समीक्षा: `मेथी की भाजी और लोकतंत्र`

व्यंग्य रचनाओं का अद्वितीय संग्रह है `मेथी की भाजी और लोकतंत्र`

समीक्षक: दीपक गिरकर

पुस्तक: मेथी की भाजी और लोकतंत्र
विधा: व्यंग्य
लेखक: ब्रजेश क़ानूनगो
प्रकाशक: रश्मि प्रकाशन, लखनऊ
मूल्य: ₹100.00 रूपये
पृष्ठ: 100

व्यंग्य संग्रह - `पुन: पधारें`, `सूत्रों के हवाले से`, कविता पुस्तिका - `धूल और धुएँ के परदे में, `चिड़िया का सितार`, कविता संग्रह - `इस गणराज्य में`, `कोहरे में सुबह`, बाल कथाओं की पुस्तक `फूल शुभकामनाओं के`, बालगीतों की पुस्तिका `चाँद की सेहत`, लघु कहानियों का संग्रह `रिंगटोन` और अब तीसरा व्यंग्य संग्रह `मेथी की भाजी और लोकतंत्र` जैसी पठनीय पुस्तकें देकर ब्रजेशजी ने हिन्दी जगत को सुगमता से अपनी ओर लुभाया हैं। वर्तमान समाज की उपभोक्तावादी संस्कृति में झूठ, फरेब, छल, दगाबाज़ी, दोमुँहापन, रिश्वत, दलाली, भ्रष्टाचार इत्यादि अनैतिक आचरणों को सार्वजनिक रूप से स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है, व्यंग्यकार ने इस संग्रह की रचनाओं में इन अनैतिक मानदंडों पर तीखे प्रहार किए हैं।

लेखक: ब्रजेश क़ानूनगो
शीर्षक रचना `मेथी की भाजी और लोकतंत्र` सोशल मीडिया और राजनीतिक पार्टियों पर गहरा कटाक्ष हैं। मेथी आलोचना और विरोध की तरह कड़वी होती हैं। मेथी है, तो लोकतंत्र भी हैं। व्यंग्य `गणेशजी पहुँचे कर्ज़ा लेने` एक शिक्षित बेरोज़गार की व्यथा हैं। एक शिक्षित बेरोज़गार को बैंक से धंधे के लिए कर्ज़ा लेने में कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। शिक्षित बेरोज़गारों और कर्ज़ा देने वाली वित्तीय संस्थाओं की कार्यप्रणाली एवं कर्मचारियों के आचरण के प्रति ब्रजेशजी चिंतित दिखते हैं। व्यंग्य रचना ` सफ़र में समाधि` कर्मचारियों के आचरण पर तीव्र प्रहार हैं।

 `ऐनक के बहाने` व्यंग्य रचना में लेखक लिखते है जहाँ ऐनक से हमारी भौतिक दृष्टि ठीक होती है, वही `चिंतन के चश्मे` से वैचारिक दृष्टि साफ और प्रखर हो जाती हैं। इस रचना के माध्यम से व्यंग्यकार ने चिंतन के चश्मे की धूल साफ़ की हैं। `रात के आतंकवादी` में ब्रजेशजी लिखते है आतंकवाद की कोई प्रजाति नहीं होती। आतंकवाद सिर्फ़ आतंकवाद होता हैं। वह जहरीले कीट-पतंगों का हो या भटके हुए इंसानों का, उसके खिलाफ हमारी लड़ाई निरंतर जारी रहनी चाहिए। यह व्यंग आतंकवाद को समाप्त करने का संदेश देता हैं। `सब सही है` रचना में ब्रजेश जी ने लिखा है जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण रखना सदियों से हमारा दर्शन रहा है। किसी ने कहा भी है, `जो हो रहा है, वह सही हो रहा है और जो सही नहीं हो रहा, समझो वह और ज़्यादा सही हो रहा हैं।` इस संग्रह में कुल 51 व्यंग्य रचनाएँ हैं।

समीक्षक: दीपक गिरकर
व्यंग्यकार ब्रजेश क़ानूनगोजी की लेखन शैली सीधी-सपाट और शालीन हैं, लेकिन उनके व्यंग्यों की मारक क्षमता अधिक हैं। ब्रजेश जी इस व्यंग्य संग्रह की रचनाओं से पाठकों से रूबरू होते हुए उन्हें अपने साथ लेकर चलते हैं। यही उनकी सफलता है जो इस संग्रह को पठनीय और संग्रहणीय बनाती हैं। इस संग्रह की प्रत्येक रचना हमें सोचने पर विवश करती हैं। सरलता और सहज बुनावट ब्रजेशजी के लेखन की विशेषता हैं। संग्रह की रचनाओं में शब्दों की शक्ति और कटाक्ष पाठकों के दिल और दिमाग़ को झंझोड़कर रख देते हैं। ब्रजेशजी की व्यंग्य रचनाओं में उनकी समाजवादी और जनवादी विचारधारा, प्रगतिशील जीवन मूल्य एवं मनुष्य के प्रति प्रतिबद्धता की वैज्ञानिक दृष्टि अभिव्यक्त होती हैं। यह व्यंग्य संग्रह भारतीय व्यंग्य रचनाओं के परिदृश्य में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल हुआ हैं।

नि:संदेह ब्रजेशजी की लेखन शैली और अनैतिक मानदंडों पर उनकी तिरछी नज़र देश के अग्रणी व्यंग्य लेखकों की प्रथम पंक्ति में उन्हें स्थापित करती है।

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