नि:शक्त घुटने - लघुकथा

कुणाल शर्मा
"बेटा, तेरा इंटरव्यू ज्यादा जरुरी है, डॉक्टर को तो मैं अगले हफ्ते भी दिखा लूँगा।" पिताजी उसे समझा रहे थे।

"लेकिन पिताजी, आपके घुटनों का दर्द भी तो बढ़ता जा रहा है ! "

"बेटा, तू फिक्र ना कर। तू बस अपने इंटरव्यू की सोच। भगवान ने चाहा तो आज ...।"

पिताजी के आग्रह पर डॉक्टर से ली अपॉइंटमेंट कैंसिल कर वह  इंटरव्यू ऑफिस को निकल पड़ा। काफी अरसे से वह नौकरी की तलाश में जुटा था, पर हर बार निराशा ही हाथ लग रही थी। पिताजी की रिटायरमेंट के बाद घर की आर्थिक स्थिति भी चरमरा गई थी। इंटरव्यू ऑफिस में  दोपहर बाद उसका नम्बर आया। पर आज भी वह रिजेक्ट हो गया था।

खिन्न मन से वह घर को चल दिया। उसे लगा कि पिताजी के घुटनों का दर्द उसके घुटनों में जगह बनाता जा रहा है। बेजान हो चुकी टाँगों के सहारे घिसटता-सा वह थका-हारा घर पहुँचा। उसके चेहरे पर उड़ती हवाइयाँ भाँपकर माँ और पिताजी ने चुप्पी ओढ़ ली।

रात को बिना कुछ खाये-पिये वह बिस्तर पर लेट गया। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। दीवार पर लटकी घड़ी दो बजा रही थी। भरे मन से वह बिस्तर पर करवटें बदलता रहा। जिंदगी उसे बोझिल लगने लगी थी।

चित लेटा तो छत पर झूलता पंखा उसे अपनी ओर खींचता-सा लगा।  रस्सी लाने के लिए वह बिस्तर से उठकर बाहर आ गया।  बगल वाले कमरे में बत्ती जलती देख उसने अंदर झाँका। दर्द से परेशान पिताजी घुटनों को मुट्ठियों में जकड़ पीठ झुकाये बैठे थे। बार-बार उठ रहे खाँसी के धसके को दबाती-सी माँ पास में ही बिछी चारपाई पर लेटी थी।

उसके शरीर में एक झुरझुरी-सी दौड़ गई। कुछ देर पहले उपजे विचार का ख्याल उसे ऊपर से नीचे तक हिला गया। माथे पर पसीने की बूँदें चुहचुहा आईं। वापिस अपने कमरे में आकर उसने पानी के दो गिलास गटके। फिर घूमकर पिताजी के कमरे में गया और उनके सामने बैठ घुटने दबाने लगा।