मानव एवं शान्ति

मनोज कुमार सिंह

मनोज कुमार सिंह

भक्त हो या भगवान, छात्र हो या शिक्षक, व्यक्ति हो या समाज शान्ति के लिए सभी अभिलाषित हैं। भक्त इस संसार के माया जाल, बन्धनों जन्म-मरण दुःख, कष्टों से निजात पाना चाहता है। वहीं भगवान इस सृष्टि को शान्ति पूर्वक सुचारू रूप से चलाना चाहते हैं। छात्र शान्तिपूर्वक ज्ञान अर्जन करना चाहते हैं। तो शिक्षक, शान्ति पूर्वक ज्ञान देना चाहते हैं। व्यक्ति अपने जीवन को शान्ति पूर्वक व्यतीत करना चाहता है। वहीं समाज या राष्ट्र शान्ति पूर्वक विकास करना चाहता है। यहाँ प्रश्न उठता है कि, जब शान्ति सभी चाहते है तो यह अशान्ति कैसे, कहाँ से, और कब आ गयी, इस पर विचार करने की जरूरत है।

वास्तव में शान्ति व अशान्ति कोई नई बात नहीं यह तो मानव के विकास के साथ ही साथ जुड़ा हुआ है। जब भी मानव ने विकास के पथ पर आगे बढ़ने के लिए सोचा उसके मन में लालच आया या इस कौतूहल भरे संसार को जानने की इच्छा हुई वहीं से अशान्ति प्रारम्भ हो जाती है।

अशान्ति, भौतिक व आध्यात्मिक दो रूपों में माना जा सकता है। कौतूहल भरे संसार को जानने की इच्छा इसको किसने बनाया? कब बनाया? क्यों बनाया? मानव को किसने जन्म दिया? मानव की मृत्यु का राज क्या है? वह मृत्यु के उपरान्त कहाँ जाता है? ऐसे प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए तथा मानव की आम सामाजिक, मानसिक, आर्थिक आदि समस्याएँ यथा- घर-घर में लड़ाई-झगड़ा, कालाबाजारी, अनिद्रा, रक्तपात, हड़ताल, हत्या इत्यादि जैसे प्रश्न जिसका उत्तर जानने के लिए जो धर्म का मार्ग अपनाता है वह आध्यात्मिक रूप से अशान्त रहता है और जो विज्ञान का सहारा लेता है वह भौतिक रूप से अशान्त रहता है। दूसरी ओर यह अशान्ति ही मानव को कार्य करने तथा विकास के लिए प्रेरणा देती है। साथ ही साथ यह प्रेरणा जब नैतिकता पार कर जाती है तो अनेक प्रकार से हिंसात्मक व्यवहार, अमानवीय व्यवहार तथा समस्याएँ समाज के समक्ष चुनौतियाँ देने लगती है। जब व्यक्ति इन चुनौतियों का सामना सहज रूप से करने में अपने आपको सक्षम नहीं पाता तो वह परेशान होकर इधर-उधर भटकने लगता है और धीरे-धीरे चिड़चिड़ापन होने से तनाव में रहने लगता है। जिससे वह संतुलन खोता चला जाता है। जब इस संतुलन को वह समायोजित नहीं कर पाता तो क्रोध तथा अमानवीय व्यवहार बढ़ने लगता है। जिससे अपने स्वयं की शान्ति भंग होती है तथा दूसरों की भी।

शान्ति का मार्ग का चयन करना व्यक्ति के विचार पर निर्भर करता है। उसका विचार यूँ कहें तो दार्शनिक विचार कैसा है। जिसके उपरान्त वह मार्ग का चयन करता है। जो आध्यात्म में विश्वास करता है, वह भक्ति मार्ग तथा जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखता है वह विज्ञान का सहारा लेगा। चूँकि मानव जन्म से ही अपने परिवेश को समझता है वह जिस प्रकार से समाज को समझने का दृष्टिकोण अपनाता है उसका उसी प्रकार दार्शनिक विचार बनतें है। जैसा कि शोपेनहावर ने कहा भी है कि, “प्रत्येक मानव जन्म से ही दार्शनिक होता है।“ तथा दर्शन के बारे में जैसा कि प्लेटो महोदय बताया है कि, "दर्शन आश्चर्य, जिज्ञासा और कौतूहल का प्रतिफल है।“ उसी प्रकार भक्त हो या भगवान, छात्र हो या शिक्षक, व्यक्ति हो या समाज सभी इसी पथ का अनुसरण करते हैं और शान्तिपूर्वक अपना लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं। भौतिक व आध्यात्मिक रूप से जन्मे अशान्ति को शान्ति प्रदान करने हेतु मानव निरन्तर कार्यशील रहता है। यह बहुत जटिल प्रश्न है कि, शान्ति के लिए क्या किया जाए? जैसा कि एक पेड़ की एक डाली में सभी पत्ते एक से नहीं होते। उसी प्रकार सभी व्यक्ति एक से होते हुये भी एक नहीं उनमें व्यक्तिगत विभिन्नता है। इसी प्रकार जो मार्ग एक व्यक्ति को अच्छी लगती है, जरूरी नहीं कि दूसरे को भी अच्छी लगे। इस लिए मानव अपने विचारों व स्वभाव की दृष्टि से शान्ति प्राप्त करना चाहता है।

यहाँ व्यक्तियों को शान्ति की तलाश मार्ग को तीन रूपों में देखा जा सकता है। पहला कि ईश्वर में विश्वास करने वालों को आध्यात्मिक रूप से, दूसरा विज्ञान में विश्वास करने वालों को वैज्ञानिक रूप से व तीसरा जो इन दोनों में विश्वास करते हैं, उनको वैज्ञानिक व धार्मिक रूप से। आधुनिक समय में कोई भी व्यक्ति पूर्ण रूप से धार्मिक/आध्यात्मिक या वैज्ञानिक शिक्षा का उपासक नहीं देखा जा सकता है। आज व्यक्ति इन दोनों का मिला-जुला रूप स्वीकार करता है। जब व्यक्ति भौतिकता से ऊब जाता है तो शान्ति के लिए ‘गंगा’ नदी पर बैठता है, खेल खेलता है, चलचित्र देखता है तथा तरह-तरह के उपाय करता है। लेकिन जब शान्ति नहीं मिलती है तो आध्यात्म या धर्म का सहारा लेता है, ईश्वर की पूजा करता है और कहता है- हे! ईश्वर हमें शान्ति दें। वस्तु स्थिति शान्ति कहीं ढ़ूँढ़ने से नहीं मिलती, वास्तविक शान्ति तो मानव के मन से संचालित होती है। जैसा कि कबीरदास जी ने कहा है कि ”कस्तूरी कुण्डल बसे मृग ढ़ूढ़े बन माहि ऐसे घटि -घटि राम हैं दुनियाँ देखे नाहिं।“ कह कथन आज भी प्रासंगिक है। मानव शान्ति की तलाश में इधर-उधर भटकता है। वास्तविक शान्ति तो मन में है। वह मन को जिस प्रकार संचालित करता है। वैसे उसी प्रकार उसे शान्ति व अशन्ति की अनुभूति होती है।

व्यक्ति अपने समाज, राष्ट्र की सुरक्षा के लिए नये-नये अविष्कार करता है, ताकि बाहरी आक्रमण से बचा जा सके जिसके लिए विज्ञान की शक्ति का सहारा लेता है। समाज या राष्ट्र का आपस में टकराव न हो इसके लिए शान्ति सम्मेलन अयोजित करता है। लेकिन असल में शान्ति कहाँ मिलती है? मृत्यु के उपरान्त भी लोग कहतें हैं, प्रभु इस आत्मा को शान्ति देना। दरशल शान्ति मनुष्य के भीतर है। बाहर से शान्ति आरोपित कोई वस्तु नहीं है जिसे प्राप्त किया जा सके। बल्कि हमें अपने मन के भीतर वास करने वाली शान्ति को स्थायी रूप प्रदान करने की है। यह शान्ति हमें तभी मिल पायेगी जब हम भय मुक्त हो। अनेक प्रकार की समस्याओं से भय मुक्त होकर शान्ति प्राप्त कर सकतें है। इस संसार की अजीब विडम्बनां है। ज्यों -ज्यों मानव ने शान्ति के लिए कदम बढ़ाया वह उतना ही अशान्ति के दलदल में फसता चला गया। यों कहें कि ज्यों-ज्यों दवा की रोग बढ़ता गया।

वस्तुतः व्यक्ति को अपने स्वभाव के हिसाब से जीना चाहिए जो उसकी इच्छा, कर्म और विचारों की त्रिवेणी से मेल खाये। परन्तु यह ध्यान रहे कि यह कार्य नैतिकता पर आधारित हो। जरूरी नहीं जो मार्ग हम अपनाये वह दूसरा भी अपनाएँ, हम अपनी विचारों को दूसरे के ऊपर न थोपें। हम अपने अनुसार कार्य करें  तथा दूसरे को उसके अनुसार कार्य करने में बाधा न डालें। यह विचार किसी भी क्षेत्र में देखा जा सकता है। विकास आवश्यक है लेकिन यह कहीं विनाश का कारण न बन जाये। नित नये-नये अविष्कार, विकास हेतु आवश्यक है, लेकिन यह गलत तरीके से उपयोग न हो पाये। चूँकि मानव इस संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, उसे प्रत्येक कदम सोच समझ कर उठाना चाहिये। कहीं हमारे एक गलत कदम से क्षति न हो जाये, चाहे वह क्षति भौतिक हो या आध्यात्मिक। सबको संजोकर रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। तोड़ना आसान है जोड़ना कठिन, इस लिए व्यक्ति को कठिनाइयों का सामना करना चाहिए ताकि हम समरसता पूर्वक जुड़ सकें। हमें सुई बनना है न कि तलवार। अतः हम सुई बन कर समाज, राष्ट्र व विश्व को एक माला में गूंथने का प्रयास करें। फैसला आप के हाथ में है तलवार बनना है कि सुई।

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