गीत: त्रिलोचन नाथ तिवारी

त्रिलोचन नाथ तिवारी

तो गीत लिखूँ मैं...


अनगढ़ शब्द, व्याकरण दूषित,
कैसे कुछ, मनमीत लिखूँ मैं?
मन के भाव अभी कच्चे हैं,
पक जायें, तो गीत लिखूँ मैं।।0।।

पुनगी-पुनगी पारिजात की
अनगिन फूलों से लद आयी।
अरहर हुई जवान, सुहागन―
सरसों पीत वसन धर आयी।।

हल्दी लगी चिट्ठियाँ सबको,
बाँट गयी यह ऋतु अलबेली,
सुनता हूँ, कल रात, पवन के
साथ, गंध की हुई सगायी।।

मधुमय अधर, सरस चितवन,
एक मादक छुवन, मदालस सिहरन,
मौसम के प्रतीक मधु पी कर,
छक जायें, तो गीत लिखूँ मैं।।1।।

टुकड़े-टुकड़े निगल लिये दिन,
घूँट-घूँट पी लीं संध्यायें।
चार परत में मोड़ सुबह को
चलो, धुली रुमाल बनायें।।

रातों की पसरी छाती पर,
कुछ सुर की लहरियाँ उकेरें,
धड़कन से सरगम ले कर के,
साँसों का संतूर बजायें।।

झुंड-झुंड तितलियों सरीखे,
कोमल-कोमल और बहुरंगी,
स्वप्न संजोती आंखें मेरी
थक जायें, तो गीत लिखूँ मैं।।2।।

हुए बहुत दिन चुपके दुबकी
किसी हृदय की पीर न जागी।
तरस गया है अश्रु बहाने को
यह मन पीड़ा-अनुरागी।।

हुए बहुत दिन किसी चुभे
कांटे की करकन को सहलाये,
सोच रही है घाव नया
करने वाली पुरवा हतभागी।।

बिना दर्द के तार छिड़े
कैसे संगीत उगे प्राणों में?
इस पुरवाई से गुम चोट
कसक जायें, तो गीत लिखूँ मैं।।3।।

नवल पुष्प, नव-किसलय दल से
सजी प्रकृति की नव-तरुणाई।
लाज भरे रतजगे की कथा
कहती प्राची की अरुणाई।।

क्यों अगस्त-पाटल के फूले
अधर तनिक रक्तिम लगते हैं?
संभवतः चुपके से चुम्बन
चुरा ले गया अलि रसपायी।।

सव्याहृतिका गायत्री का
जाप कर रहे गाधिसुवन जो,
नूपुर-ध्वनि से उनके पांव
बहक जायें, तो गीत लिखूँ मैं।।4।।

धारदार गुप्ती शब्दों में,
और विचारों में तलवारें।
कानों के भीतर घुस कर के
श्मशान के प्रेत पुकारें।।

हर गमले में नागफनी है,
खेत-खेत में कंटक-पत्रा,
अर्थ, अनर्थों की वेदी पर
बैठे मारण-मंत्र उचारें।।

विष द्विजिह्व की फुफकारों के,
वक्रदन्त के दंश प्रकट हैं,
घाव घृणा के दिये हुये जब
ढँक जायें, तो गीत लिखूँ मैं।।5।।

गीत-मुखर होने को प्रतिपल,
लहर-लहर पनघट अकुलाया।
आंगन-दालानों में घूंघट
के पीछे चंदा उग आया।।

विहँस रही है दिशा-दिशा,
रंगीन क्षितिज के छोर हुये हैं,
धरती से अम्बर तक जैसे,
कोई मदन-महोत्सव छाया।।

किन्तु हमारे "गाँव" न जाने
कैसा मरण-शोक छाया है?
इस वसंत कुछ मन के छंद
महक जायें, तो गीत लिखूँ मैं।।6।।


विशेष: यह उल्लिखित "गाँव", आसेतु हिमाचल प्रसरित वह छोटा सा गाँव है जिसे भारतवर्ष कहते हैं।
सव्याहृतिका - विद्वानों के मतानुसार व्याहृतियाँ सात है—भूः, भुवः, स्वः, महः जनः, तपः और सत्यम् । इनमें प्रारंभिक तीन, महाव्याहृति कही गई है और ये सवितृ और पृश्नि की कन्या मानी जाती हैं ।
तत् सवितुर्वरेण्यं।
भर्गोदेवस्य धीमहि।
धियो यो न: प्रचोदयात् ।।
(ऋग्वेद ४,६२,१०)
यह मंत्र गायत्री मंत्र है जिसमें प्रणव ॐ तथा प्रथम तीन व्याहृतियाँ भूः भुवः स्वः जोड़ कर सप्रणवा सव्याहृति गायत्री महामंत्र बनता है।
ॐ भूर्भुव स्वः।
तत् सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

करकन - चुभे हुये कांटे का करकना।
अगस्त-पाटल - अगस्त का पुष्प
अलि - भ्रमर, भौंरा
गाधिसुवन - विश्वामित्र
कंटक-पत्रा - भड़भाड़ - जिसके पत्तों पर भी कांटे होते हैं।

3 comments :

  1. बहुत सुंदर, भाषाज्ञान और प्रयोग अद्भुत

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  2. अभी अधर में ही लटका हूँ

    कैसे परमानेंट लिखूँ मैं

    शब्द शब्द के भाव ग्रहण ....

    कर लूं तो कोई कमेन्ट लिखूँ मैं ।।

    😍😍😍

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  3. बहुत सुन्दर, बधाई

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