श्रीमद्भगवद्गीता का कर्मयोग: एक व्याख्या

आदित्य आंगिरस


श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय में अर्जुन ने कृष्ण से एक प्रश्न किया कि:
"स्थितप्रज्ञ्यस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधी: किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥

स्थिर मति की पहचान क्या है? अर्जुन का यह प्रश्न वर्तमान में भी उतना ही सार्थक है जितना महाभारत के युद्धक्षेत्र में अर्जुन के लिये था। इसका संभवत: कारण यह भी हो सकता है कि जहां अर्जुन के मन में युद्ध-पूर्व व्यामोह घर कर गया था वहीं दूसरी ओर, केशव के वचन सुन कर अर्जुन के मन एक श्रेष्ठतर जीवन दृष्टि के प्रति जिज्ञासा का उदय स्पष्ट देखा जा सकता है जो मनुष्य जीवन को श्रेष्ठता के मार्ग पर अग्रसर करता है जो मनुष्य जीवन को जीने योग्य बना सकने में समर्थ है अथवा जीवन को श्रेयस के मार्ग पर अग्रसर करने क क्या तरीका है। यह प्रश्न आज के भौतिकतावादी युग में प्रत्येक मनुष्य के सामने मुह बाये खड़ा है कि कर्म सिद्धान्त के माध्यम से मनुष्य श्रेष्ठता के मार्ग पर अग्रसर कैसे हो, शान्त हो कर कैसे जीवन यापन करे विशेषकर समसामयिक संदर्भों मे जब मनुष्य का ध्यान केवल और केवल धन, वैभव और भौतिक विलास के साधनों पर ही केन्द्रित हो। ऐसी अवस्था में क्या वह वास्तविक शान्ति, प्रसन्नता एवं उस दिव्य सुख का अनुभव कर सकता है जिसके विषय में वह इच्छा करता है।

इन्हीं संदभों में श्रीमद्भगवद्गीता के विषय में कुछ कहने से पूर्व उपरोक्त प्रश्न के संदर्भ में मेरा ध्यान बरबस ही कठोपनिषद में वर्णित यम-नचिकेता के परस्पर संवाद की ओर खिंचता है जहां यम नचिकेता को यह स्पष्ट रूप से बताते हैं कि वित्त से मनुष्य की तॄप्ति नही हो सकती है अर्थात् "नहि वित्तेन तर्पणीयो मनुष्या:"। पर नचिकेता जिस वास्तविक एवं महत्त्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर तलाशने के लिये यमलोक जाते हैं वह अन्तिम प्रश्न है वह मनुष्य जीवन का वास्तविक एवं अन्तिम श्रेष्ठतम प्रश्न है कि "मैं कौन हूं"।  नचिकेता के इस तीसरे प्रश्न का उद्धरण  प्रकारान्तर से हमें समस्त वैदिक एवं औपनिषदिक साहित्य में भी मिलता है कि "अपने को जानो" अर्थात् "आत्मानम् विद्धि"। अपने जीवन के उस अन्तर्तम तत्त्व को जानो जो सत्य,चैतन्य एवं इस सृष्टि का अविनाशी तत्त्व है।

वस्तुत: जीवन के प्रति आस्था होने के कारण जो कुछ भी आत्म को प्राप्त करने का प्रयत्न किया गया है वही कर्म मनुष्य के श्रेयस्कर है और वही कर्म वास्तविक कर्म है और वही कर्मयोगी को जीवन के श्रेष्ठ मार्ग परअग्रसर करता उस की मुक्ति का कारण बनता है। समस्त वैदिक एवं औपनिषदिक साहित्य भी केवल इसी तथ्य पर बल देता है। अत: धन सम्पत्ति वैभव का मार्ग श्रेयस्कर नहीं है अपितु आत्मचिन्तन आत्ममनन का मार्ग ही मनुष्य केलिये श्रेयस् के मार्ग को  प्रतिपादित करता है। यद्यपि यहां यह प्रष्त करना अनिवार्यता बन जाती है कि हमारा समस्त वैदिक और औपनिषदिक साहित्य सम्पदा एकत्रित करने के विरुद्ध नहीं है। मुण्ड्कोपनिषत् मे एक रस से परिपूर्ण वाक्य आता है जो इस प्रकार है “शान्तम् शिवमद्वैतम् चतुर्थम् मन्यनते सा आत्मा स विज्ञेय:॥“ अर्थात यदि जीवन का वास्तविक आनन्द चाहिये तो मनुष्य को स्वयं को जानने का प्रयास करना चाहिये, उस चैतन्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये जिसकी प्राप्ति के बाद मनुष्य जीवन में प्राप्ति के लिये कुछ भी शेष नहीं रह जाता है। यह बात तो निश्चित है कि वर्तमान समय में प्रत्येक मनुष्य का ध्यान ऐश्वर्य एवं सुख के समस्त साधनों की तरफ़ है जो उसका हित साधन नहीं कर सकते है और यह बात भी बिल्कुन निश्चित है कि जब तक मनुष्य का ध्यान बाह्य वस्तुओं तक ही केन्द्रित रहेगा तब तक वह निश्चिन्त एवं सुखी नहीं रह सकेगा क्योंकि बाह्य जागतिक पदार्थ मनुष्य को उसके स्व में स्थित होने नहीं देते जिसके परिणाम स्वरूप वह को स्वस्थ (स्वस्मिन् स्थित: वाली स्थिति) नहीं हो पाता है।

मनुष्य की इस स्थिति का वर्णन, औपनिषदिक वृत्तान्तों के अनुसार, नारद मुनि शोकमग्न हो कर कुछ इस प्रकार करते हैं कि वे संगीतादि विषयों के विशारद हैं परन्तु वे आत्मवित् नहीं हैं अर्थात वे अपने स्व को नहीं जानते हैं। नारद की यह पीडा का यह उद्धरण आज के युग के सभी मनुष्यों की पीडा के विषय में बात करता है जो आत्मतत्त्व को प्राप्त कर शान्ति को पाना चाहते हैं पर उनके ध्यान का केन्द्रबिन्दु बाह्य पदार्थों में अवस्थित है। श्रीमद्भगवद्गीता इन्हीं संदर्भों मे अपना विचार स्पष्ट करती हुई चलती है कि "इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाभसि॥" गीता २.६७॥ अर्थात् इन्द्रियों के मार्ग पर चलता हुआ मनुष्य को जिस विषय का भी ध्यान आता है वह कामी मनुष्य उस विषय को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है और वह भी सत् एवं असत् विषय का विचार किये बिना ही व्यवहार करता है और उसकी बुद्धि कुण्ठित हो जाती है और यही कार्य सिद्धन्त मनुष्य के दुख का हेतु बनता है। कालिदास ने मेघदूतम् में जब “कामार्ता हि प्रकृति कृपणा चेतनाचेतनेषु” कहा तो उसका संदर्भ भी इन्हीं अर्थों में माना जा सकता है।

वस्तुत: आर्ष मनीषा का यही अनुभूत सत्य है और इसी कारण सत् एवं असत् विषय के बारे में विवेक करने का पक्षपाती रहा है। क्योंकिभारतीय लौकिक संस्कृत साहित्य भी इसी बात को प्रतिपादित करता है कि "आपदा कथित: पन्था: इन्द्रियाणामस्यम:"। परन्तु कारणवश हम सभी इस बात को स्वीकार करके भी हम समझ नहीं पाते कि जहां हमारी रुचि होनी चाहिये उस ओर हमारा ध्यान जाता नहीं और जो जीवन का वास्तविक अभिप्रेत है उस ओर हमारी रुचि बनती नहीं । अत: जहां एक ओर दुख निश्चित है वहीं यह भी निश्चित है मनुष्य को विवेकज ज्ञान के प्रयोग के कारण वस्तु के सत् एवं असत् स्वरूप पता चलता है। महाभारत में दुर्योधन का वचन/उद्घोषणा/स्वीकारोक्ति इन्हीं संदर्भों में द्रष्टव्य है जब वह कहता है कि वह धर्म और अधर्म के मार्ग को जानता है पर उसकी धर्म में न तो प्रवृत्ति है और न ही अधर्म से निवृति " जानामि धर्मम् न मे प्रवृत्ति,जानामि अधर्मम् न च में निवृत्ति"। अर्थात् अपने स्वभाव गत दोष के कारण मनुष्य अधर्म में प्रवृत्तहोता है।

यहां श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित कर्मयोग के विषय में बात करने से पूर्व अर्जुन की मन:स्थिति को भी देखना एक आवश्यकता बन जाती है। विशेषकर जब अर्जुन श्री कृष्ण को दोनों सेनाओं के मध्य में रध ले जाने को कहता है और अर्जुन कौरव सेना को देखते हुए विभिन्न तर्क देता हुआ युद्ध करने से इन्कार का संकेत  देता है कि "न च श्रेयो अनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे। न काड्क्षे विजयम् कृष्ण न च राज्यंसुखानि च"  (1.31)। इसके अनन्तर यदि द्वितीय अध्याय को हम ध्यान से देखे तो द्वितीय अध्याय के चतुर्थ, पंचम, शष्ठ. सप्तम एवं अष्टम श्लोक अर्जुन के मानसिक सन्ताप एवं उद्वेलन का द्योतक है और इसके पश्चात नवम श्लोक में अर्जुन स्पष्ट रूप से इन्कार कर देता है कि "एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेश: परन्तप:। न योत्स्य इति गोविन्दं उक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥" कि हे कृष्ण! मै युद्ध नहीं करूंगा। यहाँ यदि यदि हम अर्जुन की स्थिति को ध्यान से देखें तो उसके शोक का मुख्य कारण दुर्योधन, पितामह, गुरु आदि श्रेष्ठ जनों का अधर्म पालन का है एवं साथ ही यह भी कहना समीचीन होगा कि स्वयं अर्जुन का पितामह, गुरुजन एवं स्त्रीजाति के प्रति आदर की भी अभिव्यक्ति है।

यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कहां युद्धक्षेत्र और कहां राज्यत्याग की भावना और शोकसंविग्न मनस् तत्त्व। दोनों मे परस्पर कोई भी तारतम्य नहीं बैठता है। साधारण बुद्धि मनुष्य भी यदि युद्ध क्षेत्र में होगा तो वह भी भावनात्मकता की अपेक्षा युद्ध को अधिक महत्त्व देगा जिसके लिये वह युद्ध क्षेत्र में आया है। अत: अर्जुन के चित्त मे चल रहे परस्पर विरोधी विचारों को श्रीकॄष्ण चित्त की कश्मल वृत्ति मानते  हुए अर्जुन को "नानुशोचन्ति पण्डिता:" कह कर कृष्ण अपनी बात कहना प्रारंभ करते हैं। अपनी इसी बात को अधिक रूप से स्पष्ट करते हुए श्री कृष्ण अर्जुन के हृदयस्थ भाव को नपुंसकता मानते हुए कहते है कि "क्लैव्यं मा स्म पार्थगम: पार्थ नैतत्त्युपपद्यते। क्षुद्र हृदयदौर्बल्य त्यक्तोतिष्ठ परन्तप॥2.31॥" यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक बन जाता है कि अर्जुन युद्ध क्षेत्र में युद्ध के लिये आया है और कृष्ण उसके मनोभावों को भली प्रकार से समझते हुए बताते है कि युद्ध क्षेत्र में पराक्रम एवं युद्ध कौशल का अर्जुन को परिचय देना चाहिये न कि इसके विपरीत भावों का। इसी बात को हम स्थान गत, समय गत एवं भाव गत तार्किकता से इस प्रकार समझ सकते हैं कि उचित समय पर समयानुकूल कर्म करना कर्मयोग का पहला लक्षण है। प्रेम का प्रतिदान प्रेम ही हो सकता है एवं वीरता के स्थान पर यदि मनुष्य प्रेम अथवा आत्मोत्सर्ग  का प्रेम अथवा भय अथवा किसी भी अन्य भाव का परिचय देता है वह न तो भावौचित्य के रूप में माना जा सकता है और न ही श्रेष्ठ आचरण के रूप में। वर्तमान में मनुष्य जाति यद्यपि इस तथ्य को जानती है परन्तु उसे अपने आचरण में लाना मनुष्य जाति के लिये कुछ कठिन कार्य सिद्ध होता है क्योंकि हम सभी के व्यवहार में निर्मलता नहीं है। हम  जानते हुए भी इस तथ्य की जान भूझ जर उपेक्षा करते है।

 इसी बात को यदि अन्य संदर्भों मे बताना हो तो हम यह कह सकाते हैं कि श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के मध्य संवाद को ध्यान से देखें तो अर्जुन युद्ध क्षेत्र में खडा हुआ है और शोक संतप्त हो कर अपने सगे संबंधियों से युद्ध करने के लिये अग्रसर नहीं है- "विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस:" (१.४७)। अर्जुन मानसिक रूप से पूर्णतया अस्वस्थ है और  श्री कृष्ण द्वारा प्रदत्त उपदेश की वास्तविक भूमि वस्तुत: यहीं से शुरु होती है क्योंकि अर्जुन यहां शोकमग्न हो कर युद्ध करने से मना कर रहा है कि राज्य जाये तो जाये  परन्तु मेरे सगे संबन्धी, गुरुजन और पितामह आदि जीवित तो रहेंगे। यह तो स्पष्ट है कि अर्जुन यद्यपि श्रीकृष्ण का सखा है और वह युद्धक्षेत्र में अपने उस परम मित्र के साथ खडा है जो उसका प्रकारान्तर से गुरु है, मनोचिकित्स॒क है और पूर्ण रूपेण नीतिज्ञ है। ऐसे में  शोकग्रस्त अर्जुन ने अपने को स्वयं उस गुरु को संपूर्ण रूपेण आत्म समर्पित किया है जो उसका हित साधक के रूप में उसका हमेशा साथ देता रहा है। यहाँ उस आत्मसमर्पण की बात करनी भी उचित ही होगी कि अर्जुन का वह आत्मसमर्पण कैसा है। इसको संजय द्वारा गीताके द्वितीयाध्याय में भली भान्ति विवेचित करते हुए कहते हैं कि "कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: पृछामि त्वां धर्म सम्मूढचेता:। यच्छृय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥"

अर्थात अर्जुन अपने स्वभाव के विषय में जो दोष विद्यमान है, उसको अपने सामने रख कर धर्म के विषय में पूछता है कि युद्ध क्षेत्र में उसका वास्तविक धर्म क्या है?यहां यह कहना उचित होगा कि अर्जुन का धर्म से तात्पर्य परिस्थितिजन्य अपेक्षित कर्म से है। अत: धर्म शब्द की संदर्भगत व्याख्या इन्हीं अर्थों मे संभावित है और इसके अनन्तर अर्जुन श्रीकृष्ण को वे कहते हैं कि मैं शिष्य रूप में आप से शिक्षा लेने आया हूं। यहां मूल प्रश्न यह उठता है कि अर्जुन के समर्पण कैसा है। अर्जुन स्वयं कहते हैं कि हे कृष्ण, जिससे मेरे स्वभावगत दोष का शमन हो सके वह निश्चित हो कर बताये क्यों कि मैं आप का शिष्य हूं (और मैं निश्चित रूप से वही करूंगा)। यहां यह कहना एक आवश्यकता बन जाती है कि जैसा संपूर्ण रूपेण आत्मसमर्पण अर्जुन ने कृष्ण के प्रति किया वैसा समर्पण करने का साहस समसामयिक मनुष्य में कहां है? ऐसा समर्पण, जो वर्तमान समय में प्रत्येक जीव के लिये निश्चित रूप से  श्रेयस् का मार्ग प्रतिपादित कर सके। वर्तमान समय का मनुष्य अपने वास्तविक आत्मबल में कमी होने के कारण असत्य को सत्य मान कर व्यवहार करता है जो कि उसके दुख का वर्धन में सहायता करता है और उसके लिये श्रेयस का मार्ग भी प्रतिपादित नहीं करता। इस बात को जानते हुए भी समसामयिक मनुष्य गुरु के प्रति संपूर्ण रूपेण आत्मसमर्पण करने से न केवल हिचकिचाता है और वहीं दूसरी ओर, मै यह भी कहना चाहता हूं, कि गुरु का ध्यान केवल और केवल अर्थ प्राप्ति तक सीमित है। जबकि सद्गुरु का प्रथम कर्तव्य है कि वह अपने शिष्य की पीडा को समझे और तत्पश्चात  उसे आत्मसाक्षात्कार के मार्ग पर प्रवृत्त करे जो उसके समस्त रूप से निश्रेयस् को प्राप्त करने में सहायक सिद्ध हो। व्यक्ति यदि जीवित है तो जीवन की संभावनाएं अनन्त है और सद्गुरु का प्रथम कर्तव्य है कि वह उन्हीं संभावनाओं की तलाश करे जो उसके शिष्य को कल्याणकारी मार्ग पर अग्रसर करते हों। अपने शिष्य को उन्हीं संभावनाओं के पथ पर अग्रगामी बनाना श्रेष्ठ गुरु का लक्षण, गुण एवम् कर्तव्य  है। वर्तमान के संदर्भ में न तो ऐसा शिष्य मिलना संभव है जो समग्र रूपेण गुरु को अपन सर्वस्व आत्मसमर्पण कर सके और न ही ऐसा गुरु जो निश्छल रूप से शिष्य पर अपना सर्वस्व लुटा दे। ऐसे मे वह स्थिति जीवन में कभी नहीं आती जहां दोनो के मध्य वास्तविक संवाद स्थापित हो सके जिसके माध्यम से शिष्य अपनी पीडा के विषय में गुरु को बता सके और गुरु उस कीबात को समझ कर उसकी पीडा का निदान निकाल सके जैसा श्रीकृष्ण ने अर्जुन के लिये निकाला है। यहां यह कहना एक आवश्यकता बन जाती है कि श्रीकृष्ण के उपदेश देने के बाद अर्जुन ने जब युद्ध किया तो वह शोकाकुल नहीं था अपितु अर्जुन के मन का द्विधा भाव नष्ट हो गया है और वह मानसिक रूप से स्वस्थ होकर लडता है जिस में वह विजित होता है।

इन्ही संदर्भॊं में अर्जुन के मूल प्रश्न का उत्तर देना यहां एक अनिवार्यता बन जाती है कि स्थिर बुद्धि व्यक्ति के क्या लक्षण हैं। यद्यपि श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण इन्हीं संदर्भों मे अनेक प्रकार के वचनों से अर्जुन को बताने का प्रयास करते हैं जिनको मैं संक्षिप्त रूप से यहां बताने क प्रयास करूंगा। स्थितप्रज्ञता के संदर्भ में श्रीकृष्ण का यह वचन द्रष्टव्य है  "तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर:। वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥2.61॥ अर्थात जिस व्यक्ति की इन्द्रियां उसके वश में कर के मेरा ध्यान, चिन्तन, मनन करता है केवल उसी व्यक्ति की बुद्धि स्थिर रह सकती है।

वहीं दूसरी ओर श्रीकृष्ण इन्हीं संदर्भों में साधारण मनुष्य और योगी के कर्म की समीक्षा करते हुए योगी के विषय में कर्म मीमांसा को प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि "कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिन: कर्म कुर्वन्ति संड्गत्यक्त्वात्मशुद्धये॥" गीता ५.११॥ अर्थात् योगी का समस्त कर्म केवल आत्मशुद्धि के लिये होता है क्योंकि वह शरीर, मन एवं बुद्धि से कर्म फ़ल के संग  त्याग कर कर्म करता है  और केवल वही योगी, जो इसकर्म योग के रहस्य को जानता है, वही अपने आत्म को प्राप्त करने का अधिकारी बनता है। क्यॊंकि श्रीकृष्ण मनुष्य मन की वृत्ति को जानते हैं कि "इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाभसि॥" गीता २.६७॥ कि विषयों का ध्यान करता हुआ उस कृत कर्म के फ़ल में आसक्त हो जाता है और ऐसे में स्थित प्रज्ञ्यता साधारण मनुष्य के वश में नहीं है। अत: यह तो निश्चित रूप से सत्य है कि स्थित प्रज्ञ्यता प्राप्त करने के लिये मानसिक नियन्त्रण आवश्यक है। जब योगी ऐसी स्थिति को प्राप्त करता है तो  "विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन:। रसवर्ज रसो (प्यस्य परं दृष्ट्वानिवर्तते॥2.59॥ अर्थात् योगी की इन्द्रियां वस्तुओं का स्वयं ही त्याग कर देती हैं क्योंकि योगी के हृदय में उनको प्राप्त करने की कोई इच्छा नहीं होती है। त: ऐसी स्थिति में योगी जो भी कर्म सभी कामनाओं का त्याग कर निरहंकार भाव से और मैं और मेरे भाव से ऊपर उठ कर करता है जिसके परिणामस्वरूप वह शान्ति को प्राप्त होता है। यही वह ब्राह्मी स्थिति है जिसे पाकर योगी पुन: मोह को प्राप्त नहीं होता। वैसे भी श्रीकृष्ण जब विषय त्याग की बात करते हैं तो श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के 70वे श्लोक में वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि इच्छाओं को पूरी करने वाला व्यक्ति कभी भी शान्ति को प्राप्त नहीं कर सकता।  क्योंकि "नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्यकुत: सुखम्॥2.66॥

स्थितप्रज्ञ की एक और विशेषता देखने को मिलती है वह है कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का समस्त संसारिक भावों का त्याग। यदि श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय की श्लोक सं ख्या 55 से 58 को ध्यान से देखें तो श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति अपने मन की सभी कामनाओं का त्याग अपने आप में ही विचरता है। वह व्यक्ति राग, भय, क्रोध, सुख के प्रति अनिच्छा और दुख में अनुद्विग्न मना रहता है। ऐसा व्यक्ति शुभ अथवा अशुभ को प्राप्त करता हुआ किसी से द्वेष अथवा राग नही करता वास्तव में ऐसे व्यक्ति की बुद्धि स्थिर रहती है। ऐसा व्यक्ति सभी विषयों में अपने मन के भावों को अपने में समेटे रखता है जैसे एक कछुआ अपने समस्त अंगों को अपने में समेटे रखता है।

अत: यह तो निश्चित है कि मनुष्य यदि यह सोचे कि ऐसी स्थिति में कर्म नहीं करना उसके लिये श्रेयस्कर है तो यहां यह कहना उचित होगा कि मनुष्य का जीवन कर्मप्रधान है औरवह एक पल/ निमिष भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता। जीवन के लिये सांस लेना भी कर्म है। और यह तो स्पष्ट है कि किसी भी व्यक्ति का प्रत्येक कार्य उसकी मानसिक अवस्था का ही परिणाम है और उसकी मानसिक अवस्था का परिचालन त्रिगुण मिल कर करते हैं। व्यक्ति कभी भी एक सी मानसिक स्थिति में नहीं रहता है। अत:स्थिरबुद्धि होने की जहां भी बात आयेगी वहां चित अथवा मन की त्रिगुणात्मिका वृत्ति की भी बात होगी। श्रीकॄष्ण अर्जुन को इन्हीं संदर्भों में समझाते हुए कहते है कि "त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान"॥2.45॥ अर्थात् प्रकृति की इस त्रिगुणात्मक वृत्ति को समझ कर वह आचरण करे जिसके उसका चित्त निर्द्वन्द्वता की स्थिति में चला जायेगा एवं इस प्रकार वह सर्वदा ही स्वयं में स्थित हो कर आत्मवान रहेगा।

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार कर्मों से संन्यास लेने अथवा उनका परित्याग करने की अपेक्षा कर्मयोग अधिक श्रेयस्कर है। कर्मों का केवल परित्याग कर देने से मनुष्य सिद्धि अथवा परमपद नहीं प्राप्त करता। मनुष्य एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रहता। सभी अज्ञानी जीव प्रकृति से उत्पन्न सत्व, रज और तम, इन तीन गुणों से नियंत्रित होकर, परवश हुए, कर्मों में प्रवृत्त किए जाते हैं। मनुष्य यदि बाह्य दृष्टि से कर्म न भी करे और विषयों में लिप्त न हो तो भी वह उनका मन से चिंतन करता है। इस प्रकार का मनुष्य मूढ़ और मिथ्या आचरण करनेवाला कहा गया है। कर्म करना मनुष्य के लिए अनिवार्य है। उसके बिना शरीर का निर्वाह भी संभव नहीं है। भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं कि तीनों लोकों में यद्यपि उनके लिये कोई भी कर्तव्य नहीं है। उनके लिये कोई भी वस्तु  प्राप्त करनी नहीं रहती पर फिर भी वे कर्म में संलग्न हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को स्पष्ट करते हुए यदि वे कर्म न करें तो आसुरी सम्पद् वाले मनुष्य उनका उदाहरण गलत संदर्भों में प्रस्तुत करते हुए मनुष्य समाज में निष्क्रियता का संदेश देंगे। परिणामस्वरूप इससे लोक स्थिति के लिए किए जाने वाले सत्कर्मों का अभाव हो जाएगा जिसके फलस्वरूप सारी प्रजा नष्ट हो जाएगी।

अत: आत्मज्ञानी मनुष्य को भी, जो प्रकृति के बंधन से मुक्त हो चुका है, सदा कर्म करते रहना चाहिए। अज्ञानी मनुष्य जिस प्रकार फलप्राप्ति की आकांक्षा से कर्म करता है उसी प्रकार आत्मज्ञानी को लोकसंग्रह के लिए आसक्तिरहित होकर कर्म करना चाहिए। इस प्रकार आत्मज्ञान से संपन्न व्यक्ति ही, गीता के अनुसार, वास्तविक रूप से कर्मयोगी हो सकता है। इस योग में कर्म के द्वारा ईश्वर की प्राप्ति की जाती है। श्रीमद्भगवद्गीता में यज्ञभाव से किया गया कर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। गृहस्थ और कर्मठ व्यक्ति के लिए योग का यही स्वरूप उत्तम एवं अधिक उपयुक्त है। हममें से प्रत्येक किसी न किसी कार्य में लगा हुआ है, पर हममें से अधिकांश अपनी शक्तियों का अधिकतर भाग व्यर्थ खो देते हैं; क्योंकि हम कर्म के रहस्य को नहीं जानते। जीवन की रक्षा के लिए, समाज की रक्षा के लिए, देश की रक्षा के लिए, विश्व की रक्षा के लिए सत्कर्म करना आवश्यक है। किन्तु यह भी एक सत्य है कि दु:ख की उत्पत्ति भी कर्म से ही होती है। सारे दु:ख और कष्ट आसक्ति से उत्पन्न हुआ करते हैं। कोई व्यक्ति कर्म करना चाहता है, वह किसी मनुष्य की भलाई करना चाहता है और इस बात की भी प्रबल सम्भावना है कि उपकृत मनुष्य कृतघ्न निकलेगा और भलाई करने वाले के विरुद्ध कार्य करेगा। इस प्रकार सुकृत्य भी दु:ख देता है। फल यह होता है कि इस प्रकार की घटना मनुष्य को कर्म से दूर भगाती है। यह दु:ख या कष्ट का भय कर्म और शक्ति का बड़ा भाग नष्ट कर देता है। कर्मयोग सिखाता है कि कर्म के लिए कर्म करो, आसक्तिरहित होकर कर्म करो। कर्मयोगी इसीलिए यज्ञभाव से कर्म करता है कि कर्म करना उसे अच्छा लगता है और इसके परे उसका कोई हेतु नहीं है। कर्मयोगी कर्म का त्याग नहीं करता वह केवल कर्मफल का त्याग करता है और कर्मजनित दु:खों से मुक्त हो जाता है। उसकी स्थिति इस संसार में एक दाता के समान है और वह कुछ पाने की कभी चिन्ता नहीं करता। वह जानता है कि वह दे रहा है और बदले में कुछ माँगता नहीं और इसीलिए वह दु:ख के चंगुल में नहीं पड़ता। वह जानता है कि दु:ख का बन्धन ‘आसक्ति’ की प्रतिक्रिया का ही फल हुआ करता है।

गीता में कहा गया है कि मन का समत्व भाव ही योग है जिसमें मनुष्य सुख-दु:ख, लाभ-हानि, जय-पराजय, संयोग-वियोग को समान भाव से चित्त में ग्रहण करता है। कर्म-फल का त्याग कर धर्मनिरपेक्ष कार्य का सम्पादन भी पूजा के समान हो जाता है। संसार का कोई कार्य ब्रह्म से अलग नहीं है। इसलिए कार्य की प्रकृति कोई भी हो निष्काम कर्म सदा ईश्वर को ही समर्पित हो जाता है। पुनर्जन्म का कारण वासनाओं या अतृप्त कामनाओं का संचय है। कर्मयोगी कर्मफल के चक्कर में ही नहीं पड़ता, अत: वासनाओं का संचय भी नहीं होता। इस प्रकार कर्मयोगी पुनर्जन्म के बन्धन से भी मुक्त हो जाता है। मेरे अल्पमति के अनुसार कर्मयोग का यही रहस्य एवं स्वरूप है।