‘ग्लोबल गाँव के देवता’ उपन्यास में आदिवासी जीवन

स्वाति सिंह

शोधार्थी (हिन्दी-विभाग), बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ (उ.प्र.)
ईमेल swatisingh15943@gmail.com

ग्‍लोबल गाँव के देवता (उपन्‍यास)
ISBN- 978-81-263-5159-1
रचनाकार - रणेन्‍द्र
प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ


“हम बाकी दिन कैसे गुज़ारेंगे
इसका कोई अर्थ नहीं
हमारी रात
भरपूर काली रात होने का आश्वासन दे रही
क्षितिज पर एक भी तारा नहीं
उदास हवाएँ
दूर कहीं विलाप कर रहीं
हमारे कदमों के ठीक पीछे
हमारा दुर्भाग्य चल रहा है
एक जख़्मी हिरण
अपने पीछे भागते शिकारी की आवाज़ सुनकर
अपने आप को 
अपनी पूर्ण मृत्यु के लिये तैयार कर रहा है |”1 
पश्चिम के सुप्रसिद्ध दार्शनिक हेगेल ने एक विधा के रूप में उपन्यास को आधुनिक चेतना से जोड़ते हुए ‘आधुनिक युग का महाकाव्य’ कहा है। किन्तु, भारत में उपन्यास के पश्चिमी मॉडल को प्रश्नांकित करते हुए भारतीय उपन्यासों के अलग अनुभव, परम्परा और ढाँचे की बात कही गयी है। हिन्दी उपन्यास को राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़कर देखा गया है। यदि यूरोप में उपन्यास की मृत्यु की घोषणा हुई तो भारत में भी आलोचक डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने उपन्यास को ‘असमय वृद्ध’ घोषित किया तथा नेमिचन्द्र जैन द्वारा उपन्यास के भविष्य के प्रति आशंका व्यक्त किए जाने के बावजूद समकालीन विमर्शकारों ने उपन्यास विधा को नयी जमीन और नयी पहचान दी है। विमर्शों पर केन्द्रित साहित्य रचने वाले साहित्यकारों ने उपन्यास के बुनियादी आधार को नये कारकों से जोड़ने का प्रयास किया है। आज उपन्यास सामाजिक अस्मिता के अन्वेषण का माध्यम बन गया है। साहित्य में जो विधा समकालीन विमर्शों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समझी गयी वह विधा उपन्यास ही है। 
आदिवासी का अर्थ है मूल निवासी यानी वह समुदाय जो किसी क्षेत्र का प्राचीनतम निवासी हो। वीर भारत तलवार के अनुसार, ‘‘भारत में करीब 427 आदिवासी जातियाँ रहती हैं।’’2 आदिवासी समाज के अन्तर्गत आने वाली यह प्रचुर जातियाँ आज भी मुख्य धारा से कोसों दूर हैं। आधुनिक तथाकथित सभ्य समाज जिस सामाजिक साम्य की परिकल्पना करता है और उसे पाना चाहता है वह सारी खूबियाँ आदिम समय से आदिवासी समाज में देखने को मिलती हैं। आदिम साम्यवाद और मातृसत्तात्मक समाज, संस्कृति और मूल्य आज भी उनके यहाँ कायम हैं। वीर भारत तलवार आदिवासी समाज की प्रशंसा अपनी पुस्तक ‘झारखण्ड के आदिवासियों के बीच’ में करते हुए लिखते हैं- ‘‘आदिवासी गरीब हैं। उनकी अर्थव्यवस्था पिछड़ी हुई है, उनकी उत्पादकता कम है, क्योंकि उनकी जमीन बहुत उपजाऊ नहीं है, उनके पास सिंचाई के साधन तथा उत्पादन के साधनों का अभाव है... लेकिन यह सही नहीं कि उनकी संस्कृति घटिया है... इसके उल्टे, सच बात तो यह है कि आदिवासियों की संस्कृति, मूल्य तथा बहुत सी सामाजिक परम्पराएं तथाकथित सभ्य बाहरी लोगों की संस्कृति, मूल्यों और सामाजिक परम्पराओं से कहीं अधिक श्रेष्ठ और मानवीय हैं।’’3
आदिवासी जीवन सुसंस्कृत समाज के लिए ठीक वैसे ही रहा है जैसे ‘बूढ़ी काकी’ कहानी की बूढ़ी काकी। पूरे परिवार का भरण-पोषण बूढ़ी काकी के ही दम पर निभ रहा है लेकिन बूढ़ी काकी प्यार, सम्मान के अभाव और भूख से तड़पने को मजबूर हैं। वह घर से बाहर बनी एक झोपड़ी में भूखी पड़ी रहती हैं जहाँ से उनकी आवाज कोई सुनने वाला नहीं है। उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाती है। इसी प्रकार की उपेक्षा भारतीय समाज की मुख्य धारा से आदिवासी समाज को भी निरंतर भुगतनी पड़ रही है। सारी खनिज सम्पदा उन्हीं के पास है और उससे वही उपेक्षित हैं। सिर्फ उपेक्षित ही नहीं बल्कि बहुअंतराष्ट्रीय कम्पनियों की साजिशों का शिकार भी हो रहे हैं। आदिवासियों को उनके ही जल, जंगल और जमीन से खदेड़ने की बहुतेरी कोशिश इन पूँजीवादी ताकतों के द्वारा की जा रही है।
आदिवासियों के जीवन के दुःख, दर्द को जानने-समझने के लिए आँख के आगे से अखबार और तमाम तकनीकी यंत्रों को हटाकर नंगी आँखों से ही देखा जा सकता है। हम सूचनाओं के युग में जी रहे हैं। यह ठीक बात है। पर सूचनाओं को सबसे पहले देने के चक्कर में सूचनाएँ ही घनचक्कर हो जाती हैं। यह ठीक बात नहीं है। इसीलिए यह जरुरी हो जाता है कि हम चीजों को शोध परक दृष्टि से देखें और यह उपन्यास इसी शोध परक दृष्टि का उदाहरण है। 
आदिवासी साहित्य से तात्पर्य उस साहित्य से है जिसमें आदिवासियों के जीवन संघर्ष और सामाजिक स्थिति की यथार्थ अभिव्यक्ति हुई हो, फिर चाहे वह आदिवासी द्वारा लिखा गया हो याकि गैर आदिवासी द्वारा। आदिवासी साहित्य को विभिन्न नामों से विश्व में जाना जाता है। यूरोप और अमेरिका में इसे ‘नेटिव अमेरिकन लिटरेचर’, ‘क्लर्ड लिटरेचर’, ‘स्लेब लिटरेचर’ और ‘अफ्रीकन-अमेरिकन लिटरेचर’ कहा गया। अफ्रीकी देशों में ‘ब्लैक लिटरेचर’ और ऑस्ट्रेलिया में ‘एबोरिजिनल लिटरेचर’ कहते हैं। हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में सामान्यतः ‘आदिवासी साहित्य’ ही कहा गया है। 
आदिवासी साहित्य वाचिक तौर पर अपनी मूल आदिवासी भाषाओं में बहुत ही विपुल और समृद्ध है। भारत में लिखित आदिवासी साहित्य की शुरूआत बीसवीं सदी के आरंभिक दौर में हुई जब औपनिवेशिक दिनों में आदिवासी समुदाय आधुनिक शिक्षा के संपर्क में आया। विशेषकर झारखण्ड और उत्तर-पूर्व के आदिवासी इलाकों में। मनुष्य की हर जाति हर समुदाय में एक विश्व दृष्टि रूपायित होती है। किसी भी समुदाय या जाति का लोप गहरी सांस्कृतिक क्षति है क्योंकि उसके साथ एक विश्व दृष्टि भी लुप्त हो जाती है। जल, जंगल और जमीन आदिवासी जीवन का मूलाधार रहे हैं। उनका उजड़ना आदिवासी समाज, संस्कृति और उनकी जातीय अस्मिता का उजड़ना है। सरकारों द्वारा जंगल के खनिजों का लगातार दोहन करने के कारण आदिवासी अपने मूल स्थान से पलायन करने पर मजबूर हैं। हाल ही में निर्मित ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ जो कि गुजरात में स्थित है, उसके चलते भी स्थानीय आदिवासी जीवन को काफी गहरी क्षति पहुँची है। ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ प्रोजेक्ट की वजह से गम्भीर रूप से प्रभावित करीब 75000 आदिवासियों को मजबूरन स्थानांतरित होना पड़ा है।
आदिवासी अस्मिता के संकट के कारण भारतीय समाज का परिदृश्य बदला है। इस बदलते हुए परिदृश्य को हिन्दी साहित्यकारों ने बखूबी समझा और अपने लेखन में प्रमुखता से जगह भी दी है। आदिवासी जीवन के महत्त्वपूर्ण उपन्यासकारों में मनमोहन पाठक, संजीव, पुन्नी सिंह, राकेश कुमार सिंह एवं रणेन्द्र प्रमुख हैं जिन्होंने आदिवासी जीवन के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक संदर्भों को प्रमुखता से उठाया है।
प्रसिद्ध उपन्यासकार रणेन्द्र का ‘ग्लोबल गाँव का देवता’ एक महत्त्वपूर्ण एवं चर्चित उपन्यास है। वर्ष 2009 में प्रकाशित यह उपन्यास वस्तुतः आदिवासियों-वनवासियों के जीवन के सन्तप्त का सारांश है। उपन्यास के ब्लर्ब पर असुर समुदाय के जीवन के बारे में लिखा गया है- ‘‘शताब्दियों से संस्कृति और सभ्यता की पता नहीं किस छन्नी से छन कर अवशिष्ट के रूप में जीवित रहने वाले असुर समुदाय की गाथा पूरी प्रामाणिकता व संवेदनशीलता के साथ रणेन्द्र ने लिखी है। आग और धातु की खोज करने वाली, धातु पिघलाकर उसे आकार देने वाली कारीगर असुर जाति को सभ्यता, संस्कृति, मिथक और मनुष्यता सबने मारा है। ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ असुर समुदाय के अनवरत जीवन संघर्ष का दस्तावेज है। हाशिए के मनुष्यों का सुख-दुख व्यक्त करता यह उपन्यास झारखण्ड की धरती से उपजी महत्त्वपूर्ण रचना है। असुरों की अपराजेय जिजीविषा और लोलुप-लुटेरी टोली की दुरभिसन्धियों का हृदयग्राही चित्रण।’’4 
उल्लेखनीय है कि असुर समुदाय के सुख-दुख, उसकी अपराजेय जिजीविषा और मुख्य धारा की साजिशें असुर अंचल (भौरांपाट) में विज्ञान शिक्षक के रूप में नियुक्त होकर आये मुख्यधारा के सदस्य युवा मास्टर के माध्यम से सामने आयी हैं। जब मास्टर की भेंट अम्बाटोली के गोरे-चिट्टे आदमी लालचन असुर से होती है- ‘‘सुना तो था कि यह इलाका असुरों का है, किन्तु असुरों के बारे में मेरी धारणा थी कि खूब लम्बे-चौड़े, काले-कलूटे, भयानक दाँत-वाँत निकले हुए, माथे पर सींग-वींग लगे हुए लोग होंगे। लेकिन लालचन को देखकर सब उलट-पुलट हो रहा था। बचपन की सारी कहानियाँ उलटी घूम रही थीं।’’5 दरअसल ‘‘वैदिक साहित्य से शुरू होकर रामायण, महाभारत और विभिन्न पुराणों में निर्मित असुरों की यह छवि उनके समुदाय और जीवन के मिथकीकरण का परिणाम है। प्रभुत्वशाली सत्ताएँ जिनका विनाश करना चाहती हैं उनका पहले दानवीकरण करती हैं, फिर उन पर हमला करती हैं और बाद में उनकी जमीन तथा जीवन पर कब्जा करती हैं। भारत में यह प्रक्रिया वैदिक काल से लेकर आज तक चली आ रही है।’’6 प्राचीन काल से चली आ रही असुरों के प्रति इस संकुचित सोच को ही रणेन्द्र उजागर करते हैं। 
दरअसल, आदमी की लाचार निरीहता को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। आम आदमी गरीबी और अशिक्षा के कारण अपने अधिकारों को जान ही नहीं पाता और जिस कारण उसे चरवाहे द्वारा हाँक दी गई भेड़-बकरियों की तरह जीना पड़ता है। रणेन्द्र की विशेषता यह है कि वे मुख्यधारा की नज़र से ओझल झारखण्ड के कोयलबीघा प्रखण्ड को दृश्यमान बना कर प्राकृतिक सम्पदा से युक्त क्षेत्र के बरक्स इसके मूल आदिवासियों की दुर्दशा के प्रामाणिक चित्र प्रस्तुत करते हैं। बॉक्साइट से भरे इस क्षेत्र में बहुत सारी कम्पनियाँ हैं जो खदानों से बॉक्साइट निकालने का काम करती हैं और एल्युमीनियम में ढालने के लिए उसे डेढ़ से दो सौ किलोमीटर दूर सिल्वर सिटी ऑफ इण्डिया भेजती हैं। कम्पनियाँ बॉक्साइट तो निकालती हैं लेकिन गड्ढों को नहीं भरती हैं जबकि एग्रीमेंट में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि गड्ढों को तुरन्त भर दिया जाए। लेकिन पिछले पच्चीस-तीस साल से न ये गड्ढे भरे जा रहे हैं, न इन गड्ढों में पनपने वाले मच्छरों को मारने की तजवीज की जाती है। बल्कि साल-दर-साल सेरेब्रल मलेरिया की चपेट में आकर आदिवासी आबादी का एक बड़ा हिस्सा काल का ग्रास बन जाता है। बस बचता है तो दबा-छुपा जनाक्रोश- ‘‘हमें तो लगता है कि जानबूझकर सरकार भी मटिया रही है। चाहती है, पाट पर आबादी जितनी जल्दी खत्म हो, बॉक्साइट निकालने में उतनी ही आसानी होगी।’’7  कम्पनियाँ सरकारी मातहतों से मिलकर तानाशाह हो गयी हैं। एग्रीमेंट में यहाँ के लोगों के स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से लाभ का एक बड़ा हिस्सा विकास कार्यों पर खर्च करने का भी प्रावधान है ताकि यहाँ के आदिवासियों को पीने का पानी, सड़क-परिवहन, अस्पताल की सुविधा उपलब्ध कराई जा सके। लेकिन इन सब जरूरतों को दरकिनार कर खदान मालिक लीज़ की भूमि पर कम, वन विभाग, गैर मजरूआ जमीन और असुर रैयत की जमीन से ज्यादा खनन किया करते हैं।
अवैध खनन खुलेआम और वर्षों से जारी है। रुमझुम और लालचन दा का घूम-घूमकर समझाना काम नहीं आता और न कलेक्टर, एस.पी. को आवेदन लिखना। एक बार पूरी खोज-बीन कर अवैध खनन वाली भूमि का मौजा, खाता, प्लॉट रकबा, वहाँ से बॉक्साइट ढोनेवाली गाड़ियों के नम्बर सहित दस पन्द्रह पेज की दरख्वास्त खुद रुमझुम और लालचन दा कलेक्टर के ऑफिस में उसके हाथ में दे आये। बाद में मालूम हुआ, जिला खनन पदाधिकारी को जाँच की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। ‘‘बिल्ली को दूध की रखवाली का भार! सो, न कुछ होना था न कुछ हुआ।’’8 दरअसल उपन्यासकार उपन्यास के प्रमुख पात्रों रुमझुम तथा लालचन दा के माध्यम से लोगों का ध्यान आदिवासियों के जीवन के साथ हो रहे लगातार शोषण के बिन्दुओं की तरफ खींचना है। इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है कि हर छोटा-बड़ा अधिकारी, हर छोटी-बड़ी कम्पनियाँ चाहे वह ‘शिंडाल्को’ हो याकि ‘वेदांग’ सब ने मिलकर असुर समझे जाने वाले आदिवासियों का सिर्फ और सिर्फ शोषण ही किया है। 
असुर समुदाय के इस ग्लोबल गाँव की दुर्दशा के जिम्मेदार छोटे-बड़े, पुराने-नये अनेक देवता हैं। इनमें देशी-विदेशी, व्यापारी कम्पनियाँ, सत्ता पर काबिज मंत्री व राजनेता, धर्म के ठेकेदार और पुराने रसूखदार सामंत मुख्य हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि जो भी जिस प्रकार से इनका शोषण कर सकता है, करता है; चूकने का तो सवाल ही नहीं। इस क्रम में सर्वप्रथम देशी कम्पनी ‘टाटा’ ने असुरों के लोहा गलाने और औजार बनाने के हुनर का अन्त किया, जो कारीगर असुर जाति के पूरे इतिहास की सबसे बड़ी हार है। विदेशी कम्पनी ‘वेदांग’ ग्लोबल गाँव का बड़ा देवता है जिसके बारे में डॉक्टर साहब कहते हैं- ‘‘यह कम्पनी है विदेशी और नाम रखा है ‘वेदांग’, जैसे प्योर देशी हो। कितना चालू-पुर्जा है इसी से पता चलता है।’’9  राष्ट्र और राज्य की शह पाकर उसके हौसले बुलंद हैं। वन विभाग द्वारा प्रस्तावित भेड़िया अभ्यारण के कँटीले तारों की घेराबंदी जैसे मामूली काम के बहाने वह इलाके में बॉक्साइट कारखाना खोलने के फिराक में है। कोयलाश्रम के शिवदास बाबा अपने कंठी अभियान के जरिए असुरों में पैठ बनाते हैं और धर्म की आड़ में धन कमाने से लेकर, जनसेवा के नाम पर बनवाये आवासीय विद्यालयों के अतिथिगृह में बाबा खुद असुर बच्चियों के साथ गलीज हरकते करते हैं। बबुआनी टोले का जमींदार गोनू उर्फ गणेश्वर सिंह किसी देवता से कम नहीं है। ब्लॉक अँचल की ठेकेदारी हो या कोयलबीघा प्रखण्ड की पंचायतों का कामकाज, सब उसके इशारों पर ही होता है। असुर-कोल को डरा-धमकाकर, गोनू ने अपने बाप की तीस एकड़ दोन भूमि को देखते ही देखते सौ एकड़ में बदल दिया। लेकिन चुगलखोर कहते हैं कि, “बीस एकड़ भूमि, खेरवार आदिवासी बनकर सरकार से बन्दोबस्त करवा ली थी। इसीलिए लोगों को यह शक होता था कि वह खेरवार है कि राजपूत। वैसे इस इलाके में यह कहावत मशहूर थी कि घटले खेरवार और बढ़ले राजपूत।’’10 
इन सब गठजोड़ में राष्ट्र-राज्य की गहरी भूमिका है जिसके अंत की घोषणा भूण्डलीकरण की विचारधारा के रूप में आये उत्तर आधुनिकतावाद ने की थी किन्तु अब उसी की सरपरस्ती में भूण्डलीकरण का विरोध करने वाली हर कोशिश को कुचला जा रहा है। ‘‘आज आदिवासी जिस विकराल संकट का सामना कर रहे हैं उसका मूल कारण है राष्ट्र-राज्य की अपार ताकत और आतंककारी हिंसक प्रवृत्ति।’’11  नायिका ललिता भी इस बात से वाकिफ है कि ‘‘राष्ट्र-राज्य की हिंसा का कोई जवाब नहीं हो सकता। ... यही एकमात्र संस्था है जिसने हिंसा को भी सांस्कृतिक रूप दिया है। उसकी सेना सशस्त्र बल, पुलिस, सब सैद्धांतिक तौर पर हिंसा के लिए ही प्रशिक्षित हैं। राष्ट्र-राज्य अपने को सुरक्षित रखने के लिए इंसानों का इंसानों के द्वारा ही नाश करवाता है।... इसने आदमी को ही आदमखोर बना दिया है। वह भी बिना किसी अपराध बोध के।’’12  राष्ट्र-राज्य का एक अंग वन विभाग असुरों को अपने क्षेत्र में घुसपैठिया मानता है तो दूसरा अंग पुलिस उनसे बर्बरता से पेश आती है। इन सभी देवताओं की मिलीभगत के चलते असुर एक बार पुनः पराजित होते हैं और वैदिक युग से चला आ रहा देव-असुर संघर्ष, जिसे हज़ार-हज़ार इन्द्र भी अंजाम नहीं दे सके थे, ग्लोबल गाँव के देवताओं की जीत के साथ समाप्त होता है।
उपन्यास का एक आकर्षक पहलू असुर समुदाय की अस्मिता के विभिन्न पक्षों का संवेदनशील चित्रण है। भेदभाव से मुक्त और समतावादी असुरों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में हाट एवं अखड़ा जैसे सार्वजनिक केन्द्र हैं। खरीदी-बिक्री, सामाजिक सम्मेलन, सगे सम्बन्धियों से भेंट से लेकर गिले-शिकवे, अपनों का समाचार तथा शादियाँ तक यहीं पर तय होती हैं। अखड़ा में स्त्री-पुरुषों के समूह सरहुल, हरियरी, सोहराय, सड़सी-कुटासी आदि पर्व-त्योहारों पर जदुरा, झूमर नाचते हैं। गाँव के सीवान के देव, दरहा की पूजा पर लोग निश्चिन्त सोते हैं तथा पितर-पूर्वज को हर वक्त याद करते हैं। इन गतिशील परम्पराओं के साथ पिछड़ेपन के सूचक अंधविश्वास भी मौजूद हैं जिनके कारण लोग परेशान हैं। यहाँ मान्यता है कि धान को आदमी के खून में सानकर बिचड़ा डालने से फसल बहुत अच्छी होती है। खरीफ के सीज़न में मूड़ीकटवा लोग इसीलिए सुनसान इलाके में घूमते रहते हैं। यहाँ देवी-देवताओं को खुश करने के लिए बलि चढ़ाने की पुरानी परम्परा भी है, जिसकी आड़ में मासूम आदिवासी बच्चियों के साथ कुकर्म किया जाता है, फिर बलि के नाम पर मार दिया जाता है- ‘‘कोयलेश्वर आश्रम के पास ही नदी किनारे झाड़ियों में एक बारह-तेरह साल की कमसिन बच्ची की नग्न लाश मिली। गले में नींबू-मिरची की माला, बालों में अड़हूल के फूल, देह में जहाँ-तहाँ सिन्दूर मला हुआ।’’13  लेकिन कार्यवाही के नाम पर कुछ होता दिखाई नहीं देता और कुछ होता भी है तो मात्र दिखावा। 
आदिवासी समाज कम्पनियों की मनमानी से आजिज आकर सामूहिक रूप से खदानों में काम करने से इनकार कर देते हैं। ग्लोबल गाँव के देवताओं में खलबली मच जाती है क्योंकि इससे पहले कभी उन्हें इतनी बड़ी चुनौती नहीं मिली थी। शिंडाल्को कम्पनी का मैनेजर पांडे बाबा साजिश रचकर आन्दोलन में फूट डाल देता है- कनारी संघ अपना हाथ खींच लेता है और पुलिस पाट पर छापा मारकर दर्जन भर असुरों को गिरफ्तार कर लेती है। इसके विरोध में हजारों की संख्या में लोग जमा होकर पुलिस चौकी का घेराव एवं धरना प्रदर्शन करते हैं। उन्हें भड़काकर पुलिस अचानक फायरिंग कर देती है जिसमें बालचन सहित छः लोग मारे जाते हैं। इस घटना के बारे में अगले दिन के अखबार में खबर छपती है कि,  ‘‘पाथरपाट में हुए पुलिस मुठभेड़ में छह नक्सली मारे गये। मारे गये नक्सलियों में कुख्यात एरिया कमांडर बालचन भी शामिल है।’’14  लगातार घटित हादसों ने आदिवासियों को हर तरह से तोड़ दिया था। संघर्ष समिति के अगुआ इलाका छोड़ चुके थे। नौजवान लड़के-लड़कियों ने भी मजबूरन इलाका छोड़ दिया था। पुनः आषाढ़ में खेती के लिए पाट लौटने पर ललिता, बुधनी दी, गन्टूर, एतवारी के साथ पन्द्रह लोगों का समूह वेदांग और पुलिस प्रशासन से मुआवजे पुनर्वास की बात करने जाता है परन्तु बीच रास्ते में बिछी लैंड माइंस फटने से सबकी धज्जियाँ उड़ जाती हैं। ग्लोबल गाँव के देवता इस जीत पर खुश हो जाते हैं। हालांकि लड़ाई की बागडोर संभालने के लिए राजधानी के यूनिवर्सिटी हॉस्टल से सुनील असुर का अपने साथियों के साथ कोयलबीघा पाट के लिए निकलना, इस बात का सूचक है कि अपनी सभ्यता व संस्कृति को बचाने का यह संघर्ष एक नये ‘पढे़-लिखे’ रूप में आगे जारी रहेगा . . .।
वस्तुतः ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ उपन्यास आदिवासी पुरुषों और स्त्रियों की पीड़ा और संघर्ष का मार्मिक आख्यान है। रणेन्द्र ने आदिवासी समाज के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को परस्पर गूंथ-रचकर असुर समाज से जुड़े अस्तित्व व अस्मिता के प्रश्नों को ऐतिहासिक तथ्यों, मिथकीय वृत्तान्तों और समकालीन जीवन की घटनाओं के बीच से जिस विवेक एवं कौशल से उठाया है, वह असुरों के जीवन यथार्थ को समग्रता में देखने-समझने के साथ ही उनके बारे में प्रचलित एवं प्रचारित मिथकों के प्रभाव से मुक्त प्रमाणिक जीवन इतिहास को प्रस्तुत करता है। 
संदर्भ -
1. रणेन्द्र, ग्लोबल गाँव के देवता, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2016, पृ. 74-75
2. तलवार, वीर भारत, झारखंड के आदिवासियों के बीच (एक एक्टीविस्ट के नोट्स), भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2008, पृ.33
3. वही, पृ.224-225
4. रणेन्द्र, ग्लोबल गाँव के देवता, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2016, उपन्यास के ब्लर्ब से उद्धृत
5. रणेन्द्र, ग्लोबल गाँव के देवता, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2016, पृ.11
6. शांडिल्य, सुंदरम, आदिवासियों की वेदना एवं चेतना का नया पाठ, वाङ्मय आदिवासी विशेषांक-1, जुलाई 2013, पृ.183
7. रणेन्द्र, ग्लोबल गाँव के देवता, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2016, पृ.14
8. वही, पृ.27
9. वही, पृ.80
10. वही, पृ.35
11. शांडिल्य, सुंदरम, आदिवासियों की वेदना एवं चेतना का नया पाठ, वाङ्मय आदिवासी विशेषांक-1, जुलाई 2013, पृ. 186
12. वही, पृ. 186
13. रणेन्द्र, ग्लोबल गाँव के देवता, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2016, पृ. 60
14. वही, पृ. 88

सेतु, अक्टूबर 2020

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