विलायती राम पांडेय और शुगर का झमेला

लालित्य ललित

कहते है न! कुछ काम न करो, तब वजन बढ़ जाता है और तो और कमीजें टाइट हो जाती हैं,पतलून आती नहीं। अब मियाँ कितनी कमर को अंदर को धकेले, ये कोई पालतू प्रजा तो है नहीं, कि डराया और वह डर गई।

यह कमर जब तक थी, थी और कमर नुमा थी, पर चटोरी जुबान ने पेट के माध्यम से देशी घी के पराठे और लच्छा पराठा खा-खा के कमर को कमरा बना दिया था।

इधर आए-दिन पत्नी रामप्यारी से भिड़ंत हो जाती। कुछ करो, वर्ना दिक्कत में आ जाओगे। सोते-सोते भी पत्नी का ख्याल आता, बेशक वह मायके गई हो। राम-जाने कौन सी टेलीपैथी थी जो पीछा ही नहीं छोड़ती थी। अच्छी शादी करवाई। जब नहीं करवाई थी, वे ही दिन बढ़िया थे, वोह रमता जोगी सा मन समंदर होता। अब मुसीबत गले लगा ली, कुछ होना न होना भी बेकार था। जब तक हो, सहो। ये हिंदुस्तान है साब, यहां पत्नियों की चलती है, क्या समझे! अगल-बगल में कोई नहीं था, अपने आप से बतियाने में मन बड़ा प्रसन्न होता है बाऊजी। कहते है न! हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा!

बदन भारी, हाय पांडेय जी। सबकी आंख के किरकिरी बने हुए थे। जालिम बदन अपना, खा पी के बनाया है, तुम्हें क्या दिक्कत है। पर जी, आज अपने को दिक्कत नहीं, दूसरे को है। इसका वजन क्यों बढ़ा, यह देर से क्यों आते है। इनकी पत्नी पार्क में कितनी देर सैर करती है और कितने ग्राम गप्पें लगाती हैं। शेयर करें भी तो किससे। अपना सूचकांक है ही भारी। बहरहाल अब लगी साँस फूलने। सुबह-शाम की सैर डॉक्टर ने पर्ची में लिख दी - कम से कम चालीस मिनट की सैर जरूरी। अन्यथा कुछ भी हो सकता है।

इधर जब से पांडेय जी को डॉक्टर ने डराया था, भला आदमी ट्रेक सूट में आ गया। सुबह सैर करता तो भाटिया के कुत्ते से डर कर, चोपड़ा की कार के नीचे छिपा बैठता था, मन में आया भी कि एक छड़ी ले लूँ, कम से कम डरेगा तो सही, वरना दिमाग में बचपन का कीड़ा घूमता रहता। काटेगा तो 14 इंजेक्शन लगेंगे। कुत्तों से कौन कटवाए अपने को। अगर काट लेगा, महीने के अंतिम दिनों में तो रही सही बचत मारी जाएगी, डॉक्टर को दिखाने में।

बहरहाल महल्ले में चर्चा का विषय था कि पांडेय जी को क्या हुआ-दफ्तर से आते ही ट्रेक सूट में उतर आते हैं, शाम को घूमने। कहीं ऐसा तो नहीं- वैसे कहते है कि प्यार वोह नशा है जब हो जाये,कम है। महल्ले में चुगलियों का बाजार गर्म रहता। वैसे भी तापमान अपने यौवन पर था, जैसे किसी नवयौवना को जवानी एक दम से आई हो। पसीने में लथपथ पांडेय जी के चक्कर चालू थे।

पत्नी भी उनके भले में थीं। सैर करने जाते और वापसी में मिसेज का हाथ बटाते। सब महिलाएं अपने-अपने पतियों की क्लास लेतीं- कुछ सीख लो, पांडेय जी से, दफ्तर से आते ही सैर को जाते है। भाभी जी का हाथ बटाते हैं, एक तुम हो निकम्मे कहीं के, जब देखो, थक गया हूँ, कितना काम था, डार्लिंग। पत्नियों को सब पता है, कि जो पति जितना प्यार से मनुहार करेंगे, उनका कहीं लोचा है। पर वे मौके की तलाश में रहती हैं कि एक बार मौका मिले तो सही। किसी की हेकड़ी निकाली जाए, तभी बात बनेगी।

बात-बात में से निकल आई बात - दफ्तर जाने से पहले पत्नी ने पांडेय के सामने ब्रेक फ़ास्ट सजा दिया - इंग्लिश स्टाइल में, दलिया मीठे वाला और उसके ऊपर किशमिश और बादाम के टुकड़े। माँ-कसम पांडेय जी के मन में अज्ञात भावनाएँ जाग्रत हों, इससे पहले ही मिसेज पांडेय ने पांडेय जी की उंगली पकड़ी और झट से हल्की से सुई चुभो दीं- जैसे ही कुछ सेकिंड में परिणाम आया- कहने लगी- हे भगवान, यह क्या हुआ। तुम तो अपनी सैर का वक्त बढ़ाओ। देखा खाली पेट शुगर का लेवल 175 आया है, यह आना चाहिए कम से कम 100 बहुत ज्यादा है।तो क्या नाश्ता ले जाओगी, अपना मन तो किशमिश और बादाम देख रोमांचित हो गया था, कहने लगी- अब तो खा लो, शाम से मीठा बंद, दफ्तर में फीकी चाय, आई बात समझ में। आई सब बात, अब चलूँ! नहीं तो फिर ट्रैफिक में फँसूंगा।

बहरहाल दफ्तर पहुँचे ही थे, अपने बगल के कुलीग से बात दोहरा दी - अचानक जोर से चिल्लाये, कहने लगे -यानी आप को भी शुगर डिक्लेयर हो गई, इतनी जोर से बोले कि लगा कि इस बार के चुनाव लड़ने की टिकट मेरे नाम से किसी की सिफारिश पर मिल गई हो। संभल जाओ, यह परहेज करो, अचानक से सीधा सा सम्पादक मित्र कोई नीम-हकीम बन उपदेश देने की मुद्रा में आ चुका था, कहने लगा- हमारी शुगर जैसे ही 130 क्रॉस होती है तो पत्नी वोह क्लास लेती है। बहुत जिम्मेवारी रहती है। कहीं कुछ हो गया हमें, तो घर का क्या होगा,बच्चों का क्या होगा। कि क्या बताऊँ। मैँ समझ चुका था, क्लास बढ़िया रहती होगी, इन मित्र की। कुछ न कुछ कहते रहें। सुबह की चाय का स्वाद जाता रहा और बेवजह का भाषण सुन मैसेंजर में किसी से दुआ सलाम हुई तो दूरस्थ बैठी मोहतरमा का संदेश- ओह, सुनके तकलीफ हुई, आप ऐसा कीजिये कि करेले का सेवन कीजिए और जामुन खाइये, किसी की क्या मजाल कि आपको सुगर नुकसान पहुंचाए। कल ही किसी बाबा जी का चूरन लेकर आती हूँ। मेरे हसबेंड को भी हुआ था, इस चूरन को चटाने से इनकी शुगर जाती रहीं। हद है जमाने की, जिसे देखो वही आपकी वाट लगाने को तैयार बैठा है!

जमाना भी अपना कमाल का है, बिन पैसे वाला पार्क में चक्कर लगाता हुआ नहीं थकता और पैसे वाले को जिम चाहिए, ट्रेड मिल चाहिए। उसके बिना उसका माहौल नहीं बनेगा।

जब-जब सड़क पर किसी मेहनतकश मजदूर को देखता हूँ तो सोचता हूँ कि कैसे उसके तो सिक्स पैक अपने आप ही बन गए, उसे कहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ी। यानि अपन जो सो-काल्ड इंटेलेक्चुअल्स हैं वोह थोड़े से इंसान बन जायें, थोड़े से ईमानदार, अपने प्रति, अपने कर्तव्यों के प्रति मजाल क्या कोई शुगर पास फटकेगी, दिमाग दुरुस्त और सेहत चुस्त होगी। अच्छे विचार जितनी तेजी से आते उतनी ही तेजी से लुप्त भी हो जाते, जैसे एक जमाने में कई कंपनियां आईं कि आपके पैसे कुछ दिनों में बेहतरीन इंटरेस्ट देने लगेंगे, कुछ समय दिया भी, उसके बाद कंपनियों की साँस फूल गई और वे सब अज्ञात दिशा को अंतर्धयान हो गईं, अब हम जैसे गरीबों का रक्तचाप बढ़ना स्वाभाविक था। पत्नी का साफ निर्देश था,समोसे बंद, बर्फी बंद, आगरे का पेठा बंद। मरता क्या न करता। मुँह से कपड़ा बांध लिया - मिठाई बंद, क्या पता उसकी खुशबू से भी शुगर बढ़ जाये। नया जमाना है, कुछ भी कहीं भी हो सकता हैं।

पाण्डेय जी को कभी-कभी उपदेश अच्छे लगते थे। उनका सैर अभियान जारी था। हाँ, अपने बगल के कुलीग के साथ की सुबह की मॉर्निंग टी अब छोड़ दी, सोचना शुरू कर दिया- काहे पीए अपन फीकी-मीठी चाय। जब जल ही जीवन है। जब बातों के मूल में जल ही अनिवार्य। सो उन्होंने आज से जल पर जोर शुरू कर दिया।वैसे भी अनुभवी लोगों का कहना है - जल ही जीवन है, सो साफ जल बेहतर सेहत की निशानी है। सुनने में आया है, विलायती राम पांडेय की शुगर कंट्रोल उनकी कड़ी मेहनत और मिसेज पांडेय की मशक्कत से कम हो गई। पत्नी को और बच्चों को खुश करने के लिए पांडेय जी लेंसडाउन जाने के लिए प्लान बनाने लगे। बच्चों का कहना था, उनके यार दोस्त भी जा रहे हैं, आप भी चलिये, कहीं न कहीं। गर्मी से आतंकित पांडेय जी भी थे, एक तो दफ्तर के एसी का कंडेंसर खराब था। एडमिन को कहा भी, कहते है मेंटिनेंस को कह दिया है, जल्द हो जाएगा, अब इस बात को भी 20 दिन गुजर गए। परिवार की बात पर अमल किया और निकल गए, किसी पहाड़ की ओर। उनका मानना है कि घर के बिना जीवन बेकार है सो घर भी खुश रहे और घरवाले भी। पता था, कहीं जाएंगे, तो चांद पिटेगी सो अलग, पर अब जाए बिना कोई चारा भी नहीं था।

कार सर्राटे से अपने लक्ष्य की और दौड़ रही थी। बच्चों के सपने अलग। किसी के मन में ठंडी हवा तो किसी के मन मे शॉपिंग घूम रही थीं। पर पांडेय जी के मन में था, चलो किसी बहाने गर्मी से मुक्ति तो मिलेगी, बेशक तीन दिन को घर से दूर निकल आये हो। मिसेज पांडेय ने अपना सर विलायती राम पांडेय के कंधे टिका दिया था। अब पांडेय जी आश्वस्त थे कि किसी भी भारी से भारी चिंता को जब चाहे कंट्रोल कर सकते हैं। गाना बज रहा था - तुझे जीवन की डोर से बांध लिया है, बांध लिया है। आगे के बोल भूल चुके विलायती अब किसी अज्ञात अभिनेत्री के सपनों में विचरने लगे थे। यह विचरना ऐसे माहौल में हम भारतीय पुरुषों का जन्मसिद्ध अधिकार है, इस अधिकार को हम किसी को भी छीनने नहीं देंगे। कदापि नहीं।

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