प्रतिद्वंदी - लघुकथा

ज्योत्सना कपिल
- ज्योत्सना कपिल

जबसे जूनागढ़ रियासत की वार्षिक गायन प्रतियोगिता की घोषणा हुई थी संगीत प्रेमियों में हलचल मच गई थी। उस्ताद ज़ाकिर खान और पंडित ललित शास्त्री दोनों ही बेजोड़ गायक थे। परन्तु उनमे गहरी प्रतिद्वन्दिता थी। राष्ट्रीय संगीत आयोजन के लिए दोनों पूरे दमखम के साथ रियाज़ में जुट गए, वे दोनों ही अपने हुनर की धाक जमाने को बेकरार थे। अक्सर दोनो के चेले-चपाटों के बीच सिर-फुटव्वल की नौबत आ जाती। खान साहब के शागिर्द अपने उस्ताद को बेहतर बताते तो शास्त्री जी के चेले अपने गुरु को।

खान साहब जब अलाप लेते तो लोग सुध-बुध खोकर उन्हें सुनते रहते, उधर शास्त्री जी के एक एक आरोह-अवरोह के प्रवाह में लोग साँस रोककर उन्हें सुनते रह जाते। दोनों का रियाज़ देखकर निर्णय लेना मुश्किल हो जाता कि प्रतियोगिता का विजेता होने का गौरव किसे मिलेगा। बड़ी-बड़ी शर्ते लग रही थीं कि उनमें से विजेता कौन होगा।

शास्त्री जी की अंगुलियाँ सितार पर थिरक रही थीं, वह अपनी तान में मगन होकर सुर लहरियाँ बिखेर रहे थे। पशु पक्षी तक जैसे उन्हें सुनकर सब कुछ भूल गए थे, तभी एक चेला भागा हुआ चला आया, "गुरूजी, अब आपको कोई भी कभी चुनौती नही दे पाएगा, आप संगीत की दुनिया के सम्राट बने रहेंगे।"

"क्यों क्या हो गया?"

"गुरु जी अभी खबर मिली है कि आज रियाज़ करते हुए खान साहब स्वर्ग सिधार गये ..." शिष्य ने बहुत उत्तेजना में बताया।

सुनकर शास्त्री जी का मुँह पलभर को आश्चर्य से खुला रह गया, फिर आँखों में अश्रु तैर गए। उन्होंने सितार उठाकर उसके नियत स्थान पर रखकर आवरण से ढँका और माँ सरस्वती को प्रणाम किया। फिर सूनी नज़रों से आसमान ताकते हुए ग़मज़दा आवाज़ में कहा, "मेरा हौसला चला गया... अब मैं जीवन में कभी नहीं गा सकूँगा।"

सेतु, नवम्बर 2017

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