अर्चागुणगान का भक्तिशास्त्रीय विवेचन: एक मूल्यांकन

सुबोध कुमार शांडिल्य

सुबोध कुमार शांडिल्य

अर्चागुणगान मूलतः एक भक्ति काव्य है, जिसमें श्रीवैष्णव सम्प्रदाय से सम्बंधित भक्ति-भावना का दिग्दर्शन होता है। श्रीवैष्णव सम्प्रदाय से सम्बद्ध अन्य मान्य परम्पराओं का भी वर्णन इस काव्य में स्थान-स्थान पर यथेष्ट रूप में किया गया है। स्वामी पराङ्कुशाचार्य ने इस रचना में वेदान्त के सूत्रों एवं औपनिषदिक गुढ़तम रहस्यों की अवतारणा लोकगम्य अथवा लोकसुलभ बनाकर की है। स्वामी जी एक वैष्णव भक्त कवि थे। भक्त कवियों अथवा गीतकारों के लक्ष्यगत दो भेद हैं। प्रथम वे जो गीतों, स्तुतियों और स्तुतिपरक उद्गारों को भक्ति प्राप्ति या भगवत्प्राप्ति के साधन या सोपान समझते हैं और दूसरे वे जो आत्मसाक्षात्कार अथवा भगवत्साक्षात्कार करने के पश्चात् अपनी दिव्य अनुभूतियों को गीतों या पदों के माध्यम से लोक में वितरित करते हैं। पराङ्कुशाचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के अवलोकन से यह निश्चित है कि वे दूसरी श्रेणी में आते हैं। वे अपने ब्रह्मनिष्ठ गुरु श्री परमहंस सूरि से प्राप्त परमात्म ज्ञान और अपनी साधना व अनुभूतियों से अर्जित तत्त्वज्ञान से, गीतों के द्वारा लोक को सुसंस्कारित करने का सफल प्रयास किया है। उनका अतिधन्य जीवन धर्म-चेतना से संवलित एवं लोकमंगल से अभिमंडित था।

              अर्चागुणगान श्री पराङ्कुशाचार्य का एक गीतात्मक रचना है। इस गीतात्मक रचना की भक्तिशास्त्रीय विवेचना करने से पूर्व भारतीय भक्तिकाव्य के लक्षणों पर विचार करना अपेक्षित होगा। भारतीय भक्तिकाव्य के मुख्यतः चार लक्षण हैं। ये हैं- दार्शनिकता, भावात्मकता, लयात्मकता एवं संगीतात्मकता। वैदिक वाङ्मय से लेकर हिन्दी मध्यकालीन भक्तिकाव्यों तक में उपर्युक्त चारो लक्षणों का स्पष्ट समावेश दिखता है। लोकभाषा में रचित्त काव्य भी उनसे अछूते नहीं हैं। वस्तुतः भारतीय भक्तिकाव्य में विरोधिगुणों का समाहार दिखलाई पड़ता है। यहाँ दर्शन और भाव, राग और वैराग्य, तत्त्व दर्शन एवं सूक्ष्म कल्पनाएँ, बौद्धिकता और लयात्मकता आदि का शुचि-सुन्दर समन्वय हुआ है। वस्तुतः दर्शन और काव्य दोनों सर्वथा भिन्न धरातल पर स्थित रहते हैं। परन्तु भक्तिकाव्य साधना में दोनों एकस्थ हो जाते हैं। इस एकस्थ होने की प्रक्रिया में भक्तिकाव्य के दो रूपों का जन्म होता है। ये हैं- काव्यमय दर्शन और दर्शनमय काव्य। तद्नुसार भक्त कवियों के भी दो रूप हो जाते हैं- कवि दार्शनिक और दार्शनिक कवि। यद्यपि इन दो प्रकार के कवियों में उनके प्रतिपाद्य विषयों में समानता है, फिर भी दोनों में किंचित् अन्तर भी है। उनके प्रतिपाद्य विषय हैं- धर्म, दर्शन, भक्ति, भगवान् आदि। परन्तु जहाँ कविदार्शनिक तत्त्वों की मीमांसा पर जोर देता है, वही दार्शनिक कवि का ध्यान काव्यात्मक रसमयता पर अधिक केन्द्रित रहता है। जहाँ प्रथम में बौद्धिकता की प्रधानता रहती है, वहाँ दूसरे में भावात्मकता का प्राबल्य होता है। वैदिक ऋषियों, व्यास, वाल्मीकि आदि को कविदार्शनिक की श्रेणी में स्थान दिया जा सकता है और सूर, तुलसी, कबीर, मीरा आदि को दार्शनिक कवि कहा जा सकता है।

              स्वामी पराङ्कुशाचार्य निश्चित रूप से कविदार्शनिक की श्रेणी में आते हैं। वे अपने प्रतिपाद्य विषय पर अपने को केन्द्रित रखना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि पाठकगण वेदान्त के सूत्रों एवं अन्य सत्शास्त्रों के तत्त्वों को ठीक-ठीक समझ लें। अतः उनकी रचनाधर्मिता के मूल में लोकहित की अधिक प्रतिष्ठा है। वे गहन दार्शनिक तत्त्वों को सरल-सुगम रीति से लोक के समक्ष प्रस्तुत करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने हिन्दी के साथ-साथ लोकभाषा मगही को अभिव्यक्ति का साधन स्वीकार किया। सच तो यह है कि हिन्दी में रचित्त गीतों में भी उन्होंने मगही शब्दावलियों का प्रयोग किया है। इसीलिए उनके गीतों में एक ओर जहाँ दार्शनिकता है, वही दूसरी ओर सरसता के साथ सुबोधता भी अन्वित है।

              अर्चागुणगान में स्वामी पराङ्कुशाचार्य ने अपने इष्टदेव के रूप-स्वरुप का मार्मिक वर्णन किया है। वे अपने अनेक गीतों के माध्यम से भगवान् वेंकटेश, भगवान् श्रीनिवास, भगवान् रंगनाथ एवं भगवान् विश्वरूप आदि का सान्निध्य प्राप्त करने की कामना करते हैं। ये सभी देव श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के उपास्य देव हैं और इस सम्प्रदाय के मत से स्वयं भगवान् विष्णु ही इन रूपों में दिव्य देशो में विराजते हैं। स्वामी पराङ्कुशाचार्य जी अपने इन इष्टदेवों के दिव्य एवं अलौकिक कल्याण गुणों को पर्वताकार करने के साथ ही अपनी दुर्बलताओं एवं दुर्गुणों को निश्चल हृदय से उनके समक्ष प्रकट करना भी नहीं भूलते हैं। यही कारण है कि अर्चागुणगान में संकलित समस्त पदों को उनके विशाल शिष्यों एवं प्रशिष्यों की मंडली ने कंठहार बना लिया है, जो कवि कर्म की सफलता का प्रमाण है।

              अर्चागुणगान के कुछ गिने-चुने गीतों का भक्तिशास्त्रीय मूल्यांकन करने का प्रयास किया जायेगा ताकि श्रीवैष्णव सम्प्रदाय की भक्ति-भावना को समझा जा सके। साथ ही पद में गीत-प्रगीत के तत्त्वों पर भी विचार किया जायेगा, क्योंकि गीत भक्ति के साधनों में से एक है। अतः पहले यह विचार किया जाना समीचीन होगा कि गीत किसे कहते हैं और प्रगीत का स्वरुप क्या है? अस्तु-

         गीत किसे कहते है? गीत मानव-अभिव्यंजना की विश्व जनीन एवं सहजात सम्पदा है। इसका उत्स मानव-मन की सुख-दुखात्मक अनुभूतियों में है। यह स्वतः स्फूर्त छन्द है, जो लयात्मक होता है तथा जो वीणादि वाद्य यंत्रों के सहारे गेय होता है। प्रसिद्ध गीतकर्तृ महादेवी वर्मा का अभिमत है कि गीत सुख-दुःख की भावावेशमयी अवस्था का विशेष गिने-चुने शब्दों में स्वरसाधना से उपयुक्त चित्रण कर देना ही गीत है। विद्वानों का मानना है कि गीत कवि कल्पना की वह उड़ान है, जिसके द्वारा उसकी आत्मा असीम में मिल जाने का प्रयत्न करती है। स्वामी जी के सभी गीत इस परिभाषा के सर्वथा अनुकूल एवं अनुरूप है। स्वामी जी अपने गीतों के माध्यम से उस अनन्त अविनाशी परमतत्त्व से मिल जाने का संकल्प करते हैं और तद्नुसार प्रयत्न भी करते हैं। वे अपने अंतःकरण से कथ्य को राग-सम्पदा प्रदान कर के उसमे रमणीयता का उन्मेष करते हैं। ध्यातव्य है कि गीत में टेक की अनिवार्यता होती है। गीत के स्वरुप लक्षणों से संपृक्त उनके कुछ गीत निम्नवत् हैं :-
“अपना दयालु प्रभु के दरसन करबई, कब वेंकट में जाके।
कइसे दूनो नयन जुड़ायब, कब वेंकट में जाके।।
अपने दयालु प्रभु के हृदये टिकायब, कब वेंकट में जाके।
चरणहिं मनवां लगाय, कब वेंकट में जाके।।
अपना दयालु प्रभु के मथवा नेवायव, कब वेंकट में जाके।
यह दोनों अखियाँ बहायब, कब वेंकट में जाके।।
अपने दयालु प्रभु के भोगवा लगायब, कब वेंकट में जाके।
सब नैवेदवा बनाय, कब वेंकट में जाके।।
अपना प्रभु के आरती उतारब, कब वेंकट में जाके।
दोनों कर धर के बुलाय, कब वेंकट में जाके।।”[1]

       इस पंचपदीय गीत का बाह्य आकार तो गीतात्मक है, क्योंकि यहाँ टेक का विधान किया गया है, परन्तु इसका आंतरिक स्वरुप प्रगीतात्मक है।

            प्रगीत किसे कहते हैं? वह अन्तर्वृत्ति निरूपणी कविता प्रगीत है, जो वैयक्तिक अनुभूति से आगे बढ़ती है और जो भौतिक घटनाओं से असंपृक्त होकर उच्चस्थ भावों से सम्बन्ध बनाती है। वस्तुतः प्रगीत स्वानुभूति निरुपणी कविता है, जिसमें मानव आत्मा प्रकाशित होती है। इन लक्षणों के आधार पर कहा जा सकता है कि उपर्युक्त पंचपदीय कविता प्रगीत हैं, क्योंकि इसमें भौतिक संपदाओं का निरुपण नहीं वरन् आध्यात्मिक तत्त्वों का निदर्शन है।

              भक्तिशास्त्रीय दृष्टि से उक्त पंचपदीय पद मनोराज्य भूमिका के साथ शरणागति की आनुकूलस्य संकल्प विधा का प्रकाशन करते हैं। अब यहाँ जान लेना आवश्यक है कि मनोराज्य भूमिका क्या है तथा आनुकूलस्य संकल्प क्या है? भक्तिशास्त्र के आचार्यों ने शरणागति या आत्मनिवेदन के सात विभाग किये हैं; जिन्हें- शरणागति या प्रपत्ति का पृष्ठाधार स्वीकार किया जाता है। ये हैं- दीनता, मानमर्षता, भय-दर्शन, भर्त्सना, आश्वासन, मनोराज्य और विचारणा। इनमें मनोराज्य भूमिका (आधारशिला) अन्तर्मन की वह प्रतीति है कि मैं परमात्मा से जुड़ा हुआ हूँ, प्रभु मेरी रक्षा कर रहा है और निष्पाप होकर मैं आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हूँ। इसमें भक्त कवि को यह दृढ़ विश्वास हो जाता है कि उसे मनोवाँछित पदार्थ मिलेगें, हृदय की दाह मिटेगी और प्रभु का सान्निध्य मिलेगा।

              मनोराज्य की भूमिका में स्वामी जी वेंकटेश भगवान् से मिलने की बड़े-बड़े हौसले रखते हैं और प्रभु से विनती करते है कि उनकी कामनाओं को पूर्ण कर दे। कविकुलशेखर तुलसीदास भी कुछ इसी प्रकार से विनती करते हैं-
“कबहुँ देखाइहौं हरि, चरन।
समन सकल कलेस कलिमल, सकल मंगल करन।

x x x

कृपासिंधु सुजान रघुबर प्रनत-आरति-हरन।
दरस-आस-पियास तुलसीदास चाहत करन।।
                                                  [विनयपत्रिका, पद- 218]

गोस्वामी तुलसीदास की तरह स्वामी पराङ्कुशाचार्य भी प्रभु से विनती करते हैं-
“अपना दयालु प्रभु जी दरसन देतन, कब वेंकट से आके।
दीन हित करुण चिताय, कब वेंकट से आके।।
अपने दयालु प्रभु जी चरण धरवतन, कब वेंकट से आके।
बड़ बड़ हथवा बढाय, कब वेंकट से आके।।
अपना दयालु प्रभु जी संगहु लगवतन, कब वेंकट से आके।
सब विधि अपना बनाय, कब वेंकट से आके।।
मोर मोर कहि प्रभु जी संग बइठवतन, कब वेंकट से आके।
सिर धर कर अपनाय, कब वेंकट से आके।।
परम दयालु प्रभु जी टुकहूँ बिलोके, कब वेंकट से आके।
करुन नयन सितलाय, कब वेंकट से आके।।”[2]

              उपर्युक्त दोनों गीतों में शरणागति की आनुकूलस्य संकल्प विधा भी है। परमात्मा के नाम, रूप, लीला और धाम के निरंतर चिंतन से चित्त-वृत्तियों का ईश्वर के अनुकूल होने तथा तदनुरूप ही संकल्प होने का नाम आनुकूलस्य संकल्प है। वस्तुतः यह एक निश्चयात्मक निष्ठा है, जो चित्त को शुद्ध कर प्रभु की ओर उन्मुख करती है। भक्त को यह विश्वास हो जाता है कि अनुकूल के संकल्पों से प्रभु की कृपा अवश्य मिलेगी। अतः यह विधा भगवत्प्राप्ति की अमोघ विधि है, सशक्त साधन है। यही विधा मानस के मनु-शतरूपा को तपस्यारत कराकर भगवत्प्राप्ति कराती है। मनु जी कहते हैं-
‘होइ न बिषय-बिराना भवन बसत भा चौथपन।
हृदय बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु।।

इस विधा में परमात्मा के अनन्त कल्याण गुणों पर, उनकी दयालुता-कृपालुता पर अचल विश्वास रखता है। स्वामी जी के उपर्युक्त दोनों पदों में प्रभु की दयालुता का स्पष्ट अंकन हुआ है। भक्त कवि ‘दयालुता’ का बार-बार स्मरण करते हैं। प्रतिकूल और अनुकूल पर ध्यान नहीं देकर चेतन और अचेतन सभी का पालन-पोषण करने का प्रभु का स्वव्यापार विशेष की संज्ञा ‘दयालुता’ है। यह तो सत्य है कि प्रभु में असंख्य गुण हैं, परन्तु भक्त को तो केवल उनकी दया चाहिए, कृपा-अनुग्रह चाहिए। इसीलिए स्वामी जी बारम्बार ईश्वर की दया-कृपा का स्मरण करते हैं।

              उपर्युक्त दो गीतों में स्वामी जी ने वेंकटेश भगवान् की दयालुता का चिंतन-मनन किया है। आगे हम उस गीत पर विचार करेंगे, जिसमें रंगनाथ भगवान् की करुण दृष्टि का स्पष्ट अंकन हुआ है। ध्यातव्य है कि दक्षिण भारत में कावेरी नदी के बीच श्रीरंगम् मंदिर है, जिसमें श्रीरंग भगवान् प्रतिष्ठित हैं। यह भी स्मरणीय है कि श्रीराम के इक्ष्वाकुवंश के कुलदेवता श्रीरंगनाथ भगवान् ही थे। अतः श्रीरंगनाथ भगवान् की अपार महिमा है और श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में श्रीरंगनाथ भगवान् को साक्षात् वैकुण्ठाधिपति माना गया है। स्वामी पराङ्कुशाचार्य निम्न पद में इन्हीं रंगनाथ भगवान् की स्तुति करते हैं-
“रंग रइया ये, करुणा नजर से चिताय।
होके करुणाकर जी ठाने निठुरइया,
रंग रइया-ये, हमनिके कवन उपाय।
वेद सब तोहि नेति नेति कहि गावै,
रंग रइया ये, प्रभु रूप अर्चा बनाय।
छोड़ दिव्य लोक अरु अवध नगरिया,
रंग रइया ये, रहले दक्षिण दिशि जाय।
बाहर भीतर रहके करे रखवरिया,
रंग रइया ये, अब जनि रह तू भुलाय।
दीन-हीन दास तोर तू ही मोर स्वामी,
रंग रइया ये, कहु पग धरन उपाय।”[3]

उपर्युक्त पंचपदीय विनय गीत में रक्षिष्यतीति विश्वासः के साथ मानमर्षता की भूमिका है। भक्त का भगवान् के रक्षक रूप में अटल विश्वास करने का नाम ‘रक्षिष्यतीति विश्वासः’ है। प्रभु ने बड़े-बड़े आर्तजनों एवं पापियों की भी रक्षा की है, अतएव वह मेरी भी रक्षा अवश्य करेंगे, यह दृढ़ विश्वास उनकी कृपा-प्राप्ति का सशक्त साधन है। असुरों का विनाश एवं संतों का परित्राण उनके लोकरक्षकत्व का प्रमाण है। अहंकार का ध्वंस और नम्रता, विनयशीलता तथा दैन्य भाव का वरण कर लेने की संज्ञा मानमर्षता है। अहंकार और बड़े होने का भान दोनों भक्ति मार्ग के प्रत्यूह हैं, रोड़े हैं। ये भक्त को प्रभु तक पहुँचने में बाधा डालते हैं। अतः भगवत्प्राप्ति के लिए निरभिमान एवं विनम्र होना आवश्यक है।

              आलोच्य पदों में स्वामी जी संसार में अन्य उपाय को त्यागकर केवल रंगनाथ भगवान् को ही उपाय मान रहे हैं। इसी को भक्ति साहित्य में उपायांतर त्याग कहा गया है। समस्त(अन्य) साधनों को छोड़कर प्रभु को ही साधन और साध्य मान लेना ‘शरणागति’ नाम से जाना जाता है। स्वामी जी कहते हैं कि वो जो भी हैं रंगनाथ के दास ही है। दास स्वामी का भोग्य होता है। भोक्ता का भोग्य पर प्रीति होती है। अतः रंगनाथ भगवान् अवश्य ही कल्याण का मार्ग बतलायेंगे। वे भक्त को कभी नहीं भूलते हैं, स्वामी जी को ऐसा दृढ़ विश्वास है।

              उपर्युक्त पदों में भगवत्स्वरूप का निदर्शन भी हुआ है। भगवत्स्वरूप को पाँच रूपों में विवेचित्त किया गया है, यथा:- पर, व्यूह, विभव, अन्तर्यामी और अर्चावतार। इन पाँच रूपों में अर्चावातर ही सर्वसुलभ है-
“व्यूह पर वैभवन्ह व्यापी हूँ, कौन पाते यत्न से।
भगवान् अर्चारूप धरकर जनन से मिल सुगम से।।”[4]
भगवत्तत्व गहन तथा आर्षवाक्य अतिगूढ़ है। अस्तु-

(क) पररूप :- परात्पर वैकुण्ठ में विराजमान अनुपम, अनिर्देश्य, दस हजार पूर्ण चन्द्रों के समान कान्तिवालें विश्व का आप्यायन करने वालें शंख, चक्र, गदा, पद्म आदि दिव्यायुद्धों से युक्त श्रीमन्नारायण को ‘पर’ कहा गया है।
(ख) व्यूह :- वैकुण्ठाधिपति पररूप भगवान् ही सृष्टि, पालन, संहार एवं उपासकों पर अनुग्रह करने के लिए वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युमन और अनिरुद्ध- इन चार रूपों में हो जाते हैं; जिन्हें चतुर्व्यूह कहते हैं।
(ग) विभव :- धर्म संस्थापना के लिए गृहीत मत्स्य, कूर्म, राम, कृष्ण आदि अवतारों को ‘विभव’ नाम से जानते हैं।
(घ) अन्तर्यामी :- जगत् के समस्त चराचर जीवों में सूक्ष्म रूप में व्याप्त होकर रहनेवाले भगवान् की संज्ञा ‘अन्तर्यामी’ है।
(ड़) अर्चावातर :- अर्चारूप का अर्थ है- आराधना के लिए उपयुज्यमान भगवान् के श्रीविग्रह, जो मंदिरों में प्रतिष्ठापित किये जाते हैं।

              उपर्युक्त पाँच रूपों में चार अनधिगम्य है। केवल अर्चावतार को ही संसार स्थूल चक्षुओं से देख पाता है। इसीलिए यह रूप सुलभ है। स्वामी जी के शब्दों में-
‘वेद सब तोहि नेति नेति कहि गावै,
रंग रइया ये, प्रभु रूप अर्चा बनाय।’

              पराङ्कुशाचार्य एक ज्ञानी संत थे। ज्ञानी भक्त का जीवन भगवान् के अधीन होता है। वह भगवान् एवं उनके दिव्य-गुणों का सतत स्मरण करता है। अग्रलिखित पदों में स्वामी जी भगवान् की दयालुता और कारुण्य का स्मरण करते हुए अर्थपंचक और मंत्र विधान का प्रतिपादन करते हैं।
“अपना दयालु स्वामी अपना बनाये, हरि करूणावश होके,
सब दुःख-दूषण दुराय, हरि करूणावश होके।
द्वय मंत्र राज धर्म सब ही सुनाएं, हरि करूणावश होके,
धर कर चरण में लगाय, हरि करूणावश होके।
स्वस्वरूप पर रूप तेहिं में बताय, हरि करूणावश होके,
एक कह चरण उपाय, हरि करूणावश होके।
साधन विरोधी फल सिद्धहूँ उपाय एक, करूणावश होके,
अरु सब दूर बिलगाय, हरि करूणावश होके।
कोरवा धरत प्रभु लोरवा पोछ्त कर, करूणावश होके,
मा शुच पद समुझाय, हरि करूणावश होके।
अस दीनबंधु प्रभु दीन अपनाए, अति करूणावश होके,
तब दीनबंधु कहलाय, एके करूणावश होके।”[5]

              उपर्युक्त षड्पदीय गीत में भक्ति-दर्शन के अनेक तत्त्वों का समाहार हुआ है, जो वैष्णव सम्प्रदाय में भक्ति का आधार है। वस्तुतः इन पदों में विचारणा भूमिका के साथ शरणागति की विधा का भी प्रकाशन हुआ है। दार्शनिक विचारों से संपन्न इन छः पदों में अर्थपंचक और शुद्ध मंत्र विधान की भी अन्विति हुई है। अब एक-एक पक्ष पर विचार प्रस्तुत करने का प्रयास किया जायेगा, ताकि श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में अन्तर्निहित भक्ति के साधनों पर दृष्टिपात किया जा सके। यथा:-
(1) विचारणा की भूमिका :- मन की वह अन्तर्दशा, जिसमें भक्त स्वयं अपनी गतिविधियों के साथ ही दर्शन के लोक में पहुँचकर जीवात्मा एवं परमात्मा के संबंधो पर विचार करता है, विचारणा की भूमिका कहलाती है। उपर्युक्त पदों में स्वामी जी सेवक-सेव्य सम्बन्ध की प्रतीति में स्वामी (भगवान्) के द्वारा सेव्य (दास) को अंगीकार कर दास के समस्त दोष-दूषणों की समाप्ति की कल्पना करते हैं- ‘सब दुःख-दूषण दुराय।
(2) मंत्र-जप :- स्वामी जी जिस परम्परा में दीक्षित थे, उसमें श्रीमन्नारायण ही उपास्य हैं। श्रीमन्नारायण की उपासना हेतु वैष्णव सम्प्रदाय में तीन मंत्रो की जप का विधान है। ये है- मूल मंत्र, द्वय मंत्र एवं चरम मंत्र। विचारणा की भूमिका में स्वामी जी की उद्भावना है कि उन्हें ये तीनों मंत्र भगवान् ने करुणा करके दिये हैं।
(3) इन पदों में शरणागति की विधा गोप्तृत्व वरणं है। इस विधा में शरणागत भक्त भगवान् को रक्षक रूप में वरण कर लेता हैं, स्वीकार कर लेता है। भगवान् दीनबंधु हैं। वे दीनों को अपना लेते हैं। स्वामी जी भी भाव-राज्य में यह स्वीकार करते हैं कि उन्हें भगवान् ने स्वीकार कर लिया है, अपना बना लिया है तथा गोद में बैठाकर अंगीकार कर लिया है।
‘अस दीनबंधु हरि दीन अपनाये, अति करूणावश होके।’
(4) अर्थपंचक :- स्वस्वरूप, परस्वरूप, उपायस्वरुप, विरोधिस्वरुप और फलस्वरूप- इन पाँचों तत्त्वों के ज्ञान को ‘अर्थपंचक’ नाम से जाना जाता है। अपनी आत्मा के स्वरुप का ज्ञान, परमात्मा के स्वरुप का ज्ञान, परमात्मा की प्राप्ति का उपाय, परमात्मा की प्राप्ति में विरोध करनेवालें तत्त्वों का ज्ञान और प्रभु-प्राप्ति के बाद क्या परिणाम या फल मिलता है, उसका ज्ञान- ये सब अर्थपंचक के नाम से जाने जाते हैं।

              उपर्युक्त पदों में फलस्वरूप का विनियोग हुआ है। भगवान् का भक्तों को बुलाना, उन्हें पास बैठाना, हृदय से लगाना और अपने धाम में बैठाना आदि कृपाजन्य कर्मो का नाम ‘फलस्वरूप’ है। रामचरितमानस में भगवान् राम के द्वारा हनुमान को उठाकर हृदय से लगाना और अश्रु-जल से अभिसिक्त करना फलस्वरूप है।
‘तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा।।’
परम रमानुरागी सुतीक्ष्ण मुनि के साथ भी भगवान् यही करते हैं।
‘भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई।।
गीधराज जटायू को भी ऐसे ही फल की प्राप्ति हुई।
‘कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रघुवीर।
निरखि राम छविधाम मुख विगत भइ सब पीर।।’

              इसी प्रकार स्वामी जी को भी भगवान् अपने चरणों में लगाते हैं, गोद में लेकर लोर पोंछते हैं और द्वय मंत्र और चरम मंत्र भी बतलाते हैं। यही फलस्वरूप है।

(5) करुणा :- उपर्युक्त पदों में भगवान् के करुणा-गुण का भी सफल अंकन हुआ है। भगवान् अनन्त शक्ति, अनन्त सौन्दर्य और अनन्त शील के साक्षात् विग्रह हैं। इनमें अनन्त शील से ही भक्त को सर्वाधिक पाला पड़ता है। इस अनन्त शील के अनतर्गत- कृपा, करुणा, दया, अनुग्रह, अनुकम्पा, छोह, भागवत-वत्सलता आदि दिव्य गुणों की संस्थिति होती है। इन गुणों में भगवान् की करुणा ही मुख्य है- ‘मुख्यं तस्य हि कारुण्यं।’ [शांडिल्य भक्तिसूत्र]। ‘भगवद्गुणदर्पण’ नामक ग्रंथ में करुणा गुण की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि रक्षक भगवान् का हृदय आश्रित जनों की दुखाग्नि से द्रवित हो जाता है और अश्रुवातादि के रूप में फूट पड़ता है। सर्वसमर्थ प्रभु का पर दुःख से अकुला जाना उनका करुणागुण है।

              स्वामी पराङ्कुशाचार्य निश्चय ही एक आश्रित भक्त हैं। उन्हें भगवान् के करुणागुण पर पूर्ण विश्वास एवं भरोसा है। यही कारण है कि वे गीत के प्रत्येक चरण में ‘करुणा’ को समाहित करते चलते हैं। इस ब्याज से सभी भक्तों को यह संदेश देते हैं कि उन्हें प्रभु के करुणागुण का आश्रय अवश्य लेना चाहिए।

              ‘अर्चागुणगान’ नामक इस गीतिकाव्य में भारतीय भक्ति-दर्शन के असंख्य तत्त्वों का समावेश हुआ है। यहाँ बानगी के रूप में कुछ पदों का ही भक्ति-शास्त्रीय मीमांसा की गई है। कायदे से देखा जाय तो ‘अर्चागुणगान’ भक्ति-दर्शन की एक श्रेष्ठ रचना है। इस रचना में श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के मत एवं सिद्धांतो का सम्यक निरुपण स्वामी जी द्वारा किया गया है। यही कारण है कि अर्चागुणगान भक्तों एवं अनुयायियों का कंठाहार बना हुआ है, जो कवि-कर्म की सफलता का द्योतक है।

संदर्भ
[1]अर्चागुणगान, पृ० सं०- 82 से उद्धृत।
[2]अर्चागुणगान,  पृ० सं०- 83 से उद्धृत।
[3]अर्चागुणगान, पृ० सं०- 34 से उद्धृत।
[4]अर्चागुणगान,  पृ० सं०- 04 से उद्धृत।
[5]अर्चागुणगान,  पृ० सं०- 51 से उद्धृत।

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