स्‍त्री - पुनीता जैन

पुनीता जैन

स्‍त्री – 1

सबकी रसोई में
खाना पकता अलग तरह

चावल वही आटा वही दाल वही
पानी भी नमक भी आँच भी

स्‍वाद सबके
अलग अलग

पकती है स्‍त्री
अलग अलग आँच अपनी से
अपनी तरह
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स्‍त्री - 2

जगह मिली नहीं
कि ली नहीं

अब घर के भीतर ही
अं‍तरिक्ष में उड़ लेती हूँ

खि‍ड़की खोलती हूँ
हवा में बह लेती हूँ

वस्‍त्र पानी में डुबोती हूँ
गहरें में तैर लेती हूँ

रोटी सेंकती हूँ
तपती हूँ पकती हूँ

यहाँ होती हूँ नहीं होती हूँ
कण में पर्वत पिरोती हूँ

खूँटे संग इस तरह जुड़ती हूँ
कि अंतरिक्ष इस ओर मोड़ लेती हूँ
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स्‍त्री – 3

दु:ख
जो पहले पहल
पहुँचाता है गहरे तक आघात
घीरे से कपड़े बदल
साथ बैठने लगता है
बनकर आदत
और इस तरह शुरू होती है
यात्रा पत्‍थ्‍ार होने की
स्‍त्री
पाषाण युग की कंदरा से
अब भी गुजर रही
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