जाहिल सुल्तानपुरी की कविताओं में सामाजिक-चेतना

अरुण कुमार निषाद

अरुण कुमार निषाद

साहित्यकार भी समाज का ही अंग होता है। वह समाज में जो देखता-सुनता है उसे ही अपनी रचनाओं में स्थान देता है। समाज में व्याप्त बुराईयों के खिलाफ वह जनता की आवाज बनता है। वह समाज के शोषितों और वंचितों के साथ सदैव खड़ा रहता है। ऐसे ही कवि हैं जाहिल सुल्तानपुरी।

जाहिल सुल्तानपुरी का असली नाम कदीर अहमद है। आपका जन्म 7 जनवरी 1949 ई. को नन्दरौली, बीकापुर, फ़ैजाबाद में हुआ। आपके पिता स्वर्गीय खुर्शीद अहमद सुल्तानपुर में पुलिस विभाग में थे। आपकी शिक्षा-दीक्षा सुल्तानपुर में ही हुई और आप यहीं रोडवेज में लिपिक हो गए।

प्रकाशित पुस्तकें- 
1.‘धरती कै घाव’ (अवधी काव्य-संग्रह)-2007
2.‘लव-ए-साहिल’ साहिल सुल्तानपुरी के उर्दू काव्य-संग्रह का संकलन व प्रकाशन-2011
3.‘दोपहर का फूल’ ताबिश सुल्तानपुरी के उर्दू काव्य संग्रह के हिन्दी संस्करण का संकलन व प्रकाशन-2015
4.‘ढाई आखर’ (अवधि काव्य-संग्रह)-2017

प्रकाशनाधीन पुस्तकें-
1.‘तंज़ के नश्तर’ (काव्य-संग्रह) उर्दू हास्य व्यंग्य।
2.‘बकमल खुद’ (काव्य-संग्रह) उर्दू हास्य व्यंग्य।
3.‘निशानी अंगूठा’ (काव्य संग्रह) हिन्दी हास्य व्यंग्य।

शीघ्र प्रकाश्य पुस्तकें-       
1.‘साझा संस्कृति के पुरोधा कवि (आलोचना)
2.‘और फिर यह क्या हुआ (उर्दू काव्य संग्रह )

सम्पादन-‘युग तेवर’ (त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका) के सम्पादक मण्डल से सम्बद्ध।

संस्था से सम्बद्धता-लोक सरोकार समिति सुल्तानपुर, जिला सुरक्षा संगठन सुल्तानपुर, बज्मे अदब सहित अनेक साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से सम्बद्ध।

सम्मान-
1.‘जायसी सम्मान’ अवधी अकादमी द्वारा 1990। (2) आजाद सेवा समिति सुल्तानपुर (उ.प्र.) द्वारा साहित्यिक योगदान सम्मान-2002। (3) भारत भारती संस्था द्वारा उत्कृष्ट शायरी के लिए ‘लोकरत्न’ सम्मान -2009। (4) भारतीय अवधी संस्थान तथा अयोध्या शोध संस्थान द्वारा वर्ष 2009 में ‘तुलसी स्मृति अवधी सम्मान’। 卌 मौलाना अबुल कलाम आज़ाद एजूकेशनल इंस्टीट्यूट परऊपुर, सुल्तानपुर द्वारा अदबी खिदमत के लिए ‘मौलाना आजाद’ सम्मान-2012 सहित लगभग 50 सम्मान।

आज व्यक्ति एक-दूसरे को बेवकूफ बनाकर अपना काम खूब निकाल रहा है। जाहिल सुल्तानपुरी यह सब देखकर मन-ही-मन बहुत दुखी हैं। वह कहते हैं कि- कदम-कदम पर व्यक्ति एक-दूसरे को धोखा दे रहा है। यह दुनिया कितनी बदल गयी है।

धोखाधड़ी है मोड़-मोड़ पै, का से का अब दुनिया होइगै
फूट-फूट के अँखियाँ रोवैं, बनजर मनुवा नदिया होइगै। [1]

रोडछाप नेताओं का जितना बढिया चित्रण जाहिल सुल्तानपुरी ने किया है। वह अपने आप में बेजोड़ है। वे कहते हैं- आज के समय में जो मारपीट कर ले गाली-गालौज कर ले वही नेता हो सकता है।

कट्टा-छूरी रोज चलावैं, घूमि-घुमि सबका गरियावैं
देखौ यहू समय कै माया, वहू देस कै नेता होइगै। [2]

पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के पीछे भगाते नवयुवक-नवयुवतियों पर व्यंग्य कसते हुए वे लिखते हैं कि- हमारे युवाओं पर आज फैशन का नशा ऐसा चढ़ा है कि उन्हें यह भी नहीं मालूम की हमारी सभ्यता और संस्कृति के अनुकूल कौन सा पहनावा सही है कौन सा गलत।

पच्छूँ से जब चली हवाएँ, बेटवा-बिटिया सब बल खाएँ
पहिरावा कै बात न पूछै, नवा जमाना नंगा।

जनता को बेवकूफ बनाकर ठगने वाले ज्योतिषियों के विषय में उन्होंने कहा है कि एक पण्डित जी ने मुझे बताया हैं कि इस बार समय अच्छा है। अगर चुनाव लदे तो जीत जाओगे, इसलिए अबकी बार मैं भी अपना भाग्य आजमाने चुनाव में कूद गया-

यहि बदे अबकी एलक्सन मा ठाढ़ हमहूँ अही
‘इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है। [3] 

आजादी के ऊपर व्यंग्य करते हुए जाहिल लिखते हैं की क्या यह वही आजादी है जो चंद लोगों को मिली है? देश की आधी से अधिक जनता भूखी और नंगी है ? वह किस मुख से आजादी का जश्न मनायें? वे पुन: कहते अहि कि- घी की दीपक जलाओ छब्बीस जनवरी है, भले ही पेट न भरे।

पंचौ खुसी मनाओ छब्बीस जनवरी है
सब जुट बटुर के आओ छब्बीस जनवरी है।
चाहे उधार लाओ छब्बीस जनवरी है
घिउ कै दिया जराओ छब्बीस जनवरी है। [4]

धन के बल के आगे लोग गरीबों को कीड़ा –मकोड़ा समझते हैं। जाहिल सुल्तानपुरी कहते हैं कि- अगर आप दबंग कसम के हैं तो किसी को भी कहीं भी मारपीट सकते हैं। आज समाज में यह दिख भी रहा है।

हौ मसीहा तौ जेतना जिउ चाहै
बेगुनाहन के कत्ले आम करा। [5]

जान-पहचान के कारण आज पुरस्कार पा जाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। आज के समय में अधिकांश: पुरस्कार जी हुजूरी और मुंहदेखी पर मिलता है।

डोनेसन से मिले पद पै बधाई है तुहैं लेकिन
ई जुर्माना अदा करना भवा इनआम से पहिले। [6]

गाँव की चकबन्दी में लेखपाल, कानूनगो और ग्राम प्रधान की मिली-भगत से गरीबों की जमीन को हड़प लिया जा रहा है।

भई है जब से चकबन्दी सभन कै सीर बदली है
कि जउनी वर लखौ जागीर की जागीर बदली है। [7] 

जनता जब सरकार से तंग आ जाती है तो वह राजा को रंक भी बना देती है। जाहिल सुल्तानपुरी कहते है कि- हे कुर्सी के मठाधीशों अगर तुम यह समझते हो कि-यह राजनीति और यह कुर्सी हमारी है । हमारे बाप की बपौती है, तो यह तुम्हारी बहुत बड़ी भूल है। जनता जब भी शासन प्रशासन से परेशान हुई, उसने सरकार का तख्ता पलट किया है।

जबै जनता मा हाहाकार मचिगा रामधे, तब्बै
तखत राजा कै पलटा, राज कै तसबीर बदली है। [8] 

सरकार की अक्षमता पर व्यंग्य करते हुए जाहिल सुल्तानपुरी लिखते हैं। जाहिल साहब लिखते हैं कि- आज लचर कानून व्यवस्था के कारण लोगों में कानून का डर लगभग समाप्त हो गया है। आज अनेक प्रकार की अपराधिक घटनाएँ दिनोंदिन बढ़ रही है।

अइसन भयमुक्त होइ गवा समाज
जुर्म कानून का डेरात नहीं। [9]

जनता समाज के चोर=उचक्कों से बहुत परेशान है। उस पर जाहिल सुल्तानपुरी लिखते हैं कि- इन तस्कर और जमाखोरों का गला तो भरी बाजार में दबा देना चाहिए। चोरों का सिर पकड़ कर उन्हें नहर में डूबा देता चाहिए। इन धनपतियों को भी सरकार को सजा देनी चाहिए जो अनेकों विदेशी बैंकों में रुपया (काला धन) जमा किये हैं।

तसकर, जमाघोर कै घेघा दाबा भरी बजरिया मा
कर चोरन कै अइंठ के गटई बोरिन दिया नहरिया मा
काला धन रोका तेजी से सब से बड़ी नगरिया मा
जरति अहै सदियन से जनता गरम गरम दुपरिया मा। [10]   

मुँह में राम बगल में छुरी वालों पर व्यंग्य करते हुए जाहिल सुल्तानपुरी लिखते हैं कि- उन लोगों से बच कर रहना चाहिए जो आपके मुँह पर कुछ और तथा पीठ पीछे कुछ और बोलते हैं। जो साधु के भेष में असाधु हैं।

सान्ति कै पढ़ावैं पाठ सभा बीच परसइझे
अउर चोरी-चोरी बिखधर रहे पाल हैं
साँप आसतीनन के काटे न लहर देत
साँपहूँ के बाप बिखधर बिकराल हैं
बाहर से कुछ, कुछ अउर लागैं भीतर से
बगुला भगत की खुद बने मिसाल हैं
मानौ कालनेमि साधूनुमा सइतान हुवै
अउर मनई के बदे कालहू के काल हैं। [11]                 

जाहिल साहब लिखते हैं कि- आज सारा समाज भगवान के भरोसे चल रहा है। दफ्तर के बाबू काम नहीं करना चाहते, बिना समाज में उठे-बैठे व्यक्ति अपने आप को स्वयं ही बुद्धिमान घोषित कर दे रहा है। आज बिना जज के न्याय हो रहा है, बिना स्कूल के ज्ञान बंट रहा है।

राम भरोसे है चलत सगर राज औ काज
दफतर बिन बाबू चलै, मनई बिन समाज
मनई बिन समाज आज पावत है नालिज
बिना जज्ज इजलास चलै, बिन टीचर कालिज
कह जाहिल कबिराज चलत न मोसे तोसे
सगरौ राज औ काज चलत है राम भरोसे। [12] 

जाहिल की सहानुभूति उन मजदूरों और किसानों के प्रति है जो दिन रात एक करके इन अमीरों को फलने-फूलने दे रहे हैं। जो इनके कल-कारखानों में रात-दिन जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं और मजदूरी के नाम पर पेट भरने भर को भी नहीं पा रहे होते हैं।

देश को स्वतंत्र हुए सत्तर वर्ष हो गए परन्तु गरीब आज भी गरीब बना हुआ है और अमीर दिनों-दिन अमीर होता जा रहा है। कागजों में भले ही सब बराबर का डंका बजता हो, पर जमीनी हकीकत कुछ और ही है। आज भी बहुत सारे लोगों की जेबों में फूटी कौड़ी भी नहीं होती। अगर हम सच में आजाद हैं तो सबको रोटी, कपड़ा, मकान क्यों नहीं उपलब्ध हो पा रहा है।

देस का आजादी मिले, बीत गा सत्तर बर्स
तब्बौ पै खाली अहै, हमरे सबकै पर्स
हमरे सबकै पर्स रामधे तबौ है खाली
माँगी हाथ पसार घरै-घर बना सवाली
कह जाहिल कबिराय कहाँ ले करजा लादी
बीतिगा सत्तर बर्स देस का मिले आजादी। [13]

पब कल्चर का वर्णन करते हुए जाहिल लिखते हैं कि- आज दिनों-दिन युवक-युवतियों में पब (बियर बार) की लत बढती जा रही है। वहाँ कम वस्त्रों और अश्लील संगीत पर नृत्य करते शराब के नशे में झूमते युवा वर्ग को देखा जा सकता है। इस सामाजिक बुराई को हम आधुनिकता की संज्ञा दे रहे हैं।

पब ऊ आकरसक भवन, जहां पै बियर सराब
परसै अपने हाथ से, मस्ती भरा सबाब
मस्ती भरा सबाब जाम पग पग छलकावै
पब कलचर कै ठावैं बल खावैं
कह जाहिल कबिराय, आधुनिकता से
बन के भूत सवार होइगवा है पब कल्चर। [14]

फुरै अहैं मुख्तार जे, कहा जाँय मजबूर
असली मालिक देस कै, अबहिंउ अहैं मजूर। [15]

चुनाव का जब समय आता है तो लोग तरह-तरह के वादे करने चले आते हैं और जितने के बाद पाँच साल के लिए गायब हो जाते हैं। फिर चुनाव निकट आता तो पुनः दिखाई देते हैं और कहते हैं इस बार तो गलती हो गयी अबकी बार जिता दीजिए फिर देखते हैं।

बेकारी कै मार सहित है, बोला इक बेकार
हमहूँ कारोबार जो पाइत होइ जातै उद्धार
हमरे मुँह से निकसा जाहिल माँगी मिली मुराद
वहि कइती वह कार है देखा, यहि कइती है बार। [16]

सामाजिक असमानता के खिलाफ जाहिल सुल्तानपुरी लिखते हैं कि- कैसे आज भी आजादी के इतने दिनों बाद ऊँच-नीच की खाई बनी है। किसी को खाने को नहीं अंट रहा है और कोई सडकों पर फेंक रहा है। वे कहते हैं की इस व्यवस्था के खिलाफ जो आवाज उठाए वही आज के समय में अपराधी है।

उनकी बखरी मा उँजियार है साथियों
हमरी नगरी मा अंधियार है साथियों
पूरी बगिया भरी है चिड़ीमार से
पर जे खोलै गुनहगार है साथियों। [17]
भरी बगिया मां माली की नजर के सामने जाहिल
चिड़ी मरवै करैं निधरक चिड़ीमार गजब होइगा। [18]

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि- जाहिल सुल्तानपुरी की कविता में सामाजिक बुराईयों के सभी स्वर किसी-न-किसी रूप में उभर कर सामने आयें हैं। चाहे वे जनता को ठगने वाले अफसर हों या राजनेता सबके ऊपर जाहिल ने अपनी कविता के माध्यम से व्यंग्य कसा है।

संदर्भ
[1] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 54 
[2] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 54 
[3] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 57 
[4] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 58-59 
[5] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 60 
[6] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 63 
[7] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 64 
[8] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 65 
[9] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 67 
[10] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 108 
[11] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 111 
[12] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 114 
[13] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 115 
[14] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 116 
[15] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 121 
[16] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 122 
[17] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 132  [18] ढाई आखर (अवधी काव्य संग्रह), जाहिल सुल्तानपुरी, अवध भारती प्रकाशन, हैदरगढ़ बाराबंकी, प्रथम संस्करण 2017 ई. पृष्ठ 133   

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