देवमणि पांडेय की ग़ज़लें

देवमणि पांडेय हिन्दी और संस्कृत में प्रथम श्रेणी एम.ए. हैं। वे अखिल भारतीय स्तर पर लोकप्रिय कवि और मंच संचालक के रूप में सक्रिय हैं। उनके तीन काव्यसंग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- दिल की बातें (1999),  ‘खुशबू की लकीरें’ (2005) और  ‘अपना तो मिले कोई’(2012)।
देवमणि पांडेय ने कई फ़िल्मों, सीरियलों और अलबमों के लिए भी गीत लिखे हैं। फ़िल्म 'पिंजर' में उनके गीत गीत 'चरखा चलाती माँ' को वर्ष 2003 के लिए ''बेस्ट लिरिक आफ दि इयर'' पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
देवमणि पाण्डेय

ग़ज़ल - 1

ख़ुशबुओं की शाल ओढ़े रुत सुहानी मिल गई
दिल में ठहरे एक दरिया को रवानी मिल गई

कुछ परिंदों ने बनाए आशियाने शाख़ पर
गाँव के बूढ़े शजर को फिर जवानी मिल गई

आ गए बादल ज़मीं पर सुनके मिट्टी की सदा
सूखती फ़सलों को पल में ज़िंदगानी मिल गई

घर से निकला है पहनकर जिस्म ख़ुशबू का लिबास
लग रहा है गोया इसको रातरानी मिल गई

जी ये चाहे उम्र भर मैं उसको ही पढ़ता रहूँ
याद की खिड़की पे बैठी इक कहानी मिल गई

माँ की इक उँगली पकड़कर हँस रहा बचपन मेरा
एक अलबम में वही फोटो पुरानी मिल गई

ग़ज़ल - 2

टूट गई है लय जीवन की सुर ग़ायब हैं ताल नहीं
क्या कुछ हमसे छूट गया है इसका हमें ख़याल नहीं

अपने ही जब ग़ैर हुए तो वो वृद्धाश्रम चले गए
ख़ुश है बेटा, बहू के सर पे अब कोई जंजाल नहीं

दिनभर खटा धूप में लेकिन कुछ भी हाथ नहीं आया
क्या खाएंगे बच्चे आख़िर घर में आटा दाल नहीं

क्या क्या नहीं दिया बचपन को इंटरनेट की दुनिया ने
बच्चों के अफ़सानों में क्यूँ वो बूढ़ा बेताल नहीं

दौलत वालो! देख लो आकर क्या हैं ठाट फ़क़ीरों के
जहाँ भी रहते ख़ुश रहते हैं भले जेब में माल नहीं

ख़्वाब को मंज़िल तक पहुँचाना बेहद मुश्किल है लेकिन
कभी कभी महसूस हुआ है इसमें कोई कमाल नहीं

अच्छा दिखने की ख़्वाहिश तो हर इंसां में होती है
फिरभी जो बदनाम है उसको इसका कोई मलाल नहीं

ग़ज़ल - 3

बदली निगाहें वक़्त की क्या-क्या चला गया
चेहरे के साथ-साथ ही रुतबा चला गया

बचपन को साथ ले गईं घर की ज़रूरतें
सारी किताबें छोड़ के बच्चा चला गया

रिश्ता भी ख़ुद में होता है स्वेटर की ही तरह
उधड़ा जो एक बार, उधड़ता चला गया

वो बूढ़ी आँखें आज भी रहती हैं मुंतज़िर
जिनको अकेला छोड़ के बेटा चला गया

मेरी तलब को जिसने समंदर अता किेए
अफ़सोस मेरे दर से वो प्यासा चला गया

अबके कभी वो आया तो आएगा ख़्वाब में
आँखों के सामने से तो कब का चला गया

अपनी अना को छोड़के कुछ यूँ लगा मुझे
जैसे किसी दरख़्त का साया चला गया


ग़ज़ल - 4

वक़्त के साँचे में ढलकर हम लचीले हो गए
रफ़्ता-रफ़्ता ज़िंदगी के पेंच ढीले हो गए

इस तरक़्क़ी से भला क्या फ़ायदा हमको हुआ
प्यास तो कुछ बुझ न पाई होंठ गीले हो गए

जी हुज़ूरी की सभी को इस क़दर आदत पड़ी
जो थे परबत कल तलक वो आज टीले हो गए

क्या हुआ क्यूँ घर किसी का आ गया फुटपाथ पर
शायद उनकी लाड़ली के हाथ पीले हो गए

आपके बर्ताव में थी सादगी पहले बहुत
जब ज़रा शोहरत मिली तेवर नुकीले हो गए

हक़ बयानी की हमें क़ीमत अदा करनी पड़ी
हमने जब सच कह दिया वो लाल-पीले हो गए

हो मुख़ालिफ़ वक़्त तो मिट जाता है नामो-निशां
इक महाभारत में गुम कितने क़बीले हो गए

ग़ज़ल - 5

मेरा यकी़न, हौसला, किरदार देखकर
मंजिल क़रीब आ गई, रफ़्तार देखकर

बेटे अलग हुए हैं तो रोई है माँ बहुत
आँगन के बीच इक नई दीवार देखकर

हर इक ख़बर का जिस्म लहू में है तरबतर
मैं डर गया हूँ आज का अख़बार देखकर

बरसों के बाद ख़त्म हुआ बेघरी का दर्द
दिल खु़श हुआ है दोस्तो! घरबार देखकर

दरिया तो चाहता था कि सबकी बुझादे प्यास
घबरा गया वो इतने तलबगार देखकर

इस दौर में हर चीज़ बिकाऊ है दोस्तो
बिकने लगे हैं लोग अब बाजा़र देखकर

वैसे तो नाख़ुदा पे यकीं था ज़रा-ज़रा
पर बढ़ गया है हौसला पतवार देखकर

1 comment :

  1. सेतु परिवार में शामिल करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।

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