एक गीत - सुरजीत मान जलईया सिंह

सुरजीत मान जलईया सिंह
- सुरजीत मान जलईया सिंह

छूट गयीं सब सुख सुविधाएँ
टूट गया हूं अन्दर तक!
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तुमसे कुछ भी कह न पाया
मैं अपने हालात प्रिये!
आंसू के बिस्तर पर कैसे
काटी अपनी रात प्रिये!
कमरे के सन्नाटों में बस 
तेरी यादें बसती हैं
बची खुची कुछ मुस्कानों सँग
बिखर गया हूं अन्दर तक!
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धीरज कैसे बाधूँगा अब
इस दिल के अरमानों पर!
शब्द कहां से लाऊंगा मैं
टूटे फूटे तानों पर!
कोई नहीं है जिसको अपना
कह कर के ढाँढस बाँधू
किस्से और कहानी जैसा
उतर गया हूँ अन्दर तक!
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तुम पावन गंगा जल जैसी
आंखों से बह जाती हो!
जाने क्या क्या आकर मेरे
कानों में कह जाती हो!
उसी शब्द की गुंजनता से
रात रात सी काटी है 
मैं अपने ही अन्तस में अब
सँवर गया हूं अन्दर तक!