व्यंग्य-कमल: डॉ. हरीश नवल

निष्प्राण दलदल को जब जीवन रस मिलता है
कहीं किसी सरोवर में तब एक कमल खिलता है
आरती स्मित 
ऐसे ही एक कमल का नाम है 'हरीश नवल',  व्यंग्य सरोवर के अनूठे कमलों में से एक। हालाँकि इस कमल के मन -प्राण  व्यंग्य की परिधि में ही बसे हैं,मगर इसकी नाल,  यह तो विस्तार चाहती है, अपने समूचे वज़ूद को उसका आसमान देने के लिए!  तभी तो कविता, गीत, ग़ज़ल, संस्मरण, उपन्यास, टेलीफ़िल्म,वीडियो फ़िल्म, रेडियो नाटक, रंगमंच,पत्र-पत्रिका के लिए पत्रकारिता, संपादन, विद्यालय-महाविद्यालय, अन्य शिक्षण संस्थान, सम्मेलन, संगोष्ठी, मंच-अभिनय,  जीवन के हर क्षेत्र, हर दिशा में कलम चली, चल रही है, चलती रहेगी अंतिम क्षण तक, जबतक कि व्यंग्य को एक सुप्रतिष्ठित विधा के रूप में विश्व के कोने-कोने में न पहुँचा दे, सेंध मारकर नहीं, मुख्य दरवाजे से, ससम्मान। प्राय: एक इंच मुस्कान बिखेरने वाला यह व्यक्ति कितना दृढ़संकल्पी है और हिंदी विकास के प्रति, विशेषकर व्यंग्य विधा के उत्थान के लिए कितना समर्पित,  यह उनकी रचनाओं से गुज़रने के बाद ही पता चलता है। गुजरना भी यूँ ही नहीं, इनके व्यंग्य आपको अनदेखी बेड़ी से तबतक जकड़े रहेंगे, जबतक आप उन मीठे तीरों से लहूलुहान होकर करुणापूरित हो विह्वल न हो जाएँ, ये न मानने लगे कि अमुक विषय या मुद्दे पर विमर्श ज़रूरी है, न सिर्फ़  विमर्श, बल्कि अपने हिस्से की भागीदारी भी। लेकिन, व्यंग्यकार के  शर-संधान का कौशल तभी काम आता है जब आप संवेदनशील हों, स्वयं को समाज का एक मुख्य हिस्सा, देश का एक जागरूक नागरिक समझते हों, भले ही आप दसवीं पास हों। उन महापुरुषों पर लेखक का वश नहीं जो 'स्व' से अधिक सोचकर अपने मस्तिष्क को कष्ट नहीं देते और प्रसन्न रहते हैं।
                 
      हरीश नवल एक ऐसा नाम है, जिन्हें 1962 से पत्रकारिता की दुनिया जानती है,मगर मुझे उन्हें पढ़ने का सौभाग्य बहुत बाद में, दिल्ली आने पर मिला, तबतक मेरे लिए व्यंग्य पढ़ने का अर्थ था हरिशंकर परसाई और शरद जोशी को पढ़ना, जिनसे मिलने का सौभाग्य न हुआ, मगर दिल किसी कोने में व्यंग्य के लिए जो जगह बनी थी, इन्हीं की देन रही। बहरहाल,  2012 में अस्थायी सहायक प्रोफ़ेसर पद के साक्षात्कार लेने वालों में एक गोरा, लंबा,पतला, सूफ़ी प्रभाव का व्यक्ति, सूट और चश्में में मुस्कुराता हुआ प्रश्न करता है, और इस पद के लिए आए डरे -सहमे प्रतिभागी को प्लेट बढ़ाकर बिस्कुट ऑफ़र करता है। उनके व्यवहार से प्रतिभागी भयमुक्त हो जाते हैं। साक्षात्कार के  दंश से गुज़रते  प्रतिभागी भले न चुने गए हों, मगर उस छवि को साथ लेकर लौटते हैं। बाद में एक कार्यक्रम में उन्हें पता चलता है कि आप व्यंग्य लेखक हरीश नवल है जो छात्रों के चहेते प्राध्यापक हैं । और यहाँ मुलाक़ात होती है लेखक की रचनाधर्मिता से ; उनकी साहित्य जीवन-यात्रा से, एक दृढ़ राही से जो अडिग है व्यंग्य को विधा की प्रतिष्ठा दिलाने के लिए। कुछ समय बाद  अनायास एक मुलाक़ात  होती है वक्ता हरीश नवल से जो 'पीली छत पर काला निशान' सुना रहे हैं और संवेदनशील श्रोता दम साधे सुन रहे हैं, सुन ही नहीं रहे, अपने ऊपर गिरते जाले को महसूस भी कर रहे हैं जो सरकारी दफ़्तरों के भ्रष्ट तंत्र द्वारा फैलाए जाल से झड़ रहे हैं। संप्रेषण- शक्ति का जवाब नहीं! व्यंग्य की इतनी बारीक तार चुभाते हैं कि आप हँसते -हँसते रो पड़े, अपने देश के सरकारी तंत्र पर। मगर हाँ, रोने की बारी घर पहुँचने के बाद आती है,तुरंत नहीं। व्यंग्य चुपके से आपके साथ हो जाता है और एकांत पाते ही आपकी बुद्धि पर हमला बोल देता है, आपकी छटपटाहट बढ़ती है और आप बिस्तर पर उठकर बैठ जाते हैं। एक और वाक़या! व्यंग्यश्री सम्मान से सम्मानित किए जा रहे व्यंग्यकार हरीश नवल 'सबके आग्रह पर एक छोटा व्यंग्य सुना रहे हैं,'तुसी कर दे की हो'। श्रोता हँस-हँस कर लोटपोट, सुनाने का अंदाज़ ऐसा है, मगर फिर वही दुर्घटना दिल और दिमाग के साथ घटती है। सार में, हरीश नवल एक ख़तरनाक व्यंग्य वाचक है, जिनके प्रभाव से श्रोता कई दिनों तक मुक्त नहीं हो सकते। कवि डॉ. बलदेव वंशी के शब्द में ऐसे व्यवहार को 'कोल्ड ब्लडेड मर्डर' कहते हैं। इस नाते डॉ. हरीश नवल 'कोल्ड मर्डरर' कहे जा सकते हैं। एक इंच मुस्कान जब दिखे तब समझना होता है कि हरीशजी किसी विसंगति की पीड़ा जज़्ब किए हैं मगर प्राण आकुल हैं, जब यह मुस्कान ठहाके में परिणत हो जाए तो समझें कि यह निसर्ग से निकला है,  बिना किसी व्यंग्य के।  
     
            पंजाब में 8 जनवरी  1947 जन्मे, भारत विभाजन के बाद की पीड़ा बचपन से देखते-भोगते शहीद भगत सिंह के सहयोगी और यूनानी चिकित्सा के ज्ञाता दादा पं. त्रिलोकनाथ आज़म के संरक्षण पले-बढ़े हरीश ने निश्चय ही अन्याय के प्रति प्रतिकार की दुदुंभी बजाने, क्रांति करने का रक्त बीज  से  पाया होगा, 27 वर्ष की उम्र से वैधव्य पीड़ा से गुज़रती, किंतु सीता की तरह अटल  माँ से धैर्य और आस्था की धरोहर पाई होगी तो बत्तीस वर्ष अल्पायु में ही दिवंगत हुए पिता हरिकृष्ण शर्मा (जिन्होंने ब्राह्मणत्व के प्रतीक 'शर्मा' को हटाकर 'नवल उपनाम रखा ) से पत्रकारिता के गुण पाए होंगे ; किशोर वय  से ही क्रमश: उम्र के बढ़ते कदम  साहित्य की महान विभूतियों,   जैनेन्द्र, वृन्दावन लाल वर्मा, यशपाल जैन, देवेंद्र सत्यार्थी, महादेवी वर्मा, किशोरदास वाजपेयी, विष्णु प्रभाकर, गोपालप्रसाद  व्यास, आचार्य विजयेन्द्र, देवेन्द्र इस्सर, हरिशंकर परसाई, बाबा आमटे, रवीन्द्रनाथ त्यागी, ठाकुर प्रसाद सिंह, राजेन्द्र अवस्थी, कमलेश्वर, विद्यानिवास मिश्र प्रभृत रत्नों  से मिलने,उनसे कुछ सीखने हेतु बढ़ते  रहे। उनके सान्निध्य ने प्रत्यक्ष  और परोक्ष रूप से हरीश के व्यक्तित्व को परिमार्जित किया और उनके लेखन ने डॉ. नवल की लेखनी को। बचपन से ही साहित्य के प्रति उत्कट अनुराग ने और वरिष्ठ साहित्यकारों से मिलने, उनकी बातों को सुनने-गुनने और अनुसरण करने की ललक और आदत ने उन्हें एक बेहतर वक्ता, पत्रकार, प्राध्यापक  और रचनाकार बनाया। गद्य विधा की ओर विशेष रुचि रही, बचपन की टूटी-फूटी रचनाओं को जैनेन्द्र जी का आशीष मिला और मार्गदर्शन भी कि ''तुम अच्छा व्यंग्य लिख सकते हो, तुममें व्यंग्यकार होने के गुण है... 'एक विधा चुन लो तो बड़ा अच्छा रहता है।" व्यंग्य लिखा तो जा ही रहा था, मगर साहित्य में उसकी स्थिति भी  हाशिए पर टंगे मुद्दों जैसी ही रही थी। हिंदी का आम पाठक व्यंग्य को शैली के रूप में जानता-मानता रहा था, स्वतंत्र विधा के रूप में नहीं। डॉ. नवल ने जैनेन्द्र जी द्वारा किसी एक विधा चुनने की सलाह पर  इस विधा को लिया, जो  साहित्य की मुख्यधारा में स्वीकारी नहीं जा रही थी। आज भी क़स्बाई क्षेत्रों में या साहित्य के क्षेत्र से अलग क्षेत्र के पाठक हास्य और व्यंग्य को एक समझते हैं और ऐसी स्थिति में डॉ. नवल बिना आक्रोश प्रदर्शित किए हास्य और व्यंग्य का अंतर समझाते हैं कि  व्यंग्य का जन्म आक्रोश से और समापन करुणा से होता है। उनके शब्दों में, "हास्य निर्मल आनंद देता है और व्यंग्य करुणा की तरफ़ ले जाता है। ... हास्यात्मक व्यंग्य और व्यंग्यात्मक हास्य भी हो सकते हैं, किंतु मात्रा का सदैव ध्यान रखना अपेक्षित है।"                           
      हरीश नवल व्यंग्य को विधा के रूप में उसकी प्राण-प्रतिष्ठा के लिए निरंतर प्रयासरत रहे हैं।उदयपुर के एक कार्यक्रम में उन्होंने  कहा, ''व्यंग्य स्वतंत्र विधा है शैली नहीं। इस व्यंग्योत्सव की तो सार्थकता यही है कि व्यंग्य को एक विधा के रूप में स्वीकार किया जाए।"

      हरीश नवल की रचनाधर्मिता में निखार के पीछे तत्कालीन समय के प्रबुद्ध साहित्यकारों का जितना हाथ रहा, उनकी व्यंग्य विधा को माँजने में परसाईजी की रचनाओं का। हालाँकि बेढब बनारसी, शरद जोशी, फ़िक्र तौंसवी, श्रीलाल शुक्ल, रवीन्द्रनाथ त्यागी सभी उनके प्रिय लेखक रहे, किंतु एक आदर्श के रूप में परसाई जी का प्रभाव बना रहा। शरद जोशी में वे स्पार्क पाते तो रवींद्रनाथ त्यागी में अद्भुत और विशिष्ट सुसंस्कृत हास्य का प्रभाव।  श्रीलाल शुक्ल के 'राग दरबारी' ने झकझोरा । कहीं न कहीं सबकी लेखन शैली का प्रभाव नवल जी के लेखन में दिखता है। वे अपने समकालीन एवं परवर्ती नवोढ़ा पीढ़ी की रचनाएँ भी तन्मयता से पढ़ते हैं। उनकी पहली व्यंग्य कृति,'बागपत के खरबूजे' जिसपर ज्ञानपीठ का युवा पुरस्कार मिला, ने उन्हें विशिष्ट व्यंग्यकार की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। इसके अतिरिक्त 'पीली छत पर काला निशान', 'दिल्ली चढ़ी पहाड़', 'वाया पेरिस आया गाँधीवाद', माफ़िया ज़िंदाबाद' उनकी सुप्रसिद्ध व्यंग्य कृतियाँ है।'

      निराला की गली में' उनका  चर्चित संस्मरण संग्रह है, जिसमें 'निराला की गली में', नामक संस्मरण सचमुच हतप्रभ करने वाला है। हिंदी साहित्य के धरोहर निराला जी का घर (दारागंज, इलाहाबाद में ) बाढ़ में डूबा रहता है और उनका बेटा हाथ रिक्शा चलाकर  गुज़ारा करने को विवश है। लेखक के लिए यह सच झेल पाना कितना कठिन था कि उन्हें अपने रिक्शे पर खींचकर लानेवाला शख़्स पूज्य निराला  का वारिस है, यह इन पंक्तियों से स्पष्ट हो जाता है :

             "मैं हतप्रभ न बाहर का रहा न भीतर का, धरती थमती लगी, अवसाद व पीड़ा की बाढ़ आँखों से फूटने लगी, ग्लानि और आत्मभर्त्सना हावी हो गई ... मुझे लग गया कि निराला का घर हमेशा बाढ़ में ही घिरा रहता है।"
       
      यह संस्मरण हिंदी की बड़ी साहित्यिक संस्थाओं और प्रशासन की उपेक्षा की ओर  ध्यान आकृष्ट करता है, जिनकी लापरवाही से एक अमूल्य निशानी मिटती जा रही है। काश, निरालाजी समय रहते समय की राजनीति समझ पाते तो उनके घर-परिवार का यह हश्र न होता!  इस संग्रह में उन वरिष्ठ साहित्यकारों से जुड़ी स्मृतियाँ भी उल्लिखित हैं, जिनके सान्निध्य की चर्चा पहले की जा चुकी है।

          'बागपत के खरबूजे' पहला व्यंग्य संग्रह होने के बावजूद नवलजी के व्यंग्य के जिस उठान की ओर संकेत करता है, वह चौंकानेवाला है। नवल जी शब्दों से आतंक पैदा करने वाली रचना को ही व्यंग्य मानते हैं, इस आतंक को फैलाने के लिए कोई सज़ा नहीं मिलती, इसलिए पहली रचना से ही विसंगतियों के खिलाफ़ उन्होंने व्यंग्य को धारदार हथियार बना डाला और चुन-चुनकर निशाना साधा है-- देश ही नहीं विदेशों में भी रंग बदलते मानव-खरबूजों पर। इस संग्रह की एक रचना 'विक्रमार्क, बुढ़िया और सराय रोहिल्ला' में लेखक ने परिवार के अंतर्जाल को रेशे-रेशे उधेरा है जिसमें पारिवारिक टूटन, अपने ही परिवार में वृद्धों की दयनीय स्थिति का करुण चित्र उकर आया  है। एक बानगी: ''बच्चों के लिए दादी माँ एक अजीब वस्तु थी। वे उसे छू- छू कर देख रहे थे, कहाँ-कहाँ से बोलती है।' यहाँ हास्य का एहसास उनके लिए है, जिन्हें मर्म समझ न आया, वरना  व्यंग्य की मार इतनी तेज़ और इतनी सूक्ष्म कि 'आह' फूट ही पड़ती है।

          'एक बुद्ध और खरीदने जाना पामेरियन' बड़े लोगों की छोटी हरकत या 'ऊँची दुकान फीकी पकवान' कहावत चरितार्थ करती है। महानगरीय आडंबर के चीथड़े उड़ा दिए लेखक ने। महानगर के दोहरे चरित्र और उसकी चकाचौंध से अंधा होता क़स्बाई व्यक्ति जब नकल पर उतरता है तो अक्ल पर कैसे पत्थर पड़े होते हैं और आज बाज़ार ने गली-कूँचों, गंदी बस्तियों तक में कैसे अपनी पहुँच बना ली,कैसे झूठ का व्यापार होता है, इसकी बानगी दिखाती है ये पंक्तियाँ:  "मैं पचास रुपए के पीछे अपनी कुतिया का कैरियर खराब नहीं करूँगा"...

    " ये साहब हमारे थोक के ग्राहक हैं। हर हफ्ते आते हैं और जितने भी पिल्ले होते हैं, मुँह मांगे दाम में ख़रीदकर ले जाते हैं, बड़े आदमी हैं, शौक भी बड़ा है।" साहब के पामेलियन की पोल खोलकर लेखक ने ऐसे रईसों के व्यक्तित्व में होल कर दिया, और इस सुराख़ से भगवान बुद्ध की भाँति लेखक को सच का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। एक कहावत है, 'भीगा कर मारा' यह व्यंग्यकार मारने के प्राय: हर नैतिक तरीकों का इस्तेमाल करता नज़र आता है, मगर प्यार से।

     विनोद खेतान मानते हैं, "'बागपत के खरबूजे' व्यंग्य विधा की सर्वदा आश्वस्त करने वाली किताब है, जिसमें सूक्ष्म दृष्टि सामयिक संदर्भों को भी एक शाश्वत कोण भेदती है; जीवन की अद्भुत सच्चाइयों से साक्षात्कार कराती है और भाषा और शिल्प की दृष्टि से लेखक की प्रतिभा को खूब रेखांकित करती है। साथ ही कथ्य के स्तर पर व्यापक एवं मौलिक कल्पनाशीलता का जीवंत प्रमाण देती है।" 

     इसका एक जीवंत दृष्टांत  'आटे की थैली में कार' है, जो मध्यवर्गीय अभाव और मुफ़्त में कुछ अधिक  पा लेने की मानसिकता के कारण बाज़ार की  दोहन नीति और उपभोक्ता संस्कृति को उजागर करती है,साथ ही परिवार के ताने-बाने को भी। ख़ासकर सास-बहू के खटास भरे संबंधों  को तथा बेचारे पति को कुछ अधिक ही बेचारगी  के साथ लेखक ने अन्य रचनाओं में भी उजागर किया है। हालाँकि पारिवारिक संदर्भ में उनके 'कहन' का केंद्र प्राय: नहीं होते, वे सहयोगी हिस्सा होते हैं, तथापि लेखक का रचा परिवार हमेशा दीगर बहू, बेचारी सास और दोनों के बीच झूलते पति की छवि प्रस्तुत करता है। 'चौथी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफाम', 'जिसकी लाठी उसी के कुत्ते' जैसी व्यंग्य रचनाएँ  नए मुहावरे को रूपायित करती हैं। वे छीलती हैं, मगर आहिस्ते-आहिस्ते; कभी गुदगुदाती तो कभी चिकोटी काटती हैं और पाठक और श्रोता अंत तक किसी मोह-शक्ति में बंधे,वह सब सहने को विवश नहीं, उद्धत रहते हैं।          

      'पीली छत पर काला निशान' रचना व्यंग्य को उतनी ऊँचाई से कहीं अधिक ऊँचाई तक ले जाने में समर्थ है। बिजली विभाग के ऊँचे सरकारी  भवन का जाला साफ़ करने को उद्धत लेखक की टिप्पणी इतिहास के कड़ुए सच को रूपायित करती है :  " 'ऊँची छत और वह भी पीली' अंग्रेज़ों को पीली कोठियाँ बनाने का शौक था और मुगलों को लाल। लाल इमारते द्योतक हैं इस तथ्य की कि उनके बनाने में कितना खून बहाना पड़ा। अंग्रेज़ों का पीत प्रेम वसंत का परिचायक कदापि नहीं है, 'अलबत्ता भय से पीला पड़ना' मुहावरा उन्हीं के शासनकाल  की देन  है।'’

   इसीप्रकार,

'’मैंने ऊँची पीली छत की ओर  देखा, छत पार कर आकाश में झाँकना पड़ा। आकाश के पार भगवान को देखने की चेष्टा की पर पाया कि ऊपर सब जाले ही जाले लगे हुए हैं।"

     देश के अतीत की पीड़ा और कलुषित वर्तमान की वेदना इस रचना में तीक्ष्ण हो उठी है। धर्म के नाम पर व्याप्त सांप्रदायिकता, सरकारी फाइलों पर भ्रष्टाचार के निशान, आम नागरिकों में जागरूकता की कमी और जनसेवा के नाम पर सरकारी कार्यालयों में जो धाँधली मची है, उसपर सार्थक टिप्पणी है। भाव, भाषा, शैली सब क़िस्सागो के वाचन के अनुरूप ; समस्त आरोह-अवरोह दृश्य जीवंत करने में समर्थ हैं। आत्मविश्लेषण के लिए भी विवश करती है यह रचना।    

         व्यंग्य  संग्रह 'दिल्ली चली पहाड़ ' में व्यंग्य की बारीक चुभन और स्वाधीनता के बाद की दिल्ली की बेदिली का इतिहास समाहित है और इस दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण कृति है। इस संग्रह  में बीस रचनाएँ हैं। व्यंग्यकार ने इनके माध्यम से दिल्ली के पचास वर्षों के इतिहास का ख़ाका खींचने का प्रयास किया है। डॉ. नवल के ही शब्दों में, मैंने विनम्र प्रयास किया है कि दिल्ली के विगत पचास वर्षों के इतिहास को व्यंग्य में पिरोकर एक नई शैली अपना सकूँ और एक नया प्रयोग कर सकूँ।"
     
    यह नया प्रयोग सचमुच मुग्ध कर देने वाला है। ये रचनाएँ सहज भाव से गंभीर घाव करती हैं। समाज की रूढ़ियों, अनैतिकताओं, भ्रष्टाचार, आडंबर, साहित्य की गंदी राजनीति और राजनीति का बढ़ता वर्चस्व, पूँजीपतियों की शोषक प्रवृतियों  और इन जैसी समस्त विद्रूपताओं पर व्यंग्य  के नश्तर चुभोए गए है। व्यंग्य की कोई एक शैली नहीं है। व्यंग्यकार ने स्वतंत्र रूप से अनेकानेक शैलियों का प्रयोग किया है और इसी कारण से प्राय: प्रत्येक रचना  पाठक और श्रोता दोनों को बाँध कर रखने में समर्थ है। इतना ही नहीं व्यंग्यकार चिर परिचित मुस्कान लिए समाज को हौले से हिलाता-डुलाता हुआ अनायास झकझोर देता है, चेतना में एक प्रश्न उगा जाता है कि व्यक्ति और समाज के आचरण में दिनों दिन पनपती विसंगतियों का दायित्व किसपर है?    

            इस संग्रह की पहली रचना' चलो चलें लालकिला मैदान' समस्त घटनाक्रम का साक्षी है, और उस गहन पीड़ा का भी जिसे व्यंग्यकार छोटी-छोटी सुइयाँ चुभोकर उभरने पर विवश करता है... " पटेल ने रजवाड़े मिटा दिए, प्रिवी पर्स भी बंद हो गए पर हमारे नेताओं के रजवाड़े बनने लगे, फूलने लगे, फलने लगे, फलों से लदने लगे, लदकर झुकने लगे,जनता को झुकाने लगे। इनके पर्स का मुक़ाबला बेचारा प्रिवी भी क्या करता? तब के कितने राजा इनके दरबार में मंतरी-संतरी हो गए हैं।" 

           'यहाँ हर चौराहा गौशाला' में गाय को माध्यम बनाकर लेखक ने एक बार फिर परिवार की माता को निराश्रित, बेटों को विवश और  बहुओं को दोषी बनाकर कटघरे में खड़ा कर दिया है, " आजकल माताएँ भी तो गाय-सी निरीह हो गई हैं, जिनके बेटे उनके हाथों से निकलकर दूसरे खूँटों पर बंध गए है।" पारिवारिक संबंधों  के त्रिकोणीय विश्लेषण में लेखक की व्यंजना अतिवादिता की शिकार है। लेखक माता और पुत्र को लेकर पक्षपाती प्रतीत होते हैं। कई संदर्भों में एक ही बिंदु पर सूई जाकर अटकती है कि क्या यह व्यंग्यकार किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त है, जिसकी वजह से हर बार बहू खलनायिका नज़र आती है। इस व्यंग्य रचना का सामाजिक और राजनीतिक पक्ष पूरी समृद्धि के साथ उजागर हुआ है। "जै जै दिल्ली की जे. जे. कॉलोनियाँ'  में कॉलोनियों के निर्माण, विकास की प्रक्रिया से लेकर राशन कार्ड बनने-बनाने, बिजली-पानी की व्यवस्था देने की प्रक्रिया कॉ डॉ. नवल व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति दी है।

           'दिल्ली चढ़ी पहाड़' में लेखक के व्यंग्य की परिपक्वता परिलक्षित होती है। पूँजीपति वर्ग और राजनेताओं पर जो व्यंग्य परोसा गया है, वह सचमुच जायकेदार है:  " फिर आया अपना राज। देसी अंग्रेज़ आए, दिल्ली पर उनका कब्ज़ा हुआ, गाँधी टोपी और नेहरू जैकेट के अर्थ बदलने लगे, लालफ़ीताशाही, गोराशाही का रूप बनकर उभरी और नए कर्णधार भी ग्रीष्मकाल में पर्वतों पर चढ़ने लगे, बल्कि इन्होंने अपने-अपने पहाड़ों को पाल लिया।'

      "जब से नलकुबेर का वर्ग आया है, जड़ें दिल्ली में रखता है और पहाड़ों पर पनपता है... जो चढ़ाई दिल्ली वाले कर रहे हैं, उसका तो जवाब ही नहीं। रौंदकर रख दिया उन्हें। उनकी ऊँचाई धँसा दी है। ...यों मसूरी के रूप में दरअसल दिल्ली ही पहाड़ पर है।" 

          इस संग्रह की अन्य रचनाएँ, जैसे 'दिल्ली दिलवालों की', 'दिल्ली की बारात, कोई सानी नहीं' आदिक में दिल्ली की उस गौरवपूर्ण संस्कृति के प्रागैतिहास बन जाने की व्यथा है, जिसपर पाश्चात्य संस्कृति का मुलम्मा चढ़ा है। इस पुस्तक में आज़ादी के बाद की दिल्ली का जो परिदृश्य उभारा गया है, वह अपनी कलात्मकता और शैली की विविधता के कारण न केवल रोचक, वरन अतीव मर्मस्पशी बन पड़ी है। पाठक आज़ादी के बाद हो रही जीवन-मूल्यों की गिरावट और क़ीमतों के उठते ज्वार के कारण समाज में दो वर्गों के बीच पनपी और गहरी हुई खाई के निरंतर बढ़ते जाने से कुकुरमुत्ते की तरह अनचाहे उग आई कई समस्याओं से आँखें नहीं चुरा सकते। कहीं न कहीं ये समस्याएँ उनके घरों की दीवारों को भी खोखला कर रही है, ये रचनाएँ उस ओर ध्यान आकृष्ट करने में समर्थ हैं। संवाद शैली और कथानक में नाटकीयता सम्प्रेषण-क्षमता बढ़ाती है और दूर तक अपना प्रभाव पहुँचा पाने में समर्थ है।   

        'दीनानाथ के हाथ' शिक्षा के प्रति परिवार की शुभचिंता के प्रसंग को डॉ. नवल ने उत्तम पुरुष के माध्यम से व्यंजित किया है। दादी के शिक्षा-आदर्श का अनुपालक पोता सच का साथ देने क कारण तमाम मुसीबतों को झेलता है और अंत में दीनानाथ के गुरु मंत्र को समझ, उनका अनुसरण करता है। चलते-फिरते, यह रचना परिवार और समाज की विसंगत मानसिकता के कारण उत्पन्न स्थितियों का जायजा लेती और  मनोवैज्ञानिक तरीक़े से शल्य चिकित्सा करती प्रतीत होती है। इसीप्रकार अनाथालय का जो चित्र खींचा गया है, वह व्यंग्यकार की  चरित्र-चित्रण की अद्भुत क्षमता को रेखांकित करती है: 

       "समाज के यशस्वियों की अद्भुत देन है अनाथालय। अनाथालय दया के प्रतीक हैं। दयालुता से भरे अनाथों पर कृपा करके संतुष्टि-सुख पाते हैं ये अनाथालय चलेंगे कैसे यदि इनमें अनाथ ही न हों? श्री दीनानाथ जी और उन जैसे अनेक दीनानाथ समाज में अनाथों की सृष्टि करते हैं, उनकी कृपा से अनेक सनाथ-अनाथ बनते हैं ताकि अनाथालय चलते रहें तथा सुयोग्य नागरिकों पर दया भाव बना रहे।"

          'किस्स-ए-डुप्लेक्स' में समाज और राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार और शोषितों के उत्थान की  काग़ज़ी कार्यवाही  तथा अन्य कई मसलों पर भी रिक्शे वाले और सवार लेखक  के बीच के संवाद -मात्र से गहन प्रतिक्रिया अभिव्यंजित है। रिक्शावाला:

      "ओ हो साहब! यही तो समझाने जा रहा था कि हमारी झुग्गी-झोपड़ियों को  भी ज़मीन मिल चुकी है। सबको वहाँ फ्लैट अलॉट हो जाएँगे। भूरेलाल तो इसी झोपड़ी में रहेंगे, अलबत्ता आपको उनका फ्लैट मिल जाएगा। तब वक़्त और ताक़त के हिसाब से और रुपया दे देना,  मौज करना और एक काम करना... फिर किसी रिक्शेवाले से पैसे कम ना कराना।"

   संदर्भ और प्रसंग के तारतम्य को साधे रखना हरीश नवल का लेखन -कौशल है। हल्के से मारते हैं, थपका-थपका कर, बड़े प्यार से, विनोद भाव से। कहीं भी चाबुक की फटकार सुनाई नहीं देती,लेकिन चोट उससे कहीं ज़्यादा लगती है। यहाँ ज्ञानपीठ के न्यासी अशोक जैन के कथन को उद्धृत  करना समीचीन प्रतीत होता है: किसी साहित्य की गहनता जानने के लिए उसकी कविता पढ़ना आवश्यक है, विस्तार और व्यापकता समझने के लिए उसका कथा साहित्य पढ़ना चाहिए और यदि हम उसका पैनापन परखना चाहते हैं तो हमें उसका व्यंग्य लेखन देखना होगा।"

       हरीश नवल को समझने के लिए तीनों विधियों का उपयोग करना अनिवार्य है और उनके अनूठे व्यक्तित्व को समझने के लिए उनकी  हमसाया के कथन से रू-ब-रू होना भी ज़रूरी है। डॉ. स्नेह सुधा नवल की दृष्टि में हरीश नवल, "वे एक गुणी व्यक्ति, सुयोग्य नागरिक, आदर्श पिता, संकटमोचन मित्र, श्रेष्ठ भाई, लोकप्रिय तथा विद्वान अध्यापक, अच्छे वक्ता, उत्तम संगठनकर्ता, सामाजिक सरोकारों से सदा संपृक्त एक जागरूक रोटेरियन, अत्यंत हँसमुख, उदार और विनम्र व्यक्ति हैं ...बड़े विरोधाभास हैं इस व्यक्ति में। देखने में इसके ढेर सारे दोस्त हैं ... पर यूँ अंतर्मन से एकाकी हैं। ... उन्हें अमीर ग़रीब, सुदर्शन-अति सामान्य, साँवले-गोरे, देशी विदेशी, स्त्री पुरुष, वृद्ध-युवा सब एक समान अच्छे लगते हैं। एक बड़ी श्रेष्ठ बात कि वे जाति-पाँति, धर्म आदि के आधार पर कभी भेद नहीं करते। उन्हें अपने पिता से रक्त में यह संस्कार मिला है।"    

       वस्तुत: किसी रचनाकार की रचना पर उनके बाल- संस्कार और परिवेश के घटनाक्रम का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। हरीश नवल के पैतृक और साहित्यिक संस्कारों की किंचित रूपरेखा पहले दी गई थी और उसकी पुष्टि यदि किसी व्यक्ति की जीवनसंगिनी लिखित रूप में करे तो प्रामाणिकता बढ़ जाती है। और पति की विशिष्टता गिनाती जीवनसंगिनी का चिंताभाव और आभाराभिव्यक्ति, "कमाल के आदमी हैं --दिनभर काम, आगंतुक-मिलन, बतियाँ आदि के बावजूद शांत भाव से देर रात दो-दो बजे तक लिखते हैं, कहते हैं कि जितनी नीरवता बढ़ती जाती है -- चुप्पी गहराती है उन्हें लिखने में मज़ा आता है। “   

"... मुझे आगे बढ़ाकर लाने में हरीश का हाथ है। मुझे अपने पर विश्वास जमाने के लिए भी हरीश ने बहुत कार्य किया। मेरी रचनाओं, मेरी कलाकृतियों को उजागर किया, मुझे मंचों पर उपस्थित किया, सम्मेलनों में मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया और मैं अभिव्यक्ति के संकट से मुक्त हो सकी। मेरी कविताएँ छपीं-- हरीश प्रसन्न थे, मेरी पुस्तक प्रकाशित हुई-- हरीश आश्वस्त थे-- मेरी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगी --हरीश प्रसन्नता के गोते लगाने लगे; मैं कॉलेज में कार्यकारी प्रिंसीपल बनी-- हरीश गौरवान्वित थे। ... मैं उनकी सफलताओं के आधार में हूँ या नहीं-- वे ही जानें, मेरी हर सफलता के पीछे मेरा हरीश है।" 

किसी रचनाकार की पत्नी की ऐसी स्वीकारोक्ति न पढ़ी, न सुनी मैंने। यह अवश्य पाया कि हरीश नवल केवल व्यंग्य की दुनिया में अग्रिम पंक्ति में आसीन नहीं होते, अपनी संगिनी को साथ साथ आगे किए  रखते हैं, नवोन्मेष प्रतिभा को आगे की दिशा मित्रवत बताते हैं, मित्रों को भाई- सा और भाई को मित्र-सा भाव देते हैं।
       
      हरीश नवल का एक व्यंग्य 'तुसी कर दे की हो'  साहित्यकार और शिक्षक आम जन की सोच का मनोवैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करता है। किंतु बतौर पाठक एक जिज्ञासा बार -बार सिर उठाती है कि शीर्षक मध्यम पुरुष को लक्ष्यकर है, तो यहाँ उम्मीद होती है कि सारे प्रश्न लेखक से सीधे तौर पर किए जा रहे होंगे, जबकि लेखक यहाँ भी क़िस्सागो है और पूरे संवाद में कहीं भी प्रत्यक्षत: शामिल नहीं है। संवाद के रूप में प्रश्न-उत्तर का जो बाना बुना जा रहा है, उसमें दोनों ही अन्य पुरुष हैं। इस नाते क्या शीर्षक 'औह करदा की है' (ह का अस्फुट उच्चारण) बेहतर नहीं होता? बहरहाल, इससे इस व्यंग्य के पठन- पाठन और वाचन-श्रवण के रस-निमज्जन में अंतर नहीं पड़ता। अपनी विनोदपूर्ण अभिव्यक्ति और गंभीर प्रवृति के कारण यह व्यंग्य चुनिंदे व्यंग्य रचनाओं में से एक है और रहेगा। एक अन्य व्यंग्य की चर्चा मुझे अनिवार्य प्रतीत हो रही है, वह है, 'न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी' । वर्तमान नागर्री चरित्र के जितने रूप, उनकी जितनी आपदाएँ,जितने संघर्ष हो सकते हैं एक ओर लेखक ने उन समस्त स्थिति-परिस्थितियों की गहरी छानबीन की है, दूसरी ओर नागरी चरित्र में जितने आडंबर, जितने अहम, जितने अन्य अवगुण पनप सकते हैं उनकी पड़ताल करते हुए व्यंग्यकार ने सहजता से यह प्रमाणित किया है कि वर्तमान सामाजिक ढाँचे में ढली प्रतिभाशाली नागरी  यदि स्वयं सत्य, ईमानदारी, लगन और मेहनत से आगे बढ़ना चाहती है और  परिस्थितियाँ उसके  प्रतिकूल रहती है तो  वह उस ऊँचे मुकाम तक नहीं पहुँच पाती, जहाँ उसे होना चाहिए,जिससे समाज के विकास में सहयोग हो सके। किंतु कई प्रतिभाहीन नागरी अपनी चाटुकारिता, पैरवी आदि अन्य कारणों से किसी जगह प्रतिस्थापित भले ही हो जाएँ, किंतु इससे समाज का कोई भला नहीं होता। सार यह कि सही हाथ में सही वस्तु न पड़ने पर वस्तु की उपयोगिता नष्ट हो जाती है और वह हाथ भी अपनी सार्थकता खोने लगता है। यह व्यंग्य बहुत ही व्यापक विश्लेषण का परिणाम है और परिपक्वता की कसौटी पर कसा हुआ भी है। सरल सहज मगर चुटीली भाषा अपने नए तेवर में नज़र आती है, यही इसका सौंदर्य भी है।

     यायावरी प्रवृत्ति ने उन्हें  34 देशों तक पहुंचाया और जहाँ गए वहीं हिंदी का और व्यंग्य सहित अन्य विधाओं का परचम लहराया। विदेशों में हिंदी के व्याख्याता, वक्ता, निरीक्षक,परीक्षक बनाकर बुलाए गए हरीश नवल ने हिंदी और हिंदुस्तान को हरदिल अज़ीज बनाने का जो सुकार्य किया वह सराहनीय है और परवर्ती पीढ़ी के लिए अनुकरणीय भी। 'इन्हे जो बाहर से देखेगा,वह क़तई नहीं मान सकता कि पाश्चात्य जीवनशैली को अपनाया-सा यह व्यक्ति ख़ालिस हिंदुस्तानी है, जहाँ जाता है, हिंदुस्तान बसा आता है। पॉप गा रहा यह दुर्बोध व्यक्तित्व योग जानता ही नहीं, उसकी गहराई में भी आपको ले सकता है। गुनगुनाता रहता -सा यह व्यक्ति करुणा के सागर में हर समय गोते कैसे लगा सकता है! हरीश नवल परदे के नहीं, जीवन के अभिनेता हैं, कभी किसी को अपने अंतर्गुहा तक पहुँचने नहीं देते, झाँकना तो दूर की बात है। उनसे मिलने, परखने के बाद अनायास मुझे 'ये और वे लोग' में लिखी  जैनेन्द्र की  बातें  याद आ गईं जो उन्होंने जयशंकर प्रसाद के परिप्रेक्ष्य में कही थी जिसका सार है, प्रसाद अक्सर  शांत, अपने में सिमटकर रहनेवाले व्यक्ति थे, उन्हें किसी से बहुत अधिक खुलना पसंद नहीं था, वे अपने गांभीर्य को कवच बनाकर उसके घेरे में रहते प्रतीत होते, इसलिए उन्हें समझ पाना कठिन रहा, जबकि प्रेमचंद पहली ही मुलाक़ात में उन्हें सहज लगे और आपसी संबंधों को भी सहज बना दिया। नवलजी से जितनी बार मिलना हुआ, किसी न किसी गोष्ठी में या सेमिनार में या फिर शोक सभा में, वे उतने ही स्नेह से मिलते किंतु हर बार कुछ अलग रूप में, कुछ अधिक दुर्बोध, रहस्यात्मक नवलता लिए। क्योंकि कैंसर की पीड़ा, अंग-भंग की पीड़ा, शल्य चिकित्सा की पीड़ा उन्हें सालती नहीं, किंतु योग और भोग में घालमेल से चिंतित,साहित्य और राजनीति, साहित्य की राजनीति से दूर, भीड़ में ठहाके लगाते हुए भी यदि उनकी दृष्टि कहीं भी किसी भी समय किसी विसंगति को परख लेती है तो फिर वह रात चिंतन की रात होती है, वे तड़पते हैं, छटपटाते हैं कि भारतेंदु से लेकर अबतक के व्यंग्य-साहित्य की तमाम कोशिशों के बावजूद समाज में बुराइयों की जड़ें अब भी वैसी ही मज़बूत हैं। भ्रष्टाचारी सिर उठाकर और सदाचारी सिर झुकाकर चल रहे हैं, बदलाव की कोई सूरत क्यों  दिख नहीं रही अब तक!
   
     उनकी चिंता 'दीनानाथ के हाथ' संकलन के प्राक्कथन में झलकती है: " आज क़ीमतें हावी हैं, मूल्य रो रहे हैं। भ्रामक दृष्टिकोण पनप रहे हैं। सुविधा को सुख, विरोध को क्रांति, सूचना को ज्ञान, डिग्री को अध्ययन मानने वाले समाज को व्यंग्य कैसे बदलेगा? व्यंग्य की सार्थकता ही विसंगतियों के निदर्शन  तथा उनकी संगति से जुड़ी है, पर हम समवेत कुछ नहीं कर पा रहे हैं।" फिर भी उनमें आशा और बलवती है कि चेतना के स्तर पर यदि कहीं किसी भी विधा की पुस्तक प्रभावित कर बदलाव ला रही है, व्यंग्य भी ला रही होगी।"मार्क ट्वेन का यह दर्शन वाक्य: महान साहित्य वह होता है जिसे हर कोई पढ़ना चाहता है और जिसे कोई नहीं पढ़ता।"  (द ट्रेजरी ऑफ ह्यूमरस कोएशन्स, पृ. 196)   

          हरीश नवल रुकने-थकने, थककर रुकने या हार मानकर रुकनेवालों में से नहीं है। उनके अंदर का साहित्यसेवी अपने संकल्प  पर अडिग है। पन्नों पर, पन्नों से निकल कर मंचों पर धारदार व्यंग्य से अपनी बात रखना और पाठकों और श्रोताओं से मनवाने की कला के धनी हैं। वे मानते हैं, जब व्यक्ति गाली नहीं देना चाहता, उपहास नहीं उड़ाना चाहता, अवहेलना नहीं कर वह व्यंग्य रचता है और वे अनुभव उन्हें ख़ुराक देते हैं। डॉ. नवल कभी आक्रमक दिखते नहीं। वे अपनी तीक्ष्णता, प्रखरता और आक्रामकता को विनोद की चाशनी में लपेट कर परोसते हैं।

        दिल्ली के सीने पर दुकानों की तरह असंख्य उग आए नर्सिंग होम की बाज़ारवादिता पर बेबाक टिप्पणी है 'मंदी नहीं है नर्सिंग होम मंडी'। इस मंडी के लिए मरीज़ उपभोक्ता है, ख़रीदार है, अतएव उनकी भीड़ इस मंडी की रौनक है। लेखक ने नर्सिंग होम की अंदरूनी भावों और व्यवस्थाओं पर मीठी चोट की है, "दिल्ली बढ़ती जा रही, लाल डोरा से गाँव-गाँव को लील रही है, सभी जगह प्राणों के लाले हैं, ऐसे में हे उद्यमी! उठ, उद्यम कर, चैतन्य बनकर अपने को प्राणवान बनाने के लिए प्राण बना। ग्राहक ईश्वर है। उठकर जा, भागकर योजना बना, उसके लिए नर्सिंग होम बनाकर खुद को ऐश्वर्य और उसे ईश्वर्यता प्रदान कर।"

         'दिल्ली चढ़ी पहाड़' कृति सामाजिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। अभी की पीढ़ी और भावी पीढ़ी के जानने योग्य बहुत से तत्व-तथ्य इसमें समाहित हैं। न केवल समग्र रूप में,बल्कि अंतर्विषयों की एक -एक कर स्वतंत्र पड़ताल भी होनी चाहिए। अन्य संग्रह, जैसे 'माफ़िया ज़िंदाबाद' और 'वाया पेरिस आया गाँधीवाद' आज़ादी के बाद पनपी आपराधिक गतिविधियों और पश्चिमी नक़ल के कारण हुए हमारे शाश्वत मूल्यों के अवमूल्यन को रेखांकित करती है। गाँधी के सपने के भारत को देश के सिरमौरों ने बनने से पहले ही नष्ट कर दिया। गाँधी के विचार नष्ट हो गए, उसकी जगह वाद ने ले ली। बेईमानी, मक्कारी, स्वार्थपरता ने देश को आंतरिक रूप से खोखला बना डाला है। इन जैसी अनेक चिंताओं की झलक इन रचनाओं में मिलती है।

       हरीश केवल व्यंग्य रचनाओं के ही पुरोधा नहीं रहे, 'हिंदी नाटक : तीन दशक','मेरी इक्यावन रचनाएँ',  'मादक पदार्थ और पुलिस की भूमिका', 'भारतीय मनीषा के प्रतीक'(संपादित), 'रंगमंच संदर्भ', आधी छुट्टी की छुट्टी (बाल साहित्य)',  'शिवशंभू के चिट्ठे और अन्य निबंध (संपादित), 'रंग एकांकी ' (संपादित), धर्मवीर भारती के नाम खुला पत्र (संपादित)',  'रेतीले टीले का राजहंस' जैन आचार्य तुलसी पर आधारित उपन्यास) आदि अनेकानेक कृतियों से हिंदी साहित्य की अनेक विधाओं में अपनी सशक्त पहचान छोड़ी है।  इसके अतिरिक्त   वरिष्ठ रंगकर्मियों  के साक्षात्कार पर आधारित  'रंग साक्षात्कार', वरिष्ठ रचनाकारों  के संस्मरण पर आधारित कृति' 'व्यासजी की लालटेन', नई कृतियों में नवल जी द्वारा लिखी गई भूमिकाओं का संग्रह 'नवसाहित्य की भूमिका' एक कविता संग्रह  'होते थे माँ बाबूजी' एक संस्मरणात्मक उपन्यास 'कैंसराभिनंदन' जिसमें संभवत: कैंसर के तीसरे पड़ाव से बचकर नवलजी के लौटने के पीछे उनके और उनके परिवार वालों की  सकारात्मक सोच, हौंसला, मित्रों, आत्मीयों की दुआएँ,  समग्र घटनाक्रम आहिस्ते- आहिस्ते उपन्यास का रूप ले रहे हैं। अतीत की वो परछाई एक सकारात्मक सोच और आशावादिता पर आधारित है। 'छोटे पर्दे का लेखन' 400 पृष्ठ की टीवी स्क्रीन के लिए लिखी गई  पटकथा है,जिसमें हजारी प्रसाद द्विवेदी,शरद जोशी, परसाई, त्यागी आदि  के व्यंग्यों की पटकथाएँ,उपन्यास, कहानी, कविता, डॉक्यूमेंटरी, नाटक, धारावाहिक  आदि विधाओं की पटकथाएँ कुछ अंशत: कुछ पूर्णत: शामिल है। पहले भी टीवी के लिए 26 धारावाहिक, कई रेडियो नाटक और धारावाहिक  लिख चुकने वाले  नवलजी की साहित्य यात्रा अनवरत चल रही है। पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी उत्कृष्ट पकड़ और गंभीर विषय की विनोदपूर्ण प्रस्तुति के लिए वे  पाठकों के बीच आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं।

            व्यंग्य को लेकर वे सजग प्रहरी की भूमिका में आज भी नज़र आते हैं। कुछ नए व्यंग्यकारों की दिशाहीन कोशिश देखकर वे क्षुब्ध भी होते हैं, ख़ासकर जब कोई लेखक व्यंग्य में हास्य का अत्यधिक मिश्रण कर व्यंग्य को ही हास्यास्पद बना देता है, तब वे कह उठते हैं, "व्यंग्य लिखना खाला का घर नहीं है। यह करुणा के सागर से उपजा पुष्प है। इसकी मार महीन है, पर रेशम-सी नहीं, सेफ्टीपिन -सी, जो सीवन के उधड़ेपन को ढँकती भी है।" वे बार बार समझाते हैं, "व्यंग्य और हास्य में उतना ही अंतर है जितना सुख और दुख में, जितना रात्रि और दिवस में। यह अंतर बारीकी लिए है। " नवलजी व्यंग्य में हास्य का हल्का पुट तो स्वीकारते हैं, अधिकता नहीं। उनके अनुसार, "व्यंग्य वाक्य में हास्य का उतना ही इस्तेमाल हो जितना भोजन में चटनी या मिष्टान्न का।" क्योंकि " जो व्यंग्यकार व्यंग्य में हास्य का मिश्रण अधिक करते हैं, उनकी रचना सतही हो जाती है। हास्यकार जितना अधिक व्यंग्य की छौंक लगाते हैं, उनकी रचना उतनी सशक्त होती जाती है।" डॉ. नवल की दृष्टि में रचनाक्रम एक प्रक्रिया है यह धीमा असर देती है। ... व्यंग्य व्यंग्यकार को आकर्षित करती है, जो उसे बीज रूप में भाव देती है, जिसे वह अपनी शैली के ज़रिए उससे प्राप्त विडंबनाओं, विद्रूपताओं को हास्य आदि के माध्यम से 'रचना में परिवर्तित करता है जिनमें करुण त्रासदी छिपी होती है।' वे यह भी मानते हैं कि 'लेखक वही सफल  है जो नए-पुराने में फ़्यूजन कर सके। मगर जो मंच प्रस्तुति का ठेका लेते हैं, वे साहित्य का वह रूप प्रस्तुत नहीं करते जो हमारी चेतना में है। साहित्य रिफॉर्म करता है।'

           सन 1962 से साहित्य से जुड़े डॉ. हरीश नवल के व्यक्तित्व की यह ख़ासियत है कि उन्होंने अपनी दृष्टि सदैव व्यापक फ़लक पर रखी है। व्यंग्य-साहित्य की समृद्धि हेतु किया जाने वाला उनका प्रयास एक ओर शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल और धर्मवीर भारती प्रभृत मनीषियों को आश्वस्त करता रहा है, दूसरी ओर नवागंतुकों के लिए भाव और शिल्प का व्यापक क्षेत्र मुहैया कराया है, उन्हें घटनाक्रम, कालक्रम को परखने की अंतर्दृष्टि दी है, मनन और बेआवाज़ विस्फोट की शैली सिखाते हैं। अपनी नवीन शैली और शिल्प के प्रयोग के लिए वे परवर्ती व्यंग्यकारों के आदर्श साबित होंगे। ढेरों शुभकामनाएँ! 
संदर्भहरीश नवल: तीस व्यंग्य रचनाएँ; निराला की गली में; दिल्ली चढ़ी पहाड़; परसाई परंपरा का वाहक; अनेक पत्र-पत्रिकाएँ, गोष्ठियों एवं सेमीनारों में उनके वक्तव्य और रचना पाठ, तथा साक्षात्कार