आस - कहानी

कपिल शास्त्री


कपिल शास्त्री
स्वेच्छा से त्यागपत्र हवाले करने की शर्त पर ही  कंपनी ने छह महीने की रुकी हुई तनख्वाह देना मंजूर किया था। इसी सिलसिले में मैं बांद्रा कुर्ला काम्प्लेक्स के आलीशान हेड ऑफिस में उपस्थिति था। रिसेप्शनिस्ट ने लॉबी से उठाकर, कैप्सूल लिफ्ट से ऊपर जाकर अलग थलग एक कमरे में बिठा दिया था। कंपनी से पंद्रह साल पुराना नाता टूटने जा रहा था। डेढ़ करोड़ की आबादी वाले चलते फिरते शहर में भी ज़िन्दगी रुकी हुई सी लग रही थी। आज रह रहकर वो पिट्ठू याद आ रहा था जो कटरा में मिला था। पाँच वर्ष पहले प्रमोशन मिलने की ख़ुशी में और माता वैष्णोदेवी के दर्शन की आस मन में लिए भोपाल स्टेशन से मालवा एक्सप्रेस से हम पति पत्नी अपनी एक बच्ची को साथ लिए पूरे श्रद्धाभाव से जम्मू के लिए निकल पड़े थे। जम्मू से कटरा जा रही बस में अधिकतर भक्तगण ही थे जिनके "जयमातादी, जयमातादी" के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो चुका था। "चलो बुलावा आया है माता ने बुलाया है" जो मुरादें हम अपने साथ लेकर आये थे,  डेढ़ घंटे के लिएगौण हो चुकी थी, केवल दर्शन की अभिलाषा ही बची थी।

कटरा बस स्टैंड पर उतरते ही किसी की आस भरी। नज़र हमारी पांच वर्षीय हलकी फुल्की बच्ची पर टिक चुकी थी। पचास पचपन का ही होगा परंतु हाड़ तोड़ मेहनत और तंगहाली ने समय से पूर्व ही चेहरे पर झुर्रियाँ ला दी थीं। बदन में कसावट थी और चेहरे पर एक मुस्कान, रोज़ सत्रह किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई जो चढ़ता था। पास आकर पूछा, "पिट्ठू चाहिए?" इससे पहले मैं जनता भी नहीं था कि पिट्ठू क्या होता है। शायद टट्टू से भी छोटा कोई जानवर होता होगा। इसीलिए मैंने उससे पूछा था, "कहाँ है पिट्ठू?" उसने बताया, "जी मैं ही हूँ। आपकी बच्ची को कंधे पर बिठाकर ले जाऊँगा।"

अपरिचित स्थान पर हम अपनी बच्ची को किसी अनजान शख्स के हवाले नहीं करना चाहते थे, मन शंका कुशंकाओं से भर गया था इसलिए उसे मना कर दिया और कह दिया कि हमें पिट्ठू नहीं चाहिए हम तो टट्टू करेंगे, मगर उसकी आस नहीं टूटी।

लंबी यात्रा के बाद थोड़ी थकावट थी इसलिए पहले दिन होटल में विश्राम करके दूसरे दिन सुबह से चढ़ाई करने का निर्णय लिया। सुबह का मतलब था जब हमारी सुबह हो जाये। उसकी नज़र बराबर हम पर टिकी हुई थी। होटल आते जाते, बाज़ार में, दुकानों पर, हर जगह वे आस भरी नज़रें मुस्कराहट के साथ हमारा पीछा कर रही थी। वज़न को देखकर शायद उसने अपना ग्राहक चुन लिया था, और ये सोचकर अंदर ही अंदर खुश भी हो रहा था की इतनी हलकी फुलकी बच्ची को लेकर तो वो आसानी आसानी से चढ़ जायेगा, वह मुस्कराहट शायद इसी वजह से थी! मैं आश्चर्यचकित था कि मेरे  इन्कार के बावज़ूद उसमे इतना आत्मविश्वास और धैर्य कैसे है! और उसका फॉलोअप तो गज़ब का था।

मैं एक नामी फार्मास्यूटिकल कंपनी में मैनेजर था और मुझे भी डॉक्टर्स से प्रेस्क्रिप्शन्स निकलवाने के लिए ऐसी ही मुस्कराहट चेहरे पर चिपकाये रखनी पड़ती थी और उनके क्लिनिक में लंबा इंतज़ार करना पड़ता था तो एक खीज आती थी। प्रतीक्षा ही सबसे दुष्कर कार्य प्रतीत होता था। घंटो बसों व ट्रेन में, कभी बैठकर कभी खड़े-खड़े होकर गाँव- कस्बों में जाना पड़ता था। लेकिन जब प्रेस्क्रिप्शन निकल कर आते थे और केमिस्ट बोलते थे कि तुम्हारा तो बहुत माल उठा रहें हैं तो उत्साह आ जाता था और सब थकान भूलकर अगले दिन दुगने उत्साह से बिज़नस बढ़ाने में लग जाते थे। उस समय के हिसाब से पैसे भी अच्छे मिल जाते थे।

उसकी मुस्कराहट के जवाब में मुस्कुराने का अर्थ था उसे प्रतिक्रिया देना, जिससे वो हमसे और आशान्वित हो जायेगा,इसलिए बच्ची को गोद में उठाए उठाए घूमने वाले हम पति पत्नी कई बार बातचीत के दौरान हँसते हँसते उसके दिखते ही खामोश हो जाते थे। शायद कुछ डॉक्टर्स भी ऐसा ही सोचते हों कि अगर इसको हिलगा लिया तो ये मेरा दिमाग खा जायेगा इसलिए एम.आर.के सामने गंभीर ही रहते थे।

दूसरे दिन भी वो हमारे उठने से पहले ही होटल के बाहर आ कर बैठ चुका था। हम उससे नज़रें चुराकर निकल तो लिए मगर अब उसकी नज़र हमारी पीठ पर गढ़ रही थी। टट्टू करने से पहले मैं उसके पास गया और  पूछा,  "अगर तुम मेरी बच्ची को ऊपर तक ले जाते तो कितना लेते?"

उसने पचास रूपये बताया। उसके सतत प्रयास और तंगहाली को देखते हुए मैंने उसे पचास रुपये दिए और कहा, "ये तुम रख लो, हम तो टट्टू ही करेंगे।"

अगर उस स्थान पर कोई टैक्सी या बस होती तो मेहनतकश इंसान का कोई मोल नहीं होता परंतु यहाँ दो मेहनतकशों के बीच का चुनाव था। दुबले पतले, मोटे ताज़े, युवा, अधेड़, वृद्ध सभी टट्टुओं को ही प्राथमिकता देते हैं, पिट्ठुओं के पास सिर्फ बच्चे ही बचते हैं। इसमें भी टट्टू ही बाज़ी मार रहे थे।

बड़े ही अनमने भाव से उसने वो पचास रुपये स्वीकार किये। जो आस हमारे इन्कार के बाद भी नहीं टूटी थी इन पचास रुपयों ने वह आस तोड़ दी थी, अंतिम समय तक शायद उसे आशा थी कि हम अपना निर्णय बदल देंगे। वह मुस्कान गायब हो चुकी थी, ऐसा लगा जैसे उन पचास रुपयों की उसे सख्त ज़रुरत तो थी किन्तु मैंने उसका मोल एक कागज़ के टुकड़े के बराबर कर दिया हो, जैसे सत्रह किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़ कर ऊपर ले जाने की मेहनत ही उसके लिए सोना थी वो अब मिटटी में बदल चुकी थी, उसकी सारी आशाओं पर पानी फिर चुका था, उसके सतत प्रयासों का फल जैसे कसेला हो चुका हो।

भोपाल वापस लोट कर मैं कंपनी के कामकाज में लग गया और उस पिट्ठू को भुला दिया। साल दर साल कंपनी के टारगेट्स सुरसा के मुँह जैसे बढ़ते जा रहे थे, अब 'स्काई इज़ द लिमिट' नहीं थी वो उससे आगे भी कुछ देखने लगे थे। गेट समझौता लागू होने के बाद कम्पनियों में आपस में गला काट प्रतियोगिता शुरू हो चुकी थी। प्रबंधकों पर गाज़ गिरने लगी थी। साइकिल मीटिंग्स में हम इंसानो से आंकड़ो में तब्दील हो जाते थे और उसी आधार ये सितारों से खाक भी हो जाते थे। फाइव स्टार होटेल्स में ज़लील होते मैनेजर्स बोलते कि "हमसे अच्छा तो भजिया और दूध बेचने वाला है, कोई साइकिल मीटिंगस नहीं, कोई जॉइन्ट वर्किंग नहीं, कोई रिपोर्टिंग नहीं।
 वैसे तो सेल्स लाइन में बोलते हैं कि घर से बाहर निकलो तो इज्जत खूँटे पर टांग कर निकलो लेकिन पंद्रह वर्षो तक लगातार जलील होते होते अंदर ही अंदर कुछ टूटता जा रहा था। बॉस को ना कहना ही नाफार्मबर्दारी में शुमार था। सीनिअर कलीग ने समझाया भी कि "बस आई ऍम सॉरी, मुँह से बोल दे, लिख कर मत देना।"

मगर आत्मस्वाभिमान जाग उठा था।हर मध्यमवर्गीय शादीशुदा अपने बीबी बच्चों के बारे में तो सोचता ही है।विनाशकाले विपरीत बुद्धि थी या ज़लील होती ज़िन्दगी से छूटने की छटपटाहट पता नहीं।

अकाउंट सेक्शन से आये हुए व्यक्ति के आने से तंद्रा भंग हुई, "आप यहाँ साइन कर दीजिये" टाइप्ड पेपर आगे करते हुए उसने कहा।

"आइ ऍम रेज़ाइनिंग ड्यू टू पर्सनल रीज़ंस" हस्ताक्षर लेने के बाद वो मेरे रुके हुए वेतन का चेक बनवाने चला गया।

आधे घंटे बाद उसने वो चैक मेरे हवाले किया और रसीद ले ली। यह चैक लेते वक़्त मुझे खुद अपना चेहरा भी उस पिट्ठू की तरह नज़र आया। आज भी वे नज़र मेरा पीछा करती हैं और पूछती हैं, "आपने मुझसे मेरी मेहनत क्यों छीन ली?" मगर यह बात न उस दिन वह मुझसे, और न आज मैं कंपनी से बोल सका।

(लघुकथा संग्रह "ज़िन्दगी की छलांग" में पूर्वप्रकाशित)

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