काव्य: नरेंद्र कुमार

जूनियर रिसर्च फ़ैलो, फ़्रांसीसी भाषा विभाग, पॉण्डिचेरी विश्वविद्यालय, पुदुचेरी - 605014
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मैं झूठ क्यों बोलता हूँ


एक साहब ने फ़रमाया कि मैं काफी झूठ बोलता हूँ
हमने तो सिर्फ इतना ही बतलाया के
ये खूब बिकता है
सज्जनों की जुबान पर काफी सजता है
सच्चा तो दोस्तों से ही दुश्मनी पालता है
झूठ तो दुश्मनों को भी पास बैठाता है
क्या करूँ साहब इस सच्चाई का?
ना कहीं बिकती है, ना कहीं सभ्य संसार में टिकती है।
झूठ में काफी मीठा रस बहता है
सच से कड़वाहट रिसता है
सुना आपने ये झूठ काफी बिकता है
काफी दूर तक तो नहीं पर
सच से ज्यादा देर तक झूठ चलता है
बस इसलिए तो मैं झूठ बोलता हूँ
बिक गई वो सारी किताबें शाम तक
जिनमें झूठ लिखा था
खाक कर दी जलाकर वो सब किताबें जिनमें

सच छिपा था
आम-ए-कत्ल कर दिए सच्चे
और झूठों को राजसिंहासन सौंप दिए
समझे साहब ! इसलिए मैं झूठ बोलता हूँ
क्योंकि झूठ काफी बिकता है
झूठों को सम्मान नवाजे जाते हैं
सच्चों को रस्सी बख्शी जाती है।

मैं आम आदमी हूँ


मैं आम आदमी हूँ
मैं ही दबा-कुचला हूँ
इसलिए हर वक्त मैं ही मारा जाता हूँ
अगर यकीन ना हो मेरा तो
तारीख के पन्ने पलट कर देख लो
आईना देखना चाहते हो तो जाकर
जलियाँवाला बाग की मिट्टी का रंग देख लो
जिसने जड़ें हिला दीं फिरंगियों की
उस सत्तावन की क्रांति की एक झलक देख लो
इससे ज्यादा तो क्या कहूँ
अपने घर जाकर विभाजन में मारे गये
किसी बुजुर्ग की लटकी हुई तस्वीर देख लो
अगर घर में ना मिले तो

दूर-दराज़ की बुआ की लुटी हुई अस्मिता की कहानी
तेरी अपनी दादी की सिसकियों में ढूंढ लो
मैं आम आदमी हूँ
मैं ही दबा-कुचला हूँ
इसलिए हर वक्त मैं ही मारा जाता हूँ
मैं ही सीमाओं पर जागता हूँ
मैं ही खेत की मेड पर ठण्ड में ठिठुरता हूँ
मैं ही भरी दोपहरी में किसी चौराहे पर तपता हूँ
मैं ही हर देश की सरकारें चुनता हूँ
मैं आम आदमी हूँ
मैं ही दबा-कुचला हूँ

इसलिए हर वक्त मैं ही मारा जाता हूँ
सन् चौरासी में मेरी ही दाढ़ी पकड़कर घसीटा जाता हैं
और मैं ही गोधरा मे जलता हूँ
मैं ही दादरी में कटता हूँ
मैं ही किसी सिनेमा घर मे पिटता हूँ
मैं ही महाराष्ट्र में पिसता हूँ
मैं ही देश के किसी हिस्से में भूख से बिलखता हूँ
मैं ही सारे राष्ट्र गीत लिखता हूँ
फिर भी कोई मुझे बतला दे
मैं कौन से गान में गाया जाता हूँ
मैं आम आदमी हूँ
मैं ही दबा-कुचला हूँ
इसलिए हर वक्त मैं ही मारा जाता हूँ
एक अरसे से बड़ा अजीब हो रहा हैं
मैं देश चला रहा हूँ
वे सरकारें चला रहे हैं
मैं काम पीट रहा हूँ
और वो दाम पीट रहे हैं
देश गरीब हो रहा है
और वो अमीर हो रहे हैं

सारे अधिकार उनके और मेरे हिस्से में सिर्फ फर्ज आ रहे है

क्योंकि मैं आम आदमी हूँ
मैं ही दबा-कुचला हूँ।

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