स्मार्ट शहर में जाम - व्यंग्य

कल सुबह दफ़्तर जाते हुये सूरज भाई फ़ुल मूड में दिखे। सुबह-सुबह का समय था इसलिये गरम तो नहीं लेकिन चमक खूब रहे थे। सारी सड़क पर किरणों और उजाले का इंतजाम था। पेड़-पत्ती-फ़ूल सब जगह किरणें खिलखिला रही थीं। एकाध पत्तियां हवा के इशारे पर खुद तक धूप न पहुंचने की शिकायत करने के लिये जैसे ही हिलीं, उजाले और किरणों ने उनका मुंह चमका दिया। जन्मदिन केक कटने पर जैसे क्रीम से मुंह पोत देते हैं उसी तरह पूरी पत्ती, कली को रोशनी से लहलहा दिया। पत्ती मगन मन और तेज थिरकने लगी।

चौराहे पर स्कूल बस बिना गोल चक्कर लगाये शार्टकट मारते हुये निकलने लगी। आजकल भीड़ के चलते सवारियां चौराहे पर चक्कर लगाने का समय बचाते हुये ऐसे ही निकल जाती हैं। ट्रैफ़िक वाले भी अक्सर यह काम कराते हैं। जाम हटवाते हैं, जाम लगवाते हैं।

बस के आगे बैटरी वाले ऑटो ने अपनी गाड़ी सटा गयी। दस गुनी बड़ी बस अपना सा मुंह लेकर खड़ी हो गयी। ड्राइवर पिपियाते हुये आटो के निकलने का इंतजार करता रहा। ऑटो वाला अपने आगे वाले रिक्शे वाले को हटने के लिये हार्न बजाता रहा। जब तक बुजुर्ग रिक्शा वाला पहले उचककर और फ़िर उतरकर रिक्शा आगे से हटा दिया तब तक ऑटो वाले ने उसको दो-चार हल्की टाइप गाली दे डालीं। सुबह का समय होने के चलते गालियों में गुस्सा और तेजी की कमी थी। लेकिन गालियां तो गालियां थीं जैसी भी हों। रिक्शे वाला आगे निकलजाने के चलते उसे सुन नहीं पाया तो आसपास के राहगीरों को सुननी पड़ी।

फ़जलगंज चौराहे के पर एक दूसरे के लम्बबत जाते दो मोटरसाइकिल सवार के अगले और पिछले पहिये हल्के से भिड़ गये। जब तक दोनों को भिड़ने का पता चलता तब तक वे लोग न्यूटन बाबा के जड़त्व के नियम का सम्मान करते हुये एक दूसरे से दस मीटर की दूरी पर पहुंच गये थे। एक ने मुड़कर दूसरे को देखा। गर्दन में शायद तकलीफ़ थी इसलिये पूरी तरह नहीं देख पाया। दूसरा सवार हेलमेट पहने थे। उसने भी हेलमेट उतारकर कुछ करने बोलने की मंशा जताई लेकिन दूसरी तरफ़ से कोई पहल न होते देख चुप रहा। अंतत: दोनों किकिया के अपने-अपने रास्ते चले गये। लगता है दोनों को दफ़्तर पहुंचने की जल्दी रही होगी।

हमसे आगे एक रिक्शे वाला रिक्शे पर लम्बी सरिया लागे हुये चला जा रहा था। सरिया रिक्शे से तीन-चार फ़ुट पीछे तक तोप की तरह निकली हुई थी। खतरे का निशान बताने की गरज से उस पर एक लाल कपड़ा लहरा रहा था। हमको लगा रिक्शा चलने पर हिलती सरिया गाना गा रही है- हवा में उड़ता जाये मेरा लाल दुपट्टा मलमल का।

झकरकटी पुल पर भीड़ के चलते हुये धीमे हुये स्कूटर पर एक पुलिस वाला. हल्का हाथ देकर, बिना कुछ पूछे अधिकार सहित बैठ गया। जैसे विक्रम के कन्धे पर बेताल बिना कुछ पूछे बैठ जाता है उसी तरह। स्कूटर वाले ने कुछ पूछने की बेवकूफ़ी भी नहीं की। आगे टाटमिल चौराहे पर बेताल विक्रम से बिना कोई सवाल पूछे उतर गया।

हमको लगा कि जब आप किसी से कोई सुविधा लेते हो तो सवाल पूछने का सहज हक अपने आप खो देते हैं।
लौटते में फ़िर झकरकटी पुल पर जाम मिला। एक ऑटो वाले ने हमसे कहा, "ए सैंट्रो , आगे बढो भाई।" हमने अचकचा कर आगे देखा। हमारे आगे की सवारी और हमारी गाड़ी के बीच आधा मीटर की सड़क खाली थी। हमने फ़ुर्ती से आगे बढकर उस सड़क पर कब्जा किया। फ़िर थम गये। इस बीच एक बैटरी वाले ऑटो वाले ने बगल वाले ऑटो वाले से कुछ कह दिया। बगल वाले ने जाम का व्यवहारिक उपयोग करते हुये अपना ऑटो चलता हुआ छोड़ा और ऑटो वाले के पास अकड़ता हुआ आकर उसको सबक सिखाने की बात करने लगा। दूसरा ऑटो वाला भी जबाबी सबक सिखाने की बात की बात करने लगा। दोनों के बीच सड़क पर ही गालियों का जबाबी कीर्तन होने लगा। बात कुछ आगे बढती तब तक जाम कुछ आगे सरक गया। एक मीटर जगह सड़क पर निकल आई थी। आगे वाले ऑटो वाले ने सबक सिखाना स्थगित करके अपना लपककर अपना ऑटो संभाला और आगे बढ गया।

एक बार फ़िर सिद्ध हुआ कि सड़क पर लगने के बाद खुला हुआ जाम कई झगड़े स्थगित कराता है। जरीब चौकी पर एक बड़ी कार वाला हमको बायें से ओवरटेक करते हुये आगे निकला। तब तक क्रासिंग बन्द हो गयी। कार में किसी को निकलते देखकर मुझे लगा कि अब यह पीछे आकर हमको किसी बात पर हड़कायेगा। हालांकि मैंने गलती जैसी कुछ की नहीं थी। लेकिन उसकी गाड़ी बड़ी थी और हमारे आगे होने के चलते उसको मुझे बायें से ओवरटेक करना पड़ा यह भी कम बड़ा अपराध नहीं था मेरा। हमें यह भी लगा कि वह निकलेगा तो साथ में कोई कट्टा टाइप लहराते हुये या तो फ़ौरन गोली चलायेगा या फ़िर कुछ देर बाद चलायेगा।

मन किया कोई कानून बनना चाहिये जिससे किसी गाड़ी को देखते ही पता चल जाये कि अंदर बैठे लोग कितने गुस्से में हैं। उनके पास कट्टा है कि नहीं। लेकिन कानून बनने से होता क्या है भाई आजकल। कानून बेचारे का तो जन्म ही उल्लंघित होने के लिये होता है। अपने लोगतंत्र में हर कानून बेचारा अपना उल्लंघन करवाकर ही जिन्दा रह पाता है। जहां उसने उल्लंघन होने से एतराज किया, बदल दिया जाता है।

फिर हमको लगा कि जैसे थरमल इमेजिंग से लोग अंधेरे में भी दिख जाते हैं वैसे ही कोई गुस्सा इमेजिंग तकनीक भी होनी चाहिये। किसी के दस/सौ मीटर दूर से ही पता चल जाये कि उसका कितना गुस्सा है। वह देखते ही कच्चा चबायेगा या फ़िर हल्ला-गुल्ला मचाकर शान्त हो जायेगा।

विजय नगर चौराहे पर तो गदर जाम लगा था। मतलब हर दिन की तरह नजारा था। हमारे पीछे वाले ऑटो वाले अपने पीछे वाले ऑटो की तरफ़ देखते हुये हमारी आगे वाली गाड़ी वाले को गाड़ी को गाली थी। गाली देना का कारण शायद यह रहा हो कि वह जाम में सबसे आगे खड़ा था। चौराहे पर हर तरफ़ से गाड़ियां आ रही थी। सब जाम में फ़ंस जा रही थीं। हर गाड़ी वाला अपने हिसाब से आगे निकलने के लिये छटपटा रहा था, फ़टफ़टा रहा था, पर फंसा जा रहा था।

अचानक पीछे वाला ऑटो वाला आगे निकलकर जाम हटवाने में सहायता टाइप करने लगा। गाड़ियों को दिशा बताते हुये निकालने लगा। गाड़ियां अदबदाकर इतनी तेज आगे बढ़ीं कि एकबारगी लगा कि उसके ऊपर चढकर निकल जायेंगी।

कल को हो सकता है कि बड़ी गाड़ियां अपने विज्ञापन में बतायें- ’ अब जाम के झंझट से मुक्ति पाने के लिये जिन्दगी भर के एक/दो जामब्वॉय साथ में।’ सेटपनी की तरह शायद डिक्की में बैठे रहे वे जामब्वॉय। जहां जाम लगा फ़ौरन उतरकर हटवाने लगें।

कानपुर स्मार्ट शहरों की लिस्ट में सुमार हो रहा है शायद। इसकी यह स्मार्टनेस ही है कि यहां के चौराहे किसी ट्रैफ़िक सिग्नल के मोहताज नहीं। किसी चौराहे पर कहीं हरी बत्ती जलती दिखी तो जाम ट्रैफ़िक को आगे बढने से रोक देता। ट्रैफ़िक के हाल अनारकली सरीखे हो जाते हैं। हरी बत्ती उसे रोकती नहीं, जाम उसे आगे नहीं जाने देता।

आगे वाली छुटकी गाड़ी आगे बढने में देर कर रही थी क्योंकि उसके आगे एक ट्रक लम्बवत खड़ा था। पीछे वाली गाड़ी घुरघुराते हुये ऐसे आवाज कर रही थी मानो आगे वाली पर दांत पीस रही हो।

इस बीच अचानक जाम खुल गया। सारी गाड़ियां कांजी हाउस की दीवार टूटने पर भागते जानवरों की तरह भागी। भागते हुये हमने जाम हटाने के सूत्रधार ट्रैफ़िक वाले सिपाही को देखा। सैकड़ों गाड़ियों के बीच फ़ंसा सिपाही हर तरह से गाड़ियों को निकालने की कोशिश कर रहा था लेकिन सब गाड़ी वाले अपनी मनमर्जी कर रहे थे। जाम लगाने में सहयोग कर रहे थे।

हमने घर पहुंचकर जो सांस ली उसे सांसों की भाषा में सुकून की साँस कहते हैं।