बेटी: दो कविताएँ

संध्या कुमारी

संध्या कुमारी

* बेटी का अस्तित्व *

क्यों होता है ऐसा?
मैं तो चहकती चिड़िया हूँ
अपने बाबुल की बगिया की
लाड़ली हूँ मैं अपने भाई की
सब करते है मुझसे कितना प्यार,
फिर भी क्यों होता है ऐसा
जब तक थी माँ-पापा के घर
कितना पहरा लगाया जाता था मुझ पर,
न थी कोई आजादी, न भर सकती थी मैं उड़ान
क्यों होता है ऐसा
क्या कसूर था मेरा
सिर्फ इतना कि मैं बेटी थी
मेरे बोलने से, मेरी आजादी से,
मेरी उड़ान से
होती थी कम पापा की इज्जत
जब गई ब्याह के मैं ससुराल
वहाँ भी वही पहरा
न था कोई अपना अस्तित्व मेरा
न थी कोई मेरी पहचान
किसी से बोलना, कहीं भी जाना,
मेरे लिए क्यों है अपराध
सिर्फ बेटी होने के कारण
क्यों बना रखा है समाज ने हमें गुलाम,
क्यों लगा दी है पाबंदी इतनी
क्या गुनाह है बेटी होना?
देख विधाता तू देख दुर्दशा मेरी
तूने भेजा लक्ष्मी, दुर्गा,
का रुप बनाकर
तेरे ही बनाए पुतलों ने
बना दिया क्या तेरी लक्ष्मी का हाल,
बचपन से छीन ली आजादी
युवावस्था में भी लगाई लगाम
क्या मेरे जीवन पर थोड़ा भी हक नहीं है मेरा,
बचपन में पापा की नफरत
जवानी में पति की डाँट
बुढापे में बेटे का बुरा व्यवहार
क्या यही रह गई
एक बेटी का अस्तित्व,
क्या यही है एक बेटी की पहचान
क्यों नही मिलता हर बेटी को सम्मान
क्यों होता है ऐसा?


* एक लड़की की व्यथा *

आज मैं
कुछ कहना चाहती हूँ
महसूस करना चाहती हूँ
उस लड़की के
दर्द को, पीड़ा को
बयाँ करना चाहती हूँ
उसकी वेदना को

जब थी वह माँ के गर्भ में
समाज की कुरीति ले लेती है
उसको अपने आगोश में
कोशिश बहुत हुई उसे
नष्ट करवाने की
पर माँ ने की हिम्मत
उसे दुनिया में लाने की
मगर बेटे की चाहत में
माँ ने भी बिसरा दिया उसे
मानो जैसे तक़लीफों ने
जकड़ लिया उसे

माँ करने लगी बेटे और बेटी में अन्तर
लड़की के साथ होने लगा भेद-भाव निरंतर
रोती थी वह बिलखती थी वह
अपनी वेदना को दिल में
ही दबा देती थी वह

देख अपने भाई के किताबों को
उसका भी दिल करने लगा पढ़ने को
खिल उठा कली सा मुख उसका
उसका भी मन करने लगा स्कूल जाने को
देख टेलिविजन और अखबारो में
'मेरी कॉम' और 'कल्पना चावला' को
चाहती थी वह उनके जैसा बनने को
पर न आती विधाता को भी उस पर दया
बना दिया उसे दु:खो से भरी काया

इसी तरह बीत गया उसका बचपन
बढ़ने लगी उसके जीवन की अड़चन
देखते ही देखते हो गई वह चौदह की
किया विचार उसको ब्याह देने का
माता-पिता ने किया पसन्द एक शहज़ादा
जिसकी उमर थी लड़की से दो गुणा ज्यादा
करा दी लड़की की शादी
हो गई उसके जीवन की बर्बादी
माता-पिता ने लिया
लड़की से पल्लू झाड़

चली गई वह अपने
पिया के द्वार
साथ में ले कर गई
सपने हजार
दहेज़ की खातिर
किया जाने लगा
प्रताड़ित उसे
न थी वहाँ किसी को हमदर्दी
इस चौदह साल की बच्ची से
करती रहती वह घर का पूरा काम
न मिला कभी उसे आराम
दहेज़ की खातिर मारा-पीटा
जाने लगा उसको
वह अबला अपनी व्यथा
कहे तो कहे किसको
माता-पिता ने दिया था उसको ज्ञान
रखना अपने पति की पगड़ी का मान
अब तो वही घर तेरा है
मेरा घर तो कुछ पलों का बसेरा है

लड़की की डोली उठती है
पिता के द्वार से और
अर्थी उठती है पिया
के संसार से
न आना कभी पिया
का घर छोड़कर
वरना हम भी चले जायेंगे
तुम से मुँह मोड़कर
यही सब स्मरण करके
खुश हो जाती वह दु:ख
भूल के
पर दिल की पीड़ा तो बनी ही रहती
अपने माता-पिता को रहती वह याद करती
एक दिन दहेज़ के खातिर
कर दी पिया ने हत्या उसकी
मार डाला जला कर उसको
थोड़ा भी न आयी दया किसी को
प्रशासन भी देता है उसका साथ
सत्ता और पैसा हो जिसके हाथ
शासन ने तो चलाईं कई मुहिमें
फिर भी न हुआ सुधार इस कुप्रथा में
कब मिटेगा लड़कियों के
जीवन का अंधेरा
कब होगी लड़कियों
के जीवन में सवेरा
कब सुधरेगा समाज
कब होगा लड़कियों
का विकास

आज मैं

कुछ कहना चाहती हूँ।

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