कविता: सुबोध कुमार शांडिल्य

सुबोध कुमार शांडिल्य

हमारी हिंदी

हमारी हिंदी सबसे न्यारी है
भारतवर्ष की दुलारी है
जन-जन की प्यारी है
यह राष्ट्र की अमृतवाणी है।

हमारी हिंदी हिमालय से
हिन्द महासागर तक
बंगाल से अरब सागर तक
फैलाती उजियारी है।

यह सम्पूर्ण भारतवर्ष को
एकता के सूत्र में पिरोती है
चाहे पूर्वोत्तर हो या द्वीप-खंड
संस्कृति की खुशबू हर जगह बिखेरती है।

देश को तो छोड़ो विदेशों में भी
हमारी हिंदी चहकती है
मॉरिशस फिजी सूरीनाम में
यह खूब दमकती और महकती है।

दुनिया का कोई ऐसा कोना नहीं
जहाँ हिंदी का कोई हीरा-सोना नहीं
सब बड़े शान से लेखनी चला रहे
पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन-सम्पादन
कर अथवा करा रहे।

हमारी हिंदी विचार अभिव्यक्ति
का मात्र साधन नहीं
यह तो प्रेम-तप-त्याग का
मार्ग प्रकाशक भी है।

यह है एक वैज्ञानिक भाषा
इसमें जो जैसा बोलता
वैसा ही लिखता
इसका कहीं कोई जोड़ नहीं
अंग्रेजी में भी इसका कोई तोड़ नहीं।
वैदिक (संस्कृत) से लौकिक (संस्कृत) हुआ

पाली प्राकृत अपभ्रंश
आगे चल कर निखरा
हिंदी का सुन्दर अंश।
अवधी बघेली छत्तीसगढ़ी
पूर्वी हिंदी के हैं बोली

खड़ी कन्नौजी बांगरू बुन्देली ब्रज सहेली
ये पाँचों हैं पश्चिमी हिंदी की मुँहबोली।
राजस्थानी में मारवाड़ी जयपुरी मेवाती
मालवी भी है इसका साथी।

गढ़वाली कुमायूँनी नेपाली
ये सब है हिंदी पहाड़ी
मैथिलि मगही भोजपुरी
बिहारी का डंका विश्व में बज रहा।
सचमुच हिंदी रंग-बिरंगा गुलदस्ता है
इसमें अष्टादश सुगंध की मादकता है
यह विघ्न बाधाओं में भी खड़ी-अड़ी रही है
विश्व को आलोकित करती रही यह फुलझड़ी है।

हम सब को प्राणपण से
हिंदी की सेवा करनी है
कुछ ऐसा करे कि
इसे एक दिन संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषा बननी है!
हमारी हिंदी सरस-भावप्रवण है

सभी विधाओं को व्यंजित करने का दम है
इसके संधान में जीवमात्र का कल्याण है
क्योंकि ‘वसुधैव कुटुम्बकं’ का यह महामंत्र है।

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