पीताम्बर दास सराफ़ 'रंक' की दो ग़ज़लें

पीताम्बर दास सराफ़ 'रंक'

ग़ज़ल - 1

   ( फाइलातुन फाइलुन फाइलातुन फाइलुन)

आज हैं, कल हों न हों, यह अनिश्चितता तो है
अनबुझे ये कुछ सवालात हैं, खलता तो है।

जो नहीं हैं, वे नहीं हैं, इस पर बहस नहीं
पर जो हैं, वे कल नहीं हैं, प्रश्न बनता तो है।

रचयिता का ये दिखाना कि उसके दम से हम
हैं, मगर उसका ये घमंड लचर लगता तो है।

हम नहीं तो ये जहां उसके किस हित के लिये
ये धरा, उसका रचा, जीव का हाता तो है।

वो हमें पाले,हमें देखता, उसकी खुशी
सोचता तो है हमारे लिये, जगता तो है।

वो हमारे करम देखे,हमारे धरम भी
शरम भी देखे, हमारे लिये लड़ता तो है।

तौलकर अपने तराजू में, फिर निर्णय दे वो
ज़िंदगी या मौत,उसके लिये आता तो है।

हो गया अब "रंक" उसको समय मिल भी गया
वो तराजू पे रखा, वो समझ रखता तो है।
                     

ग़ज़ल - 2


कर वही,जो दिल कहे, और कुछ, हरगिज़ नहीं
अपने दिल की सुन, किसी की कहन, हरगिज़ नहीं।

दिल कहे,उसकी मदद कर ,तो तन्मयता से कर
ग़र लगे, वो ग़लत है, उसकी तब, हरगिज़ नहीं।

जब कभी ऐसा लगे,कुछ ग़लत तो है यहाॅ॓
मत करो, बिल्कुल नहीं,जानकर, हरगिज़ नहीं।

टूटता है, टूटने दो, कहीं जुड़ जायगा
फिर उसे, वापिस लेने का कष्ट, हरगिज़ नहीं।

झोपड़ी टूटे अगर, टेक देना ही उचित
बारहा टूटे, उसे ज़बर धर, हरगिज़ नहीं।

ख़ुदगर्ज़ इंसान, जीता है तो, अपने लिये
दूसरों के वास्ते, रख दे सर, हरगिज़ नहीं।

भूख से तड़पे हुऐ से मिली रोटी मांगो
पहले घूरेगा, कहेगा, रहम, हरगिज़ नहीं।

चांद तारे, इस ज़मीं के लिये, नक्षत्र "रंक"
हम कहें, हमको ज़मीं दे, खसक, हरगिज़ नहीं।

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