कविता: सपने और सपने में फ़र्क

निर्मल गुप्त

निर्मल गुप्त

मेरी नींद के भीतर
तमाम चिड़ियों को चोटिल करने के बाद
एक थका हुआ बच्चा
गुलेल को सीने पर टिका
चैन की नींद सोता हौले से मुस्कराता है
उसके सपने में नुकीले पत्थर ही पत्थर हैं

बच्चे ने इतनी कम उम्र में
सीख लिया है नृशंसता का व्याकरण
मैं परिंदों के कंधे पर
मजबूत परों के उग आने के
मासूम  से सपने देखता
बच्चे के हमउम्र बन जाने की बाट जोहता हूँ।

मेरे सपने नींद के मोहताज़ हैं
बच्चे को मुस्कराने के लिए
किसी वजह की जरूरत नहीं
वह जागते सोते
सपनों को अपनी जिंदगी से
जल्द से ख़ारिज करते जाने की उत्कंठा से भरा है।

मेरे भीतर एक अजब खालीपन है
घायल चिड़ियों की निशब्द बेबसी है
बच्चे के पास जीने लायक दिनों को जमावड़ा है
उसके लिए आखेट का आर्तनाद ही
दरअसल उसका चहचहाना है

मेरी नींद के भीतर
नाज़ुक यादों का अनंत सिलसिला है
बच्चे की नाक के ठीक नीचे
हिटलर वाली तितली पंख फडफडा रही है
वह दबे पाँव  मेरे वजूद का
चप्पा चप्पा घेर लेने को आतुर है.

बच्चा देखते ही देखते
बचपन  से छिटक कर
कितना बड़ा हो गया है।

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