कविताएँ: अरुण खेवरिया

अरुण खेवरिया

सम्बन्धों के गुलाब

मैं जानता हूँ
उस ओर घाटी में
ज़िंदगी की
आड़ी, तिरछी
पथरीली, सँकरी
उतार चढ़ावों वाली
पेचीदा,
पहाड़ी पगडंडियाँ हैं
और
अंतर को चीरते
दुखों के बर्फीले तूफान।

मैं जानता हूँ
उस ओर उदास आसमान को
ढकते हैं कुहासे के बादल
और
फूलों की ताजगी भी
खो जाती है कहीं
धुंध की गहराइओं में।

पत्तिओ की सरसराहट
ओ'
पंछियों के स्वरों से
फूटता दर्द
बेरौनक़ कर जाता है
सांझ को।

मैं जानता हूँ
वहाँ कोयल की पुकार भी
बदल जाती है
चीखों में
और
मुरझाए चेहरों पर
छाया रहता है
पतझड़ हरदम।

मैं जानता हूँ
वहाँ ज़मीन और आसमान के बीच
कोई क्षितिज नहीं

प्रतिध्वनित होती रहती है
नीरवता
वहाँ बार-बार।

फिर भी मुझे जाना है
उस ओर
घाटी में!

क्योंकि
मेरे और तुम्हारे बीच
रिश्तों का पुल
अब ढहने ही वाला है
और मुरझाने लगे हैं
हमारे सम्बन्धों के गुलाब।

खुशियों के सपने

खुशियों के सपने
कितने आकर्षक!
रंगीन!
लुभावने!
छाए रहते हैं
हमारे सामने
अनगिनत रूपों में।
बुनते हैं हम
कल्पना की सलाइयों से
सुख के स्वप्न
सतत,
अनवरत!
जबकि
हम जानते हैं कि
हमारे आँसुओं का खारापन
सुख की झील की
मिठास नहीं बन सकता
और न ही
दर्द की आहें
खुशियों की रागिनी।

फिर भी
जीवन के
नए संदर्भों की तलाश में
भागता है
पागल मन
पीड़ा की मरुभूमि में
खुशियों की
मृगमरीचिका के पीछे!

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