महावीर रवांल्टा

जन्म:  10.05.1966 को उत्तरकाशी (उ.खण्ड) जनपद के सरनौल गांव में।

शिक्षा:  स्नातक एवं डी. फार्म.।

लेखन/प्रकाशन/योगदान:  उपन्यास, कहानी, लघुकथा व कविता विधाओं के साथ रंगकर्म एवं लोक साहित्य में गहरी रुचि के चलते रंग लेखन के साथ ही अभिनय व निर्देशन में सक्रिय हिस्सेदारी। रंगमंच को गांव तक पहुँचाने की इच्छावश ग्रामीण बच्चों के साथ नाट्य शिविरों का आयोजन। कई नाटकों का मंचन एवं पुरस्कृत। आपके साहित्य पर कुछ लघु शोध प्रबन्ध एवं शोध प्रबन्ध भी विश्वविद्यालयों में प्रस्तुत हुए हैं। अब तक चार उपन्यास (पगडंडियों के सहारे, एक और लड़ाई लड़, आप घर या बाप घर, अपना-अपना आकाश), छः कहानी संग्रह (समय नहीं ठहरता, उसके न होने का दर्द, टुकड़ा टुकड़ा यथार्थ, तेग सिंह लड़ता रहा, जहर का संघात एव भंडारी उदास क्यों थे), एक लघुकथा संग्रह (त्रिशंकु), दो नाटक (सफेद घोड़े का सवार, खुले आकाश का सपना), एक कविता संग्रह (आकाश तुम्हारा होगा), एक बाल एकांकी संग्रह (ननकू नहीं रहा) एवं एक बाल कहानी संग्रह (विनय का वादा) एवं एक रवांई क्षेत्र लोक-कथाओं की पुस्तक (दैत्य और पांच बहिनें) प्रकाशित। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की संस्कार रंगटोली द्वारा ‘खुली आँखों में सपने’ कहानी का नाट्य मंचन तत्पश्चात ‘ढोल के बोल’ शीर्षक से ‘कला दर्पण’ द्वारा पुनः उत्तराखण्ड लोक नाट्य महोत्सव-2007 तथा मांडी विद्या निकेतन दिल्ली में 18 दिसम्बर 2010 को सुवर्ण रावत के निर्देशन में मंचन। उत्तराखण्ड के रवांई क्षेत्र की स्थानीय बोली रवांल्टी को पहचान दिलाने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयासरत।

सम्मान:  ‘अवरोहण’, ‘सच के आर-पार’, ‘दोस्त बड़ोनी, तुम कहाँ हो!’ कहानियों एवं ‘सफेद घोड़े पर सवार’ नाटक के लिए अखिल भारतीय स्तर पर पुरस्कार सहित रंगमंच एवं साहित्य में योगदान हेतु तीन दर्जन से अधिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत।

सम्प्रति:  अति. प्रा. स्वा. केन्द्र, आराकोट (उत्तरकाशी) में सेवारत।

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