माँ को समर्पित चार कविताएँ

मार्टिन जॉन 
- मार्टिन जॉन

माँ बीमार है    

बीमार है  मेरी माँ
दुनिया की हर शै होती हैं बीमार
सच को स्वीकारने के बावजूद मैं स्थगित हो गया हूँ
मेरी दुनिया स्थगित है
शेष सब पूर्ववत है, यथावत है।

इन्द्रियों की सक्रियता, गतिशीलता  पानी बनकर
बंजर समय के सोख्ता कागज़ पर सोखायी जा रही है
खनकते सिक्कों से उपजी खुरदुरी और सूखी संवेदना
माँ की रगों में दौडाई  जा रही है नर्स के हाथों।

माँ की आह और मेरे चेहरे पर उग आईं कंटीली झाड़ियों का
डायग्नोसिस कर तालमेल बिठाया जा रहा है
अस्पताल के रंग–रोगन से।

अस्पताल के बाहर शोर शराबा है, ठहाका है
बतकही है
पकौड़े की गंध है
जलेबियों की मिठास है
मस्ताये माहौल के बीच चीख चीख  कर कहना चाहता हूँ
मेरी माँ बीमार है।

कसैले और बेचैन समय में चाहता हूँ कि
एक ख़बर बने माँ की बीमारी
ख़बर सूरज तक पहुँचे और वह अपनी तपिश पी ले
चाँद अपनी चाँदनी को स्वर्ग दूत बनाकर भेजे
माँ के सिरहाने
राग शिवरंजनी घुल जाए हवाओं में।

ख़बर पहुँचनी चाहिए
मुनव्वर राना और बशीर बद्र तक
हुक्मरानों के कुत्ते की बीमारी खबर बन जाती है
माँ की बीमारी पर सारी कायनात खामोश है।

इन दिनों मैं माँ में समाया हूँ और माँ मुझमे
साथ साथ सोने के उपक्रम में जागते रहते हैं
हमारी आँखों की कातरता समंदर बनने से पहले
वाष्प बनकर उड़ जाती है।

कांटें की तरह चुभ रही हैं पड़ोसियों की खिलखिलाहटें
परिंदों की चहचहाट कानों में पिघलता शीशा उड़ेल रही है
गुजरते बच्चों का बेशऊर शोर हथौड़े चला रहे हैं
पसीजना चाहिए सबको
पिघलना चाहिए बर्फ सा
आखिर वह मेरी माँ है!

‘कैसी हो?’ के उत्तर में मूंदी आँखों से ज़वाब लुढ़क जाते हैं
महानदी, महासागर समा सकते हैं इन ज़वाबों में
बूंदें जो पृथ्वी से भी बड़ी लग रही है
कही अनकही बातों से ग्रन्थ  रचा जा सकता है!

माँ की हथेलियों को दबाते हुए हौले हौले सर सहलाता हूँ
लुढ़क जाते हैं और दो बूंद
मेरे भीतर का हाहाकार सुनकर।

शब्दहीन संवाद के बाद दुनिया का चेहरा देखता हूँ
सब कुछ पूर्ववत है, यथावत है।
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...और माँ चल बसी

कमरे के नथुनों में मृत्युगंध समा चुकी है
मोमबत्ती की लो, धूप के धुएं, पादरी के ईशवचन
धर्मबहनों की प्रार्थनाएँ –
कितनी ज़ल्दी दिख पड़ती है
मातमी माहौल बनाये जाने की तत्परता।

ऐसा क्योंकर होता है कि माँएँ चल बसती हैं
पृथ्वी डोलती तक नहीं
कुदरत के सीने में कोई हलचल नहीं होती
कितने सख्त हैं कायदे कानून
न पसीजती है न पिघलती है प्रकृति!

कधों पर पड़ी तसल्ली की हथेलियों को
कुछ कहते सुनता हूँ
मातविहीनता का दुःख अपना दुःख है
सदियों पुराने लीक पीटते अवसरवादी शब्द
इजाफ़ा कर देते  है समंदर के उफान में।

बाहर बूंदा-बांदी है
भीतर आँखों का पानी तौला जा रहा है आँखों से
मानो, माँ ने आँखें मूंदकर
द्रवित होने की प्रतिस्पर्द्धा की हरी झंडी दिखा दी हो!

चंद आख़िरी और कीमती साँसें
धडकनों की पोटली में बांधकर और तकिये के नीचे दबाकर
ले गया होगा समय माँ की अंगुलियाँ थामे उस घर में
जहाँ रसोई के पुराने बिखरे बर्तनों से कुछ फुसफुसायी होगी
धुल भरे आँगन को बतायी होंगी अपनी लाचारी
खांसता-खखारता बीमार टी.वी को गले लगायी होगी
जो माँ के अकेलेपन को बड़ी ईमानदारी से से बाँटता रहा है
आखरी बार खुला होगा टीन का बक्सा
बहूओं की दी हुई साड़ियाँ, चाँदी की अँगूठी
पेंशन और बैंक के खातों से न जाने क्या क्या बतियायी होगी
पापा की तस्वीर पर अंगुलियाँ फिराती हुई
‘अब लो न! ...आ रही हूँ!’ कहकर भिगोयी होगी आँखों की कोर
माँ के कापते हाथों की छुअन भर से
भर भराया होगा बेल का पेड़
छ दशक का साथ छूटने का दुःख शायद झेल पाए!
घर को घर बनाया था माँ ने, अलविदा नहीं कह पाया होगा वह
जी लेगा माँ की गंध के सहारे
घर के नए लोगों के बीच वही घर। ***
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माँ के चल बसने के बाद

रिश्तों की चादर धो-सुखाकर सहेजने का हुनर
काश! हम सीख लेते माँ से!

कुछ रिश्ते कॉलबेल बजाकर दाखिल होते गए अन्दर
कुछ दबे पांव माल-असबाब के साथ सरकते गए ...
रिश्तों की आवाजाही पर आँखें तरेर कर
खबरदार करता है मुझको मेरा घर!

कुछ रिश्ते अपने खोल से निकल आए हैं
कब्र, कफ़न, कॉफिन को कटघरे में रखकर ज़िरह करने लगे हैं।
अंगुलियाँ व्यय की बैलेंस शीट पर टिकी हुई हैं
माँ के न होने की अनुभूति पर हिसाब-क़िताब हावी है
कितनी ज़ल्दी सूख जाती है हमारे अन्दर की नदी
वगैर धूप और गर्मी के!

माँ भी मोहताजी और सूखते समय में बनती थी बैलेंस-शीट
हमलोगों के लिए अलग अलग
कभी अंगुलियाँ उठाने फिराने की नौबत नहीं आई
बैलेंस-शीट ने ही हमें ज़गह दी बने रहने की, टिके रहने की।

निगल चुका है स्याह अँधेरा सूरज का गोला
और इधर हमारे कंधों पर रिश्तों का जनाजा है
कौन इंतज़ार करे सूरज का सुपुर्द-ए-ख़ाक  के लिए! ***
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माँ और बेल का पेड़ 

नहीं जानती थी माँ अदन की वाटिका
और ज्ञानचक्षु वाला फल का पेड़
न तो हरियाली मुहिम के नारें।

रोपा गया था जब बेल का पौधा
पहलौठी संतान कुनमुनायी थी माँ के गर्भ में
रोज़ एक मग ममता और वात्सल्य का शुद्ध पौष्टिक आहार
उसके गबरू जवान होने, बगलगीर पेड़ों के सीने में
साँप लोटने के लिए काफी था।

बेलुवा संबोधन के साथ माँ की थपकियों से
उसकी धमनियों में जो कुछ होता था
झूम झूम कर ज़ाहिर करता।
बुरी लत लग गई थी माँ की दुलार की
अलसुबह आँगन बुहारते हुए निहार लेती थी माँ
गद्गद् हो जाता था वह
बखूबी समझती थी माँ बेलुवा की ज़ुबान।

चाहता तो था बेलुवा माँ का आँचल फलों से लाद देना बारहों महीना
मौसम की हिदायतों को नकार कर बद्तमीज़ नहीं होना चाहता था
हाँ, अपनी मिठास पूरी उड़ेल देता था ऐसा कि
साल बीत जाए स्वाद न जाए!

सलामती और लम्बी उम्र की माँ की दुआ के बावजूद
जीने की चाह एकबारगी झटक दिया
जैसे झटकता है कोई सोते में ओढ़ी हुई चादर
बुरी खबर सुनकर।

इधर माँ की साँसे उखड़ी
धराशायी हो गया वो माँ से लिपटने के लिए
लो और लगन की मिसाल न किसी ने देखी न सुनी
अब तक!

हम रह गए, आगे भी रह लेंगे माँ के बगैर!
बेलुवा रह नहीं सका माँ के बगैर
रूहानी रिश्ते का रूहानी सफ़र –
गीत और किस्से सुनाते हैं अक्सर परिंदे अपने बच्चों को। ***