शशांक की कवितायें

- शशांक

शशांक
1.मेरी कविताओं का कोई भी व्याकरण नहीं होता

किसी सर्दी की अलसाई सुबह
जब तुम ये कहती हो
ज़रा सी देर क्या दुबकी रहूँ मैं
इस रज़ाई में
जो कहता हूँ मैं.. "सन्डे है"
तभी अधमुँदी आँखों से
अजब अंगड़ाई सी लेकर
के तुम जो मुस्कुराती हो
तुम्हें तकते ही जाने का
लोभ सम्वरण नहीं होता

मेरी कविताओँ का कोई भी व्याकरण नहीं होता

कभी दफ़्तर से आती हो...
निगाहों से बिंधी कमनीय काया में
धँसी हों फब्तियां; ताने
कि केवल तुम जो स्त्री हो
हो स्त्री और हो सुंदर
इसी से बस वहाँ पर हो
किये चस्पा हों फ़तवे
पसीने से तर हुई
उस पीठ पर अक्सर....
मेरे काँधे पे रखकर सर
जो तुम कहती हो हौले से
"थैंक्स फ़ॉर एवरीथिंग"
जिसका कोई भी "कारण" नहीं होता

मेरी कविताओँ का कोई भी व्याकरण नहीं होता

कभी जब हम झगड़ते हैं
कोई मुद्दा नहीं होता
या होता भी है; तो 'न' सा
जो बिटिया आ के कहती है
बहुत लड़ते हो तुम दोनों
नहीं करनी है कोई बात
"मैं गुस्सा"...
तो उसको मनाने का
पुटाने का.. साथ में गुदगुदाने का
कोई भी विवरण नहीं होता

मेरी कविताओं का कोई भी व्याकरण नहीं होता

तुम्हारा फ़ोन बेसिक से
थोड़ा स्मार्ट हो जाए
मेरी भी घड़ी एच एम टी से;
रोलैक्स वॉच हो जाए...
कहीं मैं चाय के पैसे बचाकर
फ़ोन लेता हूँ
वहीं तुम साल भर घिसती हो दो साड़ी
औ कहती हो
"भली तो हैं"
सजाती हो कलाई पर
जो अपना लाड़
अपनी सालगिरह पर
तो लगता है
कि कोई प्रेम 'अकारण' नहीं होता

मेरी कविताओं का कोई भी व्याकरण नहीं होता...


2.एक नज़्म

आज हर चीज़ क्यों, मुझसे ही बतियाने लगी है!!
वो रस्ता है ना, जो आता है, थोड़ा घूमकर घर तक....
अचानक पूछ बैठा, आज मुझसे, क्यों! अकेले ही?
वो साये दरख्तों के पीठ करके लेट जाते थे ....
बदलकर करवटें, अचकचाकर यूँ घूरते क्यों हैं
वो खुशबू, साथ चलती थी, जो मेरे खो गई है क्या
वो पुलिया जिस पे हम तुम कभी थककर बैठ जाते थे...
अचानक मुझसे चिढ़कर, खुरदुरी सी हो गई है क्या
गली के मोड़ पे जो घर है, उसमें एक खिड़की है ....
वो दरवाज़े पे जो तख्ती है, वो तिरछी लगी है.....
बगीचे से कई जोड़ी निगाहें घूरती हैं ....
वो लड़की जो खड़ी है, अपने घर के सामने...
पुस्तक के पीछे से निगाहें बचाकर, शायद मुझे ही ताकती हैं....
मुझे ऐसा लगा पूछा उसी ने
क्यों! अकेले ही?
मुझे ऐसा लगा
ये सब यहाँ पर कल नहीं था....
कल जो तुम थे साथ
ये रस्ता जाने कब कट जाता था....

तेईस खम्भे, बीस मन्त्र, सौ तक गिनती
और चार गीत लंबा है रस्ता ....आज मुझे मालूम हुआ है.....


3.एक नज़्म

सुनो जानाँ,
ये तपती लू भरी हैं आंधियाँ
या तुम हो गुस्से में...
मुझे मालूम है कुछ देर में
पिघलोगी गरजोगी..
बहुत बरसोगी, रोओगी..
मगर सरसब्ज़ कर दोगी...

सुनो जानाँ!
तुम्हारे नक्शे पा देखे..
समंदर के किनारे पे..
तभी जाना तुम्हें जानाँ..
सभी का ध्यान रखने में,
बिवाईं चरचराई हैं...
तवारीखें हैं, संघर्षों की,
जो छिपते -छिपाते
एड़ियों में उभर आई हैं..

सुनो जानाँ,
कभी महसूसता हूँ,
खुद को एटीएम की तरहा..
तुम्हें मालूम है,
मेरे दबीज़ो सख़्त तन -मन में
खज़ाना है, मोहब्बत का..
तुम्हीं तक हैं, वो सारी कुंजियाँ..
जिनको दबाने से..
रगे जां झनझनाती है...
उगल देता हूँ ,सब कुछ..
औ मोहब्बत मुस्कुराती है..