कहानी: पछतावे के आँसू

विजय कुमार संदेश 

प्राध्यापक, पी.जी. हिन्दी विभाग, मार्खम कॉलेज, हजारीबाग, झारखंड,भारत
दूरभाष: +91-943 019 3804
ईमेल : sandesh.vijay@gmail.com

समय का पहिया अपनी गति से घूम रहा है और साठ वासंतिक चक्र पूरा करने के बाद अपनी स्मृतियों में शिशिर आज पुनः वहीं लौट आया है, जहाँ बचपन से उसने अपने होशोहवास में उसे घूमते हुए देखा है। इन साठ वासंतिक चक्रों के दरम्यान घटी हर उस घटना व परिस्थिति से शिशिर पूरी तरह परिचित है जो उसके सम-विषम जीवन के साक्षी रहे हैं। उसे अनुभव हो रहा है कि अतीत में उसने जो बीज बोया था, वही फसल अब काट रहा है। विगत दो महीने से वह बीमार है और जर्मनी के फ्रैंकफर्ट शहर के एक विख्यात अस्पताल ‘हॉली स्पिरिट’ के एक वार्ड में इलाजरत है। फ्रैंकफर्ट के श्रेष्ठ चिकित्सा संस्थानों में हॉली स्पिरिट की गिनती होती है। इस अस्पताल में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के सभी संसाधन मौजूद हैं, अस्पताल के कर्मचारियों द्वारा सेवा-भाव से कार्य भी किये जाते हैं। पर, उसका दुर्योग है कि आज वह यहाँ नितांत अकेला है। अपने इस अकेलेपन में वार्ड के बेड पर पड़ा-पड़ा शिशिर अतीत के उन दिनों को भुलाये नहीं भूल पा रहा है, जिसे वह साठ वसंत पीछे छोड़ आया है। पीछे छूटीं हुई स्मृतियाँ अब चलचित्र के दौड़ते रील की भांति क्षण-क्षण दृश्य बदल रही हैं, शिशिर की अधमुंमुँदी आँखों के आगे दृश्यमान हो रही हैं और क्रम से आते-जाते ये दृश्य उसे तीखे शूल की तरह चुभ रहे हैं। आँखें मुँदी होने के बावजूद अतीत के वे बीते पल साफ आईने में उभरते बिंब की तरह रू-बरु हो रहे हैं। अतीत की स्मृतियों के दृश्य कुहरे के बीच-बीच से झांकते-चमकते सितारों की तरह एक, दो, तीन, चार... और शिशिर इन्हीं दृश्यों के साथ अतीत के गह्वर में गोते लगाने लगा है।
स्मृतियों के वातायन से दृश्य एक शिशिर की आँखों के सामने है, जो अंधेरी रात में टिमटिमाते जुगनुओं की तरह झलमलाने लगा है। छह साल का शिशिर। शिशिर का नाम शिशिर क्यों पड़ा ? पिता के ये शब्द उसे आज भी ज्यों के त्यों शब्दशः याद हैं। अपने एकाकीपन के इन क्षणों में उसे पिताजी की कुछ-कुछ अस्पष्ट छवि आँखों की पुतलियों पर उभरने लगी है और वे शब्द गूँजने लगे हैं, जिसे उसने कई बार पिताजी के मुख से सुना है। पिताजी ने बताया था कि जब उसका जन्म हुआ, भारतीय मौसम और महीने के अनुसार शिशिर मास का अंतिम पक्ष चल रहा था, जिसमें केवल दो दिन ही शेष थे। आकाश में धुंध की चादर लपेटे घने कोहरे छाये हुए थे और ओस-कणों से धरती पटी हुई थी। मौसम विज्ञानी मानते हैं कि इस ऋतु के वातावरण में सूर्य-किरणें अमृत-तत्त्व बरसाती हैं और इन्हीं दिनों वनस्पतियाँ चाहे फूल हो, फल हो या हो शाक-भाजी उस अमृत-तत्त्व को स्वयं में सोख लेती हैं और यह भी कि वृक्षों के पुराने जीर्ण-शीर्ण पत्ते झड़ जाते हैं तथा उसकी जगह नयी कोपलें आ जाती हैं। नयी कोपलों के आने से पुराने बूढ़े वृक्ष भी युवा पेड़ की तरह दिखने लगते हैं। लता-द्रुम-गुल्म सभी हरे-भूरे रंग की मखमली चादर ओढ़ लेते हैं। धरती में चतुर्दिक हरियाली छा जाती है, गोया, धरती हरे-भूरे रंग से पट गई हो। दिन प्रायः गर्म और रातें ठंढ भरी होती हैं। कुल मिलाकर इन दिनों का मौसम सुखदायी और सुहावना होता है। पिता ने बताया था कि मेरे रसहीन जीवन में तुम हरियाली लेकर आये, नव कोंपल के रूप में मेरी सूखी बगिया में तुम्हारा जन्म किसी उत्सव से कम नहीं था। मित्रों-कुटुंबियों से बधाईयों का तांता था और महीनों मिठाईयाँ बंटी थी। कुछ इन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रखकर तुम्हारा नाम रखा गया था शिशिर।
स्मृतियों के भंवर में ऊभ-चूभ कर रहे शिशिर को वे दिन ठीक से याद हैं, जब वह अक्षर-ज्ञान पाने की उम्र में था। उसके पिता सुरेशकांत रेलवे में तृतीय श्रेणी के कर्मचारी थे और आम मध्यवर्गीय परिवार का प्रतिनिधित्व करते थे। आम भारतीय मध्यवर्गीय परिवार की तरह सुरेशकांत के भी कुछ सपने थे, जिसे वे किसी भी हाल में पूरा करना चाहते थे। वह स्वप्न था शिशिर को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाने की कोशिश और अपनी कोशिश में वे पूरी तरह सफल भी रहे। शिशिर जब मात्र पाँच वर्ष का था और उसने पढ़ाई शुरु की थी तथा स्कूल में दाखिला लिया था तो उसे समय पर विद्यालय पहुँचाना, विद्यालय बंद होने पर ले आना, उसे किसी तरह की कोई कमी नहीं हो- इसका पूरा-पूरा ध्यान रखना सुरेशकांत की दिनचर्या का एक विशेष हिस्सा बन गया था। माता-पिता की एकमात्र संतान होने के कारण वह लाडला भी था। उसकी एक दंतुल मुस्कान से मां-पिता अपना सारा दुःख भूल जाते थे और अपने लाडले के लिए हर आफत की घड़ी में ढाल बन जाते थे। विद्यालय भी प्रायः वह पिता के कंधों पर बैठकर ही जाता था और विद्यालय से आने के बाद माँ की गोदी से चिपक जाता था। एक बार तो ऑफिस में साथ काम करनेवाले रामप्रीत जी ने कहा भी था- सुरेश तुम बच्चे को लाड़-प्यार में बिगाड़ दोगे। रामप्रीत की बात सुनकर सुरेशकांत हँस पड़े थे और केवल इतना ही कहा था- शिशिर अभी छोटा है। समझ आने पर सब ठीक हो जायेगा। रामप्रीत आगे कुछ कहते उन्होंने रोक दिया। किंतु, एक बात तय थी कि शिशिर की पढ़ाई से वे जरा भी समझौता नहीं करते थे। स्वयं छह बजे शाम के बाद पढ़ाने के लिए बैठ जाते और नौ बजे के बाद ही उठते।
दिवस जात नहिं लागहिं बारा यानी दिन बीतते देर नहीं लगती। देखते ही देखते दस वर्ष कैसे बीत गये, पता नहीं चला। शिशिर अब कक्षा दस में पहुँच चुका था और कुछ ही दिनों के बाद उसकी सेकेण्डरी की फाइनल परीक्षा होनेवाली थी। शिशिर ने काफी परिश्रम किया, अच्छे रिजल्ट की पूरी तैयारी की और अंततः पूरे राज्य में उसने प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त किया। सुरेशकांत की इच्छा थी कि शिशिर अच्छे कॉलेज से अभियाँत्रिकी में स्नातक हो और उन्होंने देश के सबसे नामचीन कॉलेज में उसका दाखिला भी दिलवा दिया। इंजीनियंरिंग में शिशिर ने कम्प्यूटर साइंस का चयन किया। उन दिनों पूरे विश्व में कम्प्यूटर साइंस की धूम थी और कम्प्यूटर-विज्ञान शिक्षा का एक ऐसा क्षेत्र था, जो किसी मध्यवर्गीय परिवार के लिए महंगा तो था, पर सपनों के आगे सुरेशकांत को वह सस्ता ही लगा। उन्होंने बैंक से कर्ज लेकर भी अपने उस सपने को पूरा किया। अधिकांश मध्यवर्गीय परिवार के मुखिया की तरह सुरेशकांत ने भी शिशिर की पढ़ाई के लिए अपना सब कुछ न्योच्छावर कर दिया। वे चाहते थे शिशिर अपनी प्रतिभा से विज्ञान के क्षेत्र में नयी-नयी इबारत लिखे, जिस पर वह गर्व कर सकें। इसके लिए उन्होंने अपनी छोटी-छोटी खुशियों की भी आहूति दे दी थी।
कहते हैं, होनहार बिरवान के होत चिकने पात और शिशिर की प्रतिभा ने अपना रंग दिखाना शुरु किया। कम्प्यूटर विज्ञान के हर क्षेत्र में हर समसत्र में वह अव्वल आता रहा। पाठ्य-क्रम के पूरा होते-होते जर्मनी की साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी की सरकारी कम्पनी ने उसकी नियुक्ति एक रिसर्चर के पद पर कर ली और शिशिर सपनों की उड़ान के साथ जर्मनी के फ्रैंकफर्ट शहर में पहुँच गया। रिसर्चर के रूप में में उसने यहाँ भी कड़ी मेहनत की और जल्द ही उसकी गिनती वहाँ के श्रेष्ठ तकनीकी विशेषज्ञों में होने लगी। समय की गति के साथ-साथ धीरे-धीरे उसके सपने भी बड़े होते गये। बड़े होते सपनों की उस उड़ान में यूरो और डॉलर के पंख लग गए जो निरंतर बढ़ते ही गए। अपनों से फासले धीरे-धीरे कम होते गए और यूरो-डॉलर से नजदीकियाँ बढ़ती चली गयीं। इसी बीच उसकी भेंट भारतीय मूल की शैलजा से हुआ, जो उसी सरकारी कम्पनी में कार्यरत थी। भारतीय मूल का होने के कारण भेंट परिचय में और फिर परिचय ने नेह का रूप धारण कर लिया। एक दिन शिशिर ने शैलजा के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखते हुए कहा- शैलजा, मैं तुमसे अत्यंत प्यार करता हूँ और चाहता हूँ हमदोनों एक सूत्र में बंध जायें। शैलजा ने सिर हिलाकर सकारात्मक उत्तर दिया और मौन हो गयी। अंततः दोनों ने परिणय-सूत्र में बंधने का निर्णय कर लिया और शुभ दिन देखकर बंध भी गए। शिशिर ने अपने माता-पिता को सूचित कर दिया कि उन्होंने शैलजा नामक भारतीय मूल की लड़की से शादी कर ली है। कुछ ही दिनों की इस अवधि में पश्चिमी संस्कृति, यूरो और डॉलर की चकाचौंध ने शिशिर को ऐसा अंधा बना दिया कि यूरो, डॉलर और शैलजा के अतिरिक्त उसे दूसरा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। वह भूल गया कि उसके भी अपने देश में किसी के प्रति कुछ कर्त्तव्य हैं और वह किसी का कर्जदार है। समय के साथ उसकी प्राथमिकताएँ बदल गयी थीं और सामाजिक दायित्वों से उसने कन्नी काट ली थी। शैलजा ने उसे कई बार माँ-बाबूजी के बारे में याद दिलाया, पर वह डॉलर के आगे सब कुछ भूल गया था। यहाँ तक कि शैलजा के द्वारा बार-बार किये गये अनुरोध को भी वह ठुकरा देता था। शैलजा विवश हो गयी थी और अनुरोध करना छोड़ दिया था।
शिशिर ने करवट बदली तो अतीत के दूसरे दृश्य का पट स्वतः खुल गया। जर्मनी का फ्रैंकफर्ट शहर और शहर की शोभा ‘मेन नदी’ उसकी आँखों के सामने है। वह मेन नदी के ब्रिज पर शैलजा के साथ है। प्रायः नये जोड़े मेन नदी के इस ब्रिज पर आते हैं, ब्रिज की सुरक्षा-जाली में प्रेम को अटूट बंधन के रूप में बांधने के लिए वे अपने साथ मन्नत की ताली लाते हैं। जाली में हजारों छोटी-बड़ी तालियाँ लटकी हुई हैं। ये तालियाँ उन नये जोड़ों के उस प्रेम का प्रतीक हैं, जो यह विश्वास करते हैं कि इस ताले के अटूट बंधन की तरह उसका परिणय-बंधन भी अटूट रहेगा। प्रेमी-युगल चाबी मेन नदी की धारा में फेंक देते हैं और ‘मेन नदी’ से प्रार्थना करते हैं कि उनका एक-दूसरे के प्रति प्रेम ताउम्र बना रहे। शिशिर और शैलजा ने भी ब्रिज पर लगे ग्रिल में अपना ताला लगाया और चाबी मेन नदी की बीच धारा में इस विश्वास के साथ फेंक दिया कि उनका यह बंधन जन्म-जन्मांतर तक अटूट रहेगा।
शिशिर के सामने खुशी के वे दृश्य एकदम सामने है जब उसने और शैलजा ने जर्मनी की नागरिकता ले ली थी। जर्मनी का फ्रैंकफर्ट शहर सांस्कृतिक और शैक्षिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण तो है ही, जर्मनी की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए भी जाना जाता है। यह यूरोप की प्रसिद्ध व्यापारिक नगरी है। जर्मनी की नागरिकता मिल जाने के बाद वह दो-एक बार स्वदेश आया भी, पर उसने कभी कोशिश नहीं की कि वह अस्वस्थ हो चुके माँ-बाबूजी को साथ ले जाये। एक बार तो माँ ने दबी जुबां में कहा भी था- बेटा अब हम थक चुके हैं, हमें भी सहारे की जरुरत है। शिशिर ने उत्तर में ‘हाँ-हूँ’ करके बात टाल दी थी और जो गया सो गया फिर वापस लौटकर नहीं आया। शिशिर को उस दिन की याद आ रही है, जब उसके गाँव के बचपन के संगाती रमेश ने फोन पर कहा था कि तुम्हारी शादी की बात सुनकर तुम्हारे माँ-बाबूजी उदास, चिंतित और बेचैन हो गए थे। चुप्पी साध ली थी, एक धक्का-सा लगा था उन्हें और माँ तो सदमे से उबर नहीं पायीं। जीवन से ही मुक्ति ले ली थी। पिता रात भर नहीं सोये, कुर्सी पर बैठे रहे। सुबह जब लोगों ने उन्हें देखा तो सहसा किसी को विश्वास नहीं हुआ कि ये वही सुरेशकांत हैं, जो कल तक खुलकर हँस रहे थे। बात-बात में अपने बेटे की प्रशंसा करते अघाते नहीं थे। गांववाले अक्सर उनके मुख से यह कहते सुनते कि शिशिर मेरा ही नहीं पूरे गाँव और गाँव ही क्यों पूरे शहर और देश का गौरव है। उसने देश का मान बढ़ाया है। और, आज ? एक रात में ही उनकी आँखें धँस गयी थीं, चेहरा पीला पड़ गया था और सारे बाल बारह घंटों के भीतर ही सफेद और बेतरतीब हो गए थे। पत्नी की मृत्यु के बाद सुरेशकांत घोर अवसाद में चले गये। अवसाद के कारण कुछ दिनों बाद सुरेशकांत ने भी दुनिया छोड़ दी। पिता की असामयिक मृत्यु की खबर पाकर शिशिर की आँखों से आँसू जरुर ढलक पड़े पर स्वयं को तुरंत सम्हाल लिया। उपभोक्तावादी संस्कृति, डॉलर का आकर्षण और सीमित-संकुचित होती हुई दृष्टि ने उसे मनुष्य से इतर पत्थर दिल बना दिया था। भारतीय परंपरा वह भूल चुका था।
बिस्तर पर करवट दर करवट बदलते शिशिर ने लंबी सांस ली और निमिष मात्र में स्मृतियों का एक पिटारा फिर खुल गया। शिशिर के मन-मस्तिष्क में अब वे क्षण तैरने लगे हैं, जिसे उसने वर्षों पहले शैलजा के साथ जिया था। अपनी सारी जिम्मेदारियों से दूर, बेपरवाह होकर वह अपनी इस छोटी-सी दुनिया में ही पूरी तरह रम गया था। समय के अंतराल में उसके दो बच्चे हुए- बेटी शिखा और बेटा सुयश। दोनों जब विद्यालय जाने योग्य हुए तो फ्रैंकफर्ट के ही एक विद्यालय में उनका नामांकन शिशिर ने करवा दिया। दोनों बच्चों को विद्यालय पहुँचाने कभी शिशिर जाता तो कभी शैलजा जाती थी। किंतु, वापसी में बच्चे विद्यालय के वाहन से घर लौटते क्योंकि जर्मनी के विधान के अनुसार बच्चों को स्कूल से घर तक पहुँचाने की जिम्मेदारी विद्यालय प्रबंधन की होती है। शिखा और सुयश की बाल-सुलभ लीला और पढ़ाई के क्षेत्र में क्लास में सदैव अव्वल आने के कारण शिशिर और शैलजा बहुत खुश थे। हमेशा दोनों की कोशिश रही कि बच्चों के व्यक्तित्व विकास में कोई कमी न रह जाये। कुछ दिनों तक शिशिर को भारत और गाँव-घर के बंधु, मित्र, स्वजन याद रहे। फिर, धीरे-धीरे सब पीछे छूट गया। उसका संसार अब पत्नी और बच्चों तक सिमट गया था।
शिखा और सुयश समय के साथ-साथ बढ़ने लगे। बच्चों की परवरिश और देखते-देखते किस तरह तीस वर्ष बीत गए, पता नहीं चला। पढ़ाई में दोनों ने अपने पिता का इतिहास दुहराया। इंजीनियरिंग की और अपने-अपने पेशे से जुड़ गए। दोनों ने ही प्रेम विवाह किया और यूरोप के अलग-अलग देशों में सेट हो गए। शिखा अपने पति के साथ ऑस्ट्रिया शिफ्ट कर गयी और सुयश पत्नी के साथ नीदरलैंड चला गया। वर्ष में एकाध बार शिखा और सुयश आते और दो-चार दिन रहकर चले जाते। इसी बीच बीमारी के बाद शैलजा ने भी साथ छोड़ दिया। शैलजा के निधन के बाद शिशिर अकेला महसूस करने लगा और एक तरह से टूट गया। उसका निजी जीवन उस ठूँठ वृक्ष की तरह हो गया जिसमें प्राण तो है पर उससे हरियाली गायब हो गयी है। हमेशा हरा-भरा और फूलों-फलों से लदा-फदा रहनेवाला कोई पेड़ कैसे अचानक प्रकृति या आपदा की मार से पलभर में ठूँठ हो जाता है, पत्ते झर जाते हैं और एक-एक करके डालियाँ सूखने लगती हैं। अंततः पेड़ सूख जाता है और हरियाली के सारे विकल्प सिरे से खारिज हो जाते हैं। आज शिशिर की स्थिति भी वैसी ही हो गयी है। विकल्पहीन शिशिर की आँखों में पछतावा है और पछतावे के आँसू हैं। किंतु, उसके मन, मस्तिष्क और हृदय में ग्रामोफोन में बजते रिकार्ड-प्लेयर की सुई के अटक जाने के बाद जैसे गाने का केवल एक ही बोल बार-बार सुनाई पड़ता है, वैसे ही शिशिर के अंतर्मन में एक ही स्वर बार-बार गूँज रहा है- ‘अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत।’
इन गूँजते स्वरों के बीच अस्पताल के बेड पर पड़े-पड़े शिशिर ने एक ठंडी आह भरी और करवट फेरते हुए उसे लगा कि जैसे उसने कुछ ही क्षणों में छह युगों को जी लिया है। दुःख, पीड़ा और अवसाद के उसाँस से उसकी आँखों के कोरों से अनायास प्रायश्चित के दो बूँद छलक पड़े और बेड के एक सिरे की ओर वह लुढ़क गया। 

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