प्रसाद के काव्य 'आँसू' के उपजीव्य स्रोत

अरविन्दर कौर 

अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, ए .एस. कालेज, खन्ना
चलभाष: +91 950 191 6488
ईमेल: akhindi31@gmail.com
“आँसू” प्रसाद जी की श्रेष्ठतम कृतियों में से अपना अलग वर्चस्व कायम किए हुए है। स्मृति काव्य के नाम से अभिहीत होने वाला यह काव्य जहां कवि के अतीत जीवन की अनुभूतियों को स्मृति के माध्यम से दर्द भरी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करता है, वहां दूसरी ओर अपनी प्रेमिका के प्रेम के झुकाव को भी स्वीकार करता है। आँसू में उस प्रेम के बिछुड़ जाने की या खत्म होने की बात को याद करना कवि के व्यक्तिगत जीवन की निराशा के गर्त से निकल कर विश्व वेदना के साथ तादातम्य स्वीकार कर मानव जीवन को सुख व आशावान बनाने के लिए सर्वदा व्याकुल रहना ही प्रसाद जी के काव्य की अनोखी प्रवृत्ति है।

    प्रसाद जी के साहित्य में भी ऐतिहासिकता के दो रूपों 'अतीत’ और 'करुणा’ में से अतीत रूप को प्राथमिकता प्राप्त हुई है। गौण रूप प्राप्त भारत के अति इस अतीत के भी रूप हैं - एक तो व्यक्तिगत अतीत और दूसरा भारतीय इतिहास का गौरवपूर्ण अतीत।   निजी अतीत की अभिव्यक्ति 'आँसू’ में स्पष्ट रूप से झलकती है किन्तु भारतीय इतिहास की झलक उनके नाटकों  एवं प्रबन्ध काव्यों में दृष्टिगोचर होती है। चूंकि 'आँसू’ प्रसाद जी की आत्माभिव्यंजना है और इस आत्माभिव्यंजना में केवल उन्हीें का ही अतीत बोल रहा है। 'आँसू’ प्रसाद जी के यौवन, विलास एवं प्रेम का सुन्दर प्रतिनिधित्व करता है। इसमें कहीं भी भारतीय इतिहास दिखाई नहीं पड़ता केवल उनका निजी आभास ही उभर कर सामने आया है।

समाज में रहते हुए मनुष्य कभी भी समाज से मुख नहीं मोड़ सकता। समाज में रहकर ही वह जीवन के साथ आत्मसात करने में सफल बनता है। प्रत्येक साहित्यकार की एक अलग सामाजिक दृष्टि होती है जिसमें वह एक नवीन एक आदर्श समाज की कल्पना करता है। अपनी कल्पना, दृष्टि और दर्शन के बल पर कवि नए समाज को बनाने का प्रयास करता है और अपने पाठकों को नवीन भावनाओं को धारण करने के लिए प्रेरणा प्रदान करता है। प्रसाद जी की भी एक निश्चित सामाजिक दृष्टि थी जो उनके साहित्य में स्थान-स्थान पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में वर्णित की गई है।

'आँसू’ में कवि ने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को भूल कर मानव जीवन को सुख से भरने की आशा की है। सामाजिक प्राणी होने के काव्य मन में उमंगों का पैदा होना स्वाभाविक ही है। अपनी प्रेयसी के प्रेम में डूबे हुए वे सपनों के महल बनाते हैं और उसी के साथ सम्पूर्ण जीवन बिताने की कल्पनाएँ करते हैं। किन्तु जब यह सपने टूट कर बिखर जाते हैं तो कवि के पास सिवाय दुःख, पीड़ा, विरह, वेदना के इलावा और कुछ नहीं बचता। वह विरहाग्नि में पल-पल जलता है और उन गुज़रे हुए लम्हों को याद कर विह्वल हो उठता है। यही विह्वलता प्रसाद जी के 'आँसू’ काव्य के प्रत्येक छन्द में आँसूओं की बूंदें बन कर छलकती दिखाई पड़ती हैं और वह अपने सुख के पलों की स्मृति को याद कर कह उठता है -
“इस करुणा कलित हृदय में, अब निकल रागिनी बजती है।
क्यों हाहाकार स्वरों में, वेदना असीम गरजती?”

वास्तविकता की दृष्टि से देखा जाए तो 'आँसू’ में जिन गीतों का अंकन किया गया है वह कवि के जीवन की वास्तविक तपन से ही उपजे हैं। कवि की वेदना पीड़ा मूल रूप से लौकिक ही है। उनका यह लौकिक प्रेम ही अलौकिकता की ओर बढ़ाने वाला है, इसी से प्रसाद का जीवन दर्शन भी स्पष्ट हो जाता है।

उनका मन्तव्य आपबीती को उदात्त बनाकर इतना व्यापक बना देने में है कि उसी में सम्पूर्ण मानवता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व हो सके और जीवन की जटिलताओं का सामना करने के समर्थ बन सके। यही प्रवृत्ति 'आँसू’ काव्य के माध्यम से व्यक्तिवादिता की संकुचित सीमाओं को तोड़ कर व्यापक रूप में सामने आती है। कवि ने अपने संघर्ष काल के दौरान दर्शन के बल पर यह तथ्य निकाला था कि वेदना, पीड़ा, आत्मा का दमन करने में असमर्थ है बल्कि वह तो उसका परिमार्जन करके उसे महान और गहन बनाने में सहायक होती है। यही वेदना आँसू का आधार है, जो कवि प्रसाद के लिए शाश्वत चेतना का रूप ले लेती है।
“सुख मान लिया करता था, जिसका दुःख था जीवन में,
जीवन में मृत्यु बसी है, जैसे बिजली हो घन में।
उनका सुख नाच उठा है, यह दुःख-द्रुम-दल हिलने से
शृंगार चपकता उनका मेरी करुणा मिलने से।
हो उदासीन दोनों से दुःख सुख से मेल करायें।
ममता की हानि उठाकर दो रूठे हुए मनायें।।”

निराशा में भी आशा को ढूंढना और उसी आशा के सहारे जीवन को नवीन राह पर ले जाने के लिए कवि व्याकुल हो कर कह उठता है -
“निर्मम जगती को तेरा, मंगलमय मिले उजाला।
इस जलते हुए हृदय की, कल्याणी शीतल ज्वाला।”
प्रत्येक दर्शन ने अपने-अपने ढंग से विचार प्रस्तुत किए किन्तु प्रसाद जी ने इनसे हट कर जिस दर्शन से प्रभावित हो आँसू की रचना की वह दर्शन था वेदना दर्शन जिसका मूल मंतव्य जीवन के परित्याग की ओर संकेत न करके जीवन के प्रति अगाध प्रेम और विश्वास से जीवन को रस से भरना है। उनका यह प्रेम संसार में रहते हुए ही अपनी भावनाओं को उदात्त बनाने का संदेश देता है। इसके अतिरिक्त प्रसाद एक अन्य पौराणिक एवं महानतम् दार्शनिक सिद्धांत का भी प्रतिपादन करते हैं, जिसका प्रभाव वचपन से ही उनके मन में परिपक्कव हो चुका था। काश्मीरी शैव दर्शन जिसने उनके बालक मन को काफी प्रभावित किया। इस दर्शन के अनुसार मनुष्य जब सुख दुःख में कोई मौलिक अन्तर न समझे और दोनों का सामंजस्य प्रस्तुत कर सके। रटी रटायी पुरानी परिपाटी का त्याग कर नयी दृष्टि रखते हुए काव्य को नवीनता प्रदान कर प्रसाद जी के काव्य जगत् को जीवन का नया उद्देश्य समझाया है, जो उनके व्यक्तिगत जीवन से पैदा होकर समूचे जन कल्याण की बात करता है -
“मानव जीवन वेदी पर, परिणय हो विरह मिलन का
दुःख सुख दोनों नाचेंगे है खेल आंख का मन का।”

पुराण और इतिहास भी इसी बात की पुष्टि करते हैं कि जब-जब मनुष्य पर विकट स्थितियां आती हैं तो लोग अपने प्राण तक न्यौछावर कर देते हैं किन्तु अपने धर्म का त्याग नहीं करते। प्रसाद जी पर भी उनके धार्मिक ग्रन्थों, वैदिक साहित्यों का गहरा प्रभाव पड़ा है जिनसे प्रेरणा लेकर वह साहित्य को नवीनता की ओर मुड़ गए। प्रसाद जी पर बौद्ध दर्शन की गहरी छाप तो है ही साथ ही वियोग शृंगार के ऊपर उनमें फारसी साहित्य पद्धति का भी प्रभाव दिखाई पड़ता है जो भारतीय पद्धति के समान अरुचिकर है -
“छिल-छिल कर छाले फोड़े, मल-मल कर मृदुल चरण से।
धुल-धुल कर वह रह जाते, आँसू करुणा के कण से।”

सांस्कृतिक मूल्यों को जानकर उनको काव्य में डालना कवि की विशेषता रही है। प्रसाद जी ने जिस प्रेम विरह का वर्णन किया है, उसको केवल प्रसाद ने ही नहीं ब्लकि उनके पूर्व के संस्कृत हिन्दी साहित्यकारों के नाम ने भी निरूपण किया है। किन्तु उनके कहने का ढंग कुछ और था। प्रसाद जी ने उन काव्यों में जो कुछ अधूरा देखा उसी को नवीनता देकर काव्य में प्रेम व विरह वेदना को प्रकट किया है।
“वेदना विकल फिर आई, भेरी चैदहों भुवन में,
सुख कहीं न दिया दिखाई, विश्राम कहां जीवन में।
उच्छवास और आँसू में, विश्राम थका सोता है,
रोई आंखों में निद्रा बनकर सपना होता है।”

प्रसाद जी ने जो कहा, जो लिखा, जो समझा वह उनकी कल्पना मात्र नहीं है बल्कि उनके द्वारा किए गए साहित्य अध्ययन का ही एक हिस्सा है। समर्पण की भावना, नारी के प्रति प्रेम व श्रद्धा की भावना, समाज कल्याण की बात, विषमताओं से ऊपर उठना, दूसरों के प्रति अगाध विश्वास एवं प्रेम की भावना आदि सांस्कृति मूल्यों का प्रसाद जी ने अपने काव्य में यथोचित स्थान प्रदान किया है। इन सांस्कृतिक मूल्यों का प्रभाव उन पर साहित्य व धर्म एवं दर्शनशास्त्रों के गहनतम अध्ययन से ही पड़ना सम्भव हो पाया है जिसने उनको काव्य जगत में श्रेष्ठतम् स्थान प्रदान किया है। मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के आधार से देखा जाए तो, प्रसाद जी के बारे में गुप्त एवं असफल प्रेम के विषय में अनेक प्रकार की आक्षेपपूर्ण अभिव्यक्तियाँ प्राप्त होती है जिन्होंने उसके मन पर गहरा प्रभाव डाला।

दुःख की स्थिति में विस्मृति ही एक मात्र सुख का पल है जिसमें कवि अपनी मुक्ति को देख रहा है। प्रसाद जी के लिए चिरंजीव संगिनि और अश्रुमय रंगिणि दुःख दग्ध हृदय की वेदना में सर्वाधिक महत्वपूर्ण साबित हुई है। प्रेम से उत्पन्न हुई पीड़ा को कवि ने जीवन, मृत्यु और अमरता का आधार बताकर विश्व को नवजीवन प्रदान करने वाला कहा है।

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