भारतीय स्वाधीनता संग्राम में ब्राह्मणीय पत्रकारिता की भूमिका

कला एवं भाषा संकाय, वली प्रोफ़ैशनल यूनिवर्सिटी, फगवाड़ा (पंजाब), मोबाइल: 9876758830
सार:
डॉ. विनोद कुमार
         अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता शेष सभी प्रकार के स्वातान्त्र्य की आधारभूमि और सर्वप्रथम साक्षी होती है। सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि  किसी भी देश और काल में लोगों को अपनी भावनाएँ और संवेदनाएँ प्रकट करने का कितना अवसर, सुविधा और अधिकार प्राप्त है, यही उस राष्ट्र  की स्वतन्त्रता और स्वायत्तता का प्रमाण और परिमाप होता है। इसी के साथ एक दूसरा महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि जनता अपनी स्वाधीनता, सम्प्रभुता और स्वायत्तता प्राप्ति के साथ-साथ उसे बनाए रखने और बचाए रखने के लिए कितना जागृत है।
दो शताब्दियों की आंग्ल पराधीनता के पाप-पुंज से आक्रान्त जनता के आर्तनाद के लिए और मुक्ति के शंखनाद के लिए ब्राह्मणीय तत्त्वों द्वारा किए गए प्रयास लिखित व अलिखित इतिहास के बन्द पन्नों में विस्मरण भले ही कर दिए जाएं, लेकिन मिटाए नहीं जा सकते और न ही उनके द्वारा किए गए परम एवं विकट उद्योग के महत्त्व को कम ही किया जा सकता है।

परिचय:
                        भारतीय स्वाधीनता के संघर्ष में पत्रकारिता का विशिष्ट योगदान है। जनता-जनार्दन की आशाएँ, आकाक्षांएँ और शासन-व्यवस्था से अपेक्षाएँ पहुँचाने का कार्य पत्रकारिता ने ही सम्पन्न किया। दासता की बेड़ियों में जकड़ी जनता को जब यह अहसास हो गया कि दमनकारी नीति के रथ पर आरूढ़ आंग्ल सत्ता उनके मानवीय अधिकारों को न देने को संकल्पित है, तब अपने स्वाभिमान को सुरक्षित रखने और पराधीनता की श्रृंखलाओं  से मुक्ति के लिए पत्रकारिता को एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया, जिसके प्रभाव से करोड़ों भारतीयों के दिलों में दबी स्वाधीनता की अग्नि अधिक प्रचण्ड हो गई, समस्त भारत एकजुट होकर दो शताब्दियों से लम्बी दासता को ध्वस्त करने के लिए उठ खड़ा हुआ और परिणास्वरूप 15 अगस्त 1947 का वह दिन आया जब अंग्रेजों को भारत को स्वतन्त्र कर वापिस लौटना पड़ा।

            भारत की स्वाधीनता के दीर्घकालीन  संघर्ष में पत्रकारिता के इस अचूक अस्त्र का प्रयोग करने वालों में ब्राह्मणीय तत्त्वों अर्थात्‍ ब्राह्मणीय पत्रकारिता की भूमिका निश्चयेण विशिष्ट एवं अतुलनीय है।       
                       
समीक्षा:
            स्वाधीनता की संघर्ष चेतना को लोकचित्त में व्यापक स्तर तक अपनी सम्पूर्ण विचार-भूमिका के साथ पहुँचाने का कार्य हिन्दी पत्रकारिता ने बहुत ही सशक्त ढंग से किया। यह कार्य राष्ट्रहित के लिए समर्पित निडर एवं नेर्भीक पत्रकारों के अथक प्रयासों का ही परिणाम था, जिसके फलस्वरूप हिन्दी पत्रकारिता जन-भावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ-साथ जन-जागरण का अमोघ अस्त्र भी साबित हुई ।

भारतीय पत्रकारिता जगत में हिन्दी पत्रकारिता को अप्रतिम स्थान प्राप्त है। स्वाधीनता-संघर्ष काल के सन्दर्भ में तो हिन्दी पत्रकारिता को सम्पूर्ण भारतीय पत्रकारिता का पर्याय भी कहा जा सकता है। हिन्दी पत्रकारिता के श्रीगणेश का श्रेय जुगलकिशोर शुक्ल नामक एक ब्राह्मण को जाता है, जिसने सरकारी विरोध, दमन, शोषण के बीच 30 मई 1826 को हिन्दी साप्ताहिक पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रकाशन का साहसिक कार्य किया।

हिन्दी समाज को आधुनिकता से जोड़ने की महत्त्वाकांक्षा के फलस्वरूप हिन्दी के प्रथम पत्र से कलकत्ता को आलोकित करने वाले व्यक्तित्व के बारे में पत्र के प्रथम अंक में कुछ इस प्रकार से लिखा गया है-
युगुल किशोर: कथ्यति धीर: सविनयमेतत्‍ सुकुलज वंश:।
 उदिते दिनकृत सति मार्तण्डे तद्वत्‍ विलसति लिक उदन्ते॥1

प्रस्तुत पत्र के प्रकाशन के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए पत्रांकित यह पंक्तियां स्वयं प्रमाणित करती हैं- सूर्य के प्रकाश के बिना अन्धकार समाप्त नहीं होता, उसी प्रकार अपढ़ समाज भी संसार में समाचार (पत्र) की सेवा के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। अत: यह प्रयत्न कर रहा हूँ।

उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी काशी नगरी से जनवरी 1845 को राजा शिव प्रसाद ‘सितारेहिन्द’ द्वारा हिन्दी प्रदेश का प्रथम साप्ताहिक पत्र ‘बनारस-अखबार’ निकाला गया जिसके सम्पादन का उत्तरदायित्त्व पं. गोविन्द रघुनाथ थत्ते को दिया गया। इन्दौर से 1848 में पं. प्रेमनारायण के द्वारा ‘मालवा-अखबार’ के नाम से प्रकाशन हिन्दी-उर्दू में प्रारम्भ किया गया। अम्बिका प्रसाद वाजपेयी इस पत्र के सम्पादक को पं. प्रेमनारायण बताते हैं।

सन १८५० हिन्दी पत्रकारिता के भीष्मपितामह पं. युगुल किशूर शुक्ल जी ने अपने पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ की असफल हो जाने पर भी हार नहीं मानी और कलकत्ता से ही नये जोश के साथ पुन: ‘साम्यदण्ड-मार्तण्ड’ नामक पत्र निकाल कर अपनी राष्ट्र के प्रति भावना का परिचय दिया।

भारत में अंग्रेजी राज्य के विरुद्ध संघर्ष के क्षेत्र में कलकत्ता का हिन्दू पेट्रियटमुख्य था, जिसकी स्थापना 1853 में लेखक व नाटककार श्री गिरीशचंद्र घोष ने की थी और जो श्री हरीशचंद्र मुखर्जी ने नेतृत्व में असाधारण लोकप्रियता प्राप्त कर गया। सन् 1861 में इस पत्र में नाटक नील दर्पणनिकला जिसने निलहे गोरे व्यापारियों के विरुद्ध नील की खेती को खत्म करने के लिए आंदोलन चलाया और इसके फलस्वरूप एक नील कमीशन की नियुक्ति हो गयी। बाद में यह पत्र श्री ईश्वरचंद्र विद्यासागर के हाथ में आ गया

1 सितम्बर 1877 में पं. बालकृष्ण भट्ट ने ‘हिन्दी-प्रदीप’ मासिक पत्रिका हिन्दी प्रवर्धनी सभा के माध्यम से निकाली। पत्रकारिता के सन्दर्भ में ‘हिन्दी-प्रदीप’ का जन्म एक युगान्तकारी घटना मानी जाती है।2

33 वर्षों तक चली इस पत्रिका ने राजनीतिक रूप ग्रहण कर सरकार की नीतियों पर तीक्ष्ण लेखन किया। महावीर प्रसाद द्विवेदी जी इसे अपने समय की श्रेष्ठ पत्रिका मानते थे। सरकार ने इस पत्र की कथित भड़काने वाली उग्र विचारधारा पर अंकुश लगाने का भरपूर प्रयास किया। और अन्तत: इसे सदा के लिए बन्द कर दिया गया। इस पत्रिका में अंग्रेजी शासन व्यवस्था के खिलाफ लेख व अन्य सामग्रियां छपा करती थीं। 1908 में माधव की एक रचना बन्दर सभा महाकाव्य प्रकाशित हुई, जिसमें अंग्रेजों को बन्दर की तरह बताया गया था। इस कविता से अंग्रेज शासक कुपित हो गए और कार्रवाई की नोटिस दे डाली। भट्ट जी ने किसी तरह जवाब देकर हिन्दी प्रदीपको मुक्त कराया।  इस पत्र के अप्रैल अंक में ‘बम क्या है’ कविता के प्रकाशन ने ब्रिटिश-सरकार की नींद हराम कर दी। परिणाम स्वरूप इस पत्र को बैन कर दिया गया। भट्ट जी ने इसे दुबारा शुरु कर अंक प्रकाशित किया, लेकिन 1910 मे पुन: सरकार द्वारा इसे बन्द कर दिया गया।3

1877 में ही लाहौर से भी हिन्दी प्रेमी कश्मीरी पंडित मुकुन्दराय ने ‘मिजविलास’ नामक साप्ताहिक पत्र निकाला।4

1878 में कलकत्ता से एक पत्र ‘भारत-मित्र’ का प्रकाशन पं. छोटू लाल मिश्र तथा पं. दुर्गा प्रसाद मिश्र के सद्‍प्रयासों से शुरु हुआ। इस पत्र के प्रकाशन के साथ ही इसकी काफी प्रसिद्धि हुई और यह तेजस्वी एवं उत्तम पत्रों के प्रकाशन का एक तारतम्य सा बन गया।5

प्रारम्भ में इस पत्र का आदर्श वाक्य था-ज्योत्स्तु सत्यनिष्ठां देषां सर्व मनोरथा:’ जिसे बदल कर बाद में इसे ‘सगुण खनिज विचित्र अति खोले सबके चित्र, शोधे नर चरित्र’ यह भारत पवित्र। कर दिया गया।

‘भारत मित्र’ ने जनता के पक्ष में अनेक आन्दोलन किए। छोटू लाल मिश्र, पं. हरमुकुन्द शास्त्री, पं. जगन्नाथ चतुर्वेदी, राधाकृष्ण चतुर्वेदी, दुर्गाप्रसाद मिश्र, पं, रुद्रदत्त शर्मा, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी आदि का साथ पाकर इस पत्र नेइस अवधि में जीवन्त-चेतना को जागृत करते हुए समुचित विकास किया।

‘उचित वक्ता’ के माध्यम से पं. दुर्गा प्रसाद मिश्र नें जन-चेतना जागृत करने का बीड़ा उठाया और यह पत्र अपने नाम के अनुरूप निर्भयता से उचित वक्ता बना। इस पत्र में छपने वाला हर शब्द सरकार की पोल खोलन्र वाला और तीर के समान तीखा होता था।

1878 में ही काशी से हरिकृष्ण भट्टाचार्य के सम्पादकत्व में ‘आर्यमित्र’ नामक पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। और पं. जगन्नाथ प्रसाद वैद्य के द्वारा प्रयाग से ‘आरोग्य दर्पण’ तथा पं. बदरीनारायण के द्वारा ‘आनन्द-कादम्बिनी’ का भी प्रकाशन किया गया।6

1882 में भी कई नए पत्रों का प्रारम्भ देखने को मिलता है। इस श्रृंखला में पं. देवकी नन्दन तिवारी द्वारा सम्पादित एवं प्रकाशित ‘प्रयाग-समाचार’, गौरी दत्त शर्मा के सम्पादन में मेरठ से ‘देवनागरी-प्रचारक’ तथा वृंदावन से गोस्वामी ज्वालादत्त प्रसाद द्वारा ‘भारतेन्दु’ नामक पाक्षिक पत्र का प्रकाशन करवाया गया।7

1883 में दो नए साप्ताहिक और पाँच मासिक पत्र प्रकाशित हुए जिनमें से जयन्ती प्रसाद शर्मा के द्वारा दिल्ली से ‘इन्द्रप्रस्थ प्रकाश’ तथा इस वर्ष का सबसे तेजस्वी पत्र 'ब्राह्मण’ पं. प्रतापनारायण मिश्र द्वारा कानपुर से प्रकाशित किया गया।8

यह पत्र  ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध अपनी आवाज बुलन्द करने की प्रेरणा भारतीय जनता को देता रहा हास्य के साथ जन-चेतना जागृति का अनोखा कार्य इस पत्र के द्वारा किया जाता था। अनेक आर्थिक संकटों से जूझते हुए भी इस पत्र ने कभी समझौता नहीं किया और अपने राष्ट्र-हित में कार्यरत रहा।

1890 में पं. मदन मोहन मालवीय जी के द्वारा प्रकाशित ‘हिन्दोस्थान’ ने राष्ट्रिय चेतना के प्रचार-प्रसर में बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। यह वही पत्र था जिसने कंसेट बिल के विरुद्ध पहली बार आवाज उठाई थी।
इस पत्र ने राष्ट्रीय आन्दोलन को गतिशील करने में काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में द्विवेदी युग की अपनी पहचान है। इस युग की पत्रकारिता ने साहित्यिकता के बावजूद राष्ट्रिय चेतना के लिए जो काम किया, वह अतुलनीय है।9

सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक जीवन को नई गतिशीलता प्रदान करने के लिए 1900 में इण्डियन प्रेस प्रयाग से हिन्दी की प्रथम सार्वजनिक मासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ का प्रकाशन हुआ। जिसे 1903 में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का सम्पादन सौभाग्य प्राप्त हुआ, जहां से इस पत्रिका ने नए आयाम स्थापित किए।10

1901 से प्रकाशित पत्रों में पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी के ‘समालोचक’ ने विशेष ख्याति अर्जित की।  1903 में पं. बाबुराव विष्णु पराड़कर के सम्पादन में कलकत्ता से ‘हितवार्ता’ का आगाज़ हुआ, जिसमें छपे लेख ‘विभक्ति-विचार और प्राकृत-विचार’ के कारण पं. गोविन्दनारायण मिश्र हिन्दी जगत में चर्चित हुए।11
द्विवेदी युगीन प्रकाशन ने स्वदेशी लहर को धार देने का काम बहुत ही खूबी से किया-
अपना बोया आप ही खावें।
अपना कपड़ा आप बनावें।12

बाल गंगाधर टिळक ने ‘केसरी’ पत्र के माध्यम से ऐसे अंगारे उगले कि सरकार की शैया तक जल उठी और उन्होंने तिलक पर राजद्रोह का मुकद्दमा थोप दिया और उन्हें छ: साल की कारावास का दण्ड दिया गया।13
राजनीतिक पत्रकारिता के इतिहास में यह पहली गिरफ़्तारी थी।14

‘केसरी’ और ‘मराठा’ के माध्यम से लोकमान्य टिळक ने अपनी निर्भीक वाणी और लेखनी से समाज की जड़ता को तोड़ा और स्वराज्य की प्राप्ति की तीव्र ललक को जन-जन के हृदय में प्रज्ज्वललित किया। सरकार की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध ‘केसरी’ में नित्य ही छपता रहता था।

टिळक की विचारधारा को लेकर चलने वाले पं. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी ने १९०७ में ‘नृसिंह’ नामक मासिक पत्रिका निकाली।15

‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार’ की भावना के प्रचार-प्रसार में अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा दी। उसने देश के लोगों में आत्मसम्मान की भावना को भरते हुए कहा कि आओ समस्त देशवासियो, हम लोग उपनिवेश और उसके पिट्ठु इंग्लैंड की वस्तुओं का बहिष्कार करे, जिससे उन्हें जान पड़े कि हिन्दिस्तानी नर मुर्दे नहीं हैं। हम लोग दिखा दें कि हम आत्माभिमानी हैं और तुम्हें तुम्हारे पाप कर्मों का फल चखाने को प्रतिबद्ध हैं।

1909 में इलाहाबाद से पं. सुन्दरलाल के सम्पादकत्व में ‘कर्मयोगी’ पत्र निकाला गया,16 जो अपनी उग्र विचारधारा के कारण जल्द ही प्रसिद्ध हो गया। जनता के आक्रोश और असंतोष फैलाने के आरोप लगाए गए। इस पत्र को पढ़ने मात्र के दोष से विद्यार्थियों को स्कूलों और कॉलेजों से निष्काषित कर दिया गया।17 मात्र नौ मास तक छपने वाले इस पत्र ने स्वाधीनता के यज्ञ में अपना शतप्रतिशत योगदान डाला। जिसमें अरविन्द घोष के कर्मयोगीतथा लोकमान्य तिलक के केसरीमें प्रकाशित लेख भी छपते थे। बहुत शीघ्र ही इसकी प्रसार संख्या दस हज़ार प्रतियां हो गयीं और इससे तंग आकर भारत सरकार ने दमनकारी कानूनों के अंतर्गत इसे बंद करा दिया। श्री सुन्दरलाल जी की प्रेरणा और सहयोग से श्री शिवनारायण भटनागर ने उर्दू का स्वराज्यपत्र निकाला जिसके नौ सम्पादकों को राजद्रोह के अंतर्गत सज़ा हुई और एक के बाद एक जेल भेजे गये, कई को काले पानी की सजा हुई। बाद में प्रेस कानूनों के अंतर्गत यह भी बंद हो गया। श्री सुंदरलाल ने साप्ताहिक भविष्यभी निकाला और वर्षों उसके सम्पादक रहे। उस पत्र के द्वारा उन्होंने राजनीतिक विचारधारा के प्रसार में बड़ा योगदान दिया।

इसी समय पं. मदन मोहन मालवीय जी की प्रेरणा और प्रोत्साहन से पं. कृष्णकान्त मालवीय जी द्वारा ‘मर्यादा’ पत्र का प्रकाशन किया गया और जन-चेतना का कार्य किया गया।18 1913 में माखनलाल चतुर्वेदी और कालूराम गंगराड़े ने ‘प्रभा’ नामक मासिक पत्र का प्रकाशन किया, जो शीघ्र ही जन-अभिव्यक्ति  का आधार बन गया।19

मदन मोहन मालवीय जी द्वारा ‘अभ्युदय’ के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर खुलकर चर्चा होती थी। सरदार भगत सिंह की फांसी के बाद ‘फांसी अंक’ निकाल कर सम्पादक ने यह दिखला दिया कि हम न डरे हैं और न डरेंगे।

1919 में गोरखपुर से पं. दशरथ प्रसाद द्विवेदी के द्वारा ‘स्वदेश’ नाम से पत्र निकाला जो 1939 तक चला। इस पत्र का उद्देश्य वाक्य था-
स्वर्गालय के लिए आत्मबलि हम न करेंगे।
जिस ‘स्वदेश’ में जिए उसी पर सदा मरेंगे॥
इसी वाक्य पर चलते हुए समस्त उत्तरप्रदेश में जागृति की लहर बनाने का काम ‘स्वदेश’ ने बहुत ही खूब किया।१९२४ में पं. पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ द्वारा सम्पादित ‘दशहरा अंक’ विस्फोटक आग्नेय अस्त्रों से भरपूर था, जिसके प्रकाशन से अंग्रेजी सरकार ने सरस्वती प्रेस, जहां यह अंक छपा था छापा मार दिया और अंक को नष्ट करने का प्रयास किया।

स्वदेश का मूल भाव सभी अंकों में मुख पृष्ठ पर प्रकाशित किया जाता था-
जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।

१९२० में प्रारम्भ हुए ‘आज’ जिसे बाबू शिवराम गुप्त ने शुरु किया था, का सम्पादन भार बाबूराव पराड़कर ने संभाला और स्वतन्त्रता आन्दोलन में रचनात्मक भूमिका अदा की। इस पत्र के प्रवेशांक में ही पराड़कर ने अपने आलेख में लिखा है कि हमारा उद्देश्य अपने देश के लिए सब प्रकार से स्वातन्त्र्य उपार्जन है। हम हर बात में स्वतन्त्र होना चाहते हैं। हमारा लक्ष्य यह है कि हम अपने देश का गौरव बढ़ावें, अपने देशवासियों में स्वाभिमान का संचार करें, उनको ऐसा बनावें कि भारतीय होने का उन्हें अभिमान हो, संकोच न हो।20 इस पत्र का उद्देश्य था गांधी के पदचिह्नों पर चलते हुए भारत को स्वतंत्र कराना| यह समाचार पत्र अंग्रेज सरकार की आंखों का छर्रा था| १९३० के नमक आंदोलन, १९४२ में भारत छोड़ो आंदोलन के अलावा कई मौकों पर इसे अंग्रेजी सरकार ने बंद कर अपनी कुदृष्टि का परिचय दिया। पं. रामगोविन्द त्रिवेदी के सम्पादन में ‘सेनापति’ नामक एक पत्र का प्रकाशन हुआ, जिसके उद्देश्य को सम्पादक ने बिल्कुल स्पष्ट किया है कि हमारा एकमात्र उद्देश्य है आर्य-जाति में वीर-भाव का जागरण और उसकी शक्ति का सुसंघठन। सम्पादक की टिप्पणी देखकर यह निश्च्येण स्पष्ट हो जाता कि हिन्दी पत्रकारिता ने राष्ट्रिय जागृति एवं स्वातान्त्र्य समर में अपना विशिष्ट योगदान दिया है।

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर ‘मतवाला’ नाम से पत्र का प्रकाशन १९२३ मे प्रारम्भ किया। यद्यपि इस पत्र का प्रकाशन साहित्यिक एवं सामाजिक था, तथापि निराला जैसे प्रखर एवं संघर्षशील व्यक्तित्त्व के साथ यह कैसे संभव होता कि स्वातान्त्र्य और स्वछन्दता की अभिव्यक्ति न हो। अपनी कविताओं के माध्यम से निराला सदैव अत्याचार और अनाचार तथा सामाजिक एवं राजनीतिक मुक्ति के स्वर  से जन-जन को के हृदय को ‘मतवाला’ कर देते थे। पत्र के तीसरे अंक में छपी एक कविता का अंश देखीए-
चूम चरण मत चोरों के तू, गले लिपट पर गोरों के तू,
झटक पटक झंझट को झटपट झाँके झाड़ में मान।
मिटी मोह-माया की निद्रा गए रूप पहचान
आप आप कर अब न अमर को, बना बाप न वंचक नर को,
अगर उतरना पार चाहता दिखा शक्ति बलवान।
मिटी मोह-माया की निद्रा गए रूप पहचान।

निरालाके इस ‘मतवाला’ पत्र के दूसरे पृष्ठ पर हमेशा यह पंक्तियाँ छपी रहती थीं, जो कलम की शक्ति और सौन्दर्य का सुन्दर उदाहरण देती थीं और वो पंक्तियाँ थी-
खींचों न कमानों को  न  तलवार  निकालो।
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो॥

निष्कर्ष:
            भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में प्रत्यक्ष सैनिक बनकर लड़े राष्ट्रभक्त सेनानियों के साथ समाज के हर वर्ग ने अपने अपने ढंग से लड़ाई लड़ी, जिसमें हिन्दी पत्रकारिता की भूमिका भी बहुत ही महत्त्वपूर्ण रही है। निर्भीक पत्रकारों ने जनता को जगाने के लिए अपने प्राणों की परवाह न करते हुए देश पर मर मिटने वाले जवानों के वक्तव्य और सन्देश जन-जन के मन तक पहुँचाए और परिणाम यह हुआ कि बच्चे-बच्चे के हृदय में पराधीनता की बेड़ियों को तोड़ स्वतन्त्रता के लिए सर्वस्व होम करने का निश्चय दृढ़ हो गया।

भारतीय पत्रकारिता विशेषत: हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में झाँक कर देखने के पश्चात इस तथ्य में शतांश भी सन्देह नहीं रह जाता कि स्वाधीनता संग्राम के अनुष्ठान में अपनी समिधा समर्पित करने वाले देशभक्त आदर्श पत्रकारों में ब्राह्मणीय तत्त्व अग्रणीय भूमिका में रहे हैं। ब्राह्मणीय पत्रकारिता ने अपनी प्रखर प्रतिभा और औजस्वी वाणी-विचार को स्वदेशी संस्कार, स्वदेशी आहार-व्यवहार और स्वदेशी शासन के संकल्प को सत्यनिष्ठा के साथ अपनी पत्रिकाओं का मूल सन्देश बनाया और भारत के कण-कण को शंकर बन स्वाधीनता और स्वायत्तता प्राप्ति के लिए विप्लव का आह्वान कर अपना धर्म निभाया, जिसे हम सभी को स्मरण करने और  पुन: मूल्याँकित करने की आवश्यकता है जिससे स्वाधीनता-चेताओं के सही मूल्य को समझा जा सके।
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संदर्भ:     
1. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी,समाचार पत्रों का इतिहास, पृ.93
2. डॉ. श्रीपाल शर्मा, निर्भीक राष्ट्रवादी पत्रकार पं. बालकृष्ण भट्ट, जयमहामना मासिक पत्रिका, जुलाई 1976
3. डॉ. वेद प्रताप वैदिक, हिन्दी पत्रकारिता के विविध आयाम, पृ.122
4. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, समाचार पत्रों का इतिहास, पृ.149
5. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, समाचार पत्रों का इतिहास, पृ.152
6. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, समाचार पत्रों का इतिहास, पृ.184
7. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, समाचार पत्रों का इतिहास, पृ.185-86
8. रामरतन भटनागर, दि राइज ग्रोथ ऑफ हिन्दी जर्नलिज्म,पृ.113
9. ब्रह्मानन्द, उ.प्र. की हिन्दी पत्रकारिता, पृ.43
10. विनय, अखिल एवं गीण्डाराम वर्मा, चंचल, हिन्दी की पत्र पत्रिकाएँ, पृ. 22
11. माधुरी, सितम्बर 1943, पृ. 229
12. माधुरी, जुलाई 1903
13. ए.जी.नूरानी,इंडियन पोलिटिक्स ट्रायल्स, पृ. 122-23
14. रविशंकर शुक्ल अभिनन्दन ग्रन्थ, पृ. 121
15. माधुरी, सितम्बर 1943, पृ. 229
16. पं. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, समाचार पत्र कला, परिशिष्ट-8, पृ. 261
17. डॉ. श्रीमाल शर्मा, हिन्दी पत्रकारिता राष्ट्रीय नव उद्‍बोधन, पृ. 107
18. माधुरी,सितम्बर 1943, पृ. 229
19. डॉ. राजीव दूबे राजिम, महाकौशल की हिन्दी पत्रकारिता, डॉ. रमेश जैन, भारत में हिन्दी पत्रकारिता, पृ.174
20. हिन्दी पत्रकारिता, कृष्णबिहारी मिश्र, पृ. 343