कैशलैस इकॉनामी - व्यंग्य

लेखक: अनूप शुक्ल

अपना देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र की गाड़ी में जनता सवारी होती है। ड्राइवर का काम सरकार करती है। सरकार चलाने के लिये नारों के ईंधन की जरूरत होती है। नारे लगते रहते हैं, सरकार सरपट चलती रहती है। नारे चुके, सरकार गयी।

पुराने समय में नारे टिकाऊ होते थे। देर तक चलते थे। आराम-हराम है, जय-जवान, जय किसान, गरीबी-हटाओ जैसे नारे पाँच-पाँच साल खैंच लेते थे सरकार की गाड़ी। एक बार लगा दिया नारा फ़िर पाँच साल कोई चिन्ता नहीं। लेकिन समय के साथ जनता के जीभ का स्वाद बदल गया है। जनता एक नारा लम्बे समय तक पसंद नहीं करती। सरकार को मजबूरी में नित-नये नारे गढ़ने पड़ते हैं। न गढ़े तो आफ़त। उतार देगी जनता। दूसरा ड्राइवर रख लेगी।

पहले संयुक्त परिवार का जमाना था। एक कमाने वाला होता था दस खाने वाले। फिर भी काम चल जाता था आराम से। कमाने वाले की इज्जत होती थी। संयुक्त परिवार के टूटने के हरेक को कमाना जरूरी हो गया।  नारों के भी वही हाल थे। पहले एक नारा पांच साल आराम से खैंच लेता था। नारे इज्जत से लगाये जाते थे। आज के समय में नारों के बुरे हाल हैं। भौत बेइज्जती होती है। लगते ही खिल्ली उड़ाने लगते हैं लोग नारों की। नारों के हाल चुटकुलों सरीखे हो गये हैं। अक्सर तो याद तक नहीं रहते। नारे  एक दफ़िया पासवर्ड (OTP) की तरह हो गये हैं। जैसे हर ट्रान्जैक्शन के लिये नया पासवर्ड चाहिये होता है वैसे ही अब हर दिन एक नया नारा चाहिये।

कैशलैस इकोनामी देश का एकदम नया नारा है। अभी ट्रायल पर है। कोई कहता है इसके बाद देश धक्काड़े से आगे बढेगा प्रगति पथ पर। दीगर लोग कहते हैं देश के लिये  नया बवाल। लेकिन भैया ऐसे सोचो  तो जिन्दगी ही एक बवाल है। तो क्या जीना छोड़ दोगे। इसलिये शुभ-शुभ बोलो।

आज के समय में देश में जो जिसमें होना चाहिये वह उसी से हीन हो रहा है। अखबार न्यूजलैस,  बुद्धिजीवी बुद्धिलैस, नायिकायें टॉपलैस, संसद बहसलैस, नौकरशाही कर्तव्यलैस और जननायक शर्मलैस हो गये हैं वैसे ही भैया आप भी कैशलैस हो जाओ। उसी में बरक्कत है। जब सरकार ने नारा दिया है तो  लगाना तो पड़ेगा ही। इसलिये कैशलैस हो जाने में भी भलाई है। निभा लेव नारा। कुछ दिन बाद नया नारा आयेगा तब उसको चिल्लाना।

कोई भी नारा सफ़ल होने के लिये उसके फ़ायदे गिनाना जरूरी होता है। तो आइये आपको गिनाते हैं कैशलैस इकोनामी के फ़ायदे।

सबसे बड़ा फ़ायदा तो यह कि देश की बाकी सब समस्यायें  कैशलैस होते ही खत्म हो जायेंगे। कोई गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार की बात करे उससे कहा जा सकता है, "भैया फ़ौरन कैशलैस हो जाओ, सब बवालों से मुक्ति पाओ।"

अभी 40 करोड़ (कोई कहता है 50 करोड़ कोई 60 करोड़। आप अपने करोड़ अपने हिसाब से तय कर लें) लोगों के बैंकों में खाते ही नहीं खुले। जिनके खाते ही नहीं खुले उनके खाते खुलवाकर उनको कैशलैस बनाने के काम में पूरा देश जुट जाये। जबरन नसबंदी की तर्ज पर 'जबरन कैशलैस' बनाया। जिसके पास पैसे बरामद हों उसके पैसे जब्त करके उसको एटीएम थमा दिया जाये। प्रौढ शिक्षा केन्द्र की तरह गांव-गांव  में कैशलैस शिक्षा केन्द्र खोले जायें, 'कैशलैस मित्र' बनाये जायें। जो एक बार एटीएम से पैसा निकाल ले उसे 'कैशेलश साक्षर' की डिग्री दे दी जाये। नौकरी में 'कैशलैस साक्षर' को वरीयता दी जाये।

'कैशलैस साक्षर' हो जाने के बाद अनपढ भी अपना बिना अक्षर पहचाने पासवर्ड प्रयोग करने लगेंगे। इस तरह भारत दुनिया का पहला हो जायेगा जहां अनपढ बिना अक्षर पहचाने उसका प्रयोग करना सीखें चुके होंगे। मास्टर लोग ककहरा सिखाने से पहले बच्चों को पासवर्ड बनाना सिखायेंगे।

एकबार कैशलैस की पटरी पर देश दौड़ने लगा फ़िर तमाम समस्यायें सर पर पैरधरकर फ़ूट लेंगी। छीना, झपटी के मामले कम हो जायेंगे। लोगों के पास जब पैसा  ही नहीं होगा तो लुटेगा क्या खाक? भीख मांगने वाले लोग  अपने बच्चों को मजबूरन स्कूल भेजेंगे। कहेंगे, "जा बेटा कम से कम कुछ हैकिंग-सैकिंग सीख ले। कम से कम जिन्दा रहने का जुगाड़ रहेगा। हमारा जमाना गया जब कहीं भी खड़े हो जाते थे कटोरा लेकर तो कुछ मिल जाता था। लोग सिक्का फ़ेंककर निकल थे। आज किसके पास समय है जो हमारी मशीन में आकर कार्ड स्वाइप करके भीख दे। दो चार जो आते भी हैं तो इंटरनेट कनेक्शन ही नहीं मिलता। भीख मांगना अब वोट मांगने से भी गया बीता काम हो गया है। बहुत मेहनत पड़ती है। बिना हैकिंग सीखे अब  गुजारा नहीं।"

आने वाले समय में जगह-जगह हैकिंग सिखाने के स्कूल खुल जायेंगे। उनके विज्ञापन कुछ इस तरह होंगे, "महीने भर में 1000 रुपये तक कैशलैस कमाई करना सीखें।"

गांवों में नई तरह के साहूकार पैदा होंगे। पहले जमाने के साहूकार लोगों के गहने गिरवी रखकर वुआज पर पैसे देते थे। नये जमाने में उनके कब्जे में लोगों के एटीएम होंगे। जिस साहूकार के कब्जे में जितने ज्यादा एटीएम होंगे वो उतना ही ताकतवर होगा। वे नये बाहुबली होंगे। जनप्रतिनिधि उनके पास ही वोट के लिये जायेंगे।

गुंडे-बदमाशों की जगह देश में हैकरों की तूती बोलेगी। जिसके पास जितने कुशल हैकर होंगे उसकी मनपसंद सरकार होगी। सरकारें आज समर्थन के अभाव में गिरती हैं। 'कैशलैस इकोनामी' हैक होना शुरु हो जायेंगी।

कैशलैस होने का एक फ़ायदा यह भी होगा कि लोगों को करोड़ों, अरबों, खरबों के पैसे रखने के लिये जगह की जरूरत नहीं होगी। इससे जो जगह बचेगी उसमें लोगों के रहने की जगह निकल आयेगा। मुफ़्त आवास सुविधा के तहत लोग अपनी इमारतें  गरीबों को दे सकेंगे।

कैशलैस व्यवस्था का मतलब धन का मूर्त से अमूर्त हो जाना। अभी धन हजार, पाँच सौ, दस, पचास के नोट की शक्ल में दिखता है। कैशलैस हो जाने बाद दिखना बन्द हो जायेगा धन का। यह आस्तिकता से नास्तिकता की यात्रा होगी। बिना मार-पीट, खून-खराबे के एक नये तरह का आस्थान्तरण होगा।

 कैशलैस इकोनामी के आह्वान के बाद देश की सारी असमानतायें खतम हो जायेंगी। देश में केवल दो तरह के होंगे। एक वे जो कैशलैस हो चुके हैं। दूसरे वे जिनको कैशलैस होना है। किसी भी समस्या का हल उनके कैशलैस होने या न होने में ही पाया जायेगा। कोई व्यक्ति अपनी कोई भी समस्या लेकर आयेगा तो उससे कहा जा सकता है, "भैया तुम्हारी सब समस्याओं का हल कैशलैस हो जाने में है। कैशलैस हो जाओ, सब समस्याओं से निजात पाओ।" अगर कोई कैशलैस हुआ व्यक्ति अपनी कोई परेशानी बताते पाया गया तो उससे कहा जायेगा, "तुम तो कैशलैस हो गये। अब किस बात की परेशानी तुमको? झूठ बोलते हो तुम। कैशविहीन हुआ आदमी अपने-आप परेशानीविहीन माना जायेगा। जाओ भागो यहां से हमको बाकी लोगों को कैशलैस व्यवस्था से जोड़ना है।"

खैर यह सब छोड़ो। आप अपनी बताओ कि आप अभी तक कैशलैस इकोनामी से जुड़े कि नहीं? जल्दी से जुड़िये वर्ना आप टापते रह जायेंगे और कोई नया नारा चलन में आ जायेगा।