अमरकांत के जीवन और साहित्य का विश्लेषणात्मक अध्ययन

आनन्द दास
- आनंद दास

अमरकांत का जन्म उत्तर प्रदेश के सबसे पूर्वी जिले बलिया के भगमलपुर गाँव में साधारण कायस्थ परिवार में हुआ था। अमरकांत का नाम श्रीराम रखा गया। इनके खानदान में लोग अपने नाम के साथ 'लाल` लगाते थे। अत: अमरकांत का भी नाम 'श्रीराम लाल' हो गया। बचपन में ही किसी साधु-महात्मा द्वारा अमरकांत का एक और नाम रखा गया था। वह नाम था - 'अमरनाथ'। यह नाम अधिक प्रचलित तो ना हो सका, किंतु स्वयं श्रीराम लाल को इस नाम के प्रति आसक्ति हो गयी। इसलिए उन्होंने कुछ परिवर्तन करके अपना नाम 'अमरकांत' रख लिया। अपने नामकरण की चर्चा करते हुए स्वयं लिखते हैं, ''मेरे खानदान के लोग अपने नाम के साथ 'लाल' लगाते थे। मेरा नाम भी श्रीराम लाल ही था। लेकिन जब हम लोग बलिया शहर में रहने लगे तो चार-पाँच वर्ष बाद वहाँ अनेक कायस्थ परिवारों में 'लाल' के स्थान पर 'वर्मा' जोड़ दिया गया और मेरा नाम भी श्रीराम वर्मा हो गया। ऐसा क्यों किया गया, इसे उद्घाटित करने के लिए भारत के बहुत से जातिवादी कचरे को उलटना-पुलटना पड़ेगा। बस इतना ही कहना पर्याप्त है कि जब मैंने लेखन का निश्चय कर लिया तो 'लाल' या 'वर्मा' अथवा किसी जाति सूचक 'सरनेम' से मुक्ति पाने के लिए अपना नाम 'अमरकांत' रख लिया। यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि मेरे दो नाम रखे गए थे, जिनमें एक 'अमरनाथ' भी था, जिसे एक साधु ने दिया था। यह नाम प्रचलित तो नहीं था, लेकिन मैंने इसमें हल्का संशोधन करके साहित्यिक नाम के रूप में इसे मान्यता दिला दी।"1

उनकी साहित्यिक कृतियाँ 'अमरकांत' नाम से ही प्रसिद्ध हुईं। अमरकांत की प्रारंभिक शिक्षा 'नगरा' के प्राइमरी स्कूल से आरंभ हुई। अमरकांत के बचपन का समय वह समय था जब सारा देश आज़ादी के लिए तड़प रहा था। क्रांतिकारियों के किस्से हर गली हर मुहल्ले में गीतों के रूप में गाये जाते थे। अध्ययन के लिए सामग्री चोरी-छुपे उपलब्ध होती थी। मन्मथनाथ गुप्त की पुस्तक भारत में सशस्त्र क्रांति की चेष्टा, चाँद का फाँसी अंक और ऐसी कई पुस्तकों ने अमरकांत की जीवन दिशा बदली। अमरकांत ने बलिया के सतीशचन्द्र इन्टर कॉलेज से इन्टरमीडियेट की पढ़ाई पूरी कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए.किए। उन्होंने बी.ए. पास करने के बाद पत्रकार बनने का निश्चय कर लिया और दैनिक सामाचार 'सैनिक' में अमरकांत को नौकरी मिल गयी।

     किसी के भी व्यक्तित्व के निर्माण में परिवार, परिवेश और शिक्षा आदि का महत्वपूर्ण स्थान होता है। अमरकांत के व्यक्तित्व के बारे में राजेन्द्र यादव लिखते हैं- ''अमरकांत टुच्चे, दुष्ट और कमीने लोगों के मनोविज्ञान का मास्टर है। उनकी तर्क पद्धति, मानसिकता और व्यवहार को जितनी गहराई से अमरकांत जानता है, मेरे खयाल से हिन्दी का कोई दूसरा लेखक नहीं जानता...।"2 कथाकार अमरकांत का पारिवारिक वातावरण साहित्यिक नहीं था। फिर भी साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बहुत सारी बातें विरासत में अमरकांत को परिवार से ही मिली। 'जरि गइले एड़ी कपार' नामक लेख में शेखर जोशी ने इसी बात की चर्चा करते हुए लिखा है,  ''किस्सागोई और व्यंग्य का ऐसा अनोखा वातावरण अमरकांत को अपने परिवार से विरासत में मिला है।"3

अमरकांत को अपनी कई कहानियों की प्रेरणा परिवार के सदस्यों के द्वारा ही प्राप्त हुई है। अमरकांत का साहित्य और रचना संसार का फलक काफी विस्तृत और व्यापक है। अमरकांत के कहानी संग्रहों में जिंदगी और जो, देश के लोग, मौत का नगर, मित्र मिलन, कुहासा, तूफान, कला प्रेमी, सम्पूर्ण कहानियाँ, जाँच और बच्चे आदि प्रतिनिधि कहानियाँ हैं। अमरकांत के प्रकाशित उपन्यासों में सूखा पत्ता, आकाश पक्षी, काले उजले दिन, कँटीली राह के फूल, ग्राम सेविका, सुखजीवी, बीच की दीवार, सुन्नर पांडे की पतोह, लहरें, इन्ही हथियारों से आदि हैं। इनके अतिरिक्त 'प्रकीर्ण साहित्य' के अंतर्गत कुछ यादें कुछ बातें, नेउर भाई, बानर सेना, खूँटा में दाल है, सुग्गी चाची का गाँव, झगरूलाल का फैसला, एक स्त्री का सफर आदि रचनाएँ हैं।

    प्रारंभ में अमरकांत का जुड़ाव रोमांटिक कहानियों से हुआ। वह समय भी 'रोमांटिक बोध' का था। इन दिनों अमरकांत शरतचन्द्र से बहुत प्रभावित रहे। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि अमरकांत बलिया जैसे छोटे कस्बे में रहते थे। अमरकांत को शरतचन्द्र के लेखन ने भी प्रभावित किया। इसके कारण को स्पष्ट करते हुए अमरकांत स्वयं लिखते हैं- ''एक मध्यमवर्गीय परिवार में जिस लाड़-प्यार से वह पला था, जैसे बँधे, पिछड़े और ग्रामीण समाज में वह रहता था, जैसी कच्ची उम्र और उसका देश जिस कष्ट, पीड़ा, अन्याय और गुलामी के दौर से गुजर रहा था और जैसा वह स्वयं अव्यावहारिक एवं कल्पनाशील था- ऐसी स्थितियों में 'रोमान्टिसिज्म` एक अनिवार्य परिणाम था। ... शरतचन्द्र का रोमांटिसिज्म व्यक्तिवाद, कोरी काल्पनिकता, कलाबाजी और छद्म आधुनिकता पर आधारित नहीं है। उनकी रचनाएँ अपने समय के प्रगतिशील यथार्थ की गहरी समझ के बल पर खड़ी होती है और परिवर्तन की कामना को तीव्रता से व्यक्त करती है।"4 घर में 'चलता पुस्तकालय' के माध्यम से जो पुस्तकें उन्हें उपलब्ध होती वही वे पढ़ते थे। विद्यालय की किताबों में प्रेमचंद की कुछ एक कहानियाँ उन्होंने पढ़ी थी। पर विश्व साहित्य से उनका कोई संपर्क नहीं हो पाया था। प्रेमचंद के साहित्य को पढ़कर अमरकांत समाज के एक नए स्वरूप से परिचित हुए। समाज में व्याप्त अंधविश्वास, शोषण, कुरीतियाँ आदि को देखने की उनकी एक नई दृष्टि विकसित हुई।

    अमरकांत का रचनात्मक जीवन अपनी पूरी गंभीरता के साथ प्रारंभ हुआ। जिन साहित्यकारों को अब तक वे पढ़ते थे या अपने कल्पना लोक में देखते थे उन्हीं के बीच स्वयं को पाकर अत्यंत प्रसन्न हुए। साहित्यिक रचनाओं की सफलता अमरकांत के अनुसार रचना विशेष में निहित संवेदनात्मक ज्ञान पर आधारित होती हैं। इस संदर्भ में वे स्वयं कहते हैं- ''जो रचनाएँ द्ंवद्वशून्य होती हैं, जिनमें संवेदनात्मक ज्ञान का अभाव होता है, जो फैशन का अन्धानुकरण करके शिल्प की कृत्रिम बुनावट करती हैं, जो वस्तुनिष्ठ नहीं होती और जिनमें मात्र आत्मगत सत्यों का प्रक्षेपण होता है - ऐसी समस्त रचनाएँ कई कारणों से अपने समय में प्रसिद्ध होने के बावजूद कालान्तर में प्रभावहीन एवम् निरर्थक हो जाती हैं।"5  साहित्य सृजन के पीछे अमरकांत जो आधारभूत तत्त्व मानते हैं, वे हैं- गहरी संवेदना, सामाजिक यथार्थ की समझदारी और ऐतिहासिक एवं प्रगतिशील जीवन दृष्टि। स्वयं अमरकांत कहते हैं कि ''... लेकिन वास्तव में जिसे साहित्य कहते हैं, उसका सृजन किसी राजनैतिक फार्मूले, विधि निषेधों अथवा कर्मकाण्डों के आधार पर नहीं होता, बल्कि उसके पीछे गहरी संवेदना, सामाजिक यथार्थ की समझदारी और ऐतिहासिक एवं प्रगतिशील जीवन दृष्टि होती है। साहित्यिक कृतियों पर सेन्सर लगाने का मैं समर्थक नहीं हूँ, क्योंकि उससे देश का सांस्कृतिक विकास कुंठित एवं अवरूद्ध हो सकता है।"6 अमरकांत साहित्य को 'स्वतंत्र व्यक्ति की स्वतंत्र व्यक्ति से बातचीत'  वाली विचारधारा का समर्थन नहीं करते। उनके अनुसार ''प्रश्न यह है कि जब समाज में गरीबी, शोषण, गुलामी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, झूठ आदि हावी हों, वैसी स्थिति में स्वतंत्र व्यक्ति कौन होगा? आखिर साहित्य में इस प्रकार का नारा क्यों दिया जाता है?"7 अमरकांत मानते हैं कि साहित्य का उद्देश्य व्यापक होता है। समाज की यथार्थ और वास्तविक स्थितियों से विमुख होकर साहित्य कभी भी अपने व्यापक उद्देश्य में सफल नहीं हो पायेगा। जो साहित्यकार या बुद्धिजिवी इस बात को नहीं मानते उन्हें 'स्वतंत्र व्यक्ति` की नई परिभाषा को बताना पड़ेगा। साथ ही साथ इस तरह की स्वतंत्रता का सामाजिक यथार्थ बोध से संबंध स्थापित करते हुए यह भी सिद्ध करना पड़ेगा कि वह किस तरह साहित्य के व्यापक उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक हो सकेगा।

     कहानियों में सामाजिक यथार्थ और वैयक्तिक यथार्थ की सीमा पर अमरकांत कहते हैं कि ''वैयक्तिक अनुभव या भोगे हुए यथार्थ के नाम पर साहित्य में बहुत-सी विसंगतियाँ आई हैं। इसके आधार पर नितान्त निजी यथार्थ का भी चित्रण लोगों ने किया है। वैयक्तिक यथार्थ में कभी-कभी निजी कुंठा, निजी संत्रास, घोर व्यक्तिवादिता के दर्शन होते हैं। वैयक्तिक यथार्थ के नाम पर, जो एक नारे की तरह है, बहुत-सी रचनाओं का खण्डन किया जाता है। रचना यथार्थ की सृजनात्मक अभिव्यक्ति है, वह रचना हमारे अनुभव क्षेत्र के अंतर्गत भी आ सकती है और उससे बाहर भी जा सकती है। वस्तुपरकता ही श्रेष्ठ रचना की जान है। यदि सच्चाई एकदम निजी भी हो तो भी उसे रचनात्मक विशिष्टता उसी समय मिलती है जब वह पूरे समाज की सच्चाई या युग की सच्चाई के रूप में उभरकर आती है।"8 कला और वस्तु के संतुलन के संदर्भ में अमरकांत का मत है- ''संतुलन कोई गणित थोड़े ही है। एक रचनाकार के लिए दोनों ही आवश्यक हैं। अगर कहीं कला ही कला है, वस्तु नहीं है तो समझिये जीवन ही नहीं है। कहीं अगर जीवन ही जीवन है, कला नहीं है तो वह पत्रकारिता हो जायेगी। लेखक अपने तरीके से दोनों का इस्तमाल करता है। लेखक का काम है जीवन को देखना और उससे बिम्ब प्राप्त करना। उसमें कला और वस्तु दोनों होता है। .....तराजू पर कला और वस्तु को संतुलित नहीं किया जा सकता। पर दोनों आवश्यक हैं। किसका कितना अनुपात है यह रचना के स्वरूप पर भी निर्भर करता है। साथ ही साथ यह 'एवर डेवलपिंग` चीज है। यह कोई स्थिर चीज नहीं है। यह बात लेखक की मेहनत व उसकी क्षमता पर भी आधारित है...।"9

     अमरकांत अपने आप को कम्युनिस्ट नहीं मानते। वे विचारधाराओं से प्रभावित होने की बात तो स्वीकार करते हैं पर किसी 'वाद विशेष' की चार दिवारी में अपने आप को कैद करना पसंद नहीं करते। साहित्यकारों की अवसरवादिता से वे काफी दुखी होते हैं। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के समर्थक हैं अमरकांत। अपने ऊपर वे राजनीति का भी प्रभाव स्वीकार करते हैं। वे स्वयं राजनीति की राह पर चलकर फिर लेखक बने थे। अमरकांत मानते हैं कि विचारधाराओं से प्रभावित होना गलत नहीं है। पर यथार्थ की भावभूमि पर अगर वे विचारधाराएँ अपनी उपयोगिता साबित न कर पायें, समाज में प्रगति का कारण न बन सकें तो फिर उनसे चिपके रहना ठीक नहीं है। अमरकांत एक लेखक से पूरी ईमानदारी के साथ सृजन की आशा करते हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अन्यायी शासन के आगे बिना घुटने टेके उसका सामना करने के अमरकांत हिमायती हैं। अवसरवादी होकर लेखनी से समझौता करने वालों के प्रति उनके मन में दुख है। किसी 'वाद' की चार दीवारी उन्हें स्वीकार नहीं है। हर वो विचारधारा जो समाज, जनता और देश के हित में है उसे स्वीकार करने में उन्हें परहेज नहीं है। अमरकांत का साहित्यिक दृष्टिकोण बड़ा ही व्यापक एवं उदार है।

   बीमार पड़ने के बाद अमरकांत को कठोर प्रतिबंधों के दौर से गुजरना पड़ा। अब उनका घूमना फिरना कम हो गया किंतु आर्थिक दबाव और परिवार की जिम्मेदारियों से जूझते हुए भी उन्होंने लिखने का क्रम नहीं छोड़ा। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका लेखन कार्य सतत जारी है। नए लोगों को वे पढ़ रहे हैं। खुद अमरकांत के शब्दों में ''पत्र-पत्रिकाओं के विषय में मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा कि यदि उन्हें संगठित ढंग से निकाला जाएगा तो लोग पढ़ेंगे। उन्हें पाठकों तक पहुँचाने की जिम्मेदारी भी निकालने वालों की है। इधर बीमारी के कारण मैं बहुत नए लेखकों और लेखिकाओं को पढ़ नहीं पाया हूँ, फिर भी, उदय प्रकाश, अखिलेश, मैत्रेयी, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल ने अच्छी कहानियाँ और उपन्यास लिखे हैं।"10 उम्र के पड़ाव पर भी अमरकांत का लेखन कार्य जारी रखा। जब एक बार एक सज्जन इलाहाबाद स्थित उनके निवास पर साक्षात्कार हेतु पहुँचे तो कई नई बातें ज्ञात हुई। जैसे की 'बहाव' नामक पत्रिका का अमरकांत के संपादकत्व में निकलना। पहला अंक निकल चुका था और अमरकांत अपने छोटे पुत्र अरविंद के साथ मिलकर दूसरे अंक को निकालने की तैयारी में थे। अमरकांत ने बताया कि वे एक नाटक भी लिखना चाह रहे हैं। एक और पुस्तक 'खबर का सूरज आकाश में' पर भी उनका कार्य जारी था। इसके अतिरिक्त विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए भी अमरकांत नियमित रूप से लिखते रहते हैं। अभी वे बहुत कुछ लिखना चाहते हैं किंतु अब उनका स्वास्थ उनका साथ नहीं दे रहा। अत: अमरकांत का संपूर्ण व्यक्तित्व जीवन के कठोर तपा से तपकर कंचन से कुंदन बनता रहा है। उन्होंने अपनी मूल्यनिष्ठा समाज संपृक्ति दायित्व चेतना और मानवीय संवेदना के आधार पर लेखकीय धर्म का निर्वाह किया है और आज भी उसी के प्रति निष्ठावान हैं। अमरकांत का संपूर्ण साहित्य उनकी इसी समर्पित और संकल्पित मूल्य चेतना का प्रमाण है।

संदर्भ-सूची  
1. मेरा बचपन कब समाप्त हुआ: अमरकांत, अन्यथा पत्रिका, नवम्बर 2005, अंक 5, पृष्ठ क्रमांक 94
2. अमरकांत वर्ष 1, आत्मकथा, अमरकांत
3. कुछ यादें कुछ बातें: अमरकांत (अमरकांत वर्ष-1), पृष्ठ क्रमांक 38
4. आत्मकथ्य: अमरकांत, अमरकांत वर्ष एक, संपादक - रवीन्द्र कालिया, ममता कालिया एवम् नरेश सक्सेना, पृष्ठ क्रमांक 24 और 25
5. अमरकांत से डॉ. सत्यप्रकाश मिश्र की बातचीत: साक्षात्कार, अमरकांत वर्ष एक, संपादक - रवीन्द्र कालिया, ममता कालिया एवम् नरेश सक्सेना, पृष्ठ क्रमांक 108
6. वही, पृष्ठ क्रमांक 108
7. वही, पृष्ठ क्रमांक 110
8. कुछ यादें कुछ बातें, संस्मरण, लेखक - अमरकांत, पृष्ठ क्रमांक 136 और 137
9. मई 2006 में अमरकांत से लिए साक्षात्कार के आधार पर
10. अमरकांत से चंद्रप्रकाश पाण्डेय से बातचीत: साक्षात्कार, वसुधा, जुलाई-सितंबर 2005, पृष्ठ क्रमांक 121


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