लघुकथाएँ: प्रदीप उपाध्याय

प्रदीप उपाध्याय

मुक्ति

आज श्मशान घाट पर स्मिता को अंतिम विदाई के लिए वे लोग एकत्रित हुए थे। किसी ने पूछा कि,  “यार, आलोक की पत्नी तो उसके साथ नहीं रहती थी। शादी के आठ साल बाद ही तो उसने स्मिता को घर से निकाल दिया था और दोनों बच्चों को अपने पास रख लिया था। सुना है कि उसने किसी को रख भी लिया है और उसके दोनों बेटे भी उससे नाराज़ चल रहे हैं।”

“हाँ,  यह सही है। इनका तो कोर्ट में मुकदमा भी चला और कोर्ट ने आलोक को अपने मकान के एक हिस्से में उसके रहने, बच्चों से मिलने और गुजारा भत्ता तक देने के आदेश दे दिये थे लेकिन आलोक नियमित रूप से गुजारा भत्ता तक नहीं देता था। अब तो खैर उसके बच्चे भी बड़े हो गए हैं और अपनी खुद की गृहस्थी बसाकर अपने पिता से अलग रह रहे हैं। उनके द्वारा माँ का ध्यान रखने का तो प्रश्न ही नहीं था।” उसने कहा।

“अरे हाँ यार, जैसा बाप वैसे बेटे। लेकिन सुना है कि अभी जब स्मिता को ब्रेन हेमरेज हुआ था तब सभी इकठ्ठा हो गए थे और उसका इलाज भी करवाया।”

“अरे सब बनावटी दुनिया है। अच्छे से इलाज करवाया होता तो बच न जाती" क्या तुम्हें नहीं मालूम कि स्मिता पढ़ी-लिखी तो थी नहीं। गुजारा-भत्ता और लोगों के घरों में काम करने पर जो पैसा मिल जाता था, उसी से अपनी गुजर बसर करती थी लेकिन कई दिनों से आलोक ने गुजारा-भत्ता देना बन्द कर दिया था। स्मिता की शिकायत पर कोर्ट ने गिरफ्तारी वारंट भी जारी कर दिया था। ऐसे में बेचारी कैसे गुजर-बसर करती।”

“हाँ, सही कह रहे हो। अच्छा ही हुआ कि स्मिता को इन झंझटों से मुक्ति मिल गई।”

उन दोनों के वार्तालाप को सुन रहे तीसरे व्यक्ति ने आँख दबाते हुए कहा कि, “चलो भाई, पाँच लकड़ी चलकर दे दें अब तो शरीर भी मुक्त हो गया और आलोक को भी गुजारा भत्ता देने से मुक्ति मिल गई।”

और तीनों जन ठठाकर हँस पड़े।

ऑफ़िस का अनुशासन

“मैडम, वास्तव में मेरा बच्चा सीढ़ियों से गिर गया था और उसे गहरी चोट लगी थी। इसी कारण मैं ऑफ़िस नहीं आ सकी लेकिन दूरभाष पर मैंने सूचना कर दी थी।”

चंचला ने सिसकते हुए अपना स्पष्टीकरण दिया लेकिन मैडम ने डपटते हुए कहा, “यह तो तुम्हारी हमेशा की तरह की बहानेबाजी है। यह सब नहीं चलेगा। नौकरी करना है तो ऑफ़िस आने में नियमितता रखें और घर की समस्याओं को घर तक ही सीमित रखें। ऑफ़िस के अनुशासन का पूर्ण ध्यान रखें । आगे से इस तरह की अनुशासनहीनता मैं बर्दाश्त नहीं करूंगी। जाइये अपना काम निपटाइये।”

चंचला रुआँसी होकर अपनी सीट पर जाकर बैठ गई। वह सोचने लगी कि लोग कैसे अपने घर और ऑफ़िस के कर्तव्यों को पूरा कर लेते हैं।

अगले दिन मैडम बड़ी तेजी से ऑफ़िस में आयीं। सबको अलग-अलग बुलाकर आवश्यक हिदायतें  दीं। बड़े बाबू और स्टेनो को कुछ समझाया और कहा कि जो भी आवश्यक फाइल या डाक आदि हो, वह मेरे बंगले पर भिजवा देना, छोटी-छोटी बातों के लिए मुझे परेशान मत करना। इसके बाद मुख्यालय पर अपने वरिष्ठ अधिकारी को मैडम ने दूरभाष पर अवगत कराया कि सर आज तो मैं बहुत परेशान हूँ। बच्चे को बुखार आ गया है,  मुझे उसके पास रहना जरूरी है,  इसलिए मुझे दो-तीन दिन शायद बंगले से ही ऑफ़िस रन करना पड़ेगा। बॉस से चर्चा कर वे तत्काल अपने बंगले की ओर प्रस्थान कर गई, चंचला और स्टॉफ के अन्य लोग उन्हें जाते हुए देखते रह गए।

1 comment :

  1. पहली अपने अंजाम पर पहुँचने से रह गई और दूसरी एक और फार्मूला कथा का उदाहरण है।

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