्बन्ध की सफलता की पैरवी नहीं कर रहा जिसकी चर्चा सुगंधा करती है। उनके अलगाव के बाद वही हुआ, पुरुष पात्र तो अपने परिवार और नये साथी के साथ आनन्दमय जीवन यापन कर रहा था किन्तु लता पांडे के हिस्से आया अकेलापन, जिसने गर्भ धारण तो कई बार कराया किन्तु जन्म एक बार भी नहीं दे पाई। आज बच्चा होता तो उसके सहारे इस अकेलेपन को काट लेती। सुगन्धा के समक्ष ज्ञान चक्षु खोलने यह एक बड़ा उदाहरण था। किन्तु यदि इस स्वतंत्रता को जीना ही है तो मकान मालिकों, पड़ोसियों की ताक झांक, टोका टाकी को अनदेखा करना था, प्रेरणा द्वारा किये कटाक्ष की अनदेखी करनी थी किन्तु क्या कर पाई सुगन्धा यह सब?

यहाँ सिरे से सुगंधा को दोषी करार देने के पक्ष में मैं नहीं हूँ, जिस समाज की हम बात कर रहे हैं सुगंधा उसी समाज का एक अंग है, और व्यक्ति आज क्या है? इसमें समाज की भी अपनी भूमिका है। इस नाते किसी के चरित्र का मूल्यांकन करने से पूर्व उन परिस्थितियों को परखना आवश्यक है जिनसे होकर उसका वह व्यक्ति गुजरा है या उसका बचपन बीता है।

बालक पर माता पिता के जीवन की छाया पड़ती ही है, यहाँ सुगंधा ने बचपन में ही पिता को अपनी छात्राओं के साथ सम्बन्ध बनाते सुना, युवावस्था में माँ को सेलट अंकल के साथ। माँ के रोकने पर पिता के यह संवाद माँ के लिए, “हाँ, मैं उन्हें अपने साथ सोने के लिए मजबूर करता हूँ, तुम चाहो तो तुम्हारे लिए भी छात्रों की लाइन लगा दूँ।” (पृ 33) माँ-पापा के बीच हाथा–पाई, माँ का धक्का देना पिता का तमाचे जड़ना, एक दूसरे पर आरोप - प्रत्यारोप, अशोभनीय संवाद, माँ का घर छोड़ना, उसके बाद माँ- बेटी का जीवन संघर्ष, मकान मालिक के बेटे मोहन द्वारा नाबालिग सुगंधा के साथ जबरदस्ती, सेलट अंकल का घर आना, फिर उनकी पत्नी का घर आकर अश्लील गलियां देना, जलील करना, उस पर अंकल का सम्बन्ध तोड़ देना, माँ का सेलट अंकल से अलगाव के बाद टूटना, पल्लवी मिश्रा का दहेज वेदी पर झुलसना सारे घटनाक्रम सुगंधा के जीवन से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहे। जो स्वरूप (चरित्र) तैयार हुआ वह ‘सुगंधा’ के रूप में हमारे सामने है, कोई आश्चर्य की बात नहीं है। बच्चे फूल के समान होते हैं हमने सुना है किन्तु तभी जब इनकी देखभाल एक कुशल माली के हाथों लाड़–चाव से हो। अन्यथा कई नागफनियाँ अपना घर बना लेती हैं। सुगंधा उन खुशकिस्मत बच्चों में नहीं थी कि उसके पास अपना खिलखिलाता, मुस्काता बचपन होता, स्वयं स्वीकारती है, “बचपन की बातें याद करना हमेशा सुखद रहता है, बशर्ते आपका बचपन सुखद घटनाओं से भरा हो।” (पृ 63) बच्चा माँ से लोरियां सुनना चाहता है तो पिता के कन्धों की सवारी भी उसकी अभिलाषा होती है यहाँ तो एक मासूम बचपन को चुनाव करना था, “सुगंधा! तू मेरे साथ रहना चाहेगी या अपने पापा के साथ?” (पृ . 48) यह प्रश्न किसी भी बच्चे के पूरे वजूद को हिलाकर रखने के लिए काफी था।

सुगंधा के मन में बचपन से ही जाने-अनजाने यह बीज बो गया कि विवाह ही सरे विवादों की जड़ है। जिसमें माता-पिता के विवादित जीवन ने पोषण का कार्य किया, रिश्तों का बिखराव, उससे मिलने वाली टीस, धीरे-धीरे यही भाव उग्र रूप लेता चला गया कई प्रश्न उसके अबोध अवचेतन में जमा होने लगे। उसके मस्तिष्क में विवाह या अन्य रिश्ते मात्र एक बंधन बनकर रह गये जो केवल अधिकारों का हनन करते हैं उसमें कहीं प्रेम तत्व नहीं है। यथा – कुंवारी माँ बनने पर लडकी ही प्रताड़ित क्यों? ब्याहता होने पर स्त्री के लिए ही प्रतीक चिन्ह क्यों? “बंधन! बंधन के जो रूप मैंने अभी तक देखे हैं उनमे स्त्री को ही बन्धे हुए पाया, पुरुष तो बंधकर भी उन्मुक्त था। वैवाहिक बंधन का विकृत रूप।” (पृ 31)

यही कारण है कि, “जब भी मैं विवाह के बारे में सोचती तो मेरा मन मुझसे कहता, माँ को क्या मिला विवाह करके? एक उपनाम ही तो न? और एक टैग श्रीमती का।” सुगंधा का इस तरह वैवाहिक जीवन के बारे में धारणा बनाना अचम्भित नहीं करता क्योंकि माता पिता के अलगाव के बाद वह सभी रिश्तों से अलग हो गई थी उसका दायरा सिमटकर रह गया था अत: जीवन का वह व्यवहारिक ज्ञान जो रिश्तों की पाठशाला से मिलता सुगंधा उससे महरूम रह गई। वैवाहिक जीवन के सकारात्मक परिणाम भी होते हैं उसे नहीं पता। वह यही जानती है कि विवाह के बाद औरत को मारने–पीटने का अधिकार पुरुष को मिल जाता है। पुरुष सत्ता के प्रति उसका दृष्टिकोण उदासीन रहा यहाँ तक कि अपने नाम में भी केवल पिता की मंशा ही दिखाई दी, ‘यह नाम मुझे पिता ने दिया माँ की अपनी कोई पसंद नहीं। यह वो विष था जो सुगंधा ने बचपन से पिया तब उसका वमन तो होना ही था। “सेलट अंकल स्वयं आते हैं माँ की मज़बूरी का फायदा उठाने ... मैं अपना रोना भूलकर उन्हें चुप करने लगी। ... मुझे लगा की मुझे एक बार फिर बड़े होने की आवश्यकता है।” (पृ 60) इस तरह परिस्थितियों ने उसे कभी बच्चा रहने ही नहीं दिया।

जीवन की पाठशाला ने कई सवालों के जाल सुगंधा के मानस पर डाल दिए कि “अदालत में माँ नहीं पापा ‘बदचलन’ सिद्ध हुए लेकिन अलगाव के बाद भी माँ परित्यक्त्या कहलाई, समाज ने उन्हें ही छोड़ी हुई औरत माना, विशेष रूप से चरित्र के प्रश्न पर, महज उपभोग की वस्तु के रूप में ... जो उस परित्यक्त्य को अपनाता है उस पर दया अथवा एहसान करता है।” वहीँ माँ पिता के अलगाव के बाद माँ का यह कथन, “अकेली औरत को रखने वाले बहुत मिल जाते हैं घर देने वाला कोई नहीं मिलता।” (पृ 50)

अपनी बात (पृ 7) में इस समस्या के कारण पर वह स्वयं प्रकाश डालती है जो काफी हद तक सच है कि ‘स्त्री को आर्थिक आधार पुरुषों के बराबर न होने के कारण विवाहिताएं अपने पति द्वारा छोड़ दिए जाने से भयभीत रहती हैं, दूसरा समाज परितक्त्या को सम्मान की दृष्टि ने नहीं देखता। किन्तु यदि आर्थिक रूप से सक्षम है तो सम्मान वह पा लेती है।’ यहाँ सुगंधा आर्थिक रूप से स्वावलंबी है रखैल नहीं है, अत: आर्थिक स्वावलंबन सुगंधा का मुख्य लक्ष्य बना। विवाह से विरक्ति का सबक उसे अपने ही घर से मिला, इस तरह उसके अवचेतन पर यह विचार घर कर गया की उसे विवाह के बंधन में नहीं बंधना है। उस पर ‘सिमोन द बाऊवार’ को पढ़कर यह विचार और भी स्थायी हो गया, ‘अपने ढंग से जीवन जीने का साहस मेरे अवचेतन में कहीं न कहीं मौजूद सिमोन की उन्मुक्त जीवन यात्रा के सौपानों से मिला था मुझे’ (पृ 130) यहाँ सही तौर में सही साहित्य के अध्ययन के महत्व को समझे जाने की आवश्यकता है।
कैसी विडम्बना है, प्रकृति ने स्त्री और पुरुष की रचना सिर्फ संसार के निर्माण हेतु की थी कल्पना रही होगी कि दोनों जीव मिलकर परस्पर प्रेम की पौध उगायेंगे किन्तु जाने-अनजाने ये दोनों जीव कब एक दूसरे के प्रतिद्वंदी बन गये उनके अहम की टकराहट में सिर्फ विध्वंस की चिंगारी ही निकली जिसकी लपट ने न जाने कितनी सुगंधा के जीवन में विद्रोह का बीज बो दिया। समाज में अब ये दो वर्ग सदा अपने अस्तित्व के निजत्व हेतु संघर्षरत हैं जिनमें सदियों से पुरुष वर्ग हावी ही रहा है कारण कुछ भी हो किन्तु सच यही है, “जब-जब हमारा विवाद हुआ तब-तब ऋतिक ने शारीरिक रूप से पलटवार नहीं किया इसलिए नहीं कि वह दयालु था इसलिए कि ऋतिक तो मानसिक चोट देने में उस्ताद था। देह की चोट तो इंसान सह जाता है किन्तु मन की चोट को सहना बहुत कठिन होता है।” यही चोट है जो रिश्तों में दरकन पैदा कर देती है। युवा सुगंधा को भी दिशा बोध करने वाले का अभाव रहा।
“जरा सोचो यदि नूतन का पति मुझमें दिलचस्पी लेने लगे तो मेरी और नूतन की क्या स्थिति होगी? संबंधों को बहुत सोच समझकर निभाना पड़ता है सुगन्धा।” (पृ 44)

“रीता ने मेरे जीवन में एक अलग ही प्रभाव डाला, यदि सच कहा जाय तो यौन संबंधों की जानकारी पहली बार उसी ने मुझे दी।” (पृ 57) कोई इस तरह का साहित्य चोरी छिपे पढ़ना, चित्रों को देखना मानस पटल पर हानिकारक असर डालते हैं, तभी तो यौन शिक्षा के महत्व को प्रतिपादित किया गया है। अधिकांश बच्चे इस तरह के हल्के साहित्य के माध्यम से ही अपना यौन सम्बन्धी ज्ञान विस्तार करते हैं और जीवन की प्रयोगशाला में अप्रत्याशित प्रयोग कर बैठते हैं। रीता का ‘ज्ञान की बातें’ पुस्तक देना और कहना,
“इसे पढना तू!’ ... चल अभी पढ़, तब तक मैं चाय और पराठे लेकर आती हूँ।”
“देख ये गोली माँ ने मुझे दी है ... महीने की तारीख आगे बढ़ने की दवा।”
मित्रों आस-पड़ोस से आधी अधूरी जानकारी बच्चों को दिग्भ्रमित करती है।

रीता से मिले आधे–अधूरे ज्ञान का प्रयोग उसने रितिक के साथ किया। कहने का तात्पर्य यह है कि सुगंधा ने बचपन में रिश्तेदारों की चर्चा के स्थान पर केवल स्त्री पुरुष के संबंधों के बारे में देख और सुना। अत: उसके लिए यही दुनिया का अहम हिस्सा हो गया।

“देह की भूख ने मुझे कभी इतना प्रभावित नहीं किया जितना प्रेम की प्यास ने, कोई ऐसा हो जो मुझे सिर्फ मुझे चाहे” (पृ 25) किन्तु सुगन्धा का सारा जीवन देह की भूख और प्रेम के बीच उलझकर रह गया। माना देह जनित सुख की भी अपनी प्राथमिकता है किन्तु यहाँ लगता है नायिका सुगन्धा स्वयं स्त्री देह बनी हुई है उससे परे वह जाना ही नहीं चाहती।

इसी देह सुख के सहजीव के रूप में रितिक उसके जीवन में आया। विवाह के बंधन को नकार चुकी सुगंधा ने ‘लिव इन रिलेशन’ को अपनाया, “मुझे पति चाहिए भी नहीं, घुटन होती है इस शब्द को सुनकर, मुझे स्पेस चाहिए और प्यार भी, साथ भी, बहुत कठिन बात है न यह।”
“नहीं बिलकुल नहीं, बहुत सरल बात है, बस एक कदम उठाओ और लाँघ जाओ दुनिया के सारे नियम कायदे।” (पृ 86)
और सुगन्ध लाँघ गई वह रेख रितिक के भरोसे मगर जिसके भरोसे लांघी क्या वह भरोसा मजबूत निकला?

नियति ने उसके बचपन को उलझाये रखा किन्तु यौवन की उलझन उसने खुद ओढ़ ली। ऐसा नहीं कि माँ ने उसे नहीं रोका इस रास्ते पर चलने से, माँ का विरोध था किन्तु उसके अतीत की परतों के बीच उसके स्वर दबकर रह गए, सेलट के साथ सम्बन्ध ने बेटी के समक्ष उन्हें बौना कर दिया था। यही कारण था कि माँ इस मुद्दे पर बेटी को उंगली पकड़कर अपने अनुरूप चला नहीं पाई। बच्चे माता-पिता की भूल को जीवन भर भुनाते हैं।

“पागल तो नहीं हो गई? बिना शादी किये भी कोई किसी के साथ यूँ खुले आम रहता है?” (पृ 107) वहीँ पड़ोसन की सीख भी कम न आई, “अरे लड़का आवारा भी हो तो उसे कोई कुछ नहीं कहता, उसका घर मजे से बस जाता है लेकिन लड़की का जीवन तो कांच की तरह होता है एक भी खरोंच आई तो सबको दिखाई देने लगती है।” (पृ 64) पड़ोसन का यह कथन जीवन का यथार्थ है आज भी इससे इंकार नहीं किया जा सकता। फिर शुरू हुई सुगंधा और रितिक की समाज से टकराहट,
“हमें घर बदलना होगा।” (पृ 62) माँ ने अचानक एक दिन कहा।
“क्यों?”
“मकान मालिक यही चाहता है।”
“लेकिन क्यों? क्या किराया बढ़ाना है उसे?”
“नहीं। उसका कहना है हमारे घर अच्छे लोग नहीं आते।”

यही विडम्बना सुगन्ध के जीवन में भी रही वस्तुतः हर उस अविवाहित जोड़े की होगी जो संग रह रहा है। जिसका उत्तर सुगन्धा के ही एक स्वतंत्र विचारों वाले मकान मालिक ने दिया, “समाज छिपकर सबकुछ करने की अनुमति देता है आप चाहे आजमाकर देख लें आप दोनों अलग अलग घरों में रहिये, एक दूसरे के चचेरे - ममेरे भाई बहन होना प्रकट कीजिये फिर सब कुछ कीजिये कोई ऊँगली नहीं उठाएगा आप खुलकर करेंगे समाज का निशाना बनेंगे।” (पृ120)
इसका उदाहरण भी सुगंधा के समक्ष कीर्ति के रूप में था, कीर्ति के द्वारा सलाह देने पर सुगन्धा का कीर्ति पर उल्ट वार, “तेरे भी तो सम्बन्ध हैं पति के अलावा ...”
“हाँ! हैं न सम्बन्ध, लेकिन सदाशिव हैं मेरे साथ उसकी जानकारी में हैं यह सब, उसको कई ठेके मेरे संबंधों के आधार पर ही मिले हैं।” ये कैसी दोहरी मानसिकता है समाज की?

यदि विवाहित हैं तो आपको कोई भी रेखा पार करने का परमिट है? बड़ा प्रश्न उठाती है सुगंधा। चूँकि यह परमिट उसके पास नहीं इसलिए हर बार मकान मालिक द्वारा ताकीद दे कर बहाल की गई सुगंधा का यह कथन, “घर मानव जीवन में बहुत महत्व रखता है यह तथ्य मुझे वर्षों बाद बहुत गहरे से समझ आया।” (पृ 62) यहाँ घर की परिभाषा को सुगंधा ने किस रूप में समझा स्पष्ट नहीं है।

समाजविज्ञान की छात्रा रही सुगन्धा जानती है कि “समाज तत्कालीन विचारों के लिए परिस्थितियों का सृजन करता है प्रत्येक नागरिक को उसी के अनुरूप जीवन जीने को विवश करता है।” (पृ 71) समाज इसी को जीवन का संविधान मानता है किन्तु सुगंधा को इस संविधान से एतराज है वह अपने अनुरूप समाज को बदलने का हौसला रखती है। “हमने ही तो गढ़ा है इस समाज को, यह कोई आसमान से तो बनकर नहीं आया।” (पृ 64) उसके विचारों ने स्त्री और पुरुष दोनों को सदा प्रतिद्वंदी के रुप में देखा जबकि जीती भी रही उसी पुरुष के साथ, “स्त्री वेश्या बनती है क्योंकि पुरुष उसकी देह के बदले उसे पैसे देने को तैयार है, स्त्री दासी बनकर रहती है क्योंकि पुरुष बदले में दूसरे पुरुषों से उसकी रक्षा करता है। पुरुष जो बनाता है स्त्री बनने को तैयार हो जाती है क्योंकि वह जीना चाहती है। दुःख की बात तो ये है कि समाज के रूप में उपस्थित पुरुष और पुरुषों की दृष्टि में स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ में हर उस स्त्री को सार्वजानिक रूप से अपमानित किया जाता है जो पुरुष की दासी या वेश्या बने बिना जीना चाहती है।” (पृ 71)

किन्तु वही सुगन्धा कहीं न कहीं ऋतिक के अनुरूप स्वयं को ढाल रही थी तात्पर्य लाख अस्वीकृति के बावजूद उसमें भी वह स्त्री छिपी थी जिससे उसे इंकार था वह स्वयं स्वीकार करती है –
“रितिक को काम–तृप्ति के बाद उदर तृप्ति अधिक पसंद थी। मैं अवचेतन में उसके अनुरूप ढलती जा रही थी, सम्भवतः यह स्त्री प्रकृति का स्वभाव था।” संभवतः यही पत्नी करती है, पति के अनुरूप स्वयं को ढालती है। सुगंधा को स्त्री स्वातंत्र्य के अपने उठाये इस कदम पर गर्व था, कहीं अवचेतन में यह भी कि इसमें उत्तरदायित्वों के न होने से कहीं टकराव नहीं होगा या टकराहट होने पर आसानी से किनारा किया जा सकता है।
“किसने कहा कि मैं पढ़ाकू नहीं हूँ? पहले सोने से पहले एक न एक किताब जरुर पढ़ती थी।”
“और अब?”
“अब तुम्हें पढ़ती हूँ।”

सवाल है क्या सुगंधा पढ़ पाई रितिक को, काश इन्सान को पढना इतना आसन होता? सुगंधा का यह विश्वास टूटा जब दोनों के सुख-दुःख अलग हुए (पृ 76) “उसका पौरुष तृप्त हो चुका था और अब वह आपने उदर को तृप्त करने में जुटा था एकाएक मेरा मन उचाट हो गया। रितिक को मेरी कठिनाइयों का अनुमान नहीं है क्या?” (पृ 77 आरम्भ हुआ दोनों के निजत्व पर समाज का हस्तक्षेप, “समाज के इसी दोहरेपन के कारण हमें बार -बार घर बदलने पड़े लोगों को स्वयं से अधिक हमसे सरोकार था।” (पृ 112) यहाँ मैं कहना चाहूंगी सुगन्धा और रितिक के अलगाव की एक वजह यह भी रही, कहीं न कहीं रितिक समाज और परिवार का दबाव महसूस करने के कारण तनाव में आ गया था। जहाँ दोनों की धारणा थी कि, ‘विकल्पों की तलाश कमजोर करते हैं साहसी नहीं।’ (पृ 76) वहीं अब दोनों विकल्प तलाशने लगे, “लोग मुझे ऋतिक और मेरे सम्बन्धों के बारे में झूठ बोलने के लिए बाध्य कर रहे थे और मैं न चाहते हुए बाध्य होती जा रही थी। मैं कमजोर नहीं थी किन्तु विवाद में भी नहीं पड़ना चाहती थी।” (पृ 84) इस डर से रितिक को भैया कहना समाज में साथ मानवीय मूल्यों की गरिमा को भी चोट पहुंचाता है। इन समस्त विवादों से बचने के लिए तो हम सम्बन्धों में बंधते हैं।

किन्तु यह कहाँ तक उचित है कि हम समाज द्वारा अपने निजत्व पर घात होते देखते हैं तो समाज को दकियानूसी कह बैठते हैं, वहीँ किसी और द्वारा अपने अधिकार पर चोट पाते हैं तब भी समाज की दुहाई देते हैं ऐसे में सिद्ध यही होता है कि हम समाज की भूमिका अपने अनुरूप तय करना चाहते हैं। रितिक का यह कहना, “हमारा समाज हद दर्जे का दकियानूसी है।” स्वयं सुगंधा के शब्दों में, “अपना लाभ हमें वैधानिक लगता है, अपनी सफलता हमें न्यायोचित लगती है, अपना जीवन सामाजिक लगता है, दूसरों का लाभ, दूसरों की सफलता दूसरों का जीवन दोषपूर्ण लगता है।” वहीँ सुगंधा और रितिक को समाज की मान्यता से एतराज है किन्तु अपनी सुविधा हेतु इस संबंधों का प्रयोग करने से परहेज नहीं यथा मकान की रजिस्ट्री में पति–पत्नी के रूप में नाम दर्ज ‘सुगंधा पत्नी रितिक शर्मा’ उन्हें प्रश्न के घेरे में रखता है। वहीँ साथ रहते-रहते उन दोनों के अवचेतन में एक दूसरे के प्रति पति–पत्नी का भाव जागृत हो गया भले ही वे इसे स्वीकारने से इंकार करते रहे। सुगंधा एक गृहिणी, पत्नी का भाव लिए ही तो जीती रही रितिक के साथ यहाँ तक कि सहकर्मी के बच्चों को देख उसमें मातृत्व भी हिलोरे लेता रहा।

“नहीं मेरा मतलब यह नहीं हैं मैंने तो बस यूँ ही पूछा। पता नहीं क्यों मैं सख्त नहीं हो पाई शायद घर का मामला था और मेरे भीतर बैठी गृहिणी भी ठीक वैसा ही बड़ा सा घर पाना चाहती थी या फिर मैं रितिक के क्रोध और आक्रोश से डरने लगी थी, एक पत्नी की भांति।” (पृ 135) “एक बार फिर रितिक की दीर्घायु के लिए ईश्वर से दुआ मांग ही ली।” - करवा चौथ (पृ 146)

वहीँ रितिक में आये परिवर्तन उसे पीटीआई के कटघरे में रखते हैं, “अब वह मुझे झिड़कने भी लगा था, कई बार बिलकुल परंपरावादी पति की तरह। इधर कुछ समय से मैं अनुभव कर रही थी कि हमारा असामाजिक रिश्ता सामाजिक आकर लेता जा रहा था, दायित्वों को लेकर रितिक की मुझसे अपेक्षाएं बढती जा रही थी।” (पृ 148) “मैं महसूस करने लगी थी कि जिस ताजगी को बनाये रखने के लिए हमने विवाह किये बिना साथ रहने का निर्णय किया था वह ताजगी कहीं पीछे छूटती जा रही है। हम विवाहित नहीं इसलिए स्वतंत्र हैं कि वह ताजगी इतर व्यक्तियों में ढूंढे।” अगले ही पल स्वयं स्वीकारती है, “सम्बन्धों की यायावरी स्त्री देह को भले ही नए नकोर अनुभव दे किन्तु स्त्री मन को चैन नहीं दे पाती है।” (पृ 148) “वह पहले वाला रितिक नहीं रह गया था ... जिस पर धीरे धीरे सामाजिकता प्रभावी होती चली गई थी पर वह हमारे पारस्परिक प्रेम सम्बन्ध को अवैध मानने लगा था।” (पृ 152)

रिश्ता चाहे लिव इन का हो या सात फेरों का संग रहने से जुडाव तो हो ही जाता है, सुगन्धा ने यह राह चुनी इसलिए कि यदि उसे पार्टनर से कोई कष्ट पहुँचता तो वह उसे सुगमता से छोड़ सकती है। मगर अब वही महसूस करती है, “उफ़! मैं भी कितनी मूर्ख थी। छोड़ना सुगम नहीं होता।” (पृ 83) और यही सच है कि सुगंधा छोड़ नहीं पाई रितिक को कभी।

पड़ोसियों के कहने पर सुगंधा का रितिक को देर रात तक न ठहरने की सलाह देना उस पर रितिक का कहना “अब मेरे आने–जाने को घड़ी की सुइयों के संग क्यों बांध रही हो।” (पृ 85) अविवाहित होने पर घर में आने वाले लोगों का समय भी घड़ियों की सुइयों के संग बंधा जायज और नाजायज हो जाता है।
जिस रितिक के साथ संबंधों को वह जीवन का सुख मानकर जी रही थी जिसके लिए उसने अपनी माँ, रितिक के पिता द्वारा भावी जीवन में बच्चों के भविष्य की दुहाई देने पर सिर्फ इसलिए नहीं स्वीकार कि कहीं रितिक को न खो दूँ, वह विवाह के बंधन को ठुकराती रही क्योंकि रितिक इस बंधन में बंधना नहीं चाहता था। किन्तु अंत में वह स्वयं इस बंधन में बंध गया और सुगंधा प्यार की मृगतृष्णा में भटकती रह गई। (रितिक की माता का चिन्तन जायज था क्योंकि उनके पास समाज के गहरे अनुभव थे। बस तरीका ज्यादा उग्र, अभद्रता लिए था।) उसी रितिक ने उसे ‘रखैल, खेली खाई’ (पृ 155), की उपमा देकर इस सम्बन्ध के धागों को तोड़ दिया। चरित्र पर संदेह स्वावलंबी सुगंधा के लिए एक कभी ना निकलने वाली टीस बन गया। एक नारीत्व का अपमान जिसे धैर्यमूर्ति माता सीता ने भी नहीं स्वीकारा फिर सुगंधा तो स्त्री स्वातंत्र्य की नई परिभाषा गढ़ने जा रही है कैसे स्वीकारती। यहाँ भी पुरुषवादी विचार धारा का ही वर्चस्व रहा दरअसल लिव इन में तो दोनों ही रह रहे थे फिर चरित्र पर केवल सुगंधा के ही ऊँगली क्यों उठी? टीस जायज थी।

आख़िरकार रितिक का प्यार बोल ही गया वह देह के साथ धन का सम्बन्ध था जो, “मैं जानता था तुम यही कहोगी! तुम पैसे के पीछे दुम हिलाने वाली बिच हो ... पैसों के लिए तुम किसी के साथ भी ...” ये देह जनित रिश्ते हैं देह तक ही सीमित रहते हैं देह का नशा उतरते ही इनका मोह भी समाप्त हो जाता है इनमे भावनाओं के लिए कोई स्थान नहीं होता। जिस लेखन से रोमांच उभरता था वही अब बोर, उबाऊ लगने लगे। सुगंधा जानती है ‘प्रकृति ने स्त्री की देह को जो विशेषताएं दी हैं उन्हीं विशेषताओ को पुरुष स्त्री के विरुद्ध सदियों से इस्तेमाल करता आ रहा है’ (पृ 204) मगर स्वयं इस इस्तेमाल के लिए बार-बार इस्तेमाल हो रही है, यह उसके व्यक्तित्व के दोहरेपन को उजागर करता है।

कीर्ति का यह कहना, “वैसे मजा आता होगा न ऐसे रहने में? कोई टेंशन नहीं कोई डर नहीं! अगर ऋतिक ने जरा भी ऊँची आवाज में कुछ कहा तो तुम उसे छोड़ने की धमकी दे सकती हो, बीवी बन जाने पर यह चांस कहाँ?” (पृ 96) विवाहिताओं के मन में इस सम्बन्ध के प्रति जिज्ञासा का भाव दर्शाती है।
मकान छोड़ते हुए पड़ोसन को मकान मालिक से बात करने की हिदायत देना, जिज्ञासा ही रह गई ... आखिर क्या कहना चाहती थी सुगंधा मकान मालिक से?

दरअसल इस सम्बन्ध को जीते हुए स्वयं सुगन्धा और सम्भवतः रितिक के मन में एक अपराध बोध घर कर गया था जो धीरे-धीरे उनके मानसिकता में समा उन्हें रुग्णता की ओर ले जा रहा था। सुगन्धा का यह कथन इसकी पुष्टि करता है, “मैं पहले जैसी तटस्थ क्यों नहीं रह पाती हूँ अब सांसारिक विचारों को लेकर जबकि मैंने अपने विचार बदले नहीं हैं अभी।” (पृ 130)

“न जाने कौन सी बार उसने मुझे कांट्रेसेप्टिव के सहारे छोड़ दिया, निःसंदेह यह स्त्री का अपना दोष है कि वह पुरुष को धीरे-धीरे असीमित छूट देती चली जाती है, मैंने भी रितिक को छूट दे दी थी ... वह स्त्री की देह पर पुरुष के वर्चस्व का सबक दोहराता चला गया।” (पृ 125)

संबधों पर बार- बार शारीरिक और मानसिक चोट तोड़कर रख देती है, जैसे एक सरकारी नौकरी में भले ही वह बाबू की नौकरी हो स्थायित्व बना रहता है वहीँ निजी नौकरी में भले ही कोई मनोनुकूल जॉब हो किन्तु सदैव अस्थायित्व का खतरा मन में भय पैदा करता है। इसीलिए व्यक्ति बाबू के पद से भी तसल्ली रखता है यही बात लिव इन और वैवाहिक सम्बंधो के बारे में कही जा सकती है।

विवाहित संबंधों में एक समय के बाद तकरार और अधिकार की टकराहट पैदा हो जाती है। प्रश्न उठता है जब हम लिव इन में अपने रिश्तों के लिए वक्त निकलते हैं घूमने, एक दूसरे की इच्छाओं को समझने के लिए, इज्जत करते हैं एक दूसरे की उनके अधिकारों के प्रति सजग रहते हैं तो यही विवाहित जीवन में क्यों नहीं? यथा रितिक का समय से बाइक लेकर सुगन्धा के दफ्तर के बाहर पहुंचना, वहाँ से कहीं आउटिंग पर जाना, जब मन चाहा बाहर से खाना पैक कराया ... आदि।

उपन्यास में कई स्थानों पर परिवार और समाज की दृष्टि से वर्जित रहने वाले पक्षों को खुलकर प्रस्तुत किया गया है जिससे यह साहित्य अडल्ट की श्रेणी में आ जाता है किन्तु इसमें आश्चर्य नहीं क्योंकि कहानी की नायिका जिस तरह के स्वतंत्र विचारों की पक्ष धर है वह इस मुद्दों पर भी खुलकर बात करेगी यह सम्भाव्य है।

सुगंधा ने पारंपरिक ब्याहता नारी के चरित्र से मुक्ति हेतु यह रास्ता अपनाया किन्तु क्या वह रह पाई उस छवि से मुक्त? नहीं। आखिर वह भी कदम-कदम पर रितिक के साथ हर मामले में समझौता ही तो करती रही, कहीं- कहीं महसूस हुआ निश्चय ही लेखिका सांकेतिक भाषा का प्रयोग कर सकती थीं किन्तु उन्होंने विस्तार शैली अपनाई जो कई पाठकों को अरुचिकर लगी (जैसी मेरी इस उपन्यास को लेकर महिला वर्ग से चर्चा हुई ) यथा ओपरेशन थियेटर में ‘कापर टी’ लगाते समय की स्थितियों की चर्चा या और भी।

सुगंधा के जीवन की एक और घटना जिसने उसे कहीं न कहीं प्रभावित किया वह थी पल्लवी मिश्रा की मौत। जिसने उसके अबोध मन में वैवाहिक जीवन की असफलता पर एक और मुहर लगा दी। दहेज़ को लेकर यातना पूर्ण तरीकों से की गई उसकी हत्या उसके कुछ ही दिनों बाद परिवार का क़ानूनी प्रक्रिया से मुक्त होना, हत्यारे पति का पुन: विवाह हो जाना झकझोर गया सुगंधा को, कई जायज सवाल वह समाज के समक्ष रखती है, “दूसरी लडकी के माता पिता की आँखों में क्या पट्टी बंधी हुई थी?”
“क्या उनके कानों की सुनने की शक्ति जा चुकी थी?”
“या पूरी छानबीन किये बिना ही अपनी लड़की से छुटकारा पाने की जल्दबाजी में बेटी दहेज लोभियों के हाथों सौंप दी?”
“बहू को मारने का सास रूपी लायसेंस मिलना?”
“जिस समय बहू को जलाया जाता है तो उसके ससुर और पति जैसे पुरुषों की क्या भूमिका रहती है?”
“क्या ऐसे पुरुषों का पौरुष सिर्फ उनकी जांघों के बीच ही सीमित रहता है, क्या उनके बाजुओं तक नहीं पहुँच पता?” (पृ 104)

सुगंधा के सभी प्रश्न बेहद गंभीर है जिसका जवाब की आज भी तलाश है, एक बेटी के जलते ही मानो दूसरी बेटी के भाग्य का छींका टूट पड़ता है।
कुलमिलाकर परिस्थितिवश हो सही सुगंधा की सोच उसकी उम्र से बड़ी थी। रही बात लिव इन की सफलता की तो यहाँ स्वयं लेखिका भी इस मत से पूर्णत: आश्वस्त नहीं है, जब वे लिव इन रिलेशन के लिए अपनी भूमिका में कहती हैं, “माना जाता है स्त्री इसमें स्वतंत्रता को सुरक्षित महसूस करती है” (पृ 9) भूमिका।

सुगंधा ने देह से रितिक को छोड़ दिया किन्तु क्या मन से छोड पाई? नहीं। आरम्भ में स्वयं सुगन्ध यह स्वीकार कर चुकी है, “कहना कठिन है कि मेरे मन में उसके प्रति कितना प्रेम शेष है, फिर भी वह मेरे साथ हर समय रहता है सशरीर नहीं, एक प्रभाव बनकर।” (पृ 11) प्रत्येक पुरुष की तुलना ऋतिक से करना दर्शाता है कि सुगन्धा अपने उस सम्बन्ध को तोड़ने का चाहे कितना ही दावा क्यों न कर ले मगर छूट नहीं पाया वह सम्बन्ध न ही जीवन भर छूटेगा। क्यों कि बदले तो देह पात्र जाते हैं, नेह पात्र नहीं (पृ 116) रितिक से अलगाव के बाद सुगंधा के व्यवहार में आई कठोरता भी इसी और संकेत दे रही है।
“मैंने पाया रितिक से अलगाव के बाद मैं पुरुषों को लेकर और अधिक कठोर हो गई हूँ।” (पृ 178) दरअसल यह यह साइड इफेक्ट है रितिक और सुगंधा के बीच आये तनाव का। जिसका शिकार ऋषभ बना। संभव है आगे विशाल भी ... “वह रात रुकने की बात न करता तो कम से कम एक गुडनाईट किस तो लेकर जाता ...” यौन जनित कुंठा ही तो है ... “उफ़! फिर रितिक! मैं क्यों तुलना करने लगती हूँ उससे? मुझे उसे अपनी अनुभवजन्य स्मृतियों से बहर निकलना ही होगा, नहीं तो मैं किसी और को पूरी तरह कैसे अपना सकूंगी?”
सुगंधा के कदम फिर जीवन की प्रयोगशाला में एक नवीन प्रयोग को आतुर हो चल पड़े अंत में कई अनसुलझे सवाल छोड़कर
“क्या सुगन्धा का यह भटकाव कोई पड़ाव हासिल कर सकेगा?”
“क्या कभी वह पूरी तरह देह से ऊपर उठ पायेगी?”
“क्या वह समाज के बंधन को स्वीकार कर पायेगी या तमाम उम्र यूँ ही बदलाव को ओर नये ठौर तलाशती रहेगी?”
“सुगंधा जैसी कितनी लड़कियां हैं समाज में जो निर्दोष होकर भी परिवार के बिखराव, माता -पिता के टकराहट का शिकार होती हैं?”
“क्या समाज इस दिशा में अपनी कोई बेहतर भूमिका सिद्ध कर पायेगा?”

प्रत्येक स्त्री अपने भावी जीवन का एक चौखट तैयार कर लेती है यदि उसका जीवन उस चौखट पर फिट नहीं बैठता तो मायूसी स्वाभाविक है, किन्तु कुछ उस चौखट को अपने अनुरूप स्वयं को छांट लेती हैं, कुछ उस चौखट को सिरे से भूल जाने में भलाई समझती है। किन्तु कईयों के जीवन में अपनी उस चौखट को पा लेने का भटकाव जारी रहता है। फ़िलहाल सुगंधा इसी भटकाव में उलझी है तथा ऋषभ और विशाल इसी भटकाव के पड़ाव रहे। स्वयं वह स्वीकारती है,
“यदि मुझे कोई सही व्यक्ति नहीं मिल रहा तो क्या करूं? तू ही बता कि इसमें मेरा क्या दोष है?”
हम केवल कामना ही कर सकते हैं कि सुगंधा की यह तलाश शीघ्र समाप्त हो।
उपन्यासकार का आभार।

समीक्षक: डॉ. लता अग्रवाल
73 यश विला, भवानी धाम फेस – 1
नरेला शंकरी भोपाल – 462041
मो – 9926481878