पाठकों के पत्र

आपके विचार, आपकी राय, सम्पादक के नाम
सेतु में प्रकाशित हर आलेख के अंत में आपकी राय के लिये टिप्पणी पेटी उपलब्ध है। आपके विचारों का स्वागत है।

बहुत अच्छी रचनाएँ, पठनीय हैं। सुंदर सम्पादन हेतु बधाई।

Bahut achhi rachnayen pathniye hain,sunder sampadan hetu badhai

Regards,
Kewalkrishan Pathak
अगस्त 31, 2017

आशातीत सफलता आपका भाग्य है सौभाग्य है ईश्वर अनुकम्पा बनी रहे। आपकी कर्मनिष्ठा और हिन्दी प्रेमियों का सहयोग सफलता की कुंजी बनेगा, मंगलकामना के साथ

Regards,
Dr. Vinod Kumar
जुलाई 4, 2017

आदरणीय/प्रिय सम्पादकद्वय,

नम्स्कार. सबसे पहले तो "सेतु" के प्रकाशन हेतु बधाई. साहित्यिक पत्रिकाओं के संक्रमण काल में ये पत्रिका कालजयी साबित हो. शुभकामनायें.

अब पत्रिका के बारे में. पत्रिका पर पहले एक सरसरी निगाह देखी. अनुक्रमाणिका ही चौंकाने वाली थी. एक से बढकर एक लेखक उपस्थित हैं वहां. ऐसी अनुक्रमाणिका देखने के बाद भला कोई खुद को पत्रिका के पन्ने पलटने से रोक सकता है? शानदार लेखों/कहानियों/कविताओं का गुच्छा है ये पत्रिका. बहुत विनम्र सम्पादकीय.

पत्रिका दिनोंदिन सफ़लता की सीढियां चढे, ऐसी दुआ है मेरी.

सस्नेह
वन्दना अवस्थी दुबे
 जुलाई 14, 2016

सम्पादक महोदय,
आपकी द्विभाषिक पत्रिका के हिन्दी संस्करण का प्रथमांक बहुत ही अच्छा है जैसे लखनऊ की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का है।   उत्तरोत्तर यह पत्रिका अपनी पहचान स्वयं बना लेगी, क्योंकि प्रकाशित सामग्री का चयन स्तरीय है। पत्रिका के चहुमुखी विकास हेतु हार्दिक शुभकामनायें।

अजीत कुमार 
अगस्त 22, 2016

संपादकजी
 "सेतु" का मुखपृष्ठ शीर्षक की सार्थकता के साथ व्यवहारिक रूप में सदूर लोगों को पाठकों, लेखकों को जोड़ने की दूरियां कम कर नाम को चरितार्थ भी कर रहा है।
 करीब सभी विधाओं को को पोषित करने का कार्य के सृजन से विकसित होगा।
 मेरी अनंत शुभकामनाएं।
                               डॉ   मधुलता व्यास, नागपुर,
                              पूर्व सदस्य, महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी, मुंबई
मधुलता व्यास
7/1/2016



शर्मा जी,
पहले तो आप को बहुत बहुत बधाई .
सात समंदर पर बैठ कर जो हिंदी की सेवा कर रहे हैं उसके लिए तो कोई शब्द ही नहीं है मेरे पास .
शेष बाते फिर

प्रदीप श्रीवास्तव
लखनऊ, भारत
जुलाई 5, 2016

मेरी बहुत  बहुत शुभकामनाएं ... पत्रिका दिन दूनी रात चौगनी तरक्की करे ...

Regards,
दिगंबर नासवा
जुलाई 27, 2016

Gopal's going deep and there's Eftichia hinting links

Regards,
Aju Mukhopadhyay
जुलाई 31, 2016

i am very impressed .
badhai!

Regards,
chandra kant tripathi
8/1/2016)

Krapya patrika Setu ki jankari dene ka ksht kre

Regards,
Rajendra jain
8/1/2016)

I want membership.

Regards,
ganesh siddh (8/1/2016)

Thanks 'SETU' for publishing my poems.

Regards,
omprakash pandey 'naman' (8/1/2016)


' माधवी ' महाभारत के दुरूह पात्र पर रचित दो आधुनिक कथाएँ भारत वर्ष के अनेकता में एकता की नींव की और दृष्टीपात करने के लिए पाठक वर्ग को प्रेरित करती है। डॉ लेखा एम् ने भीष्म साहनी के नाटक माधवी तथा अनुपमा निरंजन के उपन्यास माधवी के पात्र माधवी का एक तुलनात्मक अध्ययन विषय पर  नारी अस्मिता, समाजिक सन्दर्भ में स्त्री की मनोदशा पर विचारणीय आलेख लिखा है।

 स्त्री विमर्श आधुनिक संसार में आपा खोजता हुआ शनै शनै अपना स्थान बना रहा है। इस गूढ़ और कठिन विषय पर पुरुष वर्ग भी ध्यान दे रहा है यह शुभ संकेत है।

Regards,
श्रीमती लावण्या दीपक शाह (8/23/2016)

'सेतु' से जुड़ना अच्छा ही लगे !
आज एक शानदार और अच्छी तरह से  संपुष्ट इंटरव्यू 'सेतु' में पढ़ा सुषम बेदी जी का रेणु यादव जी द्वारा लिया हुआ। प्रश्न और उत्तर दोनों ने बहुत कुछ जानकारियां उपलब्ध कराई, जो नई-नई सी रही। प्रश्न सही नब्ज़ पकडे हुए थे और उत्तर तो और भी सहज और साफगोई लिए हुए। सुषम जी का फेसबुक पर मित्र तो हूँ पर उन्हें कभी पढ़ा नहीं। छिटपुट ही कुछ पढ़ा हो। यहां उनके उत्तरों में प्रवासी भारतीयों  और वहां की परिस्थिति के बारे में जो इनर जानकारियां मिली जिससे एक कोहरा जो छाया हुआ था उसे कुछ छितराने की एक ईमानदार कोशिश दिखी।

सुषम जी की अभिव्यक्ति सरल होते हुए भी काफी सवालों का उत्तर उन्हों ने सघनता सहजता और आधिकारिक  तौर से दिए। घुटन कहां नहीं है ! और घुटते लोग भी...! स्त्री-पुरुष बूढ़े-युवा-बच्चे । शोषण यौन शोषण भी सभी जगह एक सी जड़ें जमाए हुए । कालों का ज़िक्र और भेदभाव दुखद है। जिसका कुछ-कुछ इलाज तो हुआ है पर नीम-हकीमी सा। इंसानी नफरत का ज़हर सबल, अवसर और सुविधा प्राप्त लोगों में ज़्यादा देखने को मिलता है। नफरत की सज़ा भी कहां  हम मुक़रर कर पाए हैं ! कितना कुछ हिडन होता  है और बिना गुनाह के सहा जाता है..न्याय प्रणाली की प्रक्रिया भी कितनी तो धीमी होती है...आसपास में कहीं कोई व्यक्ति अगर  घुट रहा है तो  पास में रहने वाले को ही उसकी खबर नहीं होती, या निर्बल के दोहन को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है  । औरों की तो क्या बात करें, कभी तो जो अपने हैं वे ही कितने वाक़िफ़ होते हैं अपनों के दुःख और घुटन से।

प्रवासी भारतीयों के बारे में संक्षिप्त पर ऑथेंटिक जानकारी उपलब्ध कराने के लिए 'सेतु' का शुक्रिया - धन्यवाद। एक अच्छा साक्षात्कार।

Regards,
Gyasu Shaikh (9/3/2016)


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