काव्य: पल्लवी मिश्रा

पल्लवी मिश्रा
- 1-  
प्रेम,
जब हो जाता है
अनबोलता पेड़
गंभीर और चुप
अनगिनत मौसमों में
बदस्तूर खड़ा
और
ज़मीन के कहीं भीतर तक
गड़ा पेड़ सा,
प्रेम-
तटस्थ देखता है-
पत्तों का आना और झरना
घोसलों की सुगबुगाहट
फूलों की महक का बनना
रस भरे फल।
पेड़ सा खड़ा और
ज़मीन में गड़ा प्रेम
सख़्त हुआ जाता है
हर मौसम।

प्रेम -
दिए की लौ,
आँचल और हथेलियों के जतन-से
हर अँधियाई बयार में
जलाये रखता है मन
पर
ऊँची सीढ़ियों के अंधेरों में
मंदिरों के चौखट तक पहुँची लौ
जल नहीं पाती,
गुफाओं के अंधेरी रहस्यों के आदी
मन्दिरों के देवता
सँभाल नहीं पाते बुझती लौ।

मंदिरों में बुझी प्रेम की लौ
मिटती नहीं
और
बनने लगती है द्वीप
जिस पर रहने लगते हैं
शोर मचाते तोते,
सफेद बगुले,कठफोड़वे और कबूतर
मिलने लगते हैं
सीपी में बंद मोती
मोती-
जो होते हैं
सीपी के प्रेम की लौ का जतन।

प्रेम-
जब होता है
बर्फ़ में बनता स्फटिक
ठंडा और सफ़ेद,
स्फटिक हुआ जाता प्रेम
छुपाये रखता है,
दिए की बुझी लौ
जो उभरती है
उस एक घड़ी
जब देख पाने की ललक लिये
आँखें-
प्रयत्नशील,
समेटती हैं उन्हें
हथेलियों में।

           -2-
रंगोली के हर रंग
सधे हाथों से निखार
हर दियरखे पर उजाला रख
तुलसी चौरे को टीक
साँझ के धुँधलकें में
अंतस चुपके ही
खुले आकाशों के भित्तिचित्रों पर
उत्तर के ध्रुव तारे में
ठहर जाता है।

कितनी ही बार
बंद आंखों में देखी है
राजजात यात्रा
हो आयी हूँ अनगिनत देवस्थलों तक
सिहरा गयी ज़िनकी घंटाध्वनि
ठिठके हैं पाँव नन्दा - जागरों के गीतों पर
ठहर गई हूँ अनायास ही,
देवदारों की छावँ और पनवाड़ियों में
कि कहीं दिख ही जाओ तुम
डोल-जात्रा की टोली में
किसी यात्रा पर।

साँझ के धुँधलके में
कितनी ही बार
बंद आँखो में
उतार दी है पाजेब
किया है रुद्राक्ष का श्रृंगार
निर्बाध बढ़ गयी हूँ
घाटों और शमशानों के उत्सव की ओर
किंचित सत्य ही खींच लाया हो तुम्हें
अंतस ढूँढता रहा यहाँ भी
दियों,फूलों और घाट लगी नावों में
किन्ही मठों,सीढ़ियों,दीवारों की अोट लिये
किंचित,देखा हो तुमने मुझे।

कितनी ही बार अग्नि बन
भस्म किया है शव का हर वह कण
जो बस गया है तुम्हारे भीतर
सजाई और जलाई है सती की चिता
ये आस लिये कि
समय की धार में
गंगा सा बहता प्रेम
बना दे तुम्हें
वह अर्धनारीश्वर।

कितनी ही बार चाहा है
पराजित करना तुम्हें
प्रेम के हठ योग से
कदाचित
मोक्ष मिल जाये
इसी जन्म में
पूर्ण हो जाये
हर तीर्थ, व्रत।

हर बार
आँगन की सीढ़ियों में
उलझ पड़े हैं पैर
टटोल कर
पहन ली है पाजेब
सुबह के उजालों ने
साँझ के धुँधलकों को
भुलाए रखा है हर साँझ तक
कि प्रेम बन कर रहे
पृथ्वी और ध्रुवतारा।

          -3-
तुम्हारे न होने में।

तुम जो होते
समझ पाती मैं
भ्रम, अविश्वास,डर के
उन अनगिनत
संकेन्द्री वृतों को
जो
घेरे रखते हैं मुझे
प्रत्येक क्षण।

सहज़ नहीं रहा
ये जान लेना
कि क्या खोना
और क्या पाना है अब
सच और सही रहने की
निष्ठुर परीक्षाओं ने
अछूता कर दिया है
प्रेम और घृणा के भावों से
श्रम साधना होता है
कि -
जुड़ी रहे आस्था।

सच तो ये है कि
बनना चाहती हूँ
हवा और धूप
बर्फ होते रिश्तों को
दिखाना चाहती हूँ धूप
सुलगना चाहती हूँ शब्दों में।
मेरे शब्दों का बर्फ बनना
मेरी समय से पहले हुई मौत है।

तुम्हारे न होने में
मैं पदच्युत हूँ
अपने समस्त सौभाग्यों से l

          -4-
डरो मत
डरना क्या है
अढ़ाई दिन की पीड़ा है बस
फिर
भूलोगे तुम
जैसे भूलती हूँ मैं
हर माह।

देश
रिस लेता है अब
बिलकुल मेरी ही तरह
मौन
बाँध, पोंछ लेता है
हरेक रिसता घाव।
किसी को फर्क नहीं पड़ता
अरे देश ही तो है
विकार तो होंगे ही
वैसे ही जैसे
मेरी देह।

रिसना
पोंछना
छुपाना
प्रक्रिया है सहज़
मान लो
देश
अलग कहाँ हैं
मुझसे।

समूची शक्तियों ने
ज़ान लिया है
मौन रहने के
असीमित
प्रयोजन
मौन ही
संचालित होती है
देह ।

मन, आत्मा, कल्पना
निष्कासित है
अपने संदर्भों में
कवितायें, गीत,उम्मीद
की ज़मीन पर
लिजलिजी, चिपचिपी
खून की धार की
पपड़ी को
इंतज़ार है
अगली बारिश का नहीं
अगले माह के
विकारों और अढ़ाई दिन की
पीड़ा का।

3 comments :

  1. सेतु का फरवरी२०१८अंक देखा।कवि हूं इसलिये कविताऐं
    पढ़ी।पल्लवी मिश्रा की कविताऐं प्रशंसनीय हैं।आगे और भी पढूंगा।

    ReplyDelete
  2. बेहतरीन

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।