महादेवी वर्मा: छायावादी युग की प्रमुख स्तंभ

धरोहर
26 मार्च, 1907 :: 11 सितंबर, 1987
26 मार्च 1907 को फर्रूखाबाद में श्रीमती हेमरानी और गोविंद प्रसाद के घर जन्मी महादेवी वर्मा की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा वहीं हुईं। सन् 1921 में बरेली निवासी डॉ स्वरूपनारायण वर्मा से उनका विवाह हुआ। बाद में उच्चशिक्षा के लिए वे इलाहाबाद आईं और फिर वहीं की हो रहीं।

ख्यातिनाम कवयित्री को पद्म भूषण (1956), पद्म विभूषण (1988), साहित्य अकादमी फ़ैलोशिप (1979), तथा ज्ञानपीठ सम्मान (1982) से नवाज़ा गया था।


मैं नीर भरी दुख की बदली


स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झणी मचली!

मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वासों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली!

मैं क्षितिज भृकुटि पर घिर धूमिल,
चिंता का भार बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!

पथ न मलिन करता आना,
पद चिह्न न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में,
सुख की सिहरन हो अंत खिली!

विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही,
उमड़ी कल थी मिट आज चली

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