कविताएँ - रामेश्वर सिंह

रामेश्वर सिंह
शिलाखंड!

अल्हड़ नदी सी
उतरती हो
तुम मुझमे
और
यकायक
मौन हो जाती हो!

अनमनी सी धाराएँ
तुम्हारी,
मेरी सांसों संग
कुछ थिरकती हैं
और
फिर तुम
बह निकलती हो
मेरे पार
चपल हिरणी सी!

मेरे आर,
मेरे पार,
तुम धड़कन हो,
पर
मुझमे तुम मौन हो
देवालय की साध्वी सी!

लगता है
हिमालय के
निशब्द गुंजन
के बीच,
तुम्हारे बहाव की
रेतीली सतह
पर मात्र
शिलाखंड हूँ
मैं तुम्हारा!

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तुम्हारी याद मेघ बनी और बरस गयी

आज मेघ खूब बरसे।
झमाझम बरस रहे है
अब भी!

बरसो बाद ये झड़ी लगी।

शीत ऋतु ने
अपनी अनोखी अदा से
अपने आने का पूर्व संदेश
बादलों के पहलू में
लिख भेजा है।

बादल ठंडी हवा संग लहराए,
पहलू में लिखा शीत-संदेश,
झरने सा बिखेर दिया।

तन भीगा,
मन भीगा,
तड़प गया!

एक ठंडी सिहरन
तुम्हारी याद बन
मन की दहलीज से
अंदर उतरी
और
सहमी!

अरे!
मन में एक दीप प्रज्वलित है
शाश्वत!
प्रकाश से परिपूर्ण
पर
उदास और अकेला!

तुम्हारी याद की
ठंडी सिहरन
लिपट गई दीप से,
प्रेम लौ में तप्त हुई,
मेघ बनी,
शीतल हुई
और
बरसने लगी।

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