स्मृति में मुंशी प्रेमचंद

संगम वर्मा

संगम वर्मा


धूल से धूसरित-सी
चेहरे पर छाई झुर्रियाँ
जाना पहचाना-सा लगा
स्मृतिपटल में झाँक कर देखा
तो मालूम हुआ - 'नवाबराय' है
नहीं, नहीं! 'धनपत राय' है
अरे हाँ! याद आ गया
बच्चों के चहेते कथाकार
उपन्यासों  के हैं ये सम्राट
अब ज़ेहन में उतर आया है चेहरा
हाँ! वो मुंशी प्रेमचन्द है

कितनी ही स्मृतियाँ यादों के झरोखे से
निकल आईं
एक-एक कर कृतियाँ आँखों के आगे
उमड़ आईं
शेल्फ़ पे नज़र दौड़ी
और उठाई एक क़िताब
शीर्षक था 'गोदान'
जिसमे था सारा 'हिन्दोस्तान'
हर्फ़ दर हर्फ़
पढ़ता चला गया
विचारों के संग
बहता चला गया
जीवन के यथार्थ से
जुड़ता चला गया

क्या शोषण? और क्या पोषण?
सारे समाज का हुआ कुपोषण
कैसा स्वराज्य? कैसा रामराज्य?
जीना हो गया है दुःसाध्य
तुमने ही तो सभी को जगाया
आदर्श-यथार्थ को सामने लाया

अब फिर से ज़रूरत है आन पड़ी
मशाल लेखनी की है परवान चढ़ी
तुम फिर से जन्म लो इस संसार में
ताकि हर शब्द तर जाये पतवार से
शब्दों के तुम कर्मचन्द  हो
हाँ! तुम मुंशी प्रेमचंद हो।

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