लघुकथाएँ: विनय कुमार पाठक

विनय कुमार पाठक

कहने के लिए

वह गेस्ट हाउस से नीचे उतरा। ध्वजारोहण की तैयारियां चल रही थीं। अपार्टमेंट के पहले और दूसरे माले पर गेस्ट हाउस था जहां कार्यालय के कार्य से या स्थानान्तरण होने पर कुछ दिनों तक कर्मचारियों के रहने की व्यवस्था थी। शेष मालों पर फ़्लैट थे जिसमें कंपनी के कर्मचारीगण सपरिवार रहते थे। वह भी पिछले कुछ सप्ताह से गेस्ट हाउस में ठहरा हुआ था क्योंकि उसका स्थानान्तरण उसी शहर में हुआ था।

सजावट हो चुकी थी। कुछ लोग ऊपर से नीचे आ चुके थे। एक सज्जन अपने अपने लैपटॉप से स्पीकर को जोड़ कर देशभक्ति के गाने बजाने की कोशिश कर रहे थे। धीरे-धीरे लोग एकत्र हो रहे थे। एक दूसरे से हाय-हलो कर वहीं खड़े हो ध्वजारोहण की प्रतीक्षा कर रहे थे।

उसे किसी ने नहीं पूछा। उसे बुरा लगा पर उसने सोचा ध्वजारोहण राष्ट्रीय पर्व है किसी के पूछने की क्या आवश्यकता है। थोड़ी देर बाद काफी लोग पहुँच गए तो ध्वजारोहण हुआ। राष्ट्रगान गाया गया। उसने भी स्वर में स्वर मिलाया। फिर वापस अपने कमरे में चला आया।

थोड़ी देर बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन था। इसी बीच कुछ लोगों ने अपने विचार भी  व्यक्त किये। एक सज्जन इस बात पर बड़ा जोर दे रहे थे कि आज के युग में हम एक दूसरे से मिलते जुलते नहीं है, एक दूसरे को जानते नहीं, एक दूसरे का सुख दुःख नहीं समझते।

उसके कमरे से नीचे का दृश्य साफ़ दिखता था। उसने खिड़की से झाँक कर देखा। जो सज्जन इस प्रकार की बातें कर रहे थे वे उसके सामने ध्वजारोहण के वक्त कई बार आए थे पर एक  बार भी टोका नहीं था, नजरअंदाज करते रहे थे। मानो वह कंपनी का कर्मचारी न होकर बाहरी अवांछित व्यक्ति था।

उसने ध्यान से देखा उनका चेहरा भावहीन था। मतलब जो बातें वे कह रहे थे वे सिर्फ कहने के लिए थे।

एचआर

एक विख्यात सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में अनुबंध के आधार पर नियुक्त कुछ प्रबंधक प्रशिक्षु आपस में बातें कर रहे थे।

पहली प्रशिक्षु, "अरे यार! इस संस्था में गजब हाल है। जिस विभाग में जाओ लोग मुफ्त की रोटियाँ तोड़ते मिलते हैं। मैं गई थी एक सेक्शन में। एक उच्च अधिकारी जिसका वेतन प्रति माह सवा लाख रुपये है, दिनभर क्या करता है मालूम? सिर्फ डीजीएम के लिए फोटो कॉपी करने और एक दो पत्र टाइप करने का काम करता है।"

दूसरा प्रशिक्षु, "यार मैं तो कई अनुभागों में जा कर देख चुका हूँ। सभी जगह यही हाल है। लगता है इस संस्था में एचआर नाम की कोई चीज नहीं है।"

तभी एक बुजुर्ग स्थाई अधिकारी बीच में टपका, "बच्चों इस संस्था के सौ वर्ष से ऊपर हो चुके हैं। एक से एक अनुभवी और जानकार लोग हैं इस संस्था में। इसके बाद भी आप लोगों की नियुक्ति हुई है तो सिर्फ निजी क्षेत्र के कंपनियों के नक़ल में। यदि इस संस्था में एचआर नाम की चीज होती तो आपकी यहाँ नियुक्ति ही नहीं होती।"

2 comments :

  1. दोनों लघुकथाएँ यथार्थ का वयान करती नजर आईं। प्रभावित करती हैं। बधाई।

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  2. जी बहुत बह्त धन्यवाद

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