पीड़ की डोर

कविता वर्मा
- कविता वर्मा 

पाँच बरस यूँ तो कोई लंबा समय नहीं होता पर जो छोड़ दिया गया हो उसे याद करने के लिये लंबा ही होता है। इतने समय में सपनों की फुलवारी की नरम मुलायम मिट्टी अपेक्षा के कटु अंधड़ों को झेल कर धूल बन चुकी होती है। ऐसी धूल जिसमे अब किसी सपने का अंकुरण नहीं हो सकता। मन उससे बचना चाहता है उसे छूने से भी कतराता है पर यदा कदा यादों की पुरवाई  उस धूल को उड़ा कर सिर चढ़ा ही देती है और उसकी किसकिसाहट को महसूस करते करते मन कभी उसमे आनंद लेने लगता है तो कभी उसे झाड़ कर दूर करने को छटपटाने लगता है।

जाना तो कई महीनों से टल रहा था... नहीं, वह टाल रहे थे खुद को समझा रहे थे कभी जाने के लिये तो कभी ना जाने के लिये। किसी छोड़े हुए शहर में जाने और ना जाने की इच्छा वहाँ से जुड़ी अच्छी और बुरी यादों में होती है और उनकी तो दोनों तरह की यादें ही वहाँ से जुड़ी थीं। जब वे अच्छी यादें टीसती थीं तब बुरी यादें टीसते मन को सहारा देती थीं और धीरे धीरे उन्होंने उन बुरी यादों को ही अपना साथी बना लिया था। आज अचानक अच्छी बुरी सभी यादें वक्त की धूल झाड़ कर उनके सामने आ खड़ी हो गई हैं जो उन्हें उस छूटे शहर जाने को प्रेरित भी कर रही हैं रोक भी रही हैं।

भास्कर विचारों में गुम थे जब पत्नी ने आकर उन्हें झिंझोड़ा, "आपने अब तक तैयारी नहीं की?मैंने सोचा आप कर लेंगे। अच्छा बताइये कौन कौन से कपडे रखूँ?" अलमारी खोलते हुए उसने पूछा।

"तुम रहने दो खाने की तैयारी करो मैं रख लूँगा।" वे अब तक यादों के बवंडर से घिरे थे और उससे बाहर आने के लिये थोड़ी देर और अकेले रहना चाहते थे। वे आहिस्ता से उठ कर अलमारी तक आये और ले जाने वाले कपडे चुनने लगे। सबसे नीचे रखी उस नीली शर्ट पर उनका हाथ अनायास ठहर गया। कितने साल हो गये इसे पहने शायद पाँच साल पता नहीं अब आएगी भी या नहीं। उन्होंने शर्ट पहन कर देखी आश्चर्य वह उन्हें फिट आई। एक उम्मीद भरी मुस्कान उनके चेहरे पर आ गई। पाँच साल में कुछ चीज़ें नहीं भी बदलतीं।

पत्नी खाना बना कर आई तब तक वे अपना सामान लगा चुके थे। नीली शर्ट बैग में सबसे नीचे रख ली थी वैसे ही जैसे अपनी कुछ यादों को बरसों से सबसे छुपा कर रखते आये हैं। ट्रेन में बैठने तक वे अपने विचारों को व्यवस्थित कर चुके थे और अब उन सभी बातों को सिलसिलेवार याद करना चाहते थे। करीब आठ साल पहले नौकरी के सिलसिले में वे नागपुर गए थे अनजाना शहर प्रदेश और संस्कृति पर कंपनी का ऑफर भी कम आकर्षक नहीं था। जायें ना जायें की कशमकश भी हावी थी पर घर परिवार बच्चों की जिम्मेदारी ने उन्हें दरकिनार कर दिया। जब वे सुबह ट्रैन से उतर कर स्टेशन के बाहर आये चमकीली धूप से सजे नीले आसमान ने उनका स्वागत किया। उन्होंने भी गहरी साँस लेकर हवा की खुनक को अपने भीतर उतारा और शहर को अपना लिया। कंपनी की गाड़ी उन्हें लेने आई थी।  चौड़े साफ सुथरे रास्तों पर से गुजरते बंद दुकानों शो रूम को देखते वे शहर के मिजाज़ को समझने की कोशिश करते रहे। बीच बीच में ड्रायवर उन्हें शहर के इलाकों की जानकारी देता रहा और वे हाँ-हूँ के साथ खुद को यहाँ रहने के लिये तैयार करते रहे।

पहली नज़र में शहर उन्हें ठीक ही लगा था। नई कंपनी के कामकाज को समझते सँभालते आठ दिन कहाँ बीत गये पता ही नहीं चला। उस दिन एच आर ने आकर बताया कि वे अधिकतम पंद्रह दिन ही कंपनी के गेस्ट हाउस में रह सकते हैं तब उन्हें किराये का मकान ढूंढने की सुध आई। उन्होंने अपने अधीनस्थों को एक कमरा लेट बाथ ढूंढने को कहा। शाम को टाइम निकाल कर वे कमरे देखने निकल जाते। कितने ही मकान देखे कोई कमरा बहुत छोटा था तो कोई बेढ़ब लंबा किसी में बाथरूम अटैच नहीं तो किसी में खिड़की गायब। मकान ढूँढते ढूँढते वह हताश ही हो चले थे तब उनके साथी ने कहा था बस एक आखरी मकान और देख लेते हैं यहाँ पास ही है नहीं जमा तो कल देखेंगे। बड़ी अनिच्छा से वे वहाँ गये थे। पहली मंजिल पर किराये पर चढ़ाने के लिये चार कमरे बने थे हर कमरे में अटैच लेटबाथ। कमरों का आकार भी ठीक था। पीछे तरफ एक खिड़की थी जो खुलती तो घर की हद में थी पर वहाँ से अनंत आकाश दिखाई देता था और वहीँ से पहली बार उनको देखा था। सूरज की सुनहरी किरणे सिमट कर सिंदूरी हो चली थीं। आसमान के साथ साथ उनके गालों पर भी सिंदूर उतरा हुआ था। लापरवाही से लपेट कर बनाया गया उनके बालों का जूड़ा खुलकर बिखर गया था। एक हाथ से तार पर सूखते कपडे उतार कर दूसरे हाथ पर रखती जा रही थीं। बीच बीच में कभी सिर को झटका देकर तो कभी कलाई से कभी हवा की दिशा में मुड़ कर चेहरे पर आती लटों को हटाने की उनकी अदा में वे ऐसे खोये कि आसपास का होश ही नहीं रहा। उनके साथी ने खिड़की से झाँकती उनकी नज़रों का पीछा करते हुए कहा ,"सर ये रूम ठीक लग रहा है यहाँ से बाहर का व्यू भी अच्छा है " तो वे झेंप गए थे। कमरा वाकई अच्छा था सिर्फ व्यू के कारण नहीं वैसे भी। उनकी मुस्कान कुछ और चौड़ी हो गई। होंठों के खिंचाव से उनका ध्यान गया एक बार वे फिर झेंप गये आसपास वाले उन्हें ही देख रहे थे। वे अपनी झेंप मिटाने का तरीका खोजते तब तक टिकिट चेकर आ गया और उन्हें उबार लिया।

सबने सोने की तैयारी कर ली थी वे भी बिस्तर लगा कर लेट गये। लाइट्स बंद हो गई थीं अब यादों में डूबने में नज़रों से पकड़ कर बाहर खींच लिये जाने का डर नहीं था। अब मीठी यादों की मुलायम धूप उनके चेहरे पर बिखरे या होंठों से छलके उन्हें किसी के द्वारा देखे जाने की चिंता नहीं थी। लेकिन अब तारतम्य टूट चुका था। भास्कर पाँच साल बाद फिर नागपुर जा रहे हैं ना जाने वहाँ सब कुछ कितना बदल गया होगा? वे तो सब कुछ छोड़ कर जो गये तो वापस मुड़ कर नहीं देखा। दूसरी कंपनी ज्वाइन कर ने से पहले पुरानी कंपनी का सब लेनदेन निबटा कर ही गये थे पर कुछ तो था जो वहाँ छूट गया था जिसका हिसाब किताब हो नहीं पाया था वो कर नहीं पाये या मौका नहीं मिला। एक बैचेनी सी लेकर लौटे थे वो वहाँ से। तभी शायद कभी पलट कर नहीं गये तभी शायद अब जब जा रहे हैं तो उहापोह में हैं ख़ुशी ख़ुशी जा रहे हैं या परेशान हैं। जिस काम से कंपनी भेज रही है उसी काम से जा रहे हैं या उनके कुछ अधूरे कामो को भी पूरा करने जा रहे हैं। क्या वे सभी काम पूरे हो जायेंगे? एक गहरी साँस लेकर भास्कर ने करवट ली यादों की थकन आँखों पर तारी होने लगी।

स्टेशन पर कंपनी की गाड़ी लेने आई थी वे खिड़की से शहर देखते जा रहे थे। आठ साल पहले की सुबह और आज की सुबह में कोई विशेष फर्क ना था चौड़ी सड़कें सुनसान थीं कुछ चाय पोहे के ठेले सजने लगे थे। सड़क किनारे कुत्ते सोये अलसा रहे थे। सफाई कर्मी मुस्तैदी से जुटे हुए थे। वे उसी रास्ते पर जा रहे थे जिस पर से आठ साल पहले गुजरे थे और यह उन्हें गहरा सुकून दे रहा था। तभी गाड़ी दाहिने मुड़ गई और वह रास्ता पीछे छूट गया। उन्होंने गहरी साँस लेकर सीट की पुश्त से सिर टिका लिया। पंद्रह मिनिट बाद वे अपने होटल पहुँच चुके थे।

दिन भर काम में कैसे गुजरा पता ही नहीं चला होटल के कमरे में अकेले होते ही थकान हावी होने लगी। भास्कर ने सिगरेट सुलगाई और बालकनी में पड़ी आराम कुर्सी पर बैठ गये। वह कमरा उन्होंने तुरंत ही फाइनल कर दिया था और दूसरे दिन शाम को आने का कह कर चाबी ले ली। उस रात गेस्ट रूम के अपने कमरे में वे उड़ती उलझी लटों में गुम रहे। सिन्दूरी आभा से दमकते गाल लटों को पीछे धकेलने को उठी कलाइयों में उठती गिरती चूड़ियाँ , कैसी कशिश थी वह। इतने साल कॉर्पोरेट में रहते हुए एक से एक सुंदर मॉडर्न लड़कियाँ उनके आसपास रहीं , कई खुले ऑफर उन्हें मिलते रहे पर उन्होंने किसी को नज़दीक फटकने तक ना दिया। उनके करीबी यार दोस्त तो उन्हें बुढ़ऊ कहते थे। आज ऐसा क्या हुआ कि उनका मन उस छत पर टंगे कपडे सुखाने की रस्सी में अटक गया। वे घरेलू किस्म के व्यक्ति थे काम होते ही घर भागना और फिर बीवी बच्चों में ही मशगूल रहना। कोई तो बात थी उस सिंदूरी आभा में कि कहीं कोई तार जुड़ रहा था।

कमरे में शिफ्ट हुए कई दिन बीत गये थे पर वह कभी नज़र नहीं आई थीं। आती भी कैसे वे देर रात में वापस लौटते थे, लेकिन सोने से पहले रात के अँधेरे में एक सिंदूरी आस की तलाश में एक बार खिड़की से झांक जरूर लेते थे। उस दिन रविवार था और जाने कैसे सुबह जल्दी उनकी नींद खुल गई। आदतवश उन्होंने खिड़की से बाहर झाँका तो देखा सुबह की लाली मे रंगी हुई उनकी मासूम सी आस साकार  हो गई थी। हवा में उड़ती लटों को हाथ से संवारते वे छत पर चहलकदमी कर रही थीं। उनसे नज़रें मिलीं तो वे दोनों अकबका गये। वे तेज़ी से ओट में हो गये दिल जोर जोर से धड़कने लगा जैसे चोरी करते हुए पकड़ा गए हों। क्या सोचा होगा उन्होंने? लेकिन ये ख्याल तेज़ी से उनके दिमाग से निकल गया और वे उनसे पहचान करने बातचीत शुरू करने को बेताब हो गये। यूँ अचानक आवाज़ लगा कर तो किसी से बातचीत नहीं कर सकते। ऐसे तो बात शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जायेगी। कोई भी महिला यूँ खिड़की से घूरते किसी आदमी से बात क्यों करेगी? उन्होंने घड़ी में समय देखा छह बज रहे थे और वह समय उनके दिमाग में अंकित हो गया।

भास्कर ने घड़ी देखी अब सोना चाहिए सुबह जल्दी उठना है। मीठी यादों ने उनके मन मस्तिष्क को हल्का कर दिया था वे बिस्तर पर लेटते ही सो गये।

उस दिन के बाद सुबह जल्दी उठ कर खिड़की के आसपास घूमते रहना बीच बीच में उचटती दृष्टी से पीछे छत को ताकना और उनके नीचे जाते ही फिर सो जाना दिनचर्या बन गई। बातचीत का सिलसिला फिर भी ना जुड़ा। कितना मुश्किल होता है न किसी महिला से खुद हो कर बात करना। झुंझलाहट भी हुई उन्हें इतने साल कॉर्पोरेट में रहकर यह भी ना सीखा तुम वाकई बुढ़ऊ हो भास्कर, उन्होंने खुद को धिक्कारा। कभी कभी सोचते वे  उस महिला के प्रति इतने आकर्षित क्यों हैं? साधारण नैन नक्श गेहुँआ रंग। हाँ बाल थोड़े लंबे थे। मध्यम कद की निहायत घरेलू महिला थीं वो। फिर यह आकर्षण क्यों? कारण उन्हें ढूँढे से नहीं मिला बस एक बात जानते थे उन्हें देखना अच्छा लगता था।

भास्कर को नागपुर आये महीना भर होने आया था। पहली बार वे अपने घर परिवार से इतनी दूर रहे थे। दिन तो काम में गुजर जाता पर जब वे कमरे में आते अकेलापन हावी हो जाता। बच्चों से बात करते आँखें भर आतीं। जब सब साथ थे उनके घर पहुँचते ही बच्चे घेर लेते थे। दिन भर घर में स्कूल में क्या हुआ , आपस के लड़ाई झगड़े, मम्मी की शिकायतें जब तक उन्हें सुना ना देते उन्हें चैन नहीं आता था।

खिड़की से बाहर झाँकते वे उस घरेलू माहौल की ही झलक तो नहीं पाना चाहते हैं? उन्होंने खुद से ही सवाल किया। जब कमरा देखने आये थे तब भी शायद उस महिला से ज्यादा उसके घरेलूपन ने उन्हें आकर्षित किया था। साड़ी, चूड़ी, बिंदी, बालों का ढीला जूड़ा सभी में एक बेफिक्री का स्पर्श था एक सामान्य होने का एहसास जो उनके लिये बहुत खास हो गया था जब से वे इस अनजान शहर में परिवार से दूर अकेले हो गए थे। खैर कारण जो भी हो उन्हें देखना अच्छा लगता था।
कभी कभी वे महसूस करते वे भी उन्हें देखती हैं कौतूहल से या क्रोध से समझ नहीं सके वह। दिल तो वह कहता है जो वह खुद सुनना चाहता है। उनका दिल भी यही सुनना चाहता था "भास्कर उन्हें भी अपना यूँ छुप छुप कर देखा जाना अच्छा लगता है। वे भी तुम्हे चुपके से देख लेती हैं।"

लेकिन दिमाग को दिल की ख़ुशी से जलन होती और वह उलाहना देने से नहीं चूकता , "कुछ भी सोच लेते हो तुम, तुम्हें हो क्या गया है? वे तुम्हे क्यों देखेंगी? छत पर टहलने आती हैं टहल कर चली जाती हैं। ये तो तुम सोचते हो कि वे तुम्हें देखती हैं। कभी रुक कर खिड़की की तरफ देखा है उन्होंने आज तक?

दिल और दिमाग के तर्क तो अंतहीन हो सकते हैं। दोनों ही अपने आप में बड़े खिलाड़ी लेकिन उनके सामने कमजोर पड़ जाते भास्कर और जल्दी से इस झगड़े से बाहर आना चाहते झुंझला जाते और अपने दिल को समझाते, "इस दिमाग को कभी किसी की ख़ुशी हजम हुई है आज तक? बस अब तू ही समझ जा और चुप हो जा ,तेरी ही बात सही है।"

एक दिन उन्हें मौका मिल ही गया।  उस शाम तैयार होते समय वे थोड़े नर्वस थे। दो बार आईने में देख बाल ठीक किये। नीली शर्ट के साथ काली पैंट का कॉम्बिनेशन चेक किया। ताला उठाने के बाद वापस आकर एक बार फिर डियो लगाया। धड़कते दिल से ही तो घंटी बजाई थी उनके घर की। दो मिनट बाद जिन्होंने दरवाजा खोला निःसंदेह उनके पति ही होंगे।

"मैं भास्कर शर्मा , आपके घर के पीछे वाले मकान में रहता हूँ ,उन्होंने हाथ आगे बढ़ाते हुए जल्दी जल्दी परिचय दिया कि कहीं बड़ी मुश्किल से खुला दरवाजा बंद ना हो जाये। असमंजस से भरी दो आँखों के साथ आगे बढे हाथ ने उनका हाथ थाम लिया और जल्दी ही आश्वस्त हो अपना परिचय दिया, "मैं मयंक गुप्ता।"

औपचारिकता के आदान-प्रदान के बाद उन्होंने अपने आने का प्रयोजन बताया, "मेरी कुछ शर्ट उड़ कर आपकी छत पर आ गई हैं उन्हें लेने आया हूँ।"

"अरे मोनू बेटा अंकल की शर्ट उड़ आई हैं छत पर ले आओ, "गुप्ता जी ने बेटे को आवाज़ लगाई। आइये आप अंदर तो आइये।"

छोटा सा प्यारा परिवार था गुप्ता जी का उनकी पत्नी सोनाली, अठारह साल का बेटा मोनू, और पंद्रह साल की बेटी पिंकी। देर तक गपबाजी होती रही। उनकी पत्नी चाय और गरमा गर्म पकौड़े ले आईं। अनायास ही उनके मुँह से निकला बहुत दिनों बाद घर के बने पकौड़े खाये मन तृप्त हो गया।

"आप आते रहा करिये घर का खाना मिलता रहेगा सोनाली को खाना बनाने का बहुत शौक है।"

वे झेंप गये "नहीं नहीं मेरा ये मतलब नहीं था सच में मन तृप्त हो गया तो मुँह से निकल गया।

उस दिन वे बड़े प्रफुल्लित मन से घर लौटे उनकी ख़ुशी मन में नहीं समा रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल की हो। हालाँकि उपलब्धि क्या है शब्दों में बता पाना मुश्किल ही था। अकेलेपन से मिली राहत थोड़ी देर एक पारिवारिक माहौल में बिता लेने का सुकून। सोनाली से रूबरू बात होने की ख़ुशी तो थी ही पर वह सामान्य बातचीत ही थी। जीवन में जो सुख सामान्य से मिलता है वह विशिष्ट या अति विशिष्ट से शायद नहीं मिलता।

उन्होंने सोनाली को फेसबुक पर खोज निकाला और दोस्ती का पैगाम भेज दिया। उनकी दोस्ती फेसबुक चैट से होते हुए मोबाइल पर होने वाली लंबी लंबी बातों में बदल गई। कभी वे भोजन पर आमंत्रित होते तो कभी यूँ ही चाय पर। कभी संकोच  भी होता कि उनको अपने यहाँ नहीं बुला पाते जिसे सोनाली और मयंक हँस कर टाल देते, "आप फैमिली लेकर आयेंगे ना तब हम आपके यहाँ आया करेंगे।"

उनकी ठहरी हुई एकाकी जिंदगी ने गति पकड़ ली। कंपनी के काम बच्चों से बातों के बाद ढेर सारा समय सोनाली से बातें करते गुजरता। थोड़े ही समय में दोनों एक दूसरे के साथ घंटों फोन और चैट पर रहने लगे। बातें भी क्या होती थीं, उनके ऑफिस की, घर की, बच्चों की, बचपन की, अड़ोसपड़ोस और रिश्तेदारों की। कभी कभी वे दोनों ही इस बात पर हँसते थे। करते जाओ तो अंतहीन बातें एक दूसरे को सब कुछ बता देने की बेताबी और अंत में हासिल एक दूसरे के साथ होने की तसल्ली। धीरे धीरे ये समय इतना बढ़ा कि मयंक और बच्चों की नज़र में भी आने लगा। कभी वे सोचते सोनाली कैसे मैनेज करती होगी। इतना समय उनके साथ फिर घर के काम बच्चों को समय देना लेकिन सच तो ये था इस सब के बाद भी वो बातों का मोह नहीं छोड़ पाते।

जिंदगी अपनी रफ़्तार से चलती रही पर रफ़्तार सदा एक सी कैसे रह सकती है? रास्ते में कभी ख्वाहिशों के तो कभी अनचाही परिस्थितियों के रोड़े आते ही रहते हैं और ना चाहते हुए भी रफ़्तार बाधित होती है। अपने तई आप खूब सूझबूझ से चलते हैं पर रफ़्तार कई खूबसूरत बातों को नज़रअंदाज़ कर ही देती है। कभी कोई इच्छा या व्यवहार रास्ते के गड्ढे या रोड़े बन आड़े आ जाते हैं। ऐसा ही कुछ तो हुआ था उस समय। बैचेनी से भास्कर उठे और दरवाजा खोल बाहर बालकनी में आ गए। सिगरेट जला कर गहरे गहरे कश लेने लगे। कड़वी यादों का धुंआ उनकी रगों में फैलने लगा जिससे मुँह भी कसैला हो गया और दिल भी। वे हमेशा इन यादों को भुला देना चाहते रहे हैं ये यादें उन्हें बैचेन करती रही हैं और इसलिये दुबारा इस शहर में आने से बचते रहे हैं। हालाँकि उन्हें कभी समझ नहीं आया क्या हुआ क्यों उनके और सोनाली के बीच गलतफहमियाँ और दूरियाँ बढ़ीं और कब वे दूर होते चले गये। कभी सोचते भी है तो किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाते। कभी खुद को गलत समझते तो कभी सोनाली को गलत ठहराते कभी समय को दोष देते कभी किस्मत को।

कल रविवार है उन्होंने सोचा था कल वे गुप्ता जी के यहाँ मिलने जायेंगे। नागपुर आने से पहले यही सोचा था और इसी की झिझक भी थी। मिलने के लिए आना भी चाहते थे और न मिलने के लिए आना टाल भी रहे थे। जितनी बैचेनी पहली बार परिचय करने की थी उससे ज्यादा बैचेनी इस टूटे रिश्ते के बारे में सोचने और उसे फिर जोड़ने की है। कोई बात हुई होती तो उसके बारे में चर्चा कर सब ठीक किया जा सकता था पर अगर कोई बात ही ना हुई हो तो उसे कैसे ठीक किया जाये?
रविवार की सुबह देर से उठे  नाश्ता कर टीवी  देखते देखते जाने के लिए खुद को उकसाते रहे ना जाने के बहाने ढूँढते जूते मोज़े पहने बिस्तर से बाहर पैर लटकाये झपकी लेते रहे।  बिना किसी से मिले-बताये वे नौकरी छोड़ कर मेरठ चले गये थे। ख्याल तो कई बार आया नौकरी छोड़ने का फैसला करने के बाद से नागपुर छोड़ने तक, पर ना जाने कैसी नाराज़गी थी कि उन्होंने कुछ नहीं बताया ना मयंक जी को ना सोनाली जी को। वापस जाने के बाद भी ख्याल तो आया कि एक बार फ़ोन करना चाहिये पर नहीं किया बस यूँ ही नहीं किया। अपनी दृढ़ता के गुमान में रहे कि मैं सख्त जान हूँ जो सोच लेता हूँ कर लेता हूँ। पता नहीं कैसा गुमान था यह जो उनमे जीत जाने का एहसास भरता था। मन बहुत बैचेन था आज नहीं तो फिर शायद ही कभी। अगले दो दिन बेहद व्यस्तता थी और रात की गाड़ी से ही चल देना था।

शाम के पाँच बज गये उन्होंने शर्टिंग ठीक की। नीली शर्ट पर सलवटें पड़ गई थीं पर उन्होंने उसे नहीं बदला। पहली बार यही शर्ट पहन कर वे गुप्ता जी के यहाँ गए थे आज कई साल बाद इसे फिर पहना वही शुरुआत फिर से करने के लिये। उन्होंने खुद को धकेला थोड़ी लानत मलानत की और वे गुप्ता जी के घर के सामने खड़े थे। दरवाजा बंद था। घंटी बजा कर लॉन को निहारने लगे। कई पौधे लगे थे क्यारियाँ साफ़ सुथरी थीं हर क्यारी में एक दो तरह के केक्टस के पौधे भी थे। हरे भरे लॉन और पौधों पर कोई फूल ना था हरियाली के बावजूद एक सूनापन सा पसरा था। दरवाजा इतने धीमे से खुला कि उन्हें भान ही नहीं हुआ।

"जी कहिये किससे मिलना है?" एक धीमी आवाज़ की अजनबियत ने उन्हें चौंकाया वे पलटे सामने सोनाली खड़ी थीं। शाम की धूप की जर्दी चेहरे पर ओढ़े सूती साड़ी के पल्ले  को लापरवाही से कंधे पर डाले बालों का ढीला सा जूड़ा बनाये आँखों में खालीपन लिये  वे सामने खड़ी थीं। पाँच सालों के हर मौसम के बदलाव ने मानों उन पर ही असर डाला था वे अविश्वसनीयता से देखते रहे।

"जी नमस्ते" सोनाली ने कहा तो वे चैतन्य हुए।

"नमस्ते मैं भास्कर" अकबका कर उनके मुँह से निकला।

"जी आइये" वे दरवाजे के एक ओर हो गईं और ड्राइंग रूम में उन्हें बैठाकर अंदर चली गईं। वे कमरे का मुआयना करने लगे। सब कुछ वैसा ही था, वही सोफे, दीवार पर वही पेंटिंग, वही पर्दे, कोने में रखा वही शोपीस। सब कुछ वैसा ही था बस कमरे की रौनक गायब थी शायद शाम हो गई है अँधेरा होने वाला है इसलिये। "गुप्ता जी और बच्चे कहीं बाहर गये हैं क्या?" पानी का गिलास ट्रे में रखते हुए उन्होंने पूछा।

"आप कैसे हैं नागपुर कब आये?" उनके सवाल को नज़रअंदाज़ कर दिया गया।

"दो दिन पहले कंपनी के काम से आया था।" थोड़ी देर मौन पसरा रहा। सामने वाली खिड़की से सूरज की एक कमजोर किरण कमरे में रंग भरने की नाकामयाब कोशिश कर रही थी पर कमरे की उदासी और अँधेरे के सामने थकी सी लग रही थी।

"मोनू क्या कर रहा है आजकल?"

"उसकी इंजीनियरिंग पूरी हो गई है। पुणे की एक कंपनी में जॉब कर रहा है।"

"और पिंकी?" जवाब पूरा होते ही उन्होंने अगला सवाल पूछ लिया कि कहीं बातों का सिरा छूट ना जाये।

"उसका मेडिकल में सिलेक्शन हो गया है वह औरंगाबाद में है।"

"तो अब आप और मयंक जी अकेले ही हैं?"

सूरज की जर्द किरण दम तोड़ चुकी थी कमरे में अब स्याह उदासी थी जो सोनाली की आँखों में उतर गई थी। एक सीधे से प्रश्न के जवाब में एक लम्हा उनकी आँखों में ठहर गया था जो भास्कर की आँखों में आकर ठिठक गया। सोनाली ने उठकर बत्ती जला दी कमरा सफ़ेद रौशनी से भर गया जो "अब हम साथ नहीं हैं " की गूँज से मटमैला हो गया। वे हड़बड़ा गए। इस अकस्मात खबर ने उन्हें शून्य कर दिया। सोनाली फिर सामने आकर बैठ गई। उनका गला सूख गया आँखें झपकना भूल गई चेहरा लाल हो गया।

"अचानक ये कैसे? क्या हुआ था?" उन्होंने टेबल पर रखे गिलास को उठा कर बचा हुआ पानी का घूँट लेते हुए पूछा, "कोई बहुत बड़ी वजह रही होगी?"

वे चुपचाप उन्हें देखती रहीं उनकी बात तो शायद सुनी ही नहीं गई थी। अचानक वे उठ कर खड़ी हो गईं, "मैं चाय बना कर लाती हूँ।" भास्कर उन्हें रोक भी नहीं पाये।

उनकी नज़रों में हँसता खेलता परिवार झूलने लगा। दीवार पर लगी फैमिली फोटो जिसमें चारों एक साथ थे खुश संतुष्ट उस समय यह ड्राइंग रूम हंसी ठहाकों से भरा होता था। क्यारी में फूलों के पौधे मुस्कुराते थे जो अब केक्टस में बदल गये हैं। ऐसा क्या हुआ होगा उन दोनों के बीच। उनका तो इतना आना जाना था सोनाली जी से घंटों बातें होती थी वे एक दूसरे को सारी बातें बताते थे। उन्होंने तो कभी किसी अनबन का जिक्र नहीं किया फिर अचानक यह सब। साथ साथ नहीं हैं मतलब तलाक हो गया क्या? इतने जल्दी तो तलाक मिलता नहीं तो क्या दोनों की रज़ामंदी से? पर क्यों कारण क्या है?

एक कारण बड़ी देर से उनके दिमाग में कसमसा रहा था पर वह उससे मुँह मोड़ रहे थे। बार बार उसके सच होने की आशंका सिर उठा रही थी हर बार वे खुद के निर्दोष होने की सांत्वना खुद को दे रहे थे। उनकी बैचेनी चरम पर थी वे उठ कर टहलने लगे। समय की सुई सरकना बंद हो गई एक एक पल पहाड़ सा स्थिर हो गया। उनकी सारी कैफियत धरी रह गई  वही एकमात्र कारण उन्हें असली कारण लगने लगा। बिस्किट की प्लेट उनकी तरफ बढाती सोनाली से उन्होंने पूछा, "सच बताइये क्या मेरे कारण?" उनकी आवाज़ काँप रही थी।

"बिस्किट लीजिये" सोनाली ने स्थिर आवाज़ में कहा तो उन्होंने पूरी प्लेट ही पकड़ कर टेबल पर रख दी और सोनाली का हाथ पकड़ लिया।
"सच बताइये क्या हुआ? आप लोग अलग हो गये? कहीं तलाक... " भास्कर ने अपनी जीभ काट ली बात पूरी नहीं कर पाए। सोनाली ने धीरे से हाथ छुड़ा कर चाय का कप उठा लिया। वो एकदम शांत थी कोई उद्विग्नता नहीं पर चेहरे और आँखों का सूनापन उन्हें डराने लगा। वे जानते थे इस ख़ामोशी के पीछे एक तूफ़ान छुपा है, जिसका बाहर आना जरूरी था। खुद को सांत्वना देने  की तमाम कोशिशों के बाद भी दिल के किसी कोने में वह आशंका सच होने की अनुभूति उन्हें होने लगी। इस तनाव को झेलने की उनकी शक्ति ख़त्म हो गई उन्होंने फिर पूछा "कहीं मेरे कारण तो नहीं?"

"चाय ठंडी हो रही है। "

भास्कर झुंझला गए, "सोनाली प्लीज मुझे बताओ क्या हुआ?आपने कभी ऐसी किसी बात का जिक्र नहीं किया। सब कुछ तो ठीक था आप दोनों के बीच फिर ऐसा क्या हुआ? मयंक जी कहाँ हैं आजकल? क्या वे नागपुर में नहीं हैं?"

"सब बताती हूँ" कहते हुए वह ट्रे लेकर अंदर चली गई। ऐसा लगा जैसे वह खुद से जूझ रही हैं अपने अंदर के तूफ़ान को समेटते हुए बातों का सिलसिला ज़माने की कोशिश कर रही थी फिर अचानक उन्होंने बोलना शुरू किया, "आपकी और मेरी दोस्ती इत्तेफाक से हुई या जानबूझ कर मुझे नहीं पता पर आपसे बात करना मुझे अच्छा लगता था। आपको याद ही होगा हम घंटों बातें करते थे और दोस्ती में इतने खुलते गये कि कभी कभी बातों की हद भी पार कर लेते थे लेकिन हमारी दोस्ती सिर्फ दोस्ती थी। रूटीन से अलग बातें आपका ध्यान से सुनना मुझे हँसाना टोकना चिंता करना अच्छा लगता था। शुरू शुरू में मयंक जी को आपत्ति होती थी वे कुछ कहते नहीं थे पर मेरी बातों में आपका जिक्र आने पर खामोश जरूर हो जाते थे। कहीं कोई अविश्वास उनके दिल के किसी कोने में शायद रहा हो पर उन्होंने कभी जाहिर नहीं किया। इतनी देर, कितनी बातें, उन्हें अच्छा तो नहीं लगता था लेकिन मेरी ख़ुशी के लिये चुप्पी साध ली। मोनू चिढ़ जाता पिंकी रूठ जाती पर आपके नाराज़ होने अकेले होने की चिंता मुझे ज्यादा होती।

धीरे धीरे आपकी बातों में दोस्ती से आगे बढ़कर एक अधिकार जताने की कोशिश होने लगी। दोस्ती के गलत ट्रेक पर जाने की आशंका तभी मेरे मन में उठी। मैं और मयंक जी एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। मेरी जिंदगी में दोस्ती की जगह तो थी पर इससे आगे मैं सोच भी नहीं सकती थी।

"तो क्या इसी शक़ की वजह से?" भास्कर ने पूछा पर सोनाली अपने में खोई बोलती जा रही थी।

"मैंने खुद इस बारे में सोचना शुरू किया और मुझे लगा कही ऐसा तो नहीं मेरे इतना समय देने हँसने बोलने बतियाने से आपको कोई गलत संकेत मिल रहे हैं? मैं ऐसी कोई ग़लतफ़हमी पैदा नहीं होने देना चाहती थी इसलिए खुद को समेटना शुरू किया। इससे गलतफहमी और दूरियाँ बढ़ती गईं। मुझे नहीं पता मेरी किस बात ने आपको आहत किया पर फिर आपने मुझसे बात करना, मेरा फोन उठाना बंद कर दिया। फेसबुक, व्हाट्सऐप पर मुझे ब्लॉक कर दिया। मैंने कई बार कोशिश की। मैं भी आहत हुई लेकिन फिर मुझे लगा शायद यही ठीक है। आपसे बढ़ती नज़दीकियाँ कहीं मुझे मयंक जी से दूर तो ले ही जा रही थीं। मैं आपकी दोस्ती से भरी पूरी घर वालों के लिए खाली होती जा रही थी घर की धुरी अपने स्थान पर स्थिर हो जाये तो बाकी सदस्य अपना पथ खो ही देंगे ना। अजीब माहौल हो गया था घर का सभी अपने में सिमटते जा रहे थे।

"इसी वजह से आप लोग अलग अलग हो गये क्या तलाक?" भास्कर ने तड़प कर पूछा।

"नहीं नहीं ऐसा मत कहिये। मयंक जी और बच्चों ने हमारी दोस्ती को दोस्ती की ही तरह से स्वीकार कर लिया था। आपका आना जाना घर के सदस्य की तरह ही लिया जाता था लेकिन जब आपने बात करना बंद किया तो सभी के जीवन में बहुत कुछ बदल गया। ये सब कुछ इतना अचानक हुआ कि मुझे संभलने मौका ही नहीं मिला मेरी जिंदगी में एक सन्नाटा पसर गया। ऊपर से शांत, पर अंदर से बैचेन, मैं पहले ही परिवार से दूर होती गई थी, अब और चुप चुप रहने लगी। बातें करते करते कहीं खो जाती, बिना बात चिड़चिड़ा जाती, कहीं आने जाने से मना कर देती, हमेशा अकेले रहने लगी। मेरे अंदर की बैचेनी ने मेरी एकाग्रता ख़त्म कर दी हर वक्त एक अजीब सी उलझन। सभी लोग मुझमे आये परिवर्तनों को लेकर हैरान थे। हैरान तो मैं भी थी चाहकर भी इस खालीपन को किसी और चीज़ से भर नहीं पा रही थी। खुद को ठगा सा महसूस करती थी ऐसा लगता था मुझे इस्तेमाल करके ठुकरा दिया गया हो।"

भास्कर तिलमिला गये, "ऐसा मत कहिये प्लीज् आप जानती हैं, मैं आपका बहुत सम्मान करता हूँ। "

सोनाली ने सूनी नज़रों से भास्कर की आँखों में झाँका। चेहरे की फीकी मुस्कान ने कहा, "आपके सम्मान की यह भाषा समझने की जद्दोजेहद में ही तो और उलझती चली गई।"

भास्कर की बैचेनी बढ़ती जा  रही थी। सोनाली और मयंक के अलग होने का कारण वे अभी भी समझ नहीं पा रहे थे। क्या था अलग होने का कारण जब मयंक को उनकी दोस्ती इतनी लंबी लंबी बातों से कोई आपत्ति नहीं थी। फिर जब उनका एक दूसरे से कोई संपर्क ही ना रहा तब ऐसा निर्णय क्यों? बच्चों की वजह से? उनके दिमाग में एक और कारण कौंधा।

"कब हुआ यह सब?"

"तीन साल पहले। "

"तो बच्चों की वजह से आप लोग मेरे जाने के बाद दो साल साथ रहे?"

"कह नहीं सकती। "

"मैं समझा नहीं, मेरे नागपुर से जाने के  बाद तक तो आप लोग साथ थे मैं आपकी जिंदगी से दूर चला गया था फिर आप लोग अलग क्यों हुए?"

"जीवन में कुछ असामान्य अपनी लगातार उपस्थिति से सामान्य बन जाते हैं फिर उनकी अनुपस्थिति असामान्य हो जाती है। आपसे दोस्ती इतनी बातें आपका घर आना जाना धीरे धीरे हमारी सामान्य दिनचर्या में शामिल हो गया था लेकिन जब बिना बातचीत बिना बताये आपने शहर छोड़ दिया तब वह सामान्य नहीं रहा। फिर मेरा बदला व्यवहार और आपसे बातें ना होना सबकी नज़रों में आ गया और अब यह असामान्य बात हो गई जिसने मयंक जी के मन में शक़ पैदा किया। उन्हें लगने लगा कहीं हमारे बीच ऐसा कुछ तो नहीं हुआ जो नहीं होना चाहिए था? कुछ वर्जित जिसने मुझे इतना अस्थिर कर दिया। "

"उन्होंने आपसे कुछ पूछा?"

"नहीं उन्होंने कभी कुछ नहीं पूछा। आपको शायद याद ना हो मैंने आपको कई बार बताया था कि मयंक जी मुझसे कितना प्यार करते हैं। मेरी ख़ुशी के लिये कुछ भी कर सकते हैं। मैं भी उन्हें बहुत प्यार करती हूँ और उनके अलावा किसी और से कभी नहीं। वे चोरी से मुझे देखते रहते थे मेरे चेहरे मेरी आँखों में मौजूद उदासी को पढने की कोशिश करते उसका कारण खोजने की कोशिश करते। जो वो समझते उस पर विश्वास नहीं कर पाते और जिस पर विश्वास करना चाहते वह वहाँ नहीं पाते।"

"मुझसे कुछ कह कर  पूछ कर वे मुझे छोटा नहीं बनाना चाहते थे। अपनी तरफ से सफाई दे कर मैं उन्हें नीचा नहीं दिखा सकती थी। पूरे दो साल मैंने उन्हें इसी बैचेनी में जूझते देखा। मोनू का तो उसी साल आईआईटी में सिलेक्शन हो गया था वह रुड़की चला गया, दो साल बाद पिंकी औरंगाबाद। उसके बाद हमें जोड़ने वाले सेतु ही ना रहे। साथ रहते आमने सामने अजनबी से बैठे रहते। एक दिन मैंने ही मयंक जी से कहा आप यहाँ से कहीं और का ट्रांसफर ले लो जहाँ आप शांति से रह पाओगे। सच कहूँ भास्कर जी उन दो सालों में मयंक जी की आँखों में मैंने हमेशा पीड़ा देखी और वह दुःख आपके अचानक चले जाने से कहीं बहुत बड़ा था। मैं उन्हें और तकलीफ में नहीं देख सकती थी इसलिए हमारा अलग हो जाना ही ठीक था।"

भास्कर का चेहरा बुझ गया बेवजह की एक नाराजी बेवजह की चुप्पी किसी की जिंदगी को  इस कदर सन्नाटे से भर देगी जिससे किसी की जिंदगी यूँ उथल पुथल हो सकती है उन्होंने कभी सोचा नहीं था। "आप लोगों का तलाक तो नहीं हुआ ना?" उन्होंने डूबती आवाज़ में पूछा।

धीरे से हँस दी सोनाली, "पेपर पर तो कुछ नहीं हुआ, दिलों से भी कुछ नहीं हुआ, पर हालातों ने हमें अलग कर दिया, और अलग होना ही ठीक लगा।"

"आप कहें तो मैं मयंक जी से बात करूँ मेरी वजह से यह ग़लतफ़हमी हुई है शायद मैं इसे ठीक कर सकूँ।"

"कभी नहीं" सोनाली ने तड़प कर कहा, हम दोनों आज भी एक दूसरे को बहुत प्यार करते हैं और किसी भी कारण से उन्हें शर्मिंदा होना पड़े यह मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगी। उन्हें अपना समय लेने दीजिये मुझ पर पूरा विश्वास करने का अपनी पीड़ा पर काबू पाने का। तब तक उनकी पीड़ की इस डोर से हम बंधे भी होंगे और अलग अलग भी होंगे। जब उनकी आँखों में विश्वास होगा तब हम शायद फिर एक हो जायें पर वह पहल अब उनकी तरफ से हो उस समय तक का इंतजार करूँगी मैं।"

यह सुनकर भास्कर की साँस फूलने लगी चेहरा कान की लवों तक लाल हो गया अब दो पल के लिए भी रुकना भास्कर के लिये असंभव हो गया वे झटके से उठे दोनों हाथ जोड़ कर नमस्ते कहते दरवाजे की और बढ़ गये। अचानक जैसे कुछ याद आया और ठिठक गए, "एक बात पूछूँ?"

"पूछिये " सोनाली ने सीधे उनकी आँखों में देखते हुए कहा।

"आप यहाँ अकेले क्यों रहती हैं? मेरा मतलब मोनू या पिंकी के साथ भी तो रह सकती हैं?"

"हाँ रह सकती हूँ, बल्कि अब रहूँगी पर मयंक जी को विश्वास था एक दिन आप जरूर आयेंगे और उनके विश्वास पर भरोसा कर मैं यहीं रुकी रही। "

भास्कर तेज़ी से बाहर निकल गये पूछना तो चाहते थे पर पूछ ना सके कि सोनाली आपको मेरे आने का विश्वास था या नहीं?

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