गर्मी का सौंदर्य वर्णन - अनूप शुक्ल


अनूप शुक्ल 
गर्मी की अब चला-चली की बेला है। कुछ दिन में गर्मी अपना चार्ज बारिश को देकर चली जायेगी। बारिश शपथ ग्रहण के लिये कसमसा रही है। गर्मी से मौसम की सत्ता बारिश को हस्तांतरित होने के बाद फ़िर बारिश का जलवा होगा। नाले-नालियां उफ़नायेंगे। सूखा राहत कोष में बंटने वाली बची धनराशि बाढ़ राहत कोश में हिल्ले लगा दी जायेगी। जनता के लिये रोने के लिये लगे-लगे दो मौसम मिल जायेगें। एक के साथ एक फ़्री वाले पैकेज में। बहरहाल!

हमने एक बात लक्ष्य की है कि हिन्दी साहित्य में गर्मी का सौन्दर्य वर्णन काफ़ी कम किया गया है। किया भी गया है तो हमारी निगाह से अभी तक नहीं गुजरा। अब जब हमारी निगाह से नहीं गुजरा तो उसका क्या नोटिस लिया जाना? हो सकता है कि सारा गर्मी सौंदर्य वर्णन हमारी निगाह बचा के निकल गया होगा। पहले का पुरानी सोच का होगा न! पहले का सौंदर्य शर्मीला होता होगा। निगाह नीची करके रहता होगा। अदब से निकल गया होगा। आजकल की तरह बिंदास सौंदर्य होता तो ऐसा भड़भड़ा के हल्ला मचाते हुये निकलता कि कान में ईअर प्लग लगा कर देखना पड़ता।

हिन्दी प्रेमी होने के नाते हमारी भी आत्मा कभी-कभी छटपटाती है कि जो नहीं है हमारे साहित्य में वह रचा जाये। जो कमी है उसे पूरी किया जाये। हम इस मुगालते में नहीं है कि हम अकेले हैं इस तरह हुड़कने वाले। तमाम साथी हैं जो इस तरह की तमन्ना लिये हैं। हुड़कते हैं और फ़ड़कते हुए रचनारत हैं। साहित्य की तमाम कमियों को पूरा करने के प्रयास में दण्ड पेल रहे हैं। अब यह अलग बात है कि दण्ड पेलने के बाद जो पसीना वे निकालते हैं उसको कोई साहित्य मानने को ही नहीं तैयार है।

हिन्दी साहित्य में छीछालेदर की मात्रा कुछ कम है, अनाम लेखन की परम्परा में थोड़ा हाथ तंग है। लोग अपने लिखे की जिम्मेदारी तो लेते ही हैं बखत जरूरत दूसरे के लेखन को भी अपना बताने की जिम्मेदारी निभा देते हैं। आपसी वाह-वाही में भी थोड़ा सूनापन है। ये सारी कमियां हमारे साथी ब्लागर, बजरिये ब्लागिंग, पूरा करने में उछल-कूद कर रहे हैं। पसीने-पसीने हो रहे हैं।

इस संक्षिप्त लफ़्फ़ाजी भरी भूमिका बांध लेने के बाद आइये गर्मी साहित्य सृजन रत हो जाया जाये । रत हो जाना मतलब जुट जाना या फ़िर अगर बिंदास ब्लागर की भाषा में कहें तो पिल पड़ा जाये। कुछ बिम्ब पेश किये जा रहे हैं। आप देखें कि गर्मी के बारे में क्या कुछ कहा जा सका? 

1. सूरज किसी गर्म मिजाज अफ़सर की तरह दुनिया भर में दौरा कर रहा है। दुनिया भर के लोग उसको देखते ही कमजोर दिल /कामचोर अधीनस्थों की तरह छिपकर अपनी जान बचा रहे हैं।

2. गर्मी के मौसम में सड़क पर तारकोल पिघल रहा है। लग रहा है सड़क के आंसू निकल रहे हैं। बादलों के वियोग में वह काले आंसू रो रही है।

3. चांद सूरज की चमक से ही चमकता है। लेकिन लोग उसकी तारीफ़ सूरज से ज्यादा करते हैं। इससे साबित होता है कि लोग शान्त स्वभाव वाले व्यक्ति को ज्यादा पसंद करते हैं भले ही वह कमजोर हो और उधार की खाता हो। सूरज शायद इसी बात से भन्नाया रहता है। 

4. सूरज की निगाह बचाकर दो पेड़ों की छायायें एक-दूसरे से सटकर आनन्दानुभूति में डूब गयीं हैं। इनको कोई रोकने टोकने वाला वाला नहीं है। सबको पता है कि टोकते ही ये भड़क जायेंगी - हमारी जिन्दगी में दखल देने वाले तुम कौन हो?

5. बादलों को इंद्र ने बरसने का आदेश बीते माह ही दे दिया है लेकिन वे हड़ताल पर हैं और कह रहे हैं कि पहले हमें छ्ठे वेतन आयोग के अनुसार वेतन और भत्ते दिये तब हम पानी की खेप आगे ले जायेंगे।

6. एक बुजुर्ग बदली ने एक बिंदास बादल के साथ बरसने से इनकार कर दिया है। उसने इन्द्र के यहाँ अर्जी लगायी है कि यह मुआ बादल गरजता कम हँसता ज्यादा है। यह हमारा मन बरसने का मूड खराब करता है। जरा सा भी सीरियस नहीं रहता। आप तो जानते हैं कि हँसने से मुझे एलर्जी है। मुझे कोई दूसरा जोड़ीदार बादल दिया जाये। बादल ने अपनी सफ़ाई में कहा है - साहब मैं तो फ़ेफ़ड़े साफ़ करने की एक्सरसाइज कर रहा हूं। अगर हँसूंगा नहीं तो सांँस फँस जायेगी, टें बोल जाऊँगा। इन्द्र भगवान ने वैकल्पिक व्यवस्था होने तक यथास्थिति बनाये रखने का आदेश दिया है। 

7. बादल बदली का पीछा छोड़कर एक कमसिन बादल के पीछे लग लिया है। लग रहा है इनके यहाँ भी समलैंगिकता को अनुमति मिल गयी है।

8. अंधेरे जीने में कई मिनटों की मशक्कत के बाद नायक ने नायिका से कहानी आगे बढ़ाने की मौन स्वीकृति सी पाई है। वह प्रेमालाप का फ़ीता काटने ही वाला था कि नल में पानी आने की आवाज सुनकर नायिका उसको झटककर पानी भरने चली गयी।

9. पनघट पर हमारा पति कैसा हो विषय पर चर्चा चल रही थी। एक सुमुखि का कहना था – पानी की समस्या देख-सुनकर तो मन करता है कि ऐसा पति मिले जो जरा-जरा सी बात पर रोने लगता हो। थोड़े-बहुत पानी का तो आसरा रहेगा। आँखों का पानी देखकर ही जी जुड़ा लेंगे। 

10. एक ही तराजू पर तुलकर अलग-अलग झोले में डाले जाते हुये खरबूजे और तराजू ने विदा होते हुये कहा कौन जाने, कभी पानी का ऐसा अकाल पड़े कि हमारा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाये और हम-तुम किताबों में ही दिखें केवल।

11. पति ने पत्नी को ई-मेल करते हुये अपना विरह दुख बताया- गर्मी की छुट्टियों में जब से तुम गयी हो ऐसा लगता है कि नल से पानी चला गया है। रातें ऐसे साँय-साँय करती हैं जैसे नल आने का झाँसा देते हुये साँय-साँय करता है। बादल नेताओं की तरह मौका मुआयना करके चले गयें, पलट के नहीं देखा। अब तो वे बदलियों के संग भी नहीं दिखाई देते। लगता है उनमें भी आपस में पटती नहीं, या फ़िर लगता है उनके यहां भी खर्चे को लेकर खटपट होने लगी है। यह भी हो सकता है कि खर्चे कम करने के लिये बादल ने उसको मैके भेज दिया है जैसे तुम छुट्टियों में अपने मम्मी-पापा के पास चली गयी हो। तुम्हारे वियोग में दिल खून के आँसू रोने की सोच रहा था लेकिन फिर अपनी पिछली ब्लड रिपोर्ट को ध्यान में रखकर मैंने दिल को इस ऐय्याशी के बारे में सोचने के लिये डाँट दिया। बहुत देर तक गुमसुम बना रहा बेचारा। इस पर हमने उसे फिर कामचोरी के लिये डाँट दिया। इस पर वो बदमाश राजधानी एक्सप्रेस की तरह दौड़ने लगा। हमने फ़िर उसे प्यार से समझाया कि पेट्रोल का दाम बढ़ गया है भैया जरा कायदे से चलो। तबसे ठीक है। बदमाशों से भी प्यार से बात करने से बात बन जाती है। तुम जो आटा गूँथकर गई थीं, वह अभी तक गीला बना हुआ है। समझ में नहीं आता कि उसमें आटा मिलाकर ठीक करूँ कि धूप में सुखाकर बराबर करूँ। जल्दी से अपनी मम्मी से पूछकर बताओ!