लोक से लोकप्रियता तक: 21वीं सदी में लोक, लोकप्रिय संस्कृति और बाज़ार के अंतःसूत्र

अतुल कुमार मिश्र

21वीं सदी के पिछले कुछ सालों के दौरान हम मुख्यधारा समाज के भीतर ‘लोक’ को लेकर एक नए किस्म के विमर्श को निर्मित होते हुए देख सकते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान अब तक हाशिए पर रही लोक-संस्कृति और विभिन्न लोक-परम्पराएं; धीरे-धीरे मुख्यधारा समाज की ‘लोकप्रिय संस्कृति’ (पॉपुलर कल्चर) का ही हिस्सा बनने लगती हैं और समय के साथ ‘लोक की लोकरंजकता’; पॉपुलर कल्चर की ‘जुनूनी लोकप्रियता’ में बदल जाती है। निश्चित तौर पर इस प्रक्रिया में बाज़ार एक बड़ी भूमिका निभाता है, क्योंकि यद्यपि लोक की सांस्कृतिक चेतना का बाज़ार की मूल्य-चेतना से एक स्वाभाविक विरोध है, लेकिन एक तरफ ‘लोक’ में बाज़ार को पहुँचाने और दूसरी तरफ ‘लोक का बाज़ार’ बनाने, दोनों के ही लिए पूंजीवादी बाज़ार को ‘लोक’ की ज़रूरत स्पष्ट है। नतीजतन लोक और बाज़ार की अंतर्क्रिया में बाज़ार ने लोक को तो अपनाया मगर लोक की सांस्कृतिक चेतना से उसे अलग करने के बाद। प्रस्तुत शोध-प्रपत्र में बाज़ार की मूल्य चेतना के जरिए ‘लोकप्रिय संस्कृति’ द्वारा लोक की मूल संकल्पना में आए उस रेडिकल शिफ्ट की ओर इशारा किया गया है, जहां ‘लोक’ के ‘लोकप्रिय संस्कृति’ का हिस्सा होने की प्रक्रिया में ‘लोकपन’ से मुक्ति की एक अनिवार्य प्रक्रिया भी साथ-साथ चल रही होती है।    
 अभी बहुत समय नहीं हुआ, जब लोक हमारे लिए एक पिछड़ी हुई, गैर-आधुनिक और असभ्य सी कोई चीज़ हुआ करती थी और हम लोक के अनगढ़पन, उसकी विशिष्टता को पिछड़ा पुराना मानते हुए नज़रअंदाज़ कर दिया करते थे। लेकिन पिछले कुछ सालों के भीतर अचानक से मुख्यधारा संस्कृति में लोक को लेकर एक प्रकार की स्वीकार्यता उसे मान्यता देने का प्रचलन बढ़ा है। सिनेमा से लेकर सूचना-संचार के अन्य दृश्य-श्रव्य माध्यम जो समकालीन लोकप्रिय संस्कृति (पॉपुलर कल्चर) को गढ़ते हैं, वहाँ अब लोक-संस्कृति का प्रवेश वर्जित नहीं रहा। बल्कि अब एक नए कला-रूप के बतौर उसे महत्व भी दिया जाने लगा है। यद्यपि यह बात एक नवीन परिघटना के बतौर कम-ज्यादा रूप से लोक-संस्कृति की विभिन्न कलाओं पर लागू होती है जिसमें लोक-संगीत, लोक-नृत्य, लोक-नाट्य के अलावा लोक-शिल्प और कई दूसरी लोक कलाएं भी शामिल हैं, लेकिन यहाँ पर हम सिर्फ लोक-संगीत को ही अपने विश्लेषण का आधार बनाएंगे। लोक-संगीत को अपने विश्लेषण का प्रमुख आधार बनाने की बड़ी वजह यह है कि हाल-फिलहाल के वर्षों में मुख्यधारा समाज-संस्कृति में लोक-संगीत की उपस्थिति और उसकी महत्ता लगातार बढ़ी है और धीरे-धीरे इसने खुद को लोकप्रिय संस्कृति का एक ज़रूरी हिस्सा बनाया है।     

लोक की संकल्पना और लोक/शास्त्र का विभाजन     
सामान्यतः दैनंदिन व्यवहार में लोक शब्द का प्रयोग प्रजा, जनता या आम लोगों के संदर्भ में किया जाता रहा है। प्राचीन भारतीय परंपरा में वेद के समानांतर लोक शब्द का काफी प्रयोग मिलता है। यहाँ लोक का प्रयोग सामान्यतः वेद से इतर या अन्य के संदर्भ में हुआ है।[1] वेद के बरक्स इसके प्रयोग का मतलब अभिजात्यता, शास्त्रीयता और पांडित्य के श्रेष्ठताबोध से इसके अलग होने से भी है। बाद में जब शहर गाँव का विभाजन भी ज्यादा स्पष्ट महत्वपूर्ण हो गया तो लोक के साथ एक किस्म के ग्रामीण या देशज होने का भाव भी जुड़ गया। इस प्रकार जब हम लोक कहते हैं तो यह नगरीय शास्त्रीयता एवं अभिजात्यता से अलग आम जन के सामूहिक भावबोध से उपजी देशज चेतना और उसकी परम्पराओं को अभिव्यक्त करता है। व्यापक अर्थों में लोक को प्रत्यक्ष जीवन के रूप में भी रेखांकित किया जाता है, क्योंकि जो जैसा है, उसे अपने कच्चेपन या अनगढ़पन के साथ वैसा ही देखना/जानना/जीना लोक होना है, जबकि इस अनगढ़पन को सुधारना, संवारना और परिष्कृत करना लोक से शास्त्र की ओर जाना है। अर्थात हम कह सकते हैं कि नगरीयता बनाम ग्रामीणता या आभिजात्यता बनाम गैर-आभिजात्यता के द्वैत से ही शास्त्र और लोक का यह द्वैत निर्मित होता है और यह अपनी-अपनी विशिष्टताओं के खाँचें में एक-दूसरे से स्वतंत्र दो भिन्न परिवेशों की दो भिन्न संगीत-परम्पराएं रचता है। लोक शास्त्र का यह विभाजन आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक आधार पर समाज के वर्गीय विभाजन का भी द्योतक है क्योंकि जैसा कि एंगेल्स की परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति से यह स्पष्ट होता है कि समाज के वर्गीय विभाजन के बिना कला-संगीत की दुनिया में भी श्रेष्ठता का कोई भावबोध नहीं जन्मा था।[2] इसीलिए आदिम समाजवाद की वर्गविहीन दुनिया में हमें कला और संगीत में भी कोई बंटवारा नहीं दिखता और यह बात हम कई आदिम जनजातीय समाजों में आज भी देख सकते हैं। दरअसल इस विभाजन की शुरुआत सभ्यता की तथाकथित विकास-यात्रा के साथ ही होती है और इसे कई परतों में मुकम्मल होते देखा जा सकता है। इसकी एक परत जहां शक्तिशाली सत्ताधारी वर्ग और कमजोर सत्ताहीन वर्ग के बीच के रसबोध एवं इस रसबोध से सृजित कला-संगीत की धारा को विभाजित करती है, तो प्रकृति से अलगाव की एक धारा नगरीय चेतना के साथ प्रकृति सामूहिकता की ग्रामीण परंपरा से दूर चली जाती है। इस ग्रामीण परंपरा में भी सत्ता और श्रेष्ठता के आधार पर वर्णों एवं जातियों के अलगाव लोक के ही अलग-अलग रूपों से हमारा परिचय कराते हैं। इस प्रकार निष्कर्षतः हम इस तथ्य तक पहुँचते हैं कि समाज की आर्थिक-राजनैतिक व्यवस्था में असमानता के जन्मते ही समाज के सांस्कृतिक दायरे में भी यह प्रतिबिंबित होती है और लोक बनाम शास्त्र के खांचों में बंटे कला-संगीत के ये विभाजन भी इस सामाजिक असमानता का ही सांस्कृतिक प्रतिबिम्बन है।   
असमानता पर आधारित दुनिया की कोई भी सामाजिक व्यवस्था अपनी आंतरिक संरचना में एक-दूसरे का विलोम रचती ऐसी अवधारणाओं/परंपराओं/प्रक्रियाओं (दो विरोधी बाइनरी जैसे स्त्री/पुरुष, ताकतवर/कमजोर)[3] को जन्म देती है, इसीलिए विभिन्न सभ्यताओं में शक्तिशाली एवं तथाकथित श्रेष्ठि वर्ग की अभिजात्य कला-संस्कृति के बरक्स आम जन की एक समृद्ध लोक परंपरा हमेशा ही मौजूद रही है। अभिजात्य बनाम लोक के इस विलोमार्थी द्विविभाजन को समाज के वर्गीय विभाजन से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन जब पूंजीवाद के साथ एक ताकतवर मध्य वर्ग उभरता है जिसकी अपनी विशिष्ट कला-संस्कृति भी है, तो हम पाते हैं कि दरअसल वर्ग के ताकतवर होने के साथ वर्गीय विशिष्टता का बोध और इसकी ज़रूरत किसी वर्ग की अपनी विशिष्ट कला-संस्कृति को जन्म देती है। उदाहरण के लिए राजनैतिक-आर्थिक ताकत हासिल करने के साथ सत्ताधारी वर्ग लोक-परंपरा से इतर अपनी नई पहचान खुद कोअभिजात्य परंपरा से जोड़ते हुए निर्मित करता है। इसी तरह पूंजीवादी बुर्जुआ क्रांति और उसके बाद आधुनिकता की पूरी परिघटना की अगुवाई करता हुआ मध्य वर्ग जब समाज की महत्वपूर्ण ताकत बनता है तो वह एक नई संस्कृति गढ़ता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि पूंजीवाद के पहले कोई मध्य वर्ग नहीं था। वर्गों के आधार पर समाज के विभाजन के साथ ही कम या ज्यादा रूप में एक मध्य वर्ग हमेशा रहा है। महत्वपूर्ण बात सिर्फ इतनी है कि पूंजीवाद के साथ यह मध्य वर्ग पहली बार ताकतवर और समाज का अग्रसर (लीडिंग फोर्स) बनता है। पूंजीवादी क्रांति के साथ (जो असल में एक मध्यवर्गीय क्रांति थी, क्योंकि इसकी आर्थिक-राजनैतिक ताकत पूंजीपति वर्ग के हाथों में होने के बावजूद इसकी सांस्कृतिक मशाल मध्य वर्ग के हाथों में थी) ताकतवर हुआ मध्य वर्ग लोक एवं शास्त्र दोनों से अलग अपनी एक नई लोकप्रिय संस्कृति (पॉपुलर कल्चर) को जन्म देता है। इस प्रकार समकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक जगत में लोक-संस्कृति, लोकप्रिय संस्कृति और आभिजात्य संस्कृति के ये तीन विभाजन हमारे सामने आते हैं, जिनकी एक-दूसरे से अलग कुछ अपनी ख़ासियतें हैं।

लोक, सामूहिकता और लोकप्रियता
लोक संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत उसकी सामूहिकता है। इसके अलावा जीवन की सामान्यता श्रम के साथ जुड़ाव उसे विशिष्ट बनाता है। अगर संगीत की ही बात करें तो लोक-संगीत के अनेक रूपों में से किसी में भी अमूमन अलग से कोई परफॉर्मर नहीं होता या अगर हुआ भी तो संगीत की अपनी इस प्रतिभा के चलते वह समाज के शेष लोगों से अलग एवं श्रेष्ठ नहीं मान लिया जाता, बल्कि यहाँ गायक/श्रोता की वैसी बाइनरी है ही नहीं और इसलिए सभी लोग साथ मिलकर परफॉर्म करते हैं। लोक की कई संगीत परंपराएं ऐसी हैं जिसमें गायक तो हैं, लेकिन कोई श्रोता नहीं है[4] जैसे कि खेती से जुड़े गीत-संगीत, विवाह गीत या रुदन गीत आदि। यहाँ इस बात को समझना महत्वपूर्ण है कि दरअसल किसी श्रोता का होना ही गायक या गायकी की एक सत्ता निर्मित करता है। इस सत्ता से गायक श्रोता की एक बाइनरी (विरोधी युग्म) बनती है और इस बाइनरी में श्रोता का रसबोध गायक/गायकी को श्रेष्ठता (एक्सिलेंस) की राह पर ले जाता है। लोक इसीलिए लोक है क्योंकि यहाँ श्रेष्ठता की यह चाह है ही नहीं।[5] कला-संगीत का मुख्य ध्येय मनोरंजन है और यहाँ सभी खुद अपने लिए ही (स्वांतः सुखाय) कला का प्रदर्शन करते हैं। श्रेष्ठता की चाह एक गैर-समतामूलक समाज का आदर्श है क्योंकि श्रेष्ठता हमेशा किसी किसी के बरक्स ही मुमकिन है, जबकि मोटे तौर पर लोक समाज की विशिष्टता (जातिगत विभाजनों के बावजूद) श्रेष्ठता के बजाय सामूहिकता को तवज्जो देती है। दूसरी तरफ जिसे हम पारंपरिक रूप से संस्कृति कहते/मानते रहे हैं; वह असल में अभिजात्य संस्कृति ही है, क्योंकि अपनी मूल अवधारणा में ही संस्कृति का तात्पर्य लगातार संशोधन और परिष्कार के जरिए उच्चता एवं श्रेष्ठता की अवस्था तक पहुंचना है। इसलिए अभिजात्य संस्कृति की शास्त्रीयता दूसरे शब्दों में लोक का ही परिष्करण है, जो समाज के वर्गीय विभाजन के साथ खुद के लोक से अलग होने की प्रक्रिया के बतौर जन्मती है और इस तरह लगातार संस्कारित एवं परिष्कृत होती संस्कृति (अभिजात्य) के मुक़ाबले लोक-संस्कृति दोयम बना दी जाती है, जबकि संस्कृति (अभिजात्य) की निर्मिति और उसके परिभाषित होने के बहुत पहले आदिम मानव-समाज के साथ ही लोक संस्कृति की एक गतिशील एवं समृद्ध परंपरा रही है। इन सबके बीच लोक शास्त्र की इस द्वैतता से अलग और पूंजीवाद के सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में बाज़ार और मध्यवर्ग की आपसी अंतर्क्रिया से जन्मी लोकप्रिय संस्कृति की एक नई परिघटना भी है, जो अपनी मध्यवर्गीय चेतना और मुनाफे पर टिकी पूंजीवाद की मूल प्रवृत्ति के साथ मिलकर लोकप्रियता ही श्रेष्ठता है का एक नया आदर्श रचती है। चूंकि यह पूंजीवाद का ही सांस्कृतिक हथियार है, इसलिए पूंजीवाद की विश्व-विजय के साथ ही हम इसे भी एक ग्लोबल स्वरूप अख़्तियार करते हुए देखते हैं।[6] यहाँ इस बात को समझना ज़रूरी है कि जहां लोक-संस्कृति मूलतः लौकिक जगत का मसला है और अभिजात्य संस्कृति की शास्त्रीयता अपनी प्रक्रिया और अपने रस-आस्वादन, दोनों में ही एक किस्म की पारलौकिकता (ट्रांस अवर सराउंडिंग वर्ल्ड) से जुड़ती है, वहीं इन दोनों के विपरीत लोकप्रिय संस्कृति अपने मध्यवर्गीय ढुलमुलपन के मुताबिक ही अपना छद्म यथार्थ रचती है, जहां होने से ज्यादा महत्वपूर्ण दिखना है और इस दिखने की लोकप्रियता ही सफलता का मानक है। यही कारण है कि यहाँ प्रतीकों की राजनीति महत्वपूर्ण हो जाती है और हम देखते हैं कि लोकप्रिय संस्कृति अपने बहुविध प्रतीक/नायक (आइकन) गढ़ती है। इन प्रतीकों की व्यापक दायरे में पहुँच बनाने के लिए उसे जनमाध्यमों की ज़रूरत होती है, इसीलिए लोकप्रिय संस्कृति की एक अनिवार्य शर्त जनमाध्यमों का होना है। ये प्रतीक अपनी मूल अंतर्वस्तु के बजाय अपने वाह्य आवरण के छद्म से एक पूरी जीवन-शैली रचते हैं, जो बाज़ार-अर्थव्यवस्था की ज़रूरत से उपजती है और खुद को बचाए रखने के लिए इसे अपने प्रतीकों को लगातार बदलते रहना पड़ता है ताकि एक किस्म का बदलाव या बदलाव का भ्रम बना रहे।  

पॉपुलर कल्चर का नया लोक: लोक का बाज़ार बनाम बाज़ार की लोकप्रियता  
अब अगर लोक, लोकप्रिय और अभिजात्य संस्कृति को उनके वर्गीय चरित्र के साथ समझते हुए हम अपने उस शुरुआती सवाल पर फिर से आएं कि 21वीं सदी में अचानक से लोक के लोकप्रिय संस्कृति की चकाचौंध का हिस्सा होते जाने की आखिर क्या वजह है? तो इसका जवाब हमें कला-संस्कृति की वर्ग-चेतना से संबंधित उपरोक्त विश्लेषण के आईने में ही मिलता है। दरअसल यहाँ इस बात को समझना ज़रूरी है कि लोक और शास्त्र अपनी निश्चित वर्ग-चेतना के चलते दो स्वतंत्र श्रेणियाँ हैं, जबकि मध्यवर्ग एक परिवर्तनशील श्रेणी है और यह परिवर्तनशीलता ही लोकप्रिय संस्कृति का आधार है। एक स्वतंत्र वर्ग होने के नाते जिस तरह मध्यवर्ग की राजनैतिक भूमिका दो आधारभूत वर्गों के बीच हमेशा (परिस्थितियों/ज़रूरतों के मुताबिक) अपना पक्ष या विपक्ष तय करने की रही, वैसे ही लोकप्रिय संस्कृति ने भी लोक शास्त्र के कला-रूपों में ही कुछ हेर-फेर करके या उन्हें आपस में मिलाकर पेश किया बजाय कि कुछ नया रचने के। यही कारण है कि लोकप्रिय संस्कृति के एक बड़े हिस्से में फ़्यूजन की भरमार है। लोक अभिजात्य संस्कृति के विपरीत, लोकप्रिय संस्कृति के पास अपना कुछ भी मौलिक होने के कारण ही उसे लगातार नयेपन की ज़रूरत होती है और इस नयेपन के लिए वह लगातार नए-नए प्रयोग करती है। नए-नए प्रतीकों को गढ़ना, पुरानी छवियों और बने-बनाए ढर्रों को तोड़ना, तो कभी परम्पराओं की पुनर्खोज करना, अपनी प्रासंगिकता लोकप्रियता को बनाए रखने के लिए लोकप्रिय-संस्कृति द्वारा समय-समय पर पैदा किए जाने वाले तात्कालिक जुनून ही हैं। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि जहां लोक-संस्कृति का मक़सद मूलतः अपने सामुदायिकता-बोध का सांस्कृतिक अभ्यास है, अभिजात्य संस्कृति का मक़सद (खुद और अपने ऑडियंस के साथ) यथार्थ से परे कलात्मक श्रेष्ठता की परम अवस्था तक जाकर एक तरह से मुक्ति के श्रेष्ठताबोध को जीना है, वहीं लोकप्रिय संस्कृति का मक़सद एक खास तरह की उपभोक्तावादी जीवन-शैली को बढ़ावा देना है। चूंकि लोकप्रियता ही लोकप्रिय संस्कृति का आधारभूत मानक है और यह लोकप्रियता जनमाध्यमों द्वारा विशाल स्तर पर निर्मित लोकप्रियता है, जिसमें चीजों को पसंद करने से आगे उन्हें अपनाना ज्यादा महत्वपूर्ण है और इस अपनाने में खरीदने का भाव अंतर्निहित है, इसीलिए लोकप्रिय संस्कृति को लगातार कुछ नया करते रहना पड़ता है ताकि लोगों के पास विकल्पों की एक लंबी शृंखला हो और उनमें लोकप्रियता का जुनून और खरीदने की ललक बनी रहे। इसके लिए उसे किसी भी किस्म के निश्चित मूल्यबोधों एवं पूर्वाग्रहों का अतिक्रमण करने के लिए हमेशा तैयार रहना होता है, क्योंकि लोकप्रिय संस्कृति का ध्येय वाक्य ही है कि जिसे भी लोकप्रिय बनाकर बेचा जा सकता है, वह ग्राह्य है
21वीं सदी में लोक संस्कृति के कई रूपों को लोकप्रिय संस्कृति द्वारा अपनाए जाने की प्रक्रिया को इसी परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है। इसकी ठोस भौतिक वजहें हैं, क्योंकि अभिजात्य संस्कृति की शास्त्रीयता को सुगम शास्त्रीय बनाकर और फिर इस सुगमता के अंतर्गत तमाम प्रयोगों के बाद, (और लंबे समय तक लोक-संस्कृति को अपने से हीन पिछड़ा समझते रहने के बाद) पूंजीवाद और लोकप्रिय संस्कृति को आज लोक-संस्कृति में एक नए बाज़ार की गुंजाइश दिख रही है। वैसे भी उत्तर-पूंजीवाद के इस दौर में शहर और मध्यवर्ग अब अपनी उपयोगिता के उच्चतम शिखर तक पहुँच चुके हैं और इसलिए गाँव-कस्बों के निम्न निम्न-मध्य वर्ग ही बाज़ार के लिए उम्मीद की नई रोशनी हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि गाँव-कस्बों का यह वर्ग लोक और लोक-संस्कृति की चेतना में रचा-बसा हुआ, लोक-जगत का असली नुमाइंदा है, लेकिन यह ज़रूर है कि भाषा-संस्कृति एवं परंपराओं के जरिए अपने सांस्कृतिक मूल में लोक के साथ आज भी इसका एक गहरा नाता है। इसीलिए जब भोजपुरी या छतीसगढ़ी भाषा-समाज का कोई लोक-गीत सिनेमा जैसे पॉपुलर माध्यम के जरिए उस समाज में वापस आता है तो अपनी तमाम कमियों-कमजोरियों के बावजूद बड़े पैमाने पर पसंद किया जाता है। इस लिहाज से इन जगहों और इन वर्गों तक पहुँचना वर्तमान पूंजीवाद की ज़रूरत भी है और मजबूरी भी। वैसे भी साम्राज्यवाद का नया चरण अब राजनैतिक की जगह सांस्कृतिक ज्यादा है, ऐसे में उत्तर-औद्योगिक समाज के इस दौर में मध्यवर्गीय चेतना और लोकप्रिय संस्कृति का विस्तार दरअसल पूंजीवाद का ही विस्तार है।[7] विस्तार की इस ज़रूरत के चलते ही आज बाज़ार और लोकप्रिय संस्कृति के लिए गाँव और कस्बों के उन निम्न निम्न-मध्यवर्गीय लोगों के बीच पहुँचना महत्वपूर्ण है, जो अब तक इस प्रक्रिया से अछूते रहे हैं और इसके लिए उनकी भाषा-संस्कृति-कला से जुड़ना और एक स्तर पर उसे मान्यता देना आधारभूत शर्त है। 21वीं सदी में हम अपने आसपास विस्तृत फ़लक पर इस प्रक्रिया को घटित होते हुए देखते हैं। इस प्रक्रिया के तहत ही अचानक से लोक पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण बन जाता है। एमटीवी से लेकर कोक स्टूडियो तक विभिन्न राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पहलों और वैश्विक स्तर पर लोक-संस्कृतियों से जुड़े विविध महोत्सवों, आयोजनों के जरिए दुनिया भर में विभिन्न संस्कृतियों के लोक कलाकार अपने स्थानीय संदर्भों से कटकर सीधे एक ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर जाते हैं। इससे एक तरफ तो लोकप्रिय संस्कृति के भीतर लोक का नया बाज़ार तैयार होता है और दूसरी तरफ पारंपरिक ग्रामीण-समाज में भी लोकप्रिय संस्कृति के इस नए लोक के जरिए बाज़ार लोकप्रिय-संस्कृति के प्रवेश और इससे होते हुए एक खास तरह की उपभोक्तावादी जीवन-शैली के फैलाव की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
यद्यपि आज हम इस प्रक्रिया को बड़े पैमाने पर घटित होते हुए देखते हैं, लेकिन असल में इसकी शुरुआत एक जनमाध्यम के बतौर रेडियो के आने के साथ हुई थी, जब लोकप्रिय संस्कृति के ध्वजवाहक रेडियो ने लोक कलाकारों के कार्यक्रमों के प्रसारण की शुरूआत की। इन कार्यक्रमों के चलते ही पहली बार लोक कलाकार; लोक-समाज के सामुदायिक जीवनबोध से अलग हुए और मुख्यधारा समाज की तरह कला एवं कलाकार की स्वतंत्र सत्ता-संरचना का हिस्सा होने लगे क्योंकि अब उनके पास भी ऑडियंस थी और इसलिए उन्हें भी परफॉर्म करना था। इस तरह रेडियो ने पहली बार लोक-संस्कृति को लोकप्रिय संस्कृति से जोड़ा और फिर इसके जरिए लोकप्रिय संस्कृति को लोक-समाज का हिस्सा बनाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। इससे लोकप्रिय संस्कृति को तो रेडियो की पहुँच वाले सुदूर इलाकों तक अपनी जड़े जमाने का मौका मिला ही, लोक-संगीत और लोक-नाट्य जैसे लोक के कई कला रूपों एवं उनके कलाकारों को भी लोकप्रियता मिली। बहुत से लोक कलाकारों को व्यक्तिगत स्तर पर यद्यपि इससे काफी लाभ हुआ, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में लोक-संस्कृति अपनी मूल चेतना खोकर महज लोकप्रिय संस्कृति का ही एक प्रकार होकर रह गई। चूंकि लोकप्रियता; लोकप्रिय संस्कृति का आधार है और यह जनसंचार माध्यमों की निर्मिति है, जबकि लोक संस्कृति का आधार सामुदायिकता है जो समूह-संचार माध्यमों से निर्मित होती है, इस लिहाज से माध्यम की सत्ता और उसके महत्व को स्थापित करता मार्शल मैक्लुहान का सिद्धांत माध्यम ही संदेश है[8] को भी यहाँ लागू होते देखा जा सकता है, क्योंकि लोकप्रिय संस्कृति के एक माध्यम (रेडियो) के चलते यहाँ लोक-संस्कृति का पूरा संदेश (कंटेंट) ही बदल गया। इसलिए वह लोक-संस्कृति; जिसमें अभी तक कलाकार और दर्शक/श्रोता का कोई विभेद नहीं था, कलात्मक श्रेष्ठता की कोई चाह नहीं थी, परफॉर्मेंस में सामूहिकता थी और कला का जीवन श्रम के साथ एक जुड़ाव था, अब नए माध्यम के साथ सिर्फ एक कला-रूप (आर्ट फॉर्म) के बतौर ही सीमित हो गई। नतीजतन, लोक-कलाकार अब लोक के कलाकार नहीं रहे, बल्कि अब वे लोक के प्रतिनिधि कलाकार हो गए और इन प्रतिनिधि कलाकारों की लोकप्रियता का पैमाना इस कला-रूप को बेहद कुशलता से पेश कर सकने की उनकी क्षमता पर निर्भर हो गया। हालांकि तत्कालीन समय, परिस्थितियाँ और एक जनमाध्यम के बतौर रेडियो की सीमाओं उसके स्थानीय चरित्र के चलते तब यह प्रक्रिया इतने व्यापक स्तर पर घटित नहीं हुई लेकिन आज जनसंचार के अनेक प्रभावशाली माध्यमों के साथ इसने अपना दायरा बड़ा कर लिया है। लोकप्रिय संस्कृति का वर्तमान स्वरूप भी आज पुराने रेडियो के जमाने से कहीं ज्यादा विस्तृत एवं गहरा है और इस संदर्भ में पूंजीवाद के लिए नए बाज़ारों की ज़रूरत भी ज्यादा स्पष्ट है। रेडियो के जरिए लोक कलाकारों के स्थानीय स्तर पर लोकप्रिय होने की जो शुरुआत हुई थी और इसने लोक-कलाकारों लोक-समाज के बीच जिस शुरुआती सत्ता-संरचना को जन्म दिया था, उसने नए जनमाध्यमों के साथ लोकप्रियता के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं और इस तरह लोकप्रियता (सत्ता-संरचना) के पैमाने पर लोक-संस्कृति का मुख्यधारीकरण (मेन-स्ट्रीमिंग) हुआ है।

निष्कर्ष
आज लोकप्रिय-संस्कृति के किसी भी अन्य कला-रूप के मुक़ाबले लोक का दर्जा कहीं से भी कम नहीं है। हर हनी सिंह के साथ एक मालिनी अवस्थी और हर मीशा शफ़ी के साथ एक अलम लोहार समकालीन लोकप्रिय-संस्कृति के प्रतिनिधि चेहरे हैं। इसके साथ ही शारदा सिन्हा और छन्नू लाल मिश्र जैसे लोक के अभिजात्य प्रतीक भी इसी लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा हैं। लेकिन इन सबके बीच जो लोक का असली लोकपन था, वह कहीं गायब हो चुका है। हम चाहें तो इससे माध्यम के ताकतवर होने संबंधी मैक्लुहान के सिद्धांत की पुष्टि कर सकते हैं, लेकिन इसका कोई अर्थ नहीं है। अर्थ इस बात का है कि अपनी मूल सामुदायिक चेतना से कटा हुआ जो लोक आज हमारे सामने है, वह दरअसल लोक है ही नहीं, क्योंकि वर्तमान संदर्भों में जो लोकप्रिय है, वह मूलतः लोक नहीं हो सकता और जो वास्तविक अर्थों में अपने लोकपन के साथ लोक होगा, वह लोगों द्वारा बहुतायत से पसंद किए जाने के बावजूद रूढ़ अर्थों में लोकप्रिय नहीं होगा। निश्चित रूप से लोक और लोकप्रियता के इस आधारभूत अंतर्विरोध की बाइनरी में हम लोकप्रिय संस्कृति द्वारा इस लोकपन को बचाए जाने की उम्मीद नहीं कर सकते क्योंकि इस लोकपन को बचाना सामुदायिकता के उस बोध को बचाना है जिसका पूंजीवाद के निजीपन से स्पष्ट विरोध है। लिहाजा, लोक का मर्सिया गाते हुए यह समझना कि लोकप्रिय संस्कृति के संचार माध्यमों के जरिए एक स्तर पर तो लोक को बचाया जा रहा है, एक ऐसी झूठी उम्मीद है, जिसका जल्द से जल्द टूटना बेहतर है, क्योंकि किसी उम्मीद का होना भी कई बार एक नई पहल की शुरुआत होती है।    
संदर्भ 
[1]. परांजपे, जया (2002). लोक : इतिहास पुराण मिथक. (सं. पीयूष दईया) पृ. 415.
[2]. एंगेल्स, फ़्रेडरिक. परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति
[3]. फूकोवियन संदर्भ में
[4]. कोमल कोठारी से उदय प्रकाश की बातचीत. हमारा समय और लोक. (सं पीयूष दईया). पृ. 470.
[5]. वही,
[6]. Mcrobbie, Angela (1994). Post-modernism and Popular Culture. p-18.
[7]. अडोर्नो, थियोडोर (2006). संस्कृति उद्योग. पृ. 131.
[8]. Mcluhan, Marshall (1964). Understanding Media: The extensions of Man. P-7