राम निवास बाँयला की कविताएँ

केन्द्रीय विद्यालय, भारतीय नौसेना पोत, वलसुरा
राम निवास बाँयला

आग

आग तो आग है
चाहे
किसी ने / किसी से
लगाई हो / लगवाई हो
या लगी हो।

तपन ही देती है
दाहती है तन, मन, जन, धन ।
तो -
जरूरी है कोशिश
कि
ना लग पाए आग
या कि
जैसे भी हो बुझ सके।

मुँह फेरने / आँख मूँदने से
आग नहीं बुझती।
तुम्हारा / हमारा
मुँह फेरना / आँख मूँदना
ईंधन है इस दावानल का
जो
आज नहीं तो कल
तुम्हें / मुझे / हमें
वातानुकूलित शैय्या-गृह में भी
तापेगा जरूर।

हाँ
आग को बुझाने
आवश्यक होता है – पानी।
पानी, जो शीतल है
सरल है / तरल है।
या
डाल दी जाए मिट्टी
हटा दी जाए प्राण-वायु।

लेकिन
हवा, पानी, मिट्टी
सब साधन हैं
जो
तब ही करते हैं काम
जब
दिल में हो आग
आग बुझाने की।


रोटी 

हर कोई
सेंकता है / रहा है / रहेगा
अनवरत
अपनी रोटी
वाद / विवाद / प्रतिवाद से
हाल / सवाल / बवाल से।
क्योंकि
सयाना मनुज?
मात्र जीव।
जीव का पेट
पेट को चुगगा।
चुगगा?
आयानों के लिए।
सयानों के लिए?
रोटी।
रोटी कच्ची?
नहीं करारी।
करारी के लिए?
आग।
आग के लिए?
ईंधन।
ईंधन?
जो सुलभ।
सुलभ?
जो आयाने।
तो
जितना चाहो
झोंको आग में
सेंको रोटी
खाओ / खिलाओ / खिलखिलाओ।


दे दो शीश 

तुम -
शक्तिपुंज
जीवट / जीवंत
कर सकते हो -
धरा को पानी
पानी को धुंआ
धुंआ को जीवन
कुछ भी।

किन्तु
तुम – सयाने नहीं
शातिर भी नहीं।
और
तुम्हारे
इसी आयाने रूप पर
मैं फिदा
करता हूँ - कृपा
सुनाता हूँ – जीवन सार।
यदि सुनोगे
भूल अपने को / अपनों को
तो
कर पाओगे अमल।
तो
गौर से सुनो
जीवन – मिट्टी से मिट्टी तक का सफर।
मरण – अंतिम सत्य / लक्ष्य।
किन्तु
तुम सामान्य-जन
तुम्हारा अपने से मरना –
होता है - मौत / हत्या / अत्महत्या।

मैं
सयाना समर्थ।

यदि तुम मरते हो
मेरे लिए तो – उत्सर्ग।
मेरे इशारे से तो – पूज्य।
तो
सोच लो
दे दो – शीश
बन जाओ – बर्बरीक।

घास  

जमीर जताने    
शोहरत सुलगाने
रोटियाँ सेंकने
धुँआ देखने
या
यों ही
हाथ तापने भी
जरूरत होती है
आग की।

और जब
आग लगानी होती है
तो
ढूँढना होता है
इकट्ठा करना ही होता है
घास-फूस।

और
घास-फूस
जितनी सहज होगी
नाजुक होगी
आग
उतनी ही शीघ्र /
उतनी ही अधिक प्रचंड होगी।

आग के जलने / जलाने में
कोमल / सुलभ घास
बहुत सहूलियत देती है।

इसलिए
सयाने लोग
आस-पास की घास को
सुविधानुसार
देते रहते हैं
खाद-पानी।

उद्धार   

हे भूख!
हे बेकारी!
मतलब हे गरीबी!
सदियों से
लोग करते आए हैं
तेरे नाम से
तेरा ही शोषण।

बहुत हुआ
अब
करेंगे उद्धार।

छोड़ विलाप
पधार पंडाल।

मत माँग
ये रोटी-लंगोटी
जो तृष्णा जगाती है
माया बढ़ती है।


बैठ
चाट श्रद्धा
भज आस्था
और
महसूस कर – शांति
जीवन सार / अंतिम सत्य।

शांति ही मुक्ति है।
मुक्ति ही शांति है
और
दोनों उद्धार ही तो हैं ।

परजीवी

कभी सोचा ?

किसने
बनाया होगा
यह अजब नियम
कि
सिर्फ बीज फेंक
लिख लो
फल का अधिकार।

और
छीन लो
उससे
उसका नाम तक
जिसने नि:शेष हो
बीज को फसल बनाया।

निसंदेह
वह
परजीवी ही था।

किन्तु
था इतना मजबूत
कि
उसकी
अमरबेली मानसिकता
छा गई दुनिया पर
दस्तूर बन कर।

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