साक्षात्कार: हिंदी के प्रसिद्ध लेखक विवेक मिश्र

प्रसिद्ध लेखक विवेक मिश्र से अनुराग शर्मा की वार्ता




हिंदी के सर्वाधिक चर्चित वर्तमान लेखकों में से एक विवेक मिश्र का जन्म 15 अगस्त 1970 को झांसी (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। डॉमिनिक की वापसी,  ‘हनियां तथा अन्य कहानियाँ’, ‘पार उतरना धीरे से’ एवं ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ?’ जैसी पुस्तकों के अतिरिक्त वे अनेक वृत्तचित्रों का पटकथा लेखन कर चुके हैं।

‘पार उतरना धीरे से’ के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का ‘यशपाल पुरूस्कार-2014’, 'डॉमानिक की वापसी' के लिये 'जगतराम आर्य स्मृति पुरस्कार', 'और गिलहरियाँ बैठ गईं' के लिये 'रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार' के अतिरिक्त वे 'युवा शिखर सम्मान' प्राप्त कर चुके हैं। उनकी मर्मांतक कहानी ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ’ गुजरात एवं महाराष्ट्र में स्वामी रामानन्द तीर्थ मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के स्नातक स्तर के पाठ्यक्रम में शामिल।

अनुराग: अपने बचपन, परिवेश, प्रारम्भिक शिक्षा के बारे में कुछ बताइये

विवेक: अनुराग जी हम-आप आज जो हैं वह एक दिन में नहीं बने..., हम हमारे बीते जीवन में धीरे-धीरे आज के लिए निर्मित हो रहे होते हैं। हमारे अतीत में हमारे वर्तमान के बीज हैं।

  मेरा जन्म बुंदेलखंड के झाँसी शहर में हुआ। बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का सीमांत इलाका है। हम लोगों का परिवार निम्न मध्यमवर्गीय परिवार था... बचपन की उस समय की बात करने के लिए मुझे आपको बीते समय में लगभग पैंतीस-चालीस साल पीछे और स्थान में दिल्ली से झाँसी ले चलना होगा... तभी आप समझ पाएंगे कि कैसे मेरा बनना-बिगड़ना ही मेरे कहानीकार का बनना बिगड़ना भी है…

   …झाँसी में क़िले की दीवार से थोड़ा नीचे खड़ी है पुरानी कोतवाली जिसके सामने से नीचे उतरती ढलान को टकसाल कहते हैं। राजे-रजवाड़ों के समय में यहाँ किसी इमारत में सिक्के बनते थे। यह ढलान अपने दोनो ओर बीसियों सँकरी गलियों में बंटकर पुराना शहर बनाती है। एक ऐसा शहर जो सालों से पुरानी दीवारों और बड़े-बड़े फाटकों से घिरा है। पिता जी बताते थे हमारा पुराना घर इसी ढलान पर कहीं था। पर किसी बुरे समय में टकसाल से दूर वह शहर के पूर्वी फाटक के पास वाली गली के कई सालों से बन्द रहे आए एक पुराने ढब के मकान में रहने चले आए थे। ये गली, ये मोहल्ला जैसे शहर के आम और ख़ास के बीच की लकीर था। मैं, सन सत्तर में यहीं, इसी लकीर पर पैदा हुआ।

    एक जगह जो कसबे जैसी थी पर शहर कहलाती थी, और पिताजी जो खेती करना चाहते थे पर रेलवे में नौकर हो गए थे, के मिलेजुले असर से हम, जो अपनी भाषा और साहित्य पढ़ना चाहते थे, आने वाले समय से डरे हुए, विज्ञान पढ़ते हुए बड़े होने लगे थे। वहाँ लिखने-पढ़ने का वातावरण लगभग न के बराबर था पर किस्से-कहानियाँ जैसे वहाँ की आबोहवा में घुले थे। हर तीज-त्यौहार, हर उत्सव-अवसाद, बल्कि कहें कि जीवन के हर मौसम, हर मौके के लिए एक कहानी थी। हम गली के एक चबूतरे से दूसरे पर यही गाते हुए कूदते थे, 'आमौती-दामौती रानी, सुनो-सुनाएँ बात सुहानी, जगत बोध की एक कहानी, हूँका देओ तो कथा कहें, न देओ तौ चुप्प रहैं।'

    यूँ ही खेलते-कूदते कई कहानियाँ मन में घर करती जा रही थीं। पर इन ऐतिहासिक और पारम्परिक किस्सों से अलग मेरे कान में पड़ी पहली सच्ची कहानी वह कन बत्तू थी, जो मैंने झाँसी से पचास मील दूर अपनी ननिहाल, तालबेहट में खेतों में खेलते हुए, नाना के यहाँ बटिया मजदूर की बेटी हनियां से सुनी थी। वह गजब की किस्सागो थी। वह कहती थी कि जब में रात में किस्सा सुनाती हूँ तो आदमी तो क्या पेड़-पौधे तक हुंकारा भरने लगते हैं।

   एक शाम उसने मुझे कान में फुसफुसाते हुए बताया था, “जानते हो! जब तुम दिन भर खेल कर साँझ ढले अपने पक्के मकान में लौट जाते हो, तब इस खेत में आसमान से एक जिन्न उतरता है और उस समय मैं खरारी खाट पर, अपने बापू के साथ लेटी हुई, उसे आसमान से उतरते हुए देखती हूँ। जब मेरा बापू बीमार होता है और देर रात तक ज़ोर-ज़ोर से खाँसता है, तब वह जिन्न जल्दी-जल्दी खेतों में काम करता है। वह गेहूँ की बालियों को छूकर उन्हें बड़ा कर देता है। फिर वह अपनी काली चादर हिला कर मुझे और मेरे बापू को पंखा झलता है, जिससे बापू की खाँसी शान्त हो जाती है और वह सो जाता है, फिर मैं उस जिन्न की पीठ पर बैठ इन खेतों पर उड़ती हूँ, जो रात को मेरे होते हैं, सिर्फ मेरे, पर सुबह होते ही यह तुम्हारे हो जाते हैं और वह जिन्न गायब हो जाता है और मैं रह जाती हूँ, हनियां, कन्नू माते की बिटिया, जो खजूर के पत्तों से पंखा और डलिया बनाती है, छेओले के पत्तों से दोने-पत्तलें बनाती है, जिसे छू लेने भर से तुम अपवित्र हो जाते हो और तुम्हारी नानी तुम पर घड़ों पानी उड़ेल कर तुम्हें स्नान कराती हैं और तुम्हारी नज़र उतारती हैं।” उसकी बातों ने हमारे आसपास खड़ी उन दीवारों के बारे में बताया जो उस समय हमें दिखाई नहीं देती थीं।

बड़े होने पर वे दीवारें साफ़ दिखने लगीं।
     

अनुराग: रोचक बचपन। उसके बाद? आपकी शिक्षा-दीक्षा, रोज़गार, कहानियों का प्रकाशन?

विवेक: तब सोचा भी नहीं था कि एक दिन बुन्देलखण्ड के गाँव, कसबों और शहरों के किस्सों में भटकती ये ज़िन्दगी उस महानगर में जाकर टिकेगी, जो देश की राजधानी भी है। वे नब्बे के दशक की शुरुआत में, मुफ़लिसी और बेरोजग़ारी के दिन थे जब विज्ञान में स्नातक (बी.एस.सी.) और उसके बाद दन्त स्वास्थ्य विज्ञान (डेंटल हाइजीन एंड ओरल फ्रोफोलेक्सिस) तक की पढ़ाई करके काम की तलाश में, मैं दिल्ली आया था।

  तब बड़े ज़ोरों से कहा जा रहा था कि उदारीकरण से बाज़ार के नए रास्ते खुल रहे हैं। इससे बेरोज़ग़ारी दूर होगी, मंहगाई पर नियन्त्रण होगा, सबको रोज़ग़ार के बराबर अवसर होंगे। देश पूरी तरह बदल जाएगा। पर इन सब बातों की तनिक-सी भी रोशनी हमारे घर-गली या गाँव तक नहीं आ रही थी। हमने वाणिज्य, अर्थशास्त्र या सूचना प्रोद्योगिकी जैसे विषयों की पढ़ाई नहीं की थी। उस समय जितना, जो कुछ पढ़ा था, धनाभाव और तगड़ी पैरवी के बिना, उससे अपना काम शुरु करना या कोई नौकरी हासिल करना, आसान नहीं था।

  संगी-साथियों में जो सयाने थे और जिन्होंने समय की नज़ाक़त भाँप ली थी वे वीजा-पासपोर्ट की जुगाड़कर विदेश भागे जा रहे थे।

...तभी हमने एक बात और जानी थी कि जाने-अनजाने बचपन के किसी क्षण में, हमें हमारी भाषा और मिटटी के मोह ने जकड़ लिया था। हम किसी भी तरह उससे मुक्त नहीं हो पाए थे। हमें इसी देश में अपनी इसी भाषा में ही कुछ करना था और साथ ही एक संकट और था और वो ये कि ऐसे समय में जब सब कहीँ भागे जा रहे थे और कोई किसी की नहीं सुन रहा था हमें सपने देखने और किस्से सुनाने की लत लग चुकी थी.

 ... पर इन किस्सों से जुड़ा एक दूसरा पहलू भी था और वो ये कि जब सारी योजनाएं यथार्थ की ठोकर खाकर, मुँह के बल गिर रही थीं, संभावनाओं के बीज अंकुरित होने से पहले ही पाँव सिकोड़ने लगे थे, उस समय में ये किस्से हमारे जीवन में संजीवनी का काम कर रहे थे। यूँ कहें कि हमारे सपनों की ज़मीन को बचाए रखने में किस्से ही हमारा एकमात्र सहारा थे। समझिए कि इन्हीं की दम पर हम दिल्ली में टिके हुए थे।

  बल्कि यूँ कहूँ कि टिके तो थे, पर रमे नहीं। उसी समय डेंटल हाइजीनिस्ट के पद पे नियुक्ति हो गई। भारत में यह फील्ड नई थी, बहुत कम लोग जानते थे कि एक डेंटल हाइजीनिस्ट ठीक-ठीक क्या होता है और क्या करता है। इस काम को करते हुए लिखने-पढ़ने का माहौल और समय बहुत कम मिल पाता था। पर भाषा और साहित्य में रूचि के कारण भीतर जो भी पक रहा था उसकी वजह से पान, तम्बाकू, सुपारी गुटखा खाने वाले मरीज़ों से जुड़ने उन्हें समझने और अपनी बात उनकी भाषा-वाणी में समझाने में बहुत मदद मिली। वहीं से जाना कि हर साधारण से साधारण दिखने वाले चेहरे के पीछे एक लम्बी कहानी है.। नौकरी करते हुए ही पत्रकारिता एवं जनसंचार की पढ़ाई की। उसके बाद उसमें स्नातकोत्तर भी किया। जिसकी वजह से साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में लिखने का सिलसिला बना।


अनुराग: साहित्य से आपका पहला परिचय कैसे हुआ था? क्या परिवार में पहले से कोई लेखन से जुड़ा था?

विवेक: झाँसी छूटा तो घर भी पीछे छूट गया। रह गया तो बस घर का सपना। बचपन की शरारतें, दोस्तों के ठहाके धीरे-धीरे गुम होते गए। अस्तित्व की, रोज़गार की लड़ाई दिनो-दिन तेज़ होती गई। भीतर की ख़ामोशी बाहर के शोर से संतुलन बैठाती रही। इस बीच लिखना नहीं हुआ, पर जो बीज बुंदेलखंड की मिटटी से लेके चला था उसके लिए ज़मीन तैयार होने लगी थी। जैसा मैंने पहले भी कहा वहाँ के हर आदमी में बुंदेले हरबोलों की, एक किस्सागो की आत्मा बसती है। वहाँ बातचीत भी किस्सों के जैसी है.। सहज सूचना भी बहुत रोचक और नाटकीय ढंग से देने का चलन है... शायद वहाँ के लोग अपने दुरूह जीवन को किस्सों के माध्यम से थोड़ा सरल और सहज बनाने की कोशिश करते हैं। ज़िन्दगी, रोटी-रोजगार वहाँ आज भी बहुत कठिन है, फिर भी आदमी की आँखों में जीने की ललक और उम्मीद की चमक है.

  पिता जी ने सन साठ के आसपास कानपुर से, अंग्रेजी साहित्य से एम.ए. किया था। बचपन से उनकी अलमारी में हिंदी-अंग्रेजी साहित्य की किताबें देखीं थीं। उस अलमारी को हर कोई नहीं छू सकता था, पर जब नौवीं की परीक्षाओं के बाद गर्मियों की छुट्टियों में उस अलमारी के दरवाज़े हमारे लिए खुले तो मानो एक नई दुनिया के दरवाज़े खुल गए। मैं सारे खेल छोड़ कर उसमें से अपने मतलब की कोई किताब उठाता और दिन-रात उसे पढ़ते हुए एक अलग ही दुनिया में खोया रहता, फिर उस दुनिया का अपने आसपास की दुनिया के यथार्थ से मिलान करता... बड़े असमंजस भरे दिन थे। कभी प्रेमचंद, कभी रेणु तो कभी चेखव और तोल्स्तोय..., बाल मन इन सबको मिलाके एक अलग ही दुनिया रचता था। पिता जी वैसे कम बोलते थे पर कहानियों की बात होती तो बड़े विस्तार से बताते... अब लगता है साहित्य की दुनिया से दूर होते भी एक सधा हुआ आलोचक उनके भीतर था। वह अक्सर साहित्य की आलोचना करते-करते जीवन की बहुत महीन आलोचना में उतर जाते थे जिसे हम उस समय नहीं समझ पाते थे।  

  जब रोटी-रोजगार की जद्दोजहद शुरू हुई तब पिता की जीवन दृष्टि धीरे-धीरे मेरे भीतर खुलने लगी। इस समय में कुछ छोटे-मोटे लेख लिखे। अपने ही टूटने-जुड़ने की कुछ कविताएँ लिखीं। सात-आठ साल ऐसे ही दिल्ली में डूबता-उतराता रहा। कई वृत्तचित्रों के निर्माण में शामिल हुआ। नाटक लिखा, संवाद लिखे और कुछ गीत और ग़ज़लें भी। यहाँ तक कि कुछ दिनों के लिए एक विज्ञापन एजेंसी के लिए जिंगल भी लिखे... कहूँ कि इसमें कुछ मन से लिखा, तो कुछ बेमन से।


अनुराग: पूर्णकालिक नौकरी के साथ साहित्य यात्रा किस प्रकार चलती है?

विवेक: हिंदी के लेखक के लिए नौकरी का होना और न होना दोनों कष्टकारी है। नौकरी न हो तो आप कितना भी अच्छा लिखकर अपने लेखन मात्र से अपनी आजीविका नहीं कमा सकते। आप लेखक हैं इसके चलते आपके राशन, बिजली, पानी, बच्चों की फीस और टेलीफ़ोन (अब इंटरनेट भी) के बिल न तो एक सीमा से अधिक, कम हो सकते हैं और न ही माफ़। मतलब कितना ही किफायत से रहें, सुखों का त्याग करें पर लेखक को भी जीना तो उन्हीं हालातों में है जिनमें सब जी रहे हैं।

  हिंदी में शायद ही कोई साहित्यकार हो जिसकी जीविका सिर्फ़ लेखन से चलती हो। कुछ गिनेचुने हैं जो ये दावा करते हैं पर हक़ीकत कुछ और ही है। इसके लिए उन्हें बाज़ार और प्रकाशकों के दबाव में या तो सस्ते पल्प फ़िक्शन में उतरना पड़ता है, या फिर वे भक्ति साहित्य, चालीसा टाइप कुछ लिखकर महान और पूज्य होने का ढोंग रचते हैं, हकीक़त में उनके घर का खर्च भी लेखन की रॉयल्टी से नहीं बल्कि आय के किसी अन्य स्रोत से या फिर उनकी पति या पत्नी की नियमित नौकरी से चलता है। एक मौलिक लेखक के लिए केवल लेखन से मिले पैसे से जी पाना और यदि परिवार है तो उसे पाल पाना बहुत कठिन काम है। जिन्होंने ऐसी कोशिश की भी, उन्हें अन्तोगत्वा किसी प्रकाशक के यहाँ नौकरी करनी पड़ी।

  अब दूसरी तरफ नौकरी होने और उसके साथ लेखन की अपनी मुश्किलें हैं। नियमित नौकरी आपके दिन का, आपके जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा खा जाती है। जो बात आप सुबह से अपने मन में लिए घूम रहे होते हैं उसे लिखने का समय आपको सबसे बाद में मिलता है। गद्यकारों के लिए बात और कठिन हो जाती है। अगर आप कोई लम्बी कहानी या उपन्यास लिख रहे हैं तो लेखन के अलावा उससे जुड़े शोध के लिए, सम्बंधित जानकारियाँ जुटाने के लिए, पढने के लिए अपनी दिनचर्या में से समय चुराना और कठिन हो जाता है। राजेन्द्र जी (राजेन्द्र यादव) कहा करते थे हिंदी का लेखन थका हुआ लेखन है क्योंकि यह पूर्णकालिक न होकर एक पार्ट टाइमर का लेखन है.। यह बात काफी हद तक सही भी है। सबके पास यह सुविधा नहीं कि वह काम-काज छोड़कर लिख सके...    


अनुराग: पहली कहानी कैसे छपी, कब, कहाँ, कौन सी?

विवेक: मेरा कहानियाँ लिखना शुरू करने और उनके छपने में एक बड़ा गैप था... सन 2005 में लगभग पैंतीस की उम्र में, दस कहानियाँ लिख चुकने के बाद भी मैंने अपनी कोई कहानी कहीं छपने के लिए नहीं भेजी थी। उस समय तक जो कविताएँ, लेख और वृत्तचित्रों की पटकथाएंँ लिखी थीं बस इन्हीं में से कुछ एक चीजें छपी थीं। साहित्य समाज से दूर और अपरिचित था, चाहता था पहले कविता संग्रह छपे। वही लेकर शिल्पायन के ललित शर्मा के पास गया था। उन्होंने कविताएँ देखे बिना ही कहा ‘कविताएँ छापना तो बहुत मुश्किल है... आपने इसके अलावा और कुछ लिखा हो तो बताइए...’ मैंने कहा कुछ कहानियाँ लिखी हैं जो अभी तक किसी को दिखाई नहीं। उन्होंने कहा, ‘दिखाइएगा.., अगर छपने लायक हुईं तो उन्हें जरूर छापूंगा.’ उन्हें कहानियाँ भेजीं। लगभग तीन महीने बाद फोन आया, ‘कहानियाँ अच्छी हैं, हम छाप रहे हैं.’ सुनकर बहुत ख़ुशी हुई क्योंकि तब तक यही सुन रखा था कि प्रकाशक बिना पैसे लिए कोई पुस्तक नहीं छापते।

  इस तरह पहला संग्रह ‘हनियां तथा अन्य कहानियाँ’ 2009 में शिल्पायन से आया। मित्र संजीत जो हिंदी साहित्य में पीएचडी कर रहे थे उन्होंने संग्रह पढ़कर उसे कथाकार संजीव को दिया। उन दिनों संजीव जी ‘हंस’ के कार्यकारी संपादक थे। उन्हें कहानियाँ अच्छी लगी जिससे उन्होंने न केवल कवि रमेश प्रजापति से संग्रह की ‘हंस’ में समीक्षा करवाई बल्कि राजेन्द्र जी को कहानियाँ पढने को भी कहा। कहानियाँ पढ़के राजेन्द्र जी का फोन आया। उन्होंने मिलने के लिए बुलाया। संजीव जी के साथ उनसे मिलने पहली बार उनके घर गया। एक अजीब से संकोच और भय से घिरा था। राजेन्द्र यादव नाम के इस संपादक के बारे में तरह-तरह की बातें सुन रखी थीं। पर वह इतनी आत्मीयता से मिले और उस पहली मुलाक़ात में उन्होंने ‘हनियां’ की न केवल तारीफ़ की बल्कि उसकी गहन विवेचना भी की। कहा ‘आजकल ऐसी कहानियाँ बहुत कम पढने को मिलती हैं.’ उसके बाद उन्होंने एक सवाल पूछा कि यह कहानी संग्रह में आने से पहले किस पत्रिका में छपी थी। मेरा उत्तर था ‘किसी में नहीं, ये सारी कहानियाँ सीधे संग्रह में छपी हैं.’ सुनकर उन्होंने सर पकड लिया.। फिर हँसते हुए बोले ‘अब अगली जो भी कहानी लिखो..., ‘हंस’ को भेजना.’ उसके कुछ दिन बाद जो कहानी लिखी वह ‘बदबू’ शीर्षक से ‘हंस’ में छपी। तब पता चला एक नए लेखक की कहानी के ‘हंस’ में छपने का क्या अर्थ होता है। लिखना एक बात है पर रचना का पाठकों तक पहुँचना, पत्रों के माध्यम से उनकी प्रतिक्रियाएँ जानना दूसरी, इसका स्वाद ‘हंस’ में छपने के बाद लगा। सच कहूँ तो उसके बाद ही अपने भीतर के कहानीकार को गंभीरता से लेना शुरू किया। लगा कि जितनी मैं समझता था यह उससे बड़ी जिम्मेदारी है। उसके बाद कथा साहित्य के अध्ययन का दायरा भी बढ़ा। यह वह समय था जब ‘हंस’ में स्वीकृत कहानी भी संजीव जी और राजेन्द्र जी, लेखक से कई बार लिखवाते थे। दूसरों की कहानी पर भी अपनी कहानी की तरह मेहनत करते। उनके कथ्य, भाषा और शैली के अलावा उनके अंत और उसमे छुपे निहितार्थों पर, यहाँ तक की शीर्षक तक पर बहसें होतीं। उस समय संगम पांडे भी ‘हंस’ में थे। उनकी भी कहानियों की समझ बहुत अच्छी है। वह भी अक्सर इन बहसों में हिस्सा लेते थे। मतलब किसी भी कहानी को छपने से पहले खूब ठोक-बजाकर चेक किया जाता। कई बार तो लेखक के सामने ही उसकी कहानी की खूब कटाई-छिलाई होती।                                  


अनुराग: मैं आपको मुख्यत: एक कथालेखक समझता था। अन्य विधाओं में अपने लेखन के बारे में कुछ बताइये।

विवेक: शुरुआत गीत, ग़ज़ल और कविताओं से हुई। फिर वृत्तचित्रों की पटकथाएंँ लिखी। इस बीच पिता जी का देहांत हो गया। उनके जाने के बाद एक खालीपन जो बचपन से मेरे भीतर घर किए बैठा था उसने जैसे बाहर निकलकर मेरे व्यक्तित्व को ढक लिया।

    उधर अस्थाई नौकरी, छोटी तनख़्वाह, फ्रीलॉन्स राइटिंग के बीच, ज़िन्दगी के रास्तों पर हवाएँ उल्टी ही चलती रहीं। बाहर उनसे जूझता रहा और भीतर सच्चाई और कल्पना में संतुलन बैठाता हुआ किताबों की दुनिया में कभी उनके भीतर और कभी उनके बाहर भटकता रहा। कहीं सच्चाई जीती, तो कहीं कल्पना, पर इस कशमकश ने पहली कहानी लिखवा ही ली। और वो थी, पिता की मौत पर लिखी गई कहानी ‘गुब्बारा’, जिसे लिखने के बाद एहसास हुआ कि हम जिस समय में रह रहे हैं वहाँ यथार्थ इतना जटिल है, वह इतनी परतों से ढँका है कि उसको व्यक्त करने के लिए कहानी जैसी ही विधा की दरकार है। आज भी कभी-कभी अन्य विधाओं में लिखता हूँ... कविताएँ अभी भी लिखता हूँ... पर जैसे वे सिर्फ़ अपने लिए हैं। पर कहानियाँ, और अब उपन्यास ये अपने समय और समाज के लिए हैं। उसी में कहीं न कहीं मैं भी हूँ। समझिए की मन के भीतर और बाहर कथाओं का वितान इतना बड़ा है कि उसने बाकी सब कुछ ढक लिया है।


अनुराग: आपकी रचनाओं में सबसे ज़्यादा हलचल किसने मचाई और क्यों?

विवेक: मेरी रचनाओं का द्वंद्व बाहर से ज्यादा मेरे भीतर का था। जिससे धीरे-धीरे मुझे ख़ुद ही निपटना था। हाँ जो भी भीतर घटित हो रहा था उसे एक किस्से के तौर पे लिखा जा सकता है और मैं भी उन्हें एक किस्से में ढाल सकता हूँ यह ख्याल पहली बार उदयप्रकाश की कहानियों को पढ़ते हुए आया। उनकी कहानियाँ आपके भीतर और बाहर एक साथ घटित होती हैं। जब मेरे पिता की मृत्यु हुई उसी समय मैंने उनकी पिताजी, दरियाई घोड़ा, नेलकटर, और अंत में प्रार्थना जैसी कहानियाँ पढ़ीं। उदयप्रकाश हिंदी के ऐसे लेखक हैं जिन्हें पढ़ते हुए पाठक सिर्फ़ पाठक नहीं रह जाता वह लेखक के साथ ख़ुद एक लेखक, चिंतक और विचारक बन जाता है। भाषा की यह ताक़त बहुत कम लोगों के पास होती है। उसके बाद संजीव की शोधपरक शैली ने बहुत प्रभावित किया। अपराध और आरोहण जैसी कहानियों ने सिखाया कि अपने बाहर निकल के, अपने समय के यथार्थ को आत्मसात करके अपनी रचनाओं में कैसेे उतारा जा सकता है। उसके बाद मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों से रूबरू हुआ। वे भी बुंदेलखंड से आती हैं। उनसे सच को जस का तस रखने का साहस सीखा। एक लेखक को अपने लिखे को सिद्ध करने के लिए कई बार अपने कहे शब्दों के साथ खड़ा भी होना पड़ता है। यह बात आज सबसे ज्यादा मैत्रेयी जी के लेखन और व्यक्तित्व में है। मतलब प्रेमचंद, रेणु और निर्मल वर्मा ने मन में जो नींव रखी थी, उसपर मकान कैसे बनाना है यह उदयप्रकाश, संजीव और मैत्रेयीपुष्पा की रचनाओं ने सिखाया।      


अनुराग: आपकी कुछ कहानियों पर बात करें? 'हनियां व अन्य कहानियाँ' की रचना प्रक्रिया के बारे में कुछ बताइये।

विवेक: शुरुआत में शब्दों के इस समुंदर में उतरते हुए बहुत डर  लगा क्योंकि किश्ती में पहले से ही कई छेद थे, विज्ञान का विद्यार्थी था, व्याकरण की, वर्तनी की बीसियों गलतियाँ करता था, पर लेखन से दूर, किनारे पर बैठ कर भी कोई खास चैन नहीं था, सो चल ही पड़े। लगा इससे भीतर की बेचैनी थोड़ी कम होगी, पर जब अपने घर, गली, गाँव, नहर और आस-पास के ताल-तलैयों को, अपनी माटी की लोक कथाओं को मन में लिए इस राह पर चलना शुरु कर रहा था तो नहीं जानता था कि बचपन से किलों, महलों और परकोटों के शहर में रह कर भी मेरे मन में जो कहानियाँ बस रही थीं, वे इन सबसे अलग किसी भयावह सन्नाटे की अनकही कहानियाँ थीं, जो अपने समय में पूरी नाटकीयता के साथ घटित होने के बाद भी, कहीं दर्ज़ नहीं हुई थीं। बुंदेलखंड साहित्य में बहुत कम दर्ज हुआ था। मैंने वहाँ के परिवेश की लाचारी उससे उपजी बेचैनी को अपने आसपास कई लोगों के भीतर महसूस किया था। और शायद उस समय की उस बेचैनी ने ही ‘हनिया’ लिखवा ली। लगा कि भाषा, शिल्प जैसा भी हो पर समाज का ये सच जिस रूप में मैं इसे जानता हूँ, इसे ऐसा ही लिखा जाना चाहिए।
 

अनुराग: 'और गिलहरियाँ बैठ गईं' में एक रहस्यमय वातावरण है। ऐसे रहस्य, या तिलिस्म की बात कहाँ से आती है? क्या लेखक चेतन और अवचेतन में मेल करने का कोई जादू जानता है?

विवेक: ‘और गिलहरियाँ बैठ गईं...’ को लिख पाना, उसका ‘हंस’ में छपना और पाठकों से होते हुए ‘रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार’ तक आना, मेरे लिए मेरे भीतर के एक अनकहे दर्द के पहचाने जाने जैसा है। क्योंकि यह वह कहानी है जो शायद मैं कभी लिखना नहीं चाहता था और जानता था कि यही वह कहानी है जिसे लिखे बिना मैं रह नहीं पाऊंगा। यह कहानी तब से ज़हन में थी जब कहानियाँ लिखना तो क्या उन्हें ठीक-ठीक पढ़ना और समझना भी नहीं सीख पाया था। पर जब कहानियाँ लिखना शुरू किया तो इसका लिखना लगातार स्थगित होता गया। और वह इसलिए कि इस कहानी के भीतर की चुप्पी को काग़ज़ पर उतार सकनेवाली भाषा मेरे पास नहीं थी। इसमें घर-परिवार और शहर के साथ इतनी परछाइयाँ घुली-मिली थीं कि जब भी मैं उन्हें बिलगाने बैठता, तो मैं ख़ुद ही उनमें उलझ जाता। इसलिए शायद अपनी हर कहानी लिखते हुए मैं ‘और गिलहरियाँ..’ लिखने के लिए थोड़ा-थोड़ा तैयार हो रहा था। जिन लोगों ने मेरी और कहानियाँ पढ़ी हैं तो वे इसे ‘गुब्बारा’ और ‘दोपहर’ की अगली कड़ी के रूप में भी देख सकते हैं।      

  जैसे-जैसे आप अपने रचना संसार को विस्तार देते हैं उसके लिए आप जितना बाहर की दुनिया को देखते हैं उतना ही आप अपने भीतर अपनी स्मृतियों की गहराई में भी उतरते हैं।

  कई कथानकों से गुजरते, उनसे जूझते हुए मैं अक्सर बार-बार रीतता, और फिर-फिर भर आता। जान नहीं पाता कि रीतने के लिए लिखता हूँ, या रिक्त हूँ इसलिए कहानियाँ बे रोक-टोक बही आती हैं। पर एक बार जब ये कहानियाँ भीतर प्रवेश करती हैं तो लगता है कि यह सब मेरे अपने ही जीवन की कहानियाँ हैं। शायद मन के गहरे कुँए के भीतर ही कहीं कुछ ऐसा है जिससे कोई घटना, कोई व्यक्ति, कोई परिस्थिति ऐसे पकड़ लेती है कि उससे छूट पाना मुश्किल हो जाता है। लगता है उससे कोई पुराना रिश्ता है। दिल-दिमाग़ उसके भीतर से कुछ ढूँढकर शायद अपने ही अधूरेपन को पूरा करने की कोशिश करने लगता है।  इस प्रक्रिया में ज्ञात और अज्ञात के बीच के गैप को कल्पना से भरने के क्रम में जो ट्रांस पैदा होता है शायद वही है जो यह रहस्य रचता है। यह रचना में ही नहीं जीवन में भी मेरे साथ-साथ चलता है।

   …और यह आज से नहीं है, ऐसा तब से है जब मैं नहीं जानता था कि मैं कभी कहानियाँ भी लिखूंगा। मैं बचपन में मीलों-मील फैले निचाट ऊसर मैदानों में, जहाँ इंसान और पेड़-पौधे तो क्या उनके साबुत कंकाल तक नहीं होते थे, अकेले छूट जाने के सपने देखता था। उस मैदान का भयावह सन्नाटा और उससे उपजा भय अभी भी मेरे भीतर बैठा है। उस सपने से बाहर निकलने के लिए मैं बहुत ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाता था। बहुत देर बाद, मेरी गुहार सुनकर जवाब में जो आवाज़ आती थी, वह एक स्त्री की आवाज़ थी। बहुत साधारण-सी। उसमें तनिक भी सपने जैसी भव्यता नहीं थी। वह बिलकुल रियल लगती थी। कहती थी, 'तुम जल्दी ही इस स्वप्न से मुक्त हो जाओगे। जब तुम इस मैदान को पार कर लोगे, तो मैं तुम्हें सामने खड़ी मिलूंगी, फिर मैं तुम्हें इस भयावह स्वप्न में जहाँ तुम नितान्त अकेले होते हो, वापस नहीं जाने दूंगी।' फिर मैं बेतहाशा भागते हुए उस मैदान को पार करने की कोशिश करता था।

    न वह मैदान कभी ख़त्म हुआ, न मेरी उसे पार करने की कोशिश।

    हाँ, अब उस स्त्री की आवाज़ सुनाई नहीं देती। मैं अक्सर लोगों की भीड़ में उस आवाज़ को ढूँढता हूँ। हर आवाज़ को उसी आवाज़ से मिलाकर देखता हूँ। कई बार लगता है, 'हाँ, यह वही है' पर फिर भरम टूट जाता है।

   बचपन के उस सपने ने मेरे भीतर एक कभी न भरी जा सकने वाली रिक्तता पैदा कर दी।

  मुझे लगता है कि यह रिक्तता, यह अधूरापन किसी में कम, किसी में ज्यादा हम सभी में होता है। … और हम सारी ज़िन्दगी उसी को भरने की कोशिश में लगे रहते हैं। यह रिक्तता, यह खालीपन खासतौर से उस आदमी में जो इसे किसी पूर्व प्रस्तुत चीज से नहीं, बल्कि अपने ही रचे-सृजे, देखे-समझे, अनुभूत किए से भरना चाहता है, जो भौतिक धरातल पर खड़ा होकर, वर्तमान में अपनी आँख से इस दुनिया को जितना देख पाता है, उससे कहीं ज्यादा उसे देखना चाहता है - जो अभी तक अनदेखा है, अव्यक्त है। यह बात उसके इस सफ़र को और भी मुश्किल बना देती है। इसके लिए जहाँ-जहाँ वह सशरीर उपस्थित हो सकता है, वहाँ जाता है, भटकता है, स्पर्श करता है, अनुभव करता है, सोखता है, पर कई बार अपनी आँख, अपना स्पर्श, अपना अनुभव - उस रिक्तता को भरने के लिए कम पड़ जाता है। एक समय बाद ख़ुद की योग्यता तुच्छ जान पड़ती है। ख़ुद का साहस लघु दीखता है, तब दूसरों के मन के भीतर, उनके जीवन के भीतर झाँकना होता है, उन्हें टटोलना, खंगालना होता है, पर जब उससे भी वह प्यास नहीं बुझती, वह रिक्तता नहीं मिटती, तब कल्पना में एक अलग जीवन गढ़ा जाने लगता है, पर कल्पना भी अथाह नहीं, अनन्त नहीं, वह भी एक सीमा के बाद चुकने, टूटने और खण्डित होने लगती है। ऐसी स्थिति ही एक रचनाकार के लिए सबसे कठिन और असह्य होती है।

पहले मैं इसे अपनी कमजोरी समझता था पर बाद में असह्यता ने, इस बिखराव ने एक अलग भाषा दी, संशय की भाषा और इसी डर ने इससे निकलने का एक अजीबोगरीब रास्ता भी दिखाया, और वह ये कि - एक आदमी कोई एक जीवन जीते हुए, उसे देखते हुए, एक और जीवन जीने लगता है। जैसे एक धुरी हो और दूसरा उसके चारों ओर घूमता पहिया। हालाँकि यह आसान नहीं, पर एक रचनाकार के लिए मुश्किल भी नहीं। क्योंकि भीतर की रिक्तता को भरने की कचोट इतनी असह्य है, जो उसे जीवन में किसी करवट चैन नहीं लेने देती। इस रिक्तता को भरने की सतत कोशिश से ही कोई नया अनुसंधान संभव हो सकता है, पर वह कुछ बना ही दे, ये आवश्यक नहीं, वह बना हुआ मिटा भी सकता है। अपने भीतर की इस रिक्तता को जानने-समझने-महसूस करने में, इस खाली जगह को भरने में मेरा जितना बना है, उससे ज्यादा मिटा है। कई बनी हुई धारणाएँ टूटी हैं, कई मान्यताएँ, स्थापनाएँ ध्वस्त हुई हैं, कई रिश्तों का स्वरूप बदला है। शायद इसीलिए मेरी शुरु की कहानियाँ अपने और अपने आस-पास बीतते समय के अनुभव के गिर्द, यथार्थ को केन्द्र में रखकर लिखी गई कहानियाँ हैं। पर यथार्थ के इस आग्रह ने कई स्थानों पर, सच के भीतर के सच के ऊपर एक पर्दा डाल दिया था। तब उससे आगे की कहानियों में मैंने उस पर्दे के पार देखने के लिए, सच के भीतर के सच को जानने और उजागर करने के लिए, आँखें बंद कर ली हैं और मेरा यक़ीन मानिए अब मैं बिलकुल साफ़-साफ़ देख पा रहा हूँ। जो बहुत दूर दिखाई देता था, पहुँच से बाहर था, अब मेरी ज़द में है, पर अभी भी उसके सत्य होने, या न होने का संशय बना हुआ है। और इस संशय से बाहर आने का कोई रास्ता नहीं दिखता, बस समझिए कि इसी संशय की कहानियाँ लिख रहा हूँ। या कहूँ कि बचपन के उस सपने में दूर तक फैले मैदान को पार करने की कोशिश कर कर रहा हूँ। …और इन्हें लिख पाने के लिए जिस आन्तरिक मज़बूती और निर्भीकता की ज़रूरत है, उसको पाने के लिए मैं अपने भीतर और बाहर, रोज़ एक आधी-अधूरी, एक हारी हुई-सी कोशिश करता हूँ। मेरी कहानियों में वह कोशिश कितनी दिखती है, कह नहीं सकता। शायद अब जब आप ‘और गिलहरियाँ बैठ गईं...’ को फिर कभी पढ़ेंगे तो उसमे कहीं उस कोशिश को देख सकेंगे।


अनुराग: 'ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ?' मार्च 2012 में हंस में छपी थी। जातिभेद के बीच अंतर्जातीय विवाह की इस कथा में एक स्थिति है जहाँ चिता पर शव के पाँव बाहर लटके हैं। इस एक प्रतीक से आपने बहुत गहरा संदेश दिया है। कथा में ऐसे प्रतीक के प्रयोग का विचार आपके मन में कैसे आया? क्या किसी क्षेत्र या समुदाय में सचमुच ऐसी प्रथा है?  

विवेक: हाँ, बनारस में एक जाति विशेष जो आज भी अपने में सवर्ण होने का दंभ पाले है उसमें कुछ लोग आज भी न केवल इस पर विश्वास करते हैं बल्कि इसे व्यवहार में भी लाते हैं। जब यह कहानी ‘हंस’ में छपी तो यथास्थितिवादी लोगों ने इसकी बहुत आलोचना की। कुछ ने तो फोन करके गालियाँ और धमकियाँ भी दीं। कुछ ने हंस में पत्र लिखकर आपत्ति जताई। कुछ ने कहा ऐसी कोई प्रथा है ही नहीं और कभी थी भी तो अब व्यवहार में नहीं है तो उसे इस तरह कहानी में लाने का क्या मतलब। तब इसपर एक बहस खड़ी हो गई। हिंदी आकादेमी के एक समारोह जिसमें तीन पीढ़ियों का एक साथ कहानी पाठ था, जहाँ राजेन्द्र यादव, चित्रा मुद्गल और मैं एक साथ अपनी कहानी पढ़ने के लिए मंच पर थे। मैंने यही कहानी पढ़ी और उसके बाद चर्चा में बिलकुल यही बहस शुरू हो गई। तब राजेन्द्र जी ने कहा था कि यदि सचमुच ऐसी प्रथा है तो यह रुढियों पर चोट करती एक साहसिक कहानी है, और यदि ऐसी कोई प्रथा है ही नहीं परन्तु लेखक ने अपनी बात कहने के लिए इस प्रथा के रूप में चिता और लटकते पाँवों का बिम्ब गढ़ा है तो यह एक क्लासिक कहानी है क्योंकि तब यह बिम्ब लेखक को यथार्थ से नहीं मिला है। तब थोड़ी देर के लिए मान लें कि यह प्रथा नहीं है तब उस बिम्ब के माध्यम से कहानी में जो कहा जाना था जहाँ चोट की जानी थी चोट तो वहाँ हो ही गई है। सन् 2012 से यह कहानी गुजरात और महाराष्ट्र के स्वामी रामानंदतीर्थ मराठवाड़ा विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही है।  


अनुराग: पठन-पाठन के साथ दृश्य-श्रव्य माध्यम भी महत्वपूर्ण हैं। क्या आपकी किसी कहानी पर कोई टीवी सीरियल, या फ़िल्म बनी है? इस बारे में सेतु के पाठकों को कुछ बताना चाहेंगे?

विवेक: कहानियाँ लिखने से पहले मैंने नाटकों के संवाद लिखे, वृत्तचित्रों की पटकथाएंँ लिखी। कुछ रेडियो और टीवी के लिए भी लिखा। निश्चय ही आज दृश्य-श्रव्य माध्यम की पहुँच बहुत व्यापक है। उनकी पहुँच और ताक़त को झुठलाया नहीं जा सकता। दिसंबर 2016 में मेरी कहानी ’30 मिनट्स’ पर बनी फ़िल्म  इसी नाम से रिलीज हुई। अब ‘हनियां’ पर निर्माता-निर्देशक राजा बुंदेला फ़िल्म बना रहे हैं इस बार फ़िल्म की स्क्रिप्ट भी मैंने ही लिखी थी। ‘30 मिनट्स’ में सिर्फ़ कहानी को आधार बनाया गया था और स्क्रिप्ट किसी और ने की थी जिस कारण फ़िल्म मूलकहानी से कुछ अलग है। इसके अलावा कहानी ‘खरोंच’ पर निर्देशक सोम शास्त्री स्क्रिप्ट तैयार कर रहे हैं।


अनुराग: अरे वाह! शुभकामनाएँ! आप एक लोकप्रिय लेखक हैं। आपका बड़ा पाठकवर्ग है। लेकिन अच्छे लेखक अक्सर अच्छे पाठक भी होते हैं। आप किन्हें पढ़ते हैं? किन लेखकों या रचनाओं ने आपको प्रभावित किया है?  एक सामान्य हिंदी पाठक के लिये आपका क्या संदेश है?

विवेक: हर लेखक सबसे पहले एक पाठक ही होता है। एक अच्छा पाठक, एक आस्वादक, एक जीवन का आलोचक ही धीरे-धीरे लेखक बनता है। मैं उतने समय ही लेखक होता हूँ जब मैं लिख रहा होता हूँ उसके बाद मैं एक विशुद्ध पाठक हूँ, एक ऐसा पाठक जो हर नई रचना के पास अपने सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर जाता है। मैं हर विधा में लिखा गया साहित्य, दूसरी भाषाओं से अनुदित साहित्य बहुत चाव से पढ़ता हूँ और बार-बार यह पड़ताल करता हूँ कि कहीं मैं किसी विधा के प्रति पूर्वाग्रही तो नहीं हो रहा हूँ। और शायद यही कारण है कि न केवल अपने पसंदीदा पुराने लेखकों को बल्कि अपने समकालीनों को और अपने बाद आई पीढी के लेखकों को भी में बहुत उम्मीद से पढ़ता हूँ।

  मैंने प्रेमचंद, रेणु, वृन्दावन लाल वर्मा, निर्मल वर्मा, राजकमल चौधरी, मंटो, इस्मत चुगताई, रांघेय राघव, मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, शानी, कमलेश्वर, बिज्जी से लेकर काशीनाथ सिंह, उदयप्रकाश, संजीव, शिवमूर्ति, मैत्रेयी पुष्पा, नरेन्द्र नागदेव, नासिरा शर्मा, चित्रा मुद्गल आदि कथाकारों को बहुत शिद्दत से पढ़ा है। इसके अलावा चेखव, गोर्की, होर्केस, काफ्का और मार्केस को भी इस हद तक पढ़ा है कि कई-कई दिनों तक वे सिर पर सवार रहे। अपने समकालीनों में अखिलेश, पंकज मित्र, योगेन्द्र आहूजा, अनिल कुमार यादव, सत्यनारायण पटेल, भालचंद्र जोशी, पंकज सुबीर, अजय नावरिया, टेकचंद, विमलचंद्र पांडे, मनीषा कुलश्रेष्ठ, गीत चतुर्वेदी, नीलेश रघुवंशी, अल्पना मिश्र, गीता श्री, आकांक्षा पारे, किरण सिंह, कविता, मनोज कुमार पांडे आदि ऐसे लेखक हैं जिनकी कहानियों का आज भी बेसब्री से इंतज़ार रहता है। अब इनमें से किसका कितना प्रभाव पड़ा यह बाद में बताऊंगा...                

   ...अब बात पाठकों की, एक पाठक की तरफ से दूसरे पाठकों से यही साझा करना चाहूँगा कि वही रचना कालजई होती है जो पाठकों की स्मृतियों में यात्रा करती है। आपको ऐसे झाँसे अक्सर दिए जाएंगे कि अरे आपने उन्हें नहीं पढ़ा? फलाँ कबसे लिख रहे हैं, उन्होंने कितना लिखा है। साहित्य में कबसे और कितने का कोई महत्त्व नहीं, महत्व है उन्होंने क्या लिखा है।        


अनुराग: हिंदी साहित्यकारों की शिकायत है कि सुदर्शन हों या दिनकर, प्रेमचंद या अश्क, किसी को भी नोबल नहीं मिला। आपके विचार?

विवेक: नोबेल पुरस्कार की अपनी राजनीति है जो भाषा उस राजनीति को प्रभावित करने में जितनी सक्षम हो जाती है उसी की रचना या रचनाकारों पर विचार किया जाता है। इसमें साहित्य का विश्व बाज़ार भी बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। दूसरी मुश्किल - हिंदी साहित्य का विपुलता में दूसरी भाषाओं में अनूदित न होना भी एक बड़ा कारण है। लेकिन नोबेल ही कोई अकेला श्रेष्ठता का पैमाना नहीं है। और भारत के ही नहीं अन्य कई भाषाओं के कई बड़े साहित्यकारों को नोबेल नहीं मिला।

...आप अगर ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि कहीं न कहीं व्यवस्था के भीतर रहकर परिवर्तन की कामना करने वाले धर्म और सत्ता का सीधा विरोध न करने वाले लेखकों को ही नोबेल मिलता आया है। बाज़ार और सत्ता को उनसे सीधा खतरा नहीं। वर्ना भारतीय भाषाओं में अच्छे लेखकों की आज भी कमी नहीं... के. सच्चिदानंद, भैरप्पा, संखघोष, उदयप्रकाश, जय गोस्वामी जैसे कई लेखक हैं जो कई नोबेल पुरस्कार प्राप्त लेखकों से भी अच्छा लिखते रहे हैं।


अनुराग: नोबल तो खैर बाहर की बात है, देश के भीतर पुरस्कारों की स्थिति क्या है? क्या उनके चयन, योग्यता, प्रक्रिया आदि में पर्याप्त पारदर्शिता और ईमानदारी है?

विवेक: यहाँ भी परोक्ष-अपरोक्ष रूप से सत्ता और उससे जुड़ी राजनीति हावी है। जरूरी नहीं कि पुरस्कार के लिए कोई लेखक ही राजनीति करे। राजनीति ख़ुद अपने विचार का समर्थन करने वाले लेखक को ढूँढ़कर आगे कर देती है। जहाँ वाम सत्ता में है वहाँ वाम जहाँ दक्षिण पंथी सत्ता में हैं वहाँ दक्षिण पंथी।

पुरस्कार वर्तमान समय की राजनीति और आपकी कृति के समय के सुयोग पर भी निर्भर करते हैं। जैसे किसानों की आत्महत्या पर सरकारों की पोल खोलने वाले संजीव के उपन्यास ‘फाँस’ को कहीं जगह नहीं मिलेगी। उसमें ढूँढ-ढूँढ के कमियाँ निकाली जाएंगीं। और जो सत्ता को सूट करता है उसे इसके आगे कुतर्क से अच्छा सिद्ध कर दिया जाएगा। अगर आपकी बात उनके एजेंडे को सपोर्ट करती है तो आप राजनीति करें न करें आप और आपकी कृति राजनीति का हिस्सा बन जाती है.

  ...वैसे पुरस्कारों की बात से इतर मेरा मानना है कि साहित्य भी कभी निष्पक्ष नहीं होता, इसमें अवश्यकर पक्षधरता होती है, पता चलता है आप किसके पक्ष में खड़े हैं। इसलिए साहित्य भी महीन किस्म की राजनीति ही है। देश की बदलती राजनीति में बहुत से लोगों के मुखौटे उतरे हैं।


अनुराग: पंडित सुदर्शन की 'हार की जीत', चंद्रधर शर्मा गुलेरी की 'उसने कहा था', प्रेमचंद की 'ईदगाह', आदि ऐसी कहानियाँ हैं जो कभी पुरानी नहीं पड़तीं। इनमें क्या खास है जिसे अपनाकर वर्तमान हिंदी लेखक अपने लेखन में सुधार कर सकें?

विवेक: जिन कहानियों में सर्वकालिकता होती है, जिनमें जीवन की मौलिकता का दर्शन छुपा होता है वे कहानियाँ कई पीढ़ियों तक लोक की स्मृति में बसी रहती हैं। इन कहानियों में यही खास है। ‘हार की जीत’ कहती है कि पूरी मनुष्यता की नींव एक भरोसे पर टिकी है, जिसको कुछ भी हारकर बचाया जाना चाहिए। ‘उसने कहा था’ में प्रेम की वह उदात्तता है जो जीवन में सतत रही आती है। ‘ईदगाह’ का हामिद न केवल रिश्तों की परवाह कर उन्हें पुख्ता करता है बल्कि उसका बाल मन तर्क से अपने साथियों को ही नहीं अपने भीतर की उस प्रवृत्ति को भी काउंटर कर रहा है जिसके चलते आज की भाषा में कहें तो हम पीयर प्रेशर में आ जाते हैं। यहाँ मानवीय सम्बन्धों का ऐसा बीज बोया गया है जिसके वृक्ष बनने पर कोई उसे काट नहीं सकेगा। साहित्य और कला का हर उद्यम, हर संधान अंततः मनुष्यता को बचाने और मानवीय रिश्तों को समझने, उन्हें बेहतर बनाने के लिए ही तो है। हम आज जो हैं कल इससे बेहतर हों, सारी कवायद इसी की है। अगर ये बात किसी कलम में नहीं है तो उसे थोड़ा थम के सोचना चाहिए।      


अनुराग: चाहे भारत हो या मॉरिशस, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, हिंदी/साहित्य की सरकारी, ग़ैर-सरकारी संस्थाएँ, दुनिया भर में उपस्थित हैं, लेकिन हिंदी कहीं कराह रही है। क्या यह हिंदी संस्थानों की असफलता नहीं? इन संस्थानों को सक्षम कैसे बनाया जा सकता है? क्या ये हिंदी/साहित्य संस्थाएँ सम्मेलनों, तथा सालाना पुरस्कारों की घोषणा के अतिरिक्त कुछ खास करती हैं? हिंदी के उत्थान में उनका क्या उत्तरदायित्व बनता है और वह कैसे याद दिलाया जाये?

विवेक: अनुराग जी वैसे तो इस प्रश्न का उत्तर आप मुझसे बेहतर दे सकते हैं। पर भारत में भाषा और साहित्य से जुड़ी संस्थाओं को देखकर यही लगता है कि इन संस्थाओं के आकार-प्रकार और इनपर होने वाले खर्चों की अपेक्षा इनसे हासिल बहुत कम है। इनके काम करने के तौर-तरीके बहुत पुराने हो चुके हैं। इनके संचालन में इच्छाशक्ति का बहुत अभाव दिखाई देता है। जहाँ सही मार्गदर्शन मिला वहाँ इन संस्थाओं ने अच्छा करके दिखाया। हिंदी अकादेमी, दिल्ली का पिछले दो-ढाई साल का कामकाज, उससे निकलने वाली पत्रिका इन्द्रप्रस्थ भारती की गुणवत्ता, इस बात का प्रमाण है। मेरे हिसाब से साहित्य से जुड़ी संस्थाओं, जिनमें साहित्य की शिक्षा देने वाले विश्वविद्यालयों को भी मैं शामिल मानता हूँ, दरअसल उनका पहला दायित्व लेखकों की ओर न होकर पाठकों की ओर होना चाहिए क्योंकि मेरा मानना है कि ‘लेखक’ संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में नहीं बनते, कई देशों में ऐसे उदाहरण हैं जहाँ विश्वविद्यालय, सरकारी संस्थाएँ, यहाँ तक कि तंत्र और व्यवस्था ही ध्वस्त हो गई पर वहाँ उन्हीं हालातों में बहुत अच्छे लेखक पैदा हुए। मतलब, किसी व्यक्ति को लेखक समय और समाज बनाता है पर एक समाज में संस्थाएँ और विश्वविद्यालय नए पाठकों को बनाने और साहित्य से जोड़े रखने का काम कर सकती हैं।  


अनुराग: धन्यवाद। आपकी बात से सहमत हूँ। प्रवासी हिंदी लेखकों के लिये दो शब्द?

विवेक: प्रवासी हिंदी लेखन की एक लंबी परंपरा है - ऊषा प्रियंवदा और अभिमन्यु अनत जैसे सशक्त रचनाकारों ने अपने देश से दूर रहकर बहुत अच्छी रचनाएँ हिंदी को दीं। उसके बाद सुषम बेदी, अर्चना पेन्यूली, पुष्पिता अवस्थी जैसे कथाकारों ने बहुत महत्वपूर्ण उपन्यास हिंदी के पाठकों को दिए। प्रवासी हिंदी लेखन भारत में हो रहे हिंदी लेखन से जुड़ा रहे इसके लिए कथाकार तेजेंद्र शर्मा, सुधा ओम ढींगरा, दिव्या माथुर, जय वर्मा जैसे लेखकों ने ‘हिंदी चेतना’, ‘पुरवाई’ और ‘गर्भनाल’ आदि पत्रिकाओं और साहित्यिक आयोजनों के माध्यम से प्रवासी लेखन के प्रचार का एक सिलसिला हमेशा बनाए रखा है। आप लोगों ने पहले ‘हिन्दयुग्म प्रसारण’ और बाद में ‘सेतु’ के माध्यम से एक उम्मीद जगाई है। लघुकथाओं में दीपक मशाल से उम्मीदें बधीं हैं, उनके पास बहुत अनुभव हैं, उन्हें गंभीरता से कथा साहित्य में आना चाहिए। आज प्रवासी हिंदी लेखन के सामने सबसे बड़ी चुनौती नई पीढ़ी को हिंदी साहित्य से जोड़ने की है। आज प्रवासी कहानी की बात करें तो कहानीकार तेजेंद्र शर्मा के बाद कोई ऐसा सक्रिय रचनाकार नहीं दिखाई देता जिसकी रचानाओं की भारत में भी चर्चा हो, उसका उनके जितना बड़ा पाठक वर्ग हो। उसका कारण भारतीय मूल की नई पीढी का लगातार अपनी भाषा से दूर होते जाना है।


अनुराग: सेतु के बारे में दो शब्द ...

विवेक: ‘सेतु’ के माध्यम से आप लोग बहुत महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। अच्छे पाठक और अच्छे साहित्य के बीच हमेशा से एक बड़ी खाई रही है जिसे समय-समय पर अच्छी पत्रिकाओं ने ही अपने प्रयासों से पाटा है। आज अच्छे, संवेदनशील पाठक के सामने खराब रचनाएंँ परोसी जा रही हैं। और दूसरी तरफ अच्छे, गंभीर साहित्य को पाठक नहीं मिल रहे। क्योंकि जो बीच की कड़ी है, जो सेतु है वह बाज़ार के दबाव ने ढहा दिया है। सतही, व्यवसायी, अखबारी, टिप्पणियाँ करने वाले आलोचक बन बैठे हैं, जो दरअसल बड़े प्रकाशकों के दलाल हैं, वे उन्हीं रचनाओं या पुस्तकों की बात करते हैं जिन्हें प्रकाशक बाज़ार में धकेलना चाहता है। एक सोची-समझी योजना के तहत हिंदी साहित्य को नष्ट-भ्रष्ट ही नहीं किया जा रहा, इसमें से हाशिए के साहित्य को पूरी तरह मिटाने की कोशिश की जा रही है। बाज़ार यह सिद्ध करने में लगा है कि पठन-पाठन भी अन्य कलाओं की तरह मात्र मनोरंजन और टाईमपास करने की वस्तु है। इसका सामाज, राजनीति और जीवन मूल्यों से कोई लेना देना नहीं है। इसी योजना में शामिल लोग यह होहल्ला करते आपको हर जगह मिल जाएंगे कि सब ख़त्म हो गया, अब कहीं कुछ अच्छा नहीं लिखा जा रहा, आज वही बचेगा जिसे बाज़ार स्वीकार करेगा, पाठक गंभीर, सारोकारों वाला, पक्षधरता वाला साहित्य नहीं पढ़ना चाहता। ऐसे लोग आज साहित्य में अनायास नहीं आए हैं उन्हें योजनाबद्ध तरीके से बाज़ार की ताक़तों ने हमारे आपके बीच स्थापित किया है। ऐसे में ‘सेतु’ जैसे प्रयास बहुत आश्वस्त करने वाले हैं। सब कुछ कभी ख़त्म नहीं होता। आप नए माध्यम की शक्ति और अपने परंपरा बोध से लैस हैं, आपको मनुष्यता पर, जीवन मूल्यों पर भरोसा है इसलिए आप सबके साथ मैं ‘सेतु’ का एक उज्जवल भविष्य देखता हूँ।

अनुराग:  विवेक जी, आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा। बहुत कुछ सीखने और समझने का अवसर मिला। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद और हार्दिक शुभकामनाएँ!

5 comments :

  1. बहुत अच्छी लगी बातचीत , बहुत सी बातें जानी,जाना कि कहानियां कहीं मन के किसी कोने में बचपन से बसती है ,हर एक के पास उसकी कहानी होती है।

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  2. Aesaa Laajawaab Sanvaad Jisko Padh Kar Man Abhi Bharaa Nahin Hai . Vivek ji Anurag Ji Kaa Aabhaar .

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  3. बेहद प्रेरणादायक बातचीत। इससे नए लेखकों को भी बहुत कुछ सिखने को मिलेगा। विवेक सर! आपका स्वभाव ही आपकी विशेषता है और आपकी विशेषता आपकी कहानी। बाकी आप समझ गये होंगे. साक्षात्कार पढ़कर अच्छा लगा।

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  4. " मैंने झाँसी से पचास मील दूर अपनी ननिहाल, तालबेहट में खेतों में खेलते हुए, नाना के यहाँ बटिया मजदूर की बेटी हनियां से सुनी थी। वह गजब की किस्सागो थी। वह कहती थी कि जब में रात में किस्सा सुनाती हूँ तो आदमी तो क्या पेड़-पौधे तक हुंकारा भरने लगते हैं।"
    साक्षात्कार बहुत अच्छा लगा। सहज , सरल, बातचीत और भारत में पले बढे युवा मन की, अपने सत्व की पहचान और रचनाशील विचारों के वितान का किस प्रकार मिर्माण होता है,यह ताना बना किस तरह बनता है, कैसे मन की वाणी को विस्तार मिलता है, उस गूढ़ प्रक्रीया का इस वार्तालाप में उजागर होना एक सधे हुए सम्पादक अनुराग शर्मा व एक क्रियाशील सृजनकर्ता विवेक मिश्रा का आपसी संवाद है। यह संवाद, पाठकों को अंत तक बांधे रखता है। बहुत अच्छा लगा।
    ' सेतु ' पत्रिका से भविष्य में इसी प्रकार की पठनीय सामग्री परोसने की आशा है और इस सफल प्रयास हेतु मेरी ढेरों शुभकामनाएं।
    - श्रीमती लावण्या शाह
    ओहायो प्रांत, उत्तर अमरीका से

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  5. बहुत खुब विवेक जी। हार्दिक बधाई और ढेर सारी शुभकामनाएॅ।

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