काव्य: पल्लवी मिश्रा

पल्लवी मिश्रा

मोहनजोदारो*

तुम हो नहीं सकते
मौत का टीला,
किसने पुकारा तुम्हें,
इस नाम से - मोहनजोदारो!

कालचक्र की तत्पर गति पर
गठीले प्रहरी माटी-पुरूष
तुम,
इस युग की
अतृप्त लालसा हो।

क्रम और कर्म की जीवटता से ऊबा
यह युग,
तुम्हें सलीके से जान लेने की
असीम लालसा लिए
ढूँढ़ना चाहता है-
तुम्हारी परतों में,
अपनी ख़ातिर-
तल्लीनता की ख़ुशगवारी।

तुम्हारी मध्यम आँच पर,
सुलगती रही
जीवन की ऊष्मा
माटी के चूल्हे,
लिपे-पुते आँगन
सुगंधित रसोई
उबटन बसे स्नानागार
घट, गाँव, गली
माटी पर माटी से
उकेरे खुशहाल निशाँ।

माटी को गूँथती, भिगोती, छानती
उंगलियों के स्नेहसिक्त स्पर्श पर
केसर की धीमी सुगंध लिए
उन्मत्त, मोहनजोदड़ो का यौवन।

तपते ताँबे पर
चमकती मुस्कान
कौशल से गढ़ती
पशुपतिनाथ की मूर्ति
गढ़ती और उठाती गई अमूर्त आस्था।
तुम्हारी जीवित उत्कंठा
मूर्त करती गई भाव
सुलगते चुल्हों से
उगलते रहे स्वर्ण, स्वर्णकार!

मोहनजोदारो!
धरती अब नहीं हो पाती तैयार,
माटी के लेप पर
बारिश की सोंधी महक का दुशाला ओढ़
ताँबे की चूड़ियों और
सोने की नथ और कुण्डल पहन।
थकी धरती,
उठाती है अंतहीन बोझ
दुस्सह दुर्गंध
मासिक-धर्म और वीर्य-सिक्त कूड़े
मल, मूत्र,का सैलाब
कठोर उद्योग।

धरती अब उफनती है
अपने ही दुख से
शायद हो लेना चाहे कभी
मौत का टीला,
धरती अब भी चाहती होगी
स्नेहसिक्त स्पर्श
कि-
बँट जाए उसके हिस्से आई
यह भारयुक्त दुर्दिनी।

ब्लड-मून

जीवन के खगोल पर
इश्क़ का ग्रहण
नीला, तम्बई आवारा चाँद
ख्वाबों की मजलिसें
रोशन होती रहीं
और
चमकती रही दरो-दीवार
जज्बातों की।

ग्रहण का मारा
तुम्हारे-
इश्क़ का चाँद
उस पर जज्बातों की लुका-छिपी
अमावस के झूठे अँधेरों
पूरनमासी के धुंधलके से
सराबोर होती
किसी वेदनाबाला-सी
पृथ्वी।

उफनते ज्वार-भाटे पर
फूँक दो-
घाट के पंडित का मंतर
अनगिनत तुलसी-दलों से
शुद्ध न हो सकेगा समंदर।
इश्क़ की चाँदनी का दुराग्रह
और उस बेपरवाह चाँद को भुला
तेज कर ही दो
घरों की दिया-बाती।

इश्क़ सा चंद्र-ग्रहण भी
और उस पर
नीली पड़ती तम्बई पूरनमासी
उकेरती जाती है
किसी अंजान समय के निशान।
             

अंतस का पलाश

वर्जनाओं की शाखों पर
प्रेम-सा उगा पलाश
दहकता है बसंत-भर,
दिखता है हर छोर से
विद्रोही आग-सा
सुर्ख़ और गंधहीन।

बेचैन हवा
किए जाती है जतन
ऊँचे, खड़े ठूँठ पर
विद्रोह-सा उग आया पलाश
झरे-झरे, जरा जल्दी झरे।
मानो विघ्न-सा उठा हो
अरण्य के हृदय पर
पलाश का विद्रोही प्रेम।

वर्जित प्रेम - जो उग आया
पत्तियों के प्रश्रय बिना
निंदित है,
कि भर उठा है
लाज से सारा अरण्य।
यह फुसफुसा गई है हवा,
झाड़ियों और झुरमुटों तक से।

फिर भी-
सुर्ख़ और गंधहीन पलाश
दहकता, झरता, बिखरता है
पूरे अरण्य में
बसंत-भर।

अंतस का पलाशवन
उस पलाशी रण-भूमि सा
युद्ध-रत और विद्रोही
जहाँ, झरते, बिखरते पलाश
छोड़ गए थोड़े पलाशी रंग
जो छिटके रह गए
पूरे उपवन!

मेरे अंतस का पलाशवन
जहाँ वधित हुई भावनाएँ
आहुत हुई इच्छाएँ,
उकेर दी गई मानस-पटल पर
लकीर वर्जनाओं की।

जीवन के बसंत पर,
अर्थपूर्ण है-
प्रेम का पलाश होना
सुर्ख़ और गंधहीन!

ठूँठ पर उगते पलाश का ऐश्वर्य
जीवन-समिधा के अग्निहोत्र की
सम्पूर्ण अभिव्यंजना है।

अतीत के लोग

मैंने कभी नहीं चाहा
झाड़ना, पोछना
यादों की गठरी में बंद
पीतल, काँसे, चाँदी की
पुरातन मूर्तियों को।
बीती यादें-
काठ, ताम्र, लौह सी
सीलन भरी कोठरी में बंद
जिन पर चढ़ा दी है साँकल,
ओढ़ ली है भुलावे की चादर।

गिरहें खोलूँ -
तो दर्द-से बिलबिला उठता है वक़्त
उससे रिसते घाव पर
फिर-फिर बाँधती हूँ पट्टियाँ
छुपाती हूँ उन ज़ख़्मों को
सबसे,
ख़ुद से।

उन्हीं ज़ख़्मों पर बंध पाती है पट्टियाँ
जो दिख जाते हैं आँखों से।
ज़ख्म जो नहीं दिखते
बन जाते है सर्द बर्फीले
विषादी ताल।

वक़्त के बदरंगे कैनवास पर
जिन्हें संभाले,सींचने की कोशिश की
वो मालती, शिउली, जूही, अमलताश
अब पुरातन और क्लांत दिखते हैं।
उन्होंने स्वीकार रखा है वक़्त
जी लेने की विवशता के साथ
ज्यों मैंने ही बाँध छोड़ी है
यादों की बटोरन।

मैं नहीं जीना चाहती अतीत
न चाहूँगी मिलना कभी
उन सभी से-
जिन्होंने गाहे-बगाहे
दर्ज़ की अपनी उपस्थिति।
ये वही लोग हैं
जिन्होंने ढूंढा हैं मुझमें
कमजोरियों के निशान।

ये वही लोग
जिन्होंने हमेशा ही रखी
मेरी सज्जनता से ऊपर
मेरी निश्छल भूलें
जिन्होंने तल्ख़ अंदाज़ में कसे तंज
जब कभी इन्हें दिखी
मेरे हाथों में सधी-हुई कूची।

अतीत के वो लोग-
जिन्होंने बिसार दिया
मेरी हर मासूमियत, हर हँसी
हर वो जतन
जो किए मैंने
कि दे सकूँ उन्हें थोड़ी हँसी
थोड़ी बेपरवाही और सहूलियत।

ये वो लोग हैं
जिन्होंने नहीं किया कभी
मेरे प्रेम पर फख्र
जिनके लिए मैं
बनी रही एक पहिया
जिससे तय कर पाए
वो अपने सफ़र की बोझिली।
उन रास्तों से बिछड़ कर
नहीं किया कभी मेरा इंतज़ार
मेरी यादों में बसे लोग
जिन्होंने
ज़िंदा रखा मुझे
अपनी शिकायतों में।

मैं नहीं जीना चाहती
कोई-सा भी वक़्त
दुबारा।
एक बेदिली
हर आने वाले कल को
आज ही जी लेना चाहती है
कि ख़त्म होती जाए
वक़्त के कैनवास के पास रखी
रंगो की डिबिया।

एक कशिश बनी रहती है
जान पाने की -
न जाने क्या हो,
वक़्त के उस पार
कैसी उजली हो वह चादर
जिसे ओढ़,
नहीं करना पड़ता
भूलने का भुलावा।

अपरिचित होता प्रेम

किस्सों की अलगनी
कविताओं की पोटली में
बँधा प्रेम
दिखता है क्लांत,
शब्दों के नर्म गलीचों पर बिछा हुआ।

प्रेम अपरिचित आगन्तुक सा
जिसका आना,
कम कर जाता है
आम दिनों की ऊब।

स्वर्ण-सा प्रेम
सुनार की तराजू पर तुलता
तरुण सुंदरी की-
वह असीमित इच्छा है
जो गढ़ लेती है,
स्वर्ण के विविध आकार
मन ही मन।

न आँखों के कोरों पर
न पाँवों की टूटती रवानगी पर
ठहर पाता है प्रेम।
सुनार की धौंकनी-सी उठती साँस
आँखों को जलाए देती
धौंकनी की आँच
नहीं स्थिर कर पाती
प्रेम की यायावरी।

प्रेम की जपमाला में
हर मनका कोहिनूर
जिस पर होते निष्ठुर दावों ने
ठहरने नहीं दिया
प्रेम को किसी ठौर।

प्रेम,
सूरज की तलाश में
उड़े इकरस के
वो खूबसूरत पंख
जिनका पिघलना,
धरती पर गिरना,
बिखर जाना हो
एक सुनिश्चित विधान।
मोहनजोदारो* - मोइन जो दारो, अर्थात मृतकों का टीला

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