कान्ता रॉय कृत 'पथ का चुनाव' - महावीर रवांल्टा


मानवीय मूल्यों व संवेदनाओं को उजागर करती लघुकथाएँ : महावीर रवांल्टा 

पुस्तक: पथ का चुनाव (लघुकथा संग्रह)
लेखिका: कान्ता रॉय
प्रकाशक: ज्ञान गीता प्रकाशन
एफ-7, गली न.-1, पंचशील गार्डन एक्स, नवीन शाहदरा,
दिल्ली-110032
पृष्ठ सं : 166 
संस्करण : 2016
मूल्य: ₹ 395

'पथ का चुनाव' लघुकथा के क्षेत्र में सक्रिय कान्ता रॉय का दूसरा लघुकथा संग्रह है। इससे पहले उनका 'घाट पर ठहराव कहाँ' लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुका है।इस लघुकथा-संग्रह में उनकी 134 लघुकथाएँ संग्रहित हैं। लघुकथा लेखन में कान्ता रॉय के प्रयास को डॉ. मालती बसंत ने 'लघुकथा का महाकाय प्रयास' कहा है तो कान्ता रॉय ने 'अपना दूसरा कदम' में लघुकथा की संरचना व सृजन पर अपने विचार व्यक्त करते हुए अपने आगे बढ़ने की प्रतिद्वंदिता का इमानदारी के साथ खुलासा किया है। 

लेखिका: कांता रॉय
कान्ता रॉय की लघुकथाओं में एक ओर मध्यमवर्गीय शहरी जीवन की आपाधापी, छटपटाहट व बेचैनी देखने को मिलती है तो दूसरी ओर गाँव के प्रति गहरे लगाव के साथ वहाँ की माटी की सौंधी गन्ध भी महसूस की जा सकती है।  शहरी जीवन के संस्कारों को अपनाकर उसमें अपना जीवन खपा रहें अधिसंख्य लोग भी इन लघुकथाओं के पात्र बने हैं। राजनीति में अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए प्रलोभन व पुचकार से कार्यकर्ता को वश में कर उसके इस्तेमाल की बात हो अथवा धर्म या भावनाओं की आड़ लेकर अपना उल्लू सीधा करने की जुगत, सभी की आहट लघुकथाओं के माध्यम से सुनने को मिल जाती है।

 कान्ता रॉय की अनेक लघुकथाओं का केन्द्र परिवार है। वह कहीं संयुक्त है तो कहीं एकल। बुढ़ापे में अपने माँ-बाप की सम्पत्ति पर गिद्ध-दृष्टि रखने वाली संतान, उनके प्रति उपेक्षा-भाव, अपनी संतान की यातना व तिरस्कार सहने के बावजूद पड़ोसी के सामने सुखी, समर्थ व सम्पन्नता का दिखावा करने वाले पिता, अपने बेटे की प्रेमिका को उसके साथ कुछ समय लिव-इन-रिलेशन में रहकर उसे पूरी तरह समझ लेने के बाद विवाह की सलाह देने वाली माँ, ऐसे चेहरे हैं जो अपनी नयी पीढ़ी के सुखद भविष्य के प्रति निश्छल सोच रखती है।  बच्ची को माँ-बाप का साया न मिलने पर वह कुंठाग्रस्त होकर मानसिक अवसाद का शिकार हो जाती है।

समीक्षक: महावीर रवांल्टा
निम्नवर्गीय मजदूर, व्यापारी, नौकरीपेशा सभी वर्ग के लोग कान्ता रॉय की लघुकथाओं के पात्र बने हैं, इसलिये  जीवन-यापन के लिए उनका संघर्ष स्वतः ही सामने आता है। सपरिवार रहने के लिए एक खोली न मिल पाने वाले मजदूर की पीड़ा, साधन के अभाव में हीनताबोध, मातृविहीन बेटी का दर्द, नशे की कुलत का शिकार युवा, पत्नी पर आश्रित बेरोजगार, पति की कुलत का पत्नी पर प्रभाव, शराबी पति से मुक्ति की छटपटाहट, अपनी असफलता का दोष माँ-बाप की गरीबी के सिर डालना, दहेज-प्रथा,गरीबी में जीकर आत्म संतुष्टि का भाव, आपसी बँटवारे के दर्द को सहता खेत, फिल्मों व धारावाहिकों में काम दिलाने के बहाने लड़कियों से ठगी व उनका शारीरिक शोषण करते लोग, बहादुरी की मिशाल कायम करते बच्चे जैसे अनेक लोग, इन लघुकथाओं के माध्यम से हमारे सामने आते हैं। 

संग्रह की अनेक लघुकथाओं में घर व बाहर अपने दायित्व का बखूबी निर्वाहन कर रही स्त्री के अनेक रूप सामने आए हैं। घर या बाहर उस पर पति का अघोषित पहरा, किसी दूसरे के साथ देखकर उसकी तिलमिलाहट, कार्यक्षेत्र में पुरूष के दम्भ, अपने प्रति उपेक्षाभाव, उसकी कार्य क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगने के कारण उसे अपने को साबित करने के लिए परिक्षा से गुजरना पड़ता है कि वह पुरुष से कमतर नहीं है। सहकर्मियों के कटाक्ष व काम लोलुप निगाहें सभी का उसे सामना करना पड़ता है। नौकरी छूटने पर  गरीबी की जद में आये घर को चलाने के लिए उसे पति द्वारा देह परोसने के धंधे में शामिल होने का प्रस्ताव मिलता है जो हमारे समय का वीभत्स सच है।

प्रेमी को सिर्फ एक अतीत समझ कर बिसरा देना ... नारी अस्मिता की रक्षा के लिए रणचंडी बन दूसरे के प्राण ले लेना, अपना प्यार खो जाने पर उसके मन की उथल-पुथल समाज के हितार्थ अपनी जान को उत्सर्ग करने का संकल्प, पर स्त्री के साथ पति के सम्बंध सहजता से स्वीकार लेना, अपनी सौत के प्रति उसकी सदाशयता जैसे अनेक रूपों में स्त्री इन लघुकथाओं के माध्यम से हमारे सामने आती है। 

घर में वह ससुर की कुचेष्टा का शिकार होकर बच्चे की माँ बनती है तो कहीं समधी की कामुक दृष्टि से अपनी युक्ति द्वारा बचाव कर लेती है यानि घर से बाहर तक वह कहीं सुरक्षित नहीं। अपहरणकर्ताओं के चंगुल से भागी लड़की को उसके परिवार वालों द्वारा ही अस्वीकार कर देना स्त्री के प्रति हमारे अमानवीय चेहरे को सामने रखता है।

पति-पत्नी के बीच आपसी सम्बन्धों की मिठास ही नहीं बल्कि खटास को भी ये लघुकथाएँ बयान करती है। उनके बीच का रिश्ता बेशक बेहद प्रगाढ़ होता है लेकिन एक छोटी-सी चिंगारी भी उसे बेहद नाजुक बना सकती है लेकिन पलभर का गुस्सा इसे तहस-नहस नहीं कर सकता। स्त्री-पुरुष के बीच आपसी सम्बंधों में कडुवाहट के बावजूद एक साथ जीवन-निर्वाह की मजबूरी, प्रेमिका द्वारा प्रेमी का साथ घर बसाने की हड़बड़ी, बेमेल विवाह से स्त्री मन में उपजा भाव के साथ ही स्त्री के प्रति पुरूष का भाव सिर्फ उसके शोषण तक ही सीमित नहीं है बल्कि उसे अपनाना व संरक्षण देता भी है और वह उसका सुरक्षा कवच भी बनता है। कभी ऐसा भी होता है कि स्त्री पुरूष के बीच एकाएक उपजे सम्बंध बेहद प्रगाढ़ व रक्त-सम्बंधों से कहीं अधिक मजबूत होतें हैं।

विकास के खोखले दावों की पोल खोलता यथार्थ, गाँवों की दुर्दशा व विकास की भेंट चढ़ते हमारे नदी-नालों के प्रति चिंता-भाव भी इन लघुकथाओं के माध्यम से उजागर हुआ है।  शहरी जीवन के प्रति आकर्षण के चलते गाड़ी, बँगला के लिए अपनी खेती-किसानी छोड़ पलायन करना, अपनी समृद्धि छोड़ शहर में मजदूर बन जीवन-निर्वाह करने की सोच के साथ ही गाँव के प्रति वितृष्णा का भाव भी इन लघुकथाओं के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है।

सामंती सोच के लोगों द्वारा निर्बलों का मानसिक एवं दैहिक शोषण, दबे-कुचले लोगों का उन्नति-पथ पर आगे बढ़ने का सिलसिला, विवाह के लिए योग्य वर की तलाश, लड़का व लड़की के बीच का भेदभाव, आपसी मेलजोल के बजाय सम्बंधों को फेसबुक पर अपडेट करते लोगों की मानसिकता भी हमें सोचने के लिए विवश करती है। अपरिपक्व उम्र में बेटी का विवाह करने के बाद माँ-बाप बेशक गंगा नहा लें लेकिन बेटी का जीवन पिंजरे में बंद पंक्षी का सा हो जाता है।

ऐसे ही हमारी धर्मांधता नहीं अपितु मानवता अपने आप में समर्थ व किसी का जीवनदाता बना सकती है तभी तो एक मुस्लिम का सेवा-भाव हिन्दु ब्राहम्णी के प्राणों की रक्षा कर उसकी आत्मीयता व स्नेह का पात्र बन जाता है। 

'पथ का चुनाव' शीर्षक लघुकथा 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' की धारणा को साकार करती हुई एक बेटी के मजबूत संकल्प की कथा है।

कुल मिलाकर 'पथ का चुनाव' की लघुकथाएँ मानवीय संवेदनाओं व मूल्यों के पक्ष में खड़ी होकर आज के दौर की सामाजिक विषमताओं के साथ उस विद्रुप सच को भी उद्घाटित करती है जिसकी चाहते हुए भी हम अनदेखी नहीं कर सकते। स्मृतियों का लेखा-जोखा हमारे रिश्तों को सदैव ही तरल बनाए रखता है। संग्रह की लघुकथाओं के माध्यम से ये हमें सहज ही अनुभूति हो जाती है, इन लघुकथाओं के माध्यम से कान्ता रॉय की अपनी एक विशिष्ट पहचान भी बनती है जिसका एक कारण उनका किसी भी विषय को अपने अलग ही अंदाज़ में पकड़ना है। बरहाल पाठकों के बीच 'पथ का चुनाव' की लघुकथाओं का स्वागत होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
समीक्षक: महावीर रवांल्टा
संपर्क:  ‘सम्भावना’ महरगॉव, पत्रा.- मोल्टाड़ी, पुरोला, उत्तरकाशी-249185 (उत्तराखण्ड)
मोबाइल:  09411834007 / 08894215441 / 09458272474 / 09012269751
ई मेल:  mravalta@rediffmail.com

3 comments :

  1. सुन्दर समीक्षा।

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  2. बहुत सुन्दर। संतुलित समीक्षा। बधाई और शुभकामनाएं लेखिका और समीक्षक दोनों को।

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  3. बहुत सुन्दर और संतुलित समीक्षा। बधाई और शुभकामनाएं लेखिका और समीक्षक दोनों को।

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